जल संकट के स्थायी समाधान की तलाश

Author:कृष्ण गोपाल व्यास

पानी के मामले में भारत, दुनिया का सबसे अधिक समृद्ध देश है। इसके बावजूद उसे हर साल जल संकट से गुजरना पड़ता है। इसके अलावा, लगभग सभी जल स्रोतों में बढ़ता प्रदूषण, घटती क्षमता तथा संभावित जलवायु परिवर्तन का खतरा, धीरे-धीरे देषव्यापी चिन्ता का विषय बन रहा है। राष्ट्रीय जल नीति 2012 कहती है कि मौजूदा जल संकट के पीछे जल प्रबंध की कमी है। जल प्रबंध का अर्थ है लक्ष्य प्राप्ति के लिये प्लानिंग, माकूल व्यवस्था, मानव संसाधन जुटाना, नेतृत्व प्रदान करना, गतिविधि संचालन और नियंत्रण। उपर्युक्त लक्ष्य प्राप्ति के लिए उसके सभी पक्षों को समझना आवश्यक है।

जल संकट, हर साल, मानसून की बिदाई के बाद, अवांछित मेहमान की तरह आता है। अगले मानसून के आगमन तक जल स्रोतों को अपनी मौजूदगी का अहसास कराता है। उसके असर से अकसर स्टाप-डेम, तालाब, छोटी तथा मंझौली नदियाँ, कुए और नलकूप सूखते हैं। यह कहानी, हर साल दुहराई जाती है। उसकी मार गरीबों पर अधिक और अमीरों पर कम पड़ती है। इसका एक और पक्ष है। वह पक्ष है, स्वच्छ पानी की उपलब्धता का। यह भी अमीरी और गरीबी के आधार पर बंटा होता है। भौगोलिक नजरिए से यदि उपलब्धता की मेपिंग की जाए तो पता चलता है कि यह संकट सूखी नदियों के समूचे कछार में और बारहमासी नदियों की मुख्य धारा के आसपास कम और उसके कछार की सीमाओं की ओर अधिक होता है। 

जल संकट को कम करने के लिए नोडल विभाग द्वारा अनेक वैज्ञानिक तरीके सुझाए गए हैं। उन तरीकों को अपनाने के लिए पैरवी भी होती है। इसी क्रम में लोग अपनी-अपनी सफलता की कहानी को लेखों तथा पावर प्वाईंट प्रजेन्टेशन के माध्यम से पेश भी करते है। उस दौरान समाज की सहभागिता की भी चर्चा होती है लेकिन सफलता की किसी भी कहानी में उस प्रयोग या नवाचार के असरदार बने रहने की अवधि का उल्लेख नहीं होता। इसलिए समाज जब कुओं, तालाबों, नदियों तथा स्टाप-डेमों को सूखते या अनुपयोगी होते देखता है तो उसका विश्वास डगमगा जाता है। यह चुभने वाली खामी है। इसके अलावा, उन सभी सफल कहे जाने वाले तकनीकी हस्तक्षेपों को परिष्कृत करने और उनके लाभों के स्थायित्व पर अध्ययनों का देषव्यापी अभाव है। इस कमी को दूर करने और सही समाधान को समाज के एजेंडा पर लाने की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि आदि काल से पृथ्वी पर पानी का प्रबंध, प्रकृति, करती आई है। यह प्रबंध प्राकृतिक है जो समस्त जीवधारियों और वनस्पतियों के लिये वांछित मात्रा में जल उपलब्ध कराता है। उसकी व्यवस्था कायम रखता है। वह व्यवस्था महाद्वीपों और समुद्रों में समान रुप से सक्रिय है इसीलिए समुद्री पानी के खारेपन के लगातार बढ़ते रहने के बावजूद उसमें जीवन फल-फूल रहा है। पानी की इष्टतम उपलब्धता इंगित करती है कि जीवन की निरन्तरता के लिए वह सीमित संसाधन नही है। इसीलिए जल संकट के स्थायी समाधान के लिए प्राकृतिक जल प्रबंध को समझना होगा। अब बात परंपरागत जल प्रबंध की। 

प्रारंभ में भारत की आदिम आबादी ने प्राकृतिक जल स्रोतों से आवश्यकताओं को पूरा किया। जैसे जैसे बसाहटों का विस्तार हुआ और आवश्यकताओं में विविधता आई उसने प्रकृति में मिलने वाले पानी की मदद से कृत्रिम जल स्रोत विकसित किये। उसकी खोजी प्रवृत्ति ने स्थानीय धरती के भूगोल और जलवायु तथा अन्य नियंत्रक कुदरती घटकों से तालमेल बिठाती कालजयी एवं टिकाऊ जल संरचनाओं का निर्माण किया और प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भरता कम की। संक्षेप में, जल संकट की समस्या से मुक्ति के प्राचीन भारत में अपनाया जल प्रबन्ध का  मॉडल  मुख्यतः बरसात के पानी के कुशल प्रबंध का मॉडल था। कुछ स्थानों पर नदी जल के कुछ भाग को डायवर्ट कर तालाब भरे जाते थे। बड़ी नदी के पानी के सीधे उपयोग या विशाल बाँधों के निर्माण के बिरले उदाहरण मिलते हैं। लगभग सभी जगह छोटे-छोटे तालाबों के निर्माण का प्रचलन था। तालाबों का निर्माण धरती के गुणों और सिल्ट की निकासी को ध्यान में रख किया जाता था। कहीं-कहीं छोटी जल धाराओं पर तालाबों की श्रृंखला भी बनाई गई थीं। राजस्थान के मरूस्थली इलाके में बरसाती पानी को  टैंकों में जमा किया जाता था। जल संकट से मुक्ति के लिए बुन्देलखंड और तामिलनाडु की धरती पर तालाबों का जाल तथा मगध में आहर-पईन व्यवस्था को विश्वसनीय अमलीजामा पहना कर भूजल का उपयोग सीमित किया था। नमी संरक्षण को खेती का आधार बनाया था। विकेन्द्रीकृत जल प्रबन्ध अपनाकर जल संकट का समाधान खोजा था। कृत्रिम जल स्रोतों में तालाब, तडाग, पोखर, जलाशय, सरोवर, पुष्कर, पुष्करणी, कुँआ, बावड़ी, वापी, बैराज, नहरें और बाँध मुख्य हैं। 

मौजूदा समय में भारत में जल प्रबंध के दो मॉडल प्रचलन में हैं। पहला मॉडल  पाश्चात्य जल विज्ञान पर आधारित पानी का केन्द्रीकृत माडल है। इस मॉडल में, जलाशय, जलसंचय का केन्द्र होता है। कैचमेंट पानी मुहैया कराने वाला डोनर इलाका तथा कमांड, पानी का उपभोग करने वाला इलाका होता है। आजाद भारत के खाद्यान्न संकट, हरित क्रान्ति तथा अकालों ने उसे मुख्यधारा में पहुँचाया। दूसरा मॉडल  पानी के स्वस्थाने जल संग्रह का विकेन्द्रीकृत मॉडल है। इस मॉडल  में जहाँ पानी बरसता है उसे वहीं संचित कर उपयोग में लाया जाता है। बचा पानी आगे बढ़ता है।

केन्द्रीकृत मॉडल की मदद से भारतीय नदियों में प्रवाहित में लगभग 1869 लाख क्यूबिक मीटर पानी में से अधिकतम 690 लाख हैक्टर मीटर पानी का ही उपयोग संभव है। इस गणना में भूजल के योगदान को सम्मिलित नही किया है। यदि इसमें नदी जोड़ परियोजना के माध्यम से मिलने वाले अतिरिक्त पानी को भी जोड़ लिया जाए तो भी लगभग 1123 लाख क्यूबिक मीटर पानी को ही उपयोग में लाया जा सकता है। जल प्रबंध के केन्द्रीकृत मॉडल के आधार पर बनी समस्त परियोजनाओं के पूरा होने के बाद भी प्यासे कैचमेंटों की समस्या का हल नहीं निकलेगा। अर्थात केन्द्रीकृत मॉडल द्वारा देश के हर अंचल में पानी पहुँचाना और आवश्यकताओं को पूरा करना संभव नहीं है। अर्थात, केन्द्रीकृत मॉडल की उपयोगिता सीमित है। उसके लाभ भारत की पूरी धरती तथा देश की पूरी आबादी को नहीं मिल सकते। 

जल प्रबंध के विकेन्द्रीकृत मॉडल को जल संकट दूर करने के लिए समूचा रन-आफ और दोहन योग्य भूजल उपलब्ध है। यह मात्रा लगभग 2259 लाख हैक्टर मीटर है। यह मात्रा केन्द्रीकृत मॉडल की मात्रा की तुलना में लगभग दो गुनी है। उसकी पहुँच व्यापक है। विकेन्द्रीकृत मॉडल का लाभ भारत की पूरी धरती तथा देश की पूरी आबादी को मिलना संभव है। इस क्रम में कहा जा सकता कि विकेन्द्रीकृत मॉडल की मदद से हर बसाहट में जल कष्ट को समाप्त और समाज की अनिवार्य ज़रूरतों को पूरा किया जा सकता है। यही जल संकट का स्थायी समाधान है।