जल का महत्व (Essay on Importance of Water in Hindi)

Author:मोती सिंह राठौड़
Source:भगीरथ - अप्रैल-जून, 2009, केन्द्रीय जल आयोग, भारत

हम बदलेंगे तो जग बदलेगा इस विश्वास के साथ कार्य करते हुए हम जमाने को मोड़ सकते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं होता यारों तबियत से एक पत्थर उछाल कर तो देखो। अन्त में मैं तो यह कहना चाहूँगा कि जल से ही जीवन का अस्तित्व है इसलिये भविष्य में इस धरा पर जीवन की कल्पना करना हो तो कल के लिये जल को बचा के रखना अत्यंत ही आवश्यक है।

यह सर्वविदित है कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है क्योंकि हमारे देश में आज भी लगभग दो-तिहाई जनसंख्या के जीवन-यापन का मुख्य स्रोत कृषि ही है। आजादी के बाद हमारे देश में कृषि का विकास जिस गति से होना चाहिए था उस गति से नहीं हुआ। आज भी जीवन-यापन हेतु रोजगार की तलाश में ग्रामीणों का पलायन शहरों की ओर हो रहा है। लगातार बढ़ती जनसंख्या आज हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। हमें हमारी इस कमजोरी को ही ताकत बनाना पड़ेगा। हमारी सरकार को ऐसी रणनीति बनानी पड़ेगी जिससे हमारी बढ़ती हुई जनसंख्या अभिशाप न बनकर देश के विकास में सक्रिय योगदान देने में सक्षम हो। आजादी के बाद हमारे देश में कृषि को छोड़कर लगभग सभी क्षेत्रों में आशातीत वृद्धि हुई है। ऐसा भी नहीं है कि हमने कृषि के क्षेत्र में कोई प्रगति नहीं की है। वास्तव में हमारे देश के कृषि वैज्ञानिकों ने काश्तकारों के साथ मिलकर अच्छी प्रगति की है। वर्तमान समय में कृषि हमारे देश में बढ़ती हुई बेरोजगारी की समस्या से निजात पाने का एक सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र नजर आ रहा है।

हमें अपने कृषि क्षेत्रों में किए गए नवीनतम अनुसंधानों को प्रभावी ढंग से किसानों के खेतों तक पहुँचाना नितांत आवश्यक है। हमारी भूमि की उत्पादकता को बढ़ाने के लिये मृदा के स्वास्थ्य को अच्छा बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। आज किसान आँखें बन्द कर रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कर रहा है। इसलिये सरकार को ऐसी रणनीति तैयार करनी चाहिए कि जिस प्रकार से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशनकार्ड से ही अनाज, मिट्टी का तेल या चीनी का वितरण किया जाता है ठीक उसी प्रकार से रासायनिक उर्वरकों का बेचान भी मृदा स्वास्थ्य कार्ड के माध्यम से होना चाहिए। मृदा वैज्ञानिक द्वारा मिट्टी नमूने की जाँच कर बोई जाने वाली फसल के लिये खार एवं उर्वरकों की लिखित अनुशंसा मृदा स्वास्थ्य कार्ड में की जाती है। इस कार्ड के माध्यम से मृदा का पी.एच.मान, ई.सी., मृदा में उपलब्ध जैविक कार्बन, मृदा में उपलब्ध मुख्य पोषक तत्व (नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश) के आधार पर फसलों में खाद एवं उर्वरक की मात्रा देने की सिफारिश की जाती है। मृदा जाँच प्रयोगशाला में सुविधा उपलब्ध होने पर आवश्यकतानुसार सूक्ष्म पोषक तत्वों की जाँच कर उनकी भी सिफारिश की जाती है। उक्त कार्ड के माध्यम से ही उर्वरकों को बेचान करना चाहिए। ताकि मृदा का स्वास्थ्य अच्छा बना रहे तथा लम्बे समय तक अच्छा कृषि उत्पादन प्राप्त किया जा सके।

वर्तमान समय में किसानों को भी कृषि में व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाना अत्यंत आवश्यक है। किसान भाईयों को बाजार मांग के अनुरूप फसलों एवं उनकी किस्मों का चयन करना चाहिए। इसके साथ-साथ खेती में जहाँ भी उत्पादन घटाये बिना लागत कम करने की सम्भावना हो ऐसे अवसरों पर ध्यान देना चाहिए जैसे आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग, कीट-व्याधि नियंत्रण हेतु जैविक कीटनाशक एवं भिन्न कीटों का उपयोग करना इत्यादि।

कृषि उत्पादन में बीज का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्नत बीज के उपयोग द्वारा पैदावार में 15 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी होती है। कई बार किसानों को बुवाई के लिये वांछित किस्मों का अच्छा बीज नहीं मिलता है। घटिया बीज की बुवाई के कारण कई बार वांछित उत्पादन प्रति इकाई प्राप्त नहीं होता है परिणामस्वरूप किसानों को आर्थिक रूप से नुकसान उठाना पड़ता है। अमानक बीजों के बेचान पर सरकार द्वारा कठोर कारावास का प्रावधान होना चाहिए। ऐसे अमानक बीज या घटिया कृषि आदानों के बेचान के दोषी पाए जाने पर विक्रेताओं के लाइसेंस को निरस्त कर देना चाहिए।

वर्तमान में रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ पर्यावरण प्रदूषण में महत्त्वपूर्ण योगदान कृषि में उपयोग किए जाने वाले घातक कृषि रसायनों के कारण हो रहा है। आज गाँवों और कस्बों में आसानी से ये रसायन उपलब्ध हैं। जब भी किसानों को खेत में कोई कीट या व्याधि के लक्षण नजर आते हैं ये सीधे दौड़कर निकटतम कृषि रसायन विक्रेता की दुकान पर पहुँच जाते हैं। अमूमन इन कृषि रसायन विक्रेताओं को कृषि का कोई आधारभूत ज्ञान नहीं होता है। वे तो केवल अपना मुनाफा कमाने के लिये ऐसा कृषि रसायन पकड़ा देते हैं जिनमें उनको आर्थिक रूप से फायदा अधिक होता है। कई बार तो जहर का असर बढ़ाने के लिये दो-दो रसायनों को मिलाकर छिड़काव की सलाह इन दुकानदारों द्वारा किसानों को दी जाती है। एक बार तो कीट-व्याधियों का खात्मा हो जाता है लेकिन अगली पीढ़ी के कीटों में जहर के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप इन कीटों पर हल्के जहर वाले रसायनों का कोई असर दिखाई नहीं पड़ता है। ये घातक रसायन हमारी खाद्य शृंखला में घुस जाते हैं और धीरे-धीरे से जानलेवा बीमारियों को जन्म देकर व्यक्ति की आयु को कम कर देते हैं। इन रसायनों के प्रभाव तुरन्त न होकर शनैः-शनैः जानलेवा बीमारियों का रूप धारण कर देश के आमजन के स्वास्थ्य को कमजोर कर मौत के मुँह में धकेलते हैं। सरकार को चाहिए कि जिस प्रकार से एलोपैथी दवाओं को बिना अधिकृत डॉक्टर की पर्ची के बिना विक्रय करना कानूनी जुर्म होता है ठीक इसी प्रकार से सक्षम कृषि अधिकारी के लिखित आदेश के बिना ऐसे कृषि रसायन के विक्रय पर तुरन्त प्रभाव से सरकार को प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए।

कृषि में मृदा के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है सिंचाई का जल। आमजन एवं काश्तकार यह तो जानता है कि जल ही जीवन है लेकिन उसके उचित उपयोग के प्रबन्धन पर वो ध्यान नहीं देते हैं। हम सभी जानते हैं कि जल प्रकृति की अनुपम कृषि है लेकिन उसके उपयोग में संयमता नहीं बरतते हैं। लगभग 97 प्रतिशत जल महासागरों में खारे पानी के रूप में है 2 प्रतिशत बर्फ के रूप में पर्वत शृंखलाओं पर जमा हुआ है शेष बचे 1 प्रतिशत जल ही हमारे पास उपयोग के लिये उपलब्ध है। हमारे पास उपलब्ध जल में से सर्वाधिक जल का उपयोग कृषि में किया जाता है। आज इस बात की सख्त आवश्यकता है कि हमें सिंचाई जल का अधिकतम सक्षम तरीके से उपयोग करना वर्तमान समय की मांग है।

कृषक भाईयों को चाहिए कि जलस्रोतों से खेत तक पानी पहुँचाने के लिये कच्चे धोरों का उपयोग कभी नहीं करें। जलस्रोत से खेत तक पानी को पहुँचाने के लिये सदैव सीमेंट की पक्की नाली, सीमेंट के पाईप, एच.डी.पी.ई., पी.बी.सी. या प्लास्टिक पाइप लाइनों का ही उपयोग करें ताकि जल परिवहन के दौरान कम से कम जल की क्षति हो। सिंचाई जल की क्षमता को बढ़ाने के लिये सिंचाई की उन्नत तकनीक जैसे फव्वारा एवं रेनगन पद्धति का फसल के अनुरूप चयन करें। फलदार वृक्षों में बूँद-बूँद सिंचाई पद्धति का उपयोग करें। अब तो पानी की अहमियत को समझते हुए कुछ प्रगतिशील जागरूक कृषक जिन फसलों में पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी अधिक होती है, ऐसी फसलों में भी बूँद-बूँद सिंचाई पद्धति का उपयोग कर प्रकृति के इस अमृत तुल्य जल का सर्वश्रेष्ठ उपयोग कर रहे हैं। ऐसी फसलों में प्लास्टिक मल्च का भी उपयोग कर सिंचाई जल का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सकता है। विश्व समुदाय के प्रबुद्ध लोग अब तो कहने लगे हैं कि भविष्य में युद्ध जमीन के लिये नहीं परन्तु पानी के लिये होगा। पानी प्रकृति का अमूल्य संसाधन है जिसको हम प्रकृति की निःशुल्क देन मानते हैं लेकिन आज गाँवों में दूध और शहरों में पानी लगभग एक ही मोल बिक रहा है। जिसकी कल्पना हमने पहले नहीं की थी।

हमारे देश में पानी का मुख्य स्रोत मानसून ही है। लेकिन जंगलों के कटने एवं जलवायु परिवर्तन के कारण अब मानसून का सत्र मात्र 90 से 100 घंटे के मध्य ही रह गया है। इसलिये मानसून के दौरान प्राप्त वर्षाजल को अधिक प्रभावी ढंग से एकत्रित कर जब जरूरत हो तब किसान भाई अपनी फसलों को खरीफ में बचाने के लिये जीवन रक्षक सिंचाई के रूप में उपयोग कर सकते हैं। वर्षाजल के संग्रहण के लिये खेत में उचित स्थान पर खेत तलाई (फार्म-पॉण्ड) बनाकर वर्षाजल को आसानी से एकत्रित किया जा सकता है। पश्चिम राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके में कहते हैं कि देशी घी डुल (गिर) जाएगा मुझे कोई अफसोस नहीं होगा लेकिन पानी डुल गया तो मुझे बहुत अफसोस (दुःख) होगा। इस बात से ही जल की महत्ता समझ में आती है। हमारे पूर्वजों ने भी कहा कि जिस इन्सान के खेत में से वर्षा का पहला पानी बहकर निकल जाये उसको डूबकर मर जाना चाहिए उसको खेती ही नहीं करनी चाहिए। उनके कहने में खेतों को मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई कर खेत को खुला छोड़ देना चाहिए। इससे वर्षाजल के संरक्षण के साथ-साथ फसल में कीट-व्याधियों का प्रकोप भी कम होगा और खरपतवार भी कम उगेंगे। जिन क्षेत्रों में हल्की संरचना अर्थात रेतीली मिट्टी हो वहाँ पर गर्मी में जुताई न करें।

जिन क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर काफी गहरा है वहाँ पर कूप पुनःभरण कार्य कर भूजल स्तर को बढ़ाया जा सकता है। पक्के भवनों की छतों से वर्षाजल का संग्रहण कर जल का समुचित उपयोग किया जा सकता है। छतों से वर्षाजल का संग्रहण भी सीधा भू-गर्भ में पहुँचाया जा सकता है। अकृषि भूमि पर परकोलेशन टैंक के माध्यम से भूजल को पुनः भू-गर्भ में आसानी से पहुँचाया जा सकता है। ढलाऊ, पहाड़ी, अकृषि जमीन पर कन्टूर ट्रेंच, चेक डैम, गेबियन जैसी भूजल संरक्षण की तकनीक के माध्यम से अधिक से अधिक मात्रा में मृदा एवं जल का संरक्षण किया जा सकता है।

फसलों में अच्छे अंकुरण के लिये फसलों की बीजों के आकार एवं कठोरता के आधार पर बुवाई से पहले पानी में भिगोकर बुवाई करने पर अंकुरण आसानी से होता है। पानी में बीजों को भिगोने के समय सीमा फसल के बीजों के आकार एवं कठोरता पर निर्भर करेगी।

जहाँ तक संभव हो सके फसलों में सिंचाई दोपहर के बाद ही करें। कृषक भाइयों को इस बात का नियम बना लेना चाहिए कि वे छोटे क्षेत्रों जैसे नर्सरी, सीमित क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसल अथवा फलदार वृक्षों में तो सायंकाल ही सिंचाई करें ताकि सूर्य की गर्मी से वाष्प के रूप में उड़ने वाले जल से वांछित मात्रा में कमी की जा सके।

गोबर की अच्छी प्रकार से सड़ी हुई खाद कम्पोस्ट, सुपर कम्पोस्ट, प्रॉम इत्यादि के उपयोग से खेत की जल धारण एवं जल संचयन क्षमता में बढ़ोत्तरी होती है लेकिन रासायनिक उर्वरकों के कारण फसलों की जल मांग बढ़ जाती है। अतः जल के न्यायोचित उपयोग हेतु जैविक खेती अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण उपाय हो सकता है।

भूमि की विभिन्न गहराईयों से जल एवं पोषक तत्वों के समुचित उपयोग हेतु मिलवा खेती एवं अन्तराशस्य फसल पद्धति को अपनाना नितान्त ही आवश्यक है। खरीफ में अन्तराशस्य के रूप में अन्नवाली फसलों के साथ दलहनी या तिलहनी फसलों का समावेश अवश्य करें ताकि वर्षा कम होने पर भी किसान भाइयों को कुछ न कुछ उस खेत से अवश्य प्राप्त होगा।

ढलाऊ खेतों में किसान भाइयों को चाहिए कि वे ढलान के समान्तर समोच्च रेखा पर इकाई कर बुवाई करें। समतल क्षेत्रों में खेती की मेड़बन्दी कर भी वर्षाजल का संरक्षण किया जा सकता है। क्षेत्र में मानसून की अवधि को देखते हुए फसलों एवं किस्मों का चयन करें। मानसून की अवधि छोटी हो तो अल्प समय में पकने वाली फसलों एवं किस्मों की बुवाई करें। यदि मानसून की अवधि अधिक लम्बी हो तो लम्बी अवधि वाली फसलों एवं किस्मों की बुवाई करें।

बढ़ते औद्योगिकीकरण के कारण रोज नई स्थापित हो रही औद्योगिक इकाईयों में भी जल की आवश्यकता दिन-दोगुनी रात-चौगुनी गति से बढ़ रही है। जिसके परिणामस्वरूप भूजल पर निरन्तर निर्भरता बढ़ने के साथ-साथ इसका अत्यधिक मात्रा में दोहन किया जा रहा है। हमारी प्रवृत्ति भी भोगवादी, विलासिता एवं आधुनिकतावादी होने के साथ-साथ जल के प्रति संवेदनहीनता के कारण हम आवश्यकता से अधिक जल का उपयोग कर रहे हैं।

कल के सुनहरे भविष्य के लिये आज हमें पानी को बचाना अत्यंत ही आवश्यक है। जल का संचय करना वर्तमान समय की सर्वोपरि प्राथमिकता होनी चाहिए। परम्परागत जल संचयन संरचनाओं का जीर्णोद्धार करना भी अत्यंत आवश्यक है। मानव शरीर में भी लगभग 66 प्रतिशत जल विद्यमान होता है। पेड़-पौधों, मनुष्यों और जानवरों के अस्तित्व के लिये जल परम आवश्यक है। हमारे चारों ओर देखें तो बिना जल के जीवन की परिकल्पना करना संभव नहीं है। बिना जल के जीवन का अस्तित्व नजर नहीं आता है। हमारे देश में पानी की उपलब्धता की इतनी समस्या नहीं है परन्तु हमारे यहाँ पर पानी के समुचित प्रबन्धन की समस्या प्रमुख है। पानी का उचित प्रबन्धन हमें स्वयं के स्तर से करना चाहिए। हम बदलेंगे तो जग बदलेगा इस विश्वास के साथ कार्य करते हुए हम जमाने को मोड़ सकते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं होता यारों तबियत से एक पत्थर उछाल कर तो देखो। अन्त में मैं तो यह कहना चाहूँगा कि जल से ही जीवन का अस्तित्व है इसलिये भविष्य में इस धरा पर जीवन की कल्पना करना हो तो कल के लिये जल को बचा के रखना अत्यंत ही आवश्यक है।

लेखक परिचय


मोती सिंह राठौड़
शस्य वैज्ञानिक, विद्या भवन कृषि विज्ञान केन्द्र, बड़गाँव, उदयपुर (राजस्थान)

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