जल सम्बन्धी : विज्ञान-समाचार

Author:डाॅ. दीपक कोहली
Source:जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जुलाई 2013

 

तो पानी उबालने पर नहीं बनेंगे बुलबले


जलवैज्ञानिकों ने एक ऐसा उपकरण तैयार किया है जिसमें पानी को उबालने पर बुलबुले नहीं बनेंगे। अमेरिका के ‘मैक्कार्मिक स्कूल आॅफ इंजीनियरिंग, सउदी अरब’ की शाह अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी और मेलबर्न यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर इस उपकरण को तैयार किया है। शोध दल के सदस्य नीलेश ए पाटनकर ने कहा, ‘पानी में बुलबुले बनने की प्रक्रिया हमेशा से चली आ रही हैं। लेकिन हमने इसे रोककर नई खोज की है।’ शोध में यह सामने आया है कि एक विशेष तरह की परत चढ़े बर्तन में पानी को उबालने से बुलबुले नहीं बनेंगे। अध्ययन के नतीजे ‘जर्नल नेचर’ में प्रकाशित हुए हैं।

 

पेट्रोल की जगह सीवेज से चलेगी कार


पेट्रोल के बढ़ते दाम हर किसी के लिये समस्या बनते जा रहे हैं एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार आने वाले तीन साल में बढ़े पेट्रोल के दाम कोई समस्या नहीं रह जाएँगे क्योंकि आने वाले तीन साल में गाड़ियाँ पेट्रोल की बजाय सीवेज से चला करेंगी। जापान की एक कार बनाने वाली कम्पनी ऐसी योजना पर काम कर रही है जिससे सीवेज को ईंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकेगा। इस प्रक्रिया के तहत सीवेज को हाइड्रोजन में परिवर्तित करके इसे ईंधन सेल वाहनों में प्रयोग में लाया जा सकेगा।

जापान के ‘निकेई बिजनेस डेली’ के मुताबिक इलेक्ट्रिक सेल वाहनों की तुलना में यह ज्यादा कारगर होगी। आमतौर पर हाइड्रोजन पैदा करने का परम्परागत तरीका काफी कठिन है जबकि सीवेज से हाइड्रोजन बनाना अपेक्षाकृत अधिक सस्ता है। साथ ही यह पर्यावरण के लिहाज से भी काफी बेहतर है। इस प्रक्रिया में सीवेज को सुखाकर इससे मीथेन गैस पैदा की जाएगी। फिर गैस को गैस दोबारा गर्म करके इससे उच्च सांद्रित हाइड्रोजन गैस प्राप्त की जा सकेगी।

 

तैरने वाला सौर ऊर्जा संयंत्र


ऊर्जा की जरूरतें पूरी करने के लिये पूरी दुनिया में नए-नए विकल्पों की तलाश हो रही है। फ्लोटिंग सोलर पाॅवर प्लांट, यानी पानी पर तैरने वाला सौर ऊर्जा संयंत्र, इन्हीं विकल्पों में से एक है। जापान ने हाल ही में दस फ्लोटिंग सोलर पाॅवर प्लांट लगाने की घोषणा की है। हमारे देश में भी टाटा पाॅवर नाम की कम्पनी आस्ट्रेलियाई कम्पनी सीनेंजी की मदद से इसे विकसित कर रही है।

तैरने वाले सौर ऊर्जा संयंत्र की परिकल्पना वास्तव में सीनेंजी के कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य तकनीकी अधिकारी ‘फिल कोन्नर’ की खोज तरल सौर सरणी (लिक्विड सोलर ऐरे -एल.एस.ए.) के कारण सम्भव हुई है। इसमें हल्के प्लास्टिक के लैंसों का प्रयोग किया जाता है, जो डंडों के सहारे पानी पर तैरता रहता है और सूर्यमुखी फूल की तरह सूरज का पीछा करते हुए उसकी रोशनी को सौर बैटरियों पर एकत्रित करता है। इस लेंस का नियंत्रण कम्प्यूटर के जरिए किया जाता है, जिससे यह पूरी क्षमता के साथ सूर्य की रोशनी एकत्र कर पाता है। पानी पर तैरने के कारण तेज हवा से बचाने के लिये एलएसए को सहारा देने वाले ढाँचे की जरूरत कम पड़ती है। खराब मौसम में लेंस पानी में डूब जाता है और पानी बैटरियों को ठंडा कर देता हैं इस तरह पानी इसके कूलर एवं रक्षक, दोनों का काम करता है। इससे इसकी उम्र भी बढ़ जाती है। इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसे न तो बहुत ज्यादा सामग्रियों की जरूरत पड़ती है और न ही अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की। जमीन पर लगाए जाने वाले सौर ऊर्जा संयंत्रों की तुलना में यह सस्ता और टिकाऊ भी हो सकता है। इसके अलावा वैज्ञानिकों का दावा है कि यह पहले से उपयोग हो रहे औद्योगिक जलाशयों पर भी लगाया जा सकता है।

कैसे भर रही है ओज़ोन परत


निःसन्देह यह एक खुशख़बरी है और इस खबर से साबित होता है कि यदि दुनिया भर के लोग पर्यावरण के प्रति सचेत हो जाएँ जो हम हमारे पर्यावरण की रक्षा करने में सक्षम हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार ओज़ोन गैस की परत का नाश होने का क्रम बन्द हो गया है और एक अनुमान के अनुसार 2048 तक ओज़ोन का स्तर अपनी पूर्ववत स्थिति में आ जाएगा। सन् 1980 के बाद से ओज़ोन गैस की परत को नुकसान पहुँचने की दर खतरनाक ढंग से बढ़ गई थी और इसके लिये जिम्मेदार थे 100 से अधिक ऐसे पदार्थ और गैसें जो विभिन्न गैजटों और उपकरणों में प्रयुक्त हो रहे थे। सबसे अधिक हानि रेफ्रिजरेटर और वातानुकूलित संसाधनों में प्रयुक्त होने वाली गैसें पहुँचा रही थीं। परन्तु बाद में एक आम सहमति बनी कि इस तरह की गैसों पर निर्भरता कम कर दी जाएगी और अब उसका असर दिखाई देने लगा है।

अब न केवल ओज़ोन गैस की परत को नुकसान पहुँचने का क्रम बन्द हो गया है बल्कि दुनिया भर में स्किन कैंसर की दर में भी भारी कमी आने की सम्भावना दिखाई दे रही है। यही नहीं वैज्ञानिक मानते हैं कि सन् 2048 तक ओज़ोन गैस की परत 1980 के स्तर तक पहुँच जाएगी। ओज़ोन गैस की परत को पहुँच रहे भारी नुकसान को देखते हुए मॉन्ट्रियल प्रोटोकाल को मंजूरी दी गई थी जिसके तहत दुनिया भर की कम्पनियाँ हानिकारक गैसों पर से निर्भरता कम करने को राजी हुई थीं और अब उसका असर दिखाई दे रहा है। कहते हैं न, जहाँ चाह वहाँ राह।

क्यों हिल रही है धरती


स्पेन के शहर लाॅर्का में गत वर्ष आये भूकम्प का गहन अध्ययन करने के पश्चात वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि इसके पीछे भूजल के अत्यधिक दोहन का हाथ है। इस अध्ययन के लिये वैज्ञानिकों न सेटेलाइट का सहारा लिया जिससे ली गई तस्वीरों से यह जानने में मदद मिली कि ज़मीन के किस हिस्से में हलचल हुई थी और इसकी वजह से कौन सा हिस्सा अपनी जगह से विस्थापित हो गया।

इस अध्ययन ने यह पूरी तरह से स्थापित कर दिया है कि किस तरह से बोरिंग के द्वारा वर्षों तक ज़मीन से पानी निकालने से भूकम्प आने का खतरा बढ़ सकता है। स्पेन के शहर लाॅर्का में आये भूकम्प में केवल तीन किलोमीटर नीचे ज़मीन का हिस्सा अपनी जगह से विस्थापित हुआ था। इस बारे में वैज्ञानिकों का यह भी कहना था कि मात्र 5.1 तीव्रता के भूकम्प के बावजूद इतना अधिक नुकसान हुआ था। गहराई से अध्ययन करने पर वैज्ञानिकों ने यह जाना कि भूकम्प प्रभावित इलाके के निकट ओल्टों ग्वाडेलेन्टिन बेसिन के नीचे भूजल स्तर में पिछले 50 वर्षों के दौरान 250 मीटर की गिरावट दर्ज की गई है। किसान सिंचाई के लिये भूजल का बेतहाशा दोहन कर रहे हैं। इस बारे में कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के अध्ययनों से भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं पर काबू पाने में सफलता मिल सकती है।

आसमान में बागवानी


जमीन पर हरियाली कम हो रही है तो क्या हुआ आसमान तो है ना! कभी सोचा है आपने आसमान में बगीचा लगाया जाय तो कैसा हो? कैलीफोर्निया के ‘स्टीफन ग्लासमैन’ ने न सिर्फ ऐसा सोचा बल्कि इस सोच को पूरा करने के लिये भी जुट गए। स्टीफन का प्रोजेक्ट ‘अर्बन एयर’ कैलीफोर्निया के लाॅस एंजिल्स में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस प्रोजेक्ट का थीम है ‘गार्डन इन द स्काई’। सड़कों पर पसरे ट्रैफिक के बीच हरियाली को चुना है। इस थीम के लिये स्टीफन ने बाँस को चुना। बाँस की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी मज़बूती। स्टीफन ग्लासमैन को उम्मीद हैं कि उनका ‘गार्डन इन द स्काई’ वाहन चालकों को भी शान्ति और सुकून का अहसास देगा। साथ ही हरियाली बनाए रखने के लिये देश में ऐसे दूसरे प्रोजेक्ट शुरू करने की प्रेरणा भी बनेगा।

ग्लासमैन कहते हैं कि मैं शहरों के आसमान को इतना खूबसूरत बनाना चाहता हूँ कि जब भी ट्रैफिक में फँसे थके-हारे लोग ऊपर की तरफ देखें तो उन्हें ताजा हवा और सुकून का अहसास हो। फिलहाल इस प्रोजेक्ट के ब्लू प्रिंट तैयार किये गए हैं। मिस्टर ग्लासमैन के अनुसार सारी तैयारी पूरी हो गई है। डिज़ाइनिंग से लेकर इंजीनियरिंग तक सब कुछ तय हो चुका है । प्रोजेक्ट के लिये एक विज्ञापन बोर्ड भी दे दिया गया है। बस मंजिल से कुछ कदमों की दूरी बाकी है।

जापान बनाएगा प्रदूषण मुक्त शहर:


इलेक्ट्राॅनिक और तकनीक के क्षेत्र में अग्रज जापान की इरादा अब ऐसे शहर बसाने की ओर है जहाँ कार्बन उत्सर्जन शून्य के करीब होगा। जापान न केवल ऐसे शहर बनाएगा बल्कि अन्य देशों को बेचेगा भी।

जापान ने इस तरह के स्मार्ट शहर की परियोजना प्रस्तुत की। जापान के ‘कम्बाइंड एक्जीबिशन आॅफ एडवांस टेक्नोलॉजीज’ प्रदर्शनी में एक बड़े क्षेत्र में स्मार्ट सिटी का खाका प्रस्तुत किया गया। इसमें यह दिखाया गया कि वर्ष 2020 तक शहरी जीवन किस तरह का हो जाएगा। जापान की इस परियोजना में कार्बन उत्सर्जन को कम-से-कम रखने पर जोर दिया गया है।

इस तरह के स्मार्ट शहर में सौर, पवन और परमाणु ऊर्जा का अधिकाधिक इस्तेमाल किया जाएगा। इन स्रोतों से प्राप्त ऊर्जा को शहर के घरों, रास्तों और वाहनों में वितरित किया जाएगा। जाहिर है इस शहर में चलने वाले सभी वाहन बिना जैविक ईंधन के चलेंगे, सारे वाहन, घर और अन्य संसाधन स्मार्ट ग्रिड से जुड़े होंगे जो उन्हें ऊर्जामय रखेंगे। जापान ने टोक्यों के पास पाँच वर्ष से योकोहामा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट शुरू भी कर दिया है। यह एक छोटा शहर होगा जो बिल्कुल प्रदूषण मुक्त होगा।

आस्ट्रेलिया ने भी न्यू साउथ वेल्स के शहर न्यूकैसल को स्मार्ट ग्रिड से जोड़ने का काम शुरू किया है। इस पर शुरुआती तौर पर 100 मिलियन डाॅलर खर्च किये जा रहे हैं। दक्षिण कोरिया ऐसी ही एक परियोजना जेजु द्वीप पर शुरू कर रहा है। जिसकी लागत 200 मिलियन डाॅलर तय की गई है। चीन इस तरह की परियोजना के पीछे 7.3 बिलियन डाॅलर खर्च कर रहा है। मध्य पूर्व में आबूधबी के पास ऐसा ही एक स्मार्ट शहर बन रहा है। भारत में गुजरात की राजधानी के पास आकार ले रही गिफ्ट सिटी भी कुछ इसी तरह की परियोजना है। इसके अलावा निजी कम्पनियाँ भी इस तरह की पहल कर रही हैं। टोयोटो, जापान में टोयोटो स्मार्ट सेंटर बना रहा है। इसमें तरह-तरह के विकल्पों का इस्तेमाल कर ऊर्जा तैयार की जाएगी। जैसे कि मनुष्य के चलने से, गाड़ियों के चलने से, कचरे से, खराब पानी से आदि। यहाँ के निवासी जब अपने गैजटों का इस्तेमाल नहीं कर रहें होंगे तो वे स्वतः आॅफ हो जाएँगे ताकि ऊर्जा बचे।

सम्पर्क : डॉ. दीपक कोहली, 5/104, विपुल खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ-226010 (उत्तर प्रदेश), फोन : 0522-2303520, 2067117, ईमेल : deepakkholi64@yahoo.in