जंगल रहे, ताकि नर्मदा बहे

Author:पंकज श्रीवास्तव
Source:शिवमपूर्णा, अगस्त 2014
.यह कैसा शीर्षक! जंगल रहे, ताकि नर्मदा बहे! सात कल्पों के क्षय होने पर भी क्षीण न होने की पौराणिक ख्याति वाली और भू-वैज्ञानिक दृष्टि से भी विश्व की प्राचीनतम नदियों में से एक, नर्मदा तो युगों से बहती चली आ रही है। जंगलों के रहने या न रहने से नर्मदा के बहने का क्या सम्बन्ध है? यह मानने को जी भी नहीं चाहता कि नर्मदा जैसी विशाल नदी का अस्तित्व जंगलों के होने या नहीं होने से जुड़ा हो सकता है। परन्तु वर्तमान में प्राप्त हो रहे संकेत तो कम से कम इसी ओर इशारा करते हैं कि यहाँ के जंगलों की दशा यदि और बिगड़ी तो नर्मदा और उसकी गोद में रहने वालों के लिए आने वाले समय में काफी समस्याएँ उत्पन्न होंगी। जंगल और नर्मदा को लेकर यह चिन्ता निराधार नहीं है। वर्ल्ड रिर्सोसेज इन्स्ट्टीयूट वाशिंगटन डी.सी. द्वारा अनेक नदी बेसिनों को लेकर कराए गए एक अध्ययन में नर्मदा को विश्व के सबसे ज्यादा संकटग्रस्त 6 नदी बेसिनों में से एक पाया गया है जिनमें वर्ष के 4 सबसे शुष्क महीनों में कुल वार्षिक प्रवाह का 2 प्रतिशत से भी कम जल रह जाता है।

इस अध्ययन में यह आशंका व्यक्त की गई है कि इन नदी बेसिनों में रहने वालों को वर्ष 2025 आते-आते ढंग से जीने के लिए जरूरी पानी की आवश्यक मात्रा भी शायद ही नसीब हो। इसी प्रकार आई.आई.टी. नई दिल्ली द्वारा ग्रीन हाऊस गैसों के बढ़ने पर नर्मदा में जल उपलब्धता पर प्रभाव सम्बन्धी अध्ययन के निष्कर्ष भी चिन्ताजनक हैं। भारत के जनगणना महानिदेशक द्वारा मई 2006 में जारी किए गए 2001 से 2026 के बीच जनसंख्या वृद्धि के प्रक्षेपित आँकड़ों को आधार मान कर अनुमान लगाएँ तो नर्मदा अँचल के जिलों की कुल आबादी जो वर्ष 1901 में मात्र 65.69 लाख और 2001 में 3.31 करोड़ थी वह वर्ष 2026 आते-आते लगभग 4.81 करोड़ हो जाने का अनुमान है। इससे नर्मदा अँचल के जल-जंगल-जमीन पर कितना बोझ बढ़ जाएगा यह सोच भी सिहरन पैदा करती है। इस प्रकार के अध्ययनों व प्रतिवेदनों से प्राप्त संकेतों को समझें तो नर्मदा के कल्याणकारी रूप को बचाए रखने के लिए हमें समय रहते कुछ कड़े और बड़े निर्णय लेने के लिए तैयार होना पड़ेगा।

बहना किसी भी नदी का मौलिक अधिकार है, इसकी यथासम्भव रक्षा की जानी चाहिए। नर्मदानुरागी परिव्राजक अमृतलाल वेगड़ इसी बात को और ज्यादा सुन्दर ढँग से कहते हैं- ‘‘प्रवाह नदी का प्रयोजन है। नदी अगर बहेगी नहीं तो वह नदी नहीं रहेगी। अपने अस्तित्व के लिए उसे बहना ही चाहिए।’’ इसी प्रकार नदी के हक में आवाज उठाते हुए श्याम बहादुर ‘नम्र’ कहते हैं, ‘‘हर नदी का हक है, वह नदी की ही तरह बहे।’’ अपने उद्गम स्थल से सागर तक अनवरत यात्रा को जारी रखने के नर्मदा के इस मौलिक अधिकार में आज कमी आ रही है। इस कमी के वैसे तो अनेक कारण गिनाए जा सकते हैं पर मोटे तौर पर दो कारण सामने आते हैं - पहला तो जगह-जगह बनने वाले बाँधों की शृंखला, दूसरा नर्मदा के जलागम क्षेत्र में जंगलों की बदहाली। बाँधों के बनने से नर्मदा अँचल में आ रहे व्यापक बदलावों के फलस्वरूप पूरे क्षेत्र में पड़ने वाले प्रभावों को लेकर काफी लिखा- पढ़ा गया है और जन आन्दोलन भी हुए हैं परन्तु इस नदी के अनवरत प्रवाह में दूसरी बड़ी बाधा यानि जंगलों की बदहाली की चर्चा न तो अहमियत पा सका और न ही उनके हक में कोई जन-आन्दोलन हुआ।

यह अध्ययन उसी अधूरे रह गए काम की ओर राज और समाज दोनों का ध्यान आकृष्ट करने के इरादे से लिखी गई है ताकि बाँध बन चुकने के बाद आ चुके और आगे भी सदियों तक लगातार आने वाले बदलावों का पूर्वानुमान लगाते हुए बाँध, नर्मदा और जंगल, तीनों को लम्बे समय तक जिन्दा रखा जा सके।

इस अध्ययन के माध्यम से यह कोशिश है कि नर्मदा और इसके सहायक नदी-नालों तथा जंगलों के आपसी रिश्ते को वैज्ञानिक तथ्यों और मान्यताओं के आधार पर स्पष्ट किया जाए ताकि लोग भविष्य के कदमों की आहट को थोड़ा और साफ सुन सकें। इस कोशिश में नर्मदा अँचल के जंगलों की विविधता, उनकी सम्पन्नता और विशिष्टता तथा उनपर आसन्न संकटों की टोह भी ली गई है, नवीनतम वैज्ञानिक अनुसंधानों से मिल रहे चिन्ताजनक संकेतों के आइने में नर्मदा की भविष्य की छवि देखने का प्रयास किया गया है तथा सुधार के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों के बारे में चर्चा की गई है। इस अध्ययन में यथासम्भव ‘आँखों देखी सच’ को पहला आधार बनाया गया है। इसके लिए कई बरसों से जब-जब मौका मिला, नर्मदा के साथ-साथ बुढ़नेर, बंजर, शेर, तवा, देनवा, गंजाल, कनाड़, कावेरी, कारम, डेब, हथनी, गोई व बेदा जैसी इसकी सहायक नदियों और मैकल, सतपुड़ा तथा विन्ध्य पर्वतों में फैले जंगलों से सीधे साक्षात्कार करके ठोस लेकिन विद्वता की मिलावट रहित जानकारी इकट्ठी की गई है। दिमाग के साथ-साथ दिल को भी पूरी तरह खुला रखते हुए बार-बार नदियों से बातें की गई हैं, जंगलों द्वारा उठाए जा रहे सवाल सुने गए हैं और असहनीय दबाव के बावजूद अभी तक अविचलित खड़े सतपुड़ा और विन्ध्य पर्वतों के गम्भीरतापूर्ण मौन में निहित संदेश को बाँचने की कोशिश की गई है। पुराणों और प्राचीन ग्रंथों से लेकर वन विज्ञान और इन्टरनेट तक की मदद से सम्पन्न की गई इस रचना-प्रक्रिया में हृदय और मस्तिष्क के साथ-साथ हाथ पैरों का भी खूब प्रयोग करना पड़ा है इसीलिए इस अध्ययन की भाषा भी वैसी ही बन गई है। कहीं संस्कृत में पुरानों के श्लोक हैं तो कहीं नर्मदा तट पर लिखी गई कविताएँ, कहीं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सम्पन्न वैज्ञानिक अध्ययनों और सरकारी रिपोर्ट आदि का सारांश है तो कहीं विशुद्ध सांख्यिकीय आँकड़े। कुल मिलाकर यह नर्मदा से जुड़ी बातों को एक वैज्ञानिक की तरह बुद्धि की कसौटी पर कसते हुए समझने और एक साहित्यकार की तरह खुले हृदय से परोसने का प्रयास है।

विज्ञान की बात साहित्य की शैली में और साहित्य की बात विज्ञान की शैली में करना जरा मुश्किल है। दोनों के अपने-अपने दायरे हैं। वैज्ञानिक जानकारी की भाषा आमतौर पर सामान्य आदमी के लिए जटिल तथा उबाऊ होती है। इसके उलट साहित्यकार जब ऐसे विषयों को उठाते हैं तो उसमें अलंकारिक, सुरूचिपूर्ण, हृदयस्पर्शी भाषा का प्रयोग तो अवश्य होता है पर वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश घुसपैठ जैसा लगने के कारण त्याज्य होता है जिसके फलस्वरूप विवरण भावना प्रधान हो जाता है। नर्मदा के परिप्रेक्ष्य में कुछ सोचने और करने के लिए हमें भावना और बुद्धि दोनों की आवश्यकता है। इस काम के लिए साहित्यिक क्षुधा से पीड़ित विज्ञान का भूतपूर्व छात्र रहे होना तो मेरे काम आया ही, भारतीय वन सेवा में मध्यप्रदेश के जंगलों में बीस वर्षों का वनवास उससे भी अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ क्योंकि इससे मैं नदियों के संगीत और वनों की नीरवता की भाषा को थोड़ा- बहुत पढ़ने में सक्षम हो सका। मुझे पता है कि मेरा यह प्रयास न तो वैज्ञानिकों के लिए आसानी से हजम करने योग्य है और न ही साहित्यकारों द्वारा नजरअन्दाज कर दिए जाने लायक। पर इन दोनों के कटाक्ष की प्रतीक्षा में अपने मन को दिलासा देने के लिए मैं ‘अकबर इलाहाबादी’ का शेर याद करता हूँ-

‘अकबर’ का नग़मा क़ौम के हक में मुफीद है।
दिल को तो गर्म रखता है वो बे-सुरा सही।।


मेरी यह छोटी सी कोशिश भले ही साहित्यकारों और वैज्ञानिकों के लिए बेसुरी हो परन्तु नर्मदा अँचल के जल, जंगल और जमीन के लिए वास्तव में फिक्रमंद लोगों के दिलों में नर्मदा के प्राणस्वरूप वनों के लिए थोड़ी सी गर्मी पैदा कर सके तो मैं समझूँगा कि यह प्रयास सफल रहा।

यह अध्ययन एक हठीला सवाल उठाने की कोशिश है कि फिर भी जंगल कैसे बचें? और यह काम कौन करे? जंगल के हक में यदा-कदा बौद्धिक जुगाली करने की भूमिका तक खुद को सीमित कर लेने वाले महज जुबानी शुभचिन्तकों, जो कि समाज के सभी वर्गों में पाए जाते हैं, के बूते भी जंगलों का भला होने वाला नहीं हैं। ये अच्छे लोग हैं परन्तु जंगल बचाने के लिए केवल, आदमी होना ही काफी नहीं है अच्छे आदमियों का सक्रिय होना भी जरूरी है। केवल वन महोत्सव के दौरान पौधे रोपते हुए फोटो खिंचवाने, अखबारों में लेख लिखने और गोष्टियों, सेमीनारों में विद्वतापूर्ण वक्तव्य जारी करने से जंगल नहीं बचने वाले। दुष्यन्त कुमार की पंक्तियाँ याद आती हैं - ‘लफ्जों से निपट सकती तो कब की निपट जाती: पेचीदा पहेली है बातों से न हल होगी।’ पहेली वाकई पेचीदा है।

जंगल क्यों खत्म होते जा रहे हैं इस प्रश्न के मूल में गए बिना केवल वन अधिकारियों को कोसते रहने से काम नहीं चलेगा। कुदरती कानूनों में इन्सानी दखलअंदाजी बढ़ने से पर्यावरण सम्बन्धी समस्याएँ गहराती ही जा रहीं हैं। समय आ गया है कि ‘त्वदीय पादपंकजम नमामि देवि नर्मदे’ का उच्चारण करते हुए आस्था की इस पवित्र नदी में बरसों से गोता लगाने वाले भी अच्छी तरह समझ लें कि नर्मदा का स्वास्थ्य जंगलों के स्वास्थ्य से कितनी गहराई से जुड़ा है। नर्मदा के लिए धार्मिक या आर्थिक, किसी भी कारण से चिन्तित लोगों का यह जानना जरूरी है कि नर्मदा के प्राणस्वरूप वन क्षेत्रफल और घनत्व में निरन्तर सिकुड़ रहे हैं। गरीबी तथा आजीविका का अभाव जैसे घुन परोक्ष रूप से धीरे-धीरे जंगलों को खोखला करते जा रहे हैं और जनसंख्या विस्फोट का दानव उन्हें अपने करोड़ो हाथों से पकड़कर लील जाने को तैयार दिखाई देता है। ऐसे में इन मूक, बेबस जंगलों का क्या भविष्य है यह केवल वन अधिकारियों के लिए ही नहीं बल्कि सभी का, और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी जुड़ा है।

यद्यपि यह अध्ययन बाँधों पर केन्द्रित नहीं है परन्तु आज के दौर में नर्मदा के बारे में कोई गम्भीर बात करनी हो तो बाँधों के जिक्र से बचा नहीं जा सकता। अत: इस अध्ययन में मिट्टी और पानी के बारे में चर्चा करते समय यथास्थान बाँधों का जिक्र भी आया है परन्तु मेरा प्रयास यह रहा है कि बाँधों के इस जिक्र में अर्धसत्यों या सत्य के केवल सुविधाजनक पहलुओं से काम चलाने के बजाय बाँधों को समग्रता में देखा जाए। इसके लिए मैंने बाँधों के पक्ष में दी जाने वाली दलीलों के साथ-साथ उनकी खामियाँ उजागर करने वाली दलीलों को भी एक साथ सन्तुलित दृष्टि से देखने की चेष्टा की है। इन दोनों पहलुओं पर नजर डालने के बाद मैं समझता हूँ कि हमारी बढ़ती जा रही आबादी की बिजली- पानी की जरूरतों का बाँध से अच्छा कोई और विकल्प मिल सके तो बाँध बनाने के स्थान पर शायद उन विकल्पों को अपनाना ही अधिक श्रेयस्कर रहेगा। इस काम में जंगल कितनी चमत्कारिक और व्यापक भूमिका निभा सकते हैं यह समाज के सामने लाना इस अध्ययन का ध्येय है।

अपनी बात समाप्त करने के पहले यह खुलासा कर देना जरूरी है कि अध्ययन में व्यक्त किए गए विचार मेरे अध्ययन और अपने मन की उपज हैं और उनका मेरी सरकारी भूमिका से कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह अध्ययन किसी सरकारी या गैर -सरकारी या व्यक्ति के न तो समर्थन में है न विरोध में। हाँ नर्मदा की गोद में पल रहे जंगलों के हक में ईमानदारी से कुछ बातें कहने की कोशिश जरूर है इस कोशिश में मेरे यथासम्भव सचेत रहने के बावजूद कुछ न कुछ त्रुटियाँ अवश्य रह गई होंगी जिनके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। क्षीण सी ही सही पर उम्मीद जरूर है कि हम इन्सानों के कारण असहनीय दबाव का शिकार हो रहे जंगलों को बचाने के लिए इस अध्ययन में उठाए गए चन्द सवालों पर बारीकी से गौर करने का समय राज और समाज दोनों को आज नहीं तो कल मिलेगा ही और इन सवालों के जवाब खोजने के लिए ईमानदारी से कोशिश भी कभी न कभी जरूर होगी जिससे नर्मदा का कष्ट कुछ कम हो सकेगा। आगे चलकर क्या होगा और हम क्या करेंगे यह तो बाद की बात है, पहले हम बात की गहराई को महसूस तो कर लें। दुष्यंत कुमार के ही शब्दों में-

चाहें तो आप मुँह भी न खोलें जवाब में,
मेरा सवाल ये है कि दिल तो टटोलिए।


वन संरक्षक - खंडवा (म.प्र.) मो. 09425174773