जोड़ने की या उजाड़ने की योजना

Author:पीयूष बबेले
Source:इंडिया टुडे, सितंबर 2014
. प्रसिद्ध खजुराहो के मंदिरों से महज 20 किलोमीटर की दूरी पर एक नया आकर्षण जन्म ले रहा है। यह कुछ और नहीं बल्कि देश भर में सैकड़ों नदियों को एक-दूसरे से कुछ बेढब और निरा अवैज्ञानिक किस्म से जोड़ने की कोशिश है। हम इस नए अप्राकृतिक या कृत्रिम योजना को देखने के आकर्षण में पन्ना टाइगर रिजर्व के गंगऊ द्वार की तरफ बढ़ चले।

बाढ़ और सुखाड़ से निपटारा!


अब दशक से ठंडे बस्ते में पड़ी योजना को साकार किया जा रहा है। केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को नरेंद्र मोदी सरकार की मंजूरी मिलने के बाद फिजां में नए गुंताड़े चल रहे हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि केन में अक्सर आने वाली बाढ़ में बर्बाद होने वाला पानी अब बेतवा में पहुंचकर हजारों एकड़ खेतों में फसलों को सिंचित करेगी और हमारे अनाज उत्पादन में अप्रत्याशित तौर पर बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी।

इस सवाल का जवाब कौन देगा


दूसरा पक्ष पूछता है कि 9,000 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद उन नदियों को मिलाने से क्या फायदा जो आगे चलकर खुद ही यमुना में मिल जाती हैं। दूसरा सवाल यह कि पहले से ही बाघों को बचाने के लिए परेशान देश क्या पन्ना टाइगर रिजर्व के 5,258 हेक्टेयर हिस्से को डुब वाले बांध का स्वागत करने को तैयार है?

प्यासी जमीन को मिलेगा पानी!


ऐस ही कुछ बुनियादी सवालों की जमीनी हकीकत को टटोलने की चाह में गंगऊ द्वार खुला और हम पन्ना टाइगर रिजर्व के अंदर पहुंच गए। विंध्याचल की पहाड़ियों पर हरे-भरे जंगलों के बीच पूरी तरह उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते हुए हम केन नदी पर बने 99 साल पुराने गंगऊ बांध तक पहुंच गए। बांध का दृश्य विहंगम है, लेकिन गाद से पटा बूढ़ा बांध अब बहुत पानी नहीं रोक पाता। देशभर में नदियों को जोड़ने का खाका खींचने वाली नेशनल वाटर डेवलपमेंट अथॉरटी (एनडब्ल्यूडीए) ने इस बांध से 4 किमी ऊपर डोढन गांव में नया विशाल डोढन बांध बनाने का फैसला किया है। पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र की यह बात यहां हमें सही लगी कि बांध, नहर आदि से गाद की मात्रा बढ़ती जाती है और यह बाढ़ के खतरों को भी बढ़ाने का काम करती है।

आदिवासियों के 10 गांव डूब जाएंगे


यहां 9,000 हेक्टेयर के जलाशय में पानी रोका जाएगा। इस जलाशय में छतरपुर जिले की बिजावर तहसील के 10 आदिवासी बहुल वनग्राम सुकवाहा, भोरकुवां, घुघरी, बसुधा, कुपी, शाहपुरा, डोढन, पिलकोहा, खरयानी और मनियारी डूब जाएंगे। पास ही दो बिजली घर (पावर हाउस) बनाए जाएंगे जिनसे 78 मेगावाट हाइड्रोपावर का उत्पादन किया जाएगा। यहां से 220 किमी लंबी नहर निकाली जाएगी जो मध्य प्रदेश के छतरपुर और टीकमगढ़ जिले और उत्तर प्रदेश के महोबा जिले से होते हुए अंत में झांसी जिले के चंदेल कालीन बरुआसागर तालाब में केन के अतिरिक्त पानी को गिराएगी।

यहां से यह पानी 20 किमी आगे पारीछा बांध में पहुंच जाएगा। 4,317 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैली नहर अपने रास्ते में पड़ने वाले 60,000 हेक्टेयर खेतों को सींचेगी। एनडब्ल्यूडीए की विस्तार परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) में ऐसा दावा किया गया है। रास्ते में पानी के उपयोग के बाद 591 एमसीएम पानी शुद्ध रूप से केन नदी से बेतवा नदी को हर साल देने का दावा है. सबसे बड़ी बात यह कि अगर यह प्रयोग कामयाब रहा तो 150 साल से हवा में तैर रहे देश की अलग-अलग क्षेत्रों की नदियों को आपस में जोड़ने की 30 योजनाओं का सपना भी आंखें खोलने लगेगा।

केन में कहां है इतना पानी


डीपीआर के मुताबिक, पानी का असली उपयोग यहीं से शुरू होगा. उत्तर प्रदेश को केन का अतिरिक्त पानी देने के बाद मध्य प्रदेश करीब इतना ही पानी बेतवा की ऊपरी धारा से निकाल लेगा। परियोजना के दूसरे चरण में मध्य प्रदेश चार बांध बनाकर रायसेन और विदिशा जिलों में सिंचाई का इंतजाम करेगा इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जल संसाधन मंत्री उमा भारती इस योजना को लेकर खासे उत्साहित हैं।

केन-बेतवा नदी जोड़ से 9,000 हेक्टेयर के जलाशय में पानी रोका जाएगा। इस जलाशय में छतरपुर जिले की बिजावर तहसील के 10 आदिवासी बहुल वनग्राम सुकवाहा, भोरकुवां, घुघरी, बसुधा, कुपी, शाहपुरा, डोढन, पिलकोहा, खरयानी और मनियारी डूब जाएंगे। पास ही दो बिजली घर बनाए जाएंगे जिनसे 78 मेगावाट हाइड्रोपावर का उत्पादन किया जाएगा। यहां से 220 किमी लंबी नहर निकाली जाएगी जो मध्य प्रदेश के छतरपुर और टीकमगढ़ जिले और उत्तर प्रदेश के महोबा जिले से होते हुए अंत में झांसी जिले के चंदेल कालीन बरुआसागर तालाब में केन के अतिरिक्त पानी को गिराएगी।

34 हजार मेगावॉट बिजली का उत्पादन


उमा के उत्साह की एक वजह यह भी है कि वे इस योजना से जुड़ी उत्तर प्रदेश की झांसी लोकसभा सीट से सांसद हैं और इस योजना से जुड़े मध्य प्रदेश के छतरपुर और टीकमगढ़ जिले उनकी जन्मभूमि और राजनीति की मूल भूमि रही है। उमा ने तो लोकसभा में यहां तक कहा कि अगले 10 साल में देश में 30 नदी जोड़ो योजनाओं को पूरा किया जाएगा। इससे 34,000 मेगावाट बिजली तैयार की जा सकेगी।

इस के बारे में साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल (सैंड्रप) के निदेशक हिमांशु ठक्कर यह सवाल करते हैं, “सारी परियोजना इस परिकल्पना पर टिकी है कि केन नदी में फालतू पानी है। डीपीआर में यह मान लिया गया है कि बेतवा बेसिन में प्रति हेक्टेयर 6,157 क्यूबिक मिलियन पानी की जरूरत है जबकि केन बेसिन में प्रति हेक्टेयर 5,327 क्यूबिक मिलियन पानी की जरूरत है। केन बेसिन में पानी की जरूरत जान-बूझकर 16 फीसदी कम बताई गई ताकि यहां फालतू पानी दिखाया जा सके।”

बाघों को बचाने का नाटक


इसके अलावा पन्ना टाइगर रिजर्व और मौजूदा गंगऊ बांध की निचली धारा में बने घड़ियाल सेंचुरी को भी इससे बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। वैसे भी पन्ना टाइगर रिजर्व एक बार पहले भी अपने सारे बाघ खो चुका है और वहां अब नए सिरे से बाघों को बसाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को उठाने वाले भोपाल के पर्यावरण कार्यकर्ता अजय कुमार दुबे कहते हैं, ‘अगर बाघों का बसेरा उजाड़कर उन्हें मार ही डालना है तो सरकार बाघ बचाने का नाटक ही क्यों करती है?’ पर्यावरण से जुड़े इन्हीं अंदेशों के कारण कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के समर्थन के बावजूद पिछली सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने योजना को मंजूरी नहीं दी थी।

पर्यावरण कार्यकर्ता अरुंधति धू सवाल करती हैं, ‘बेतवा का पानी विदिशा में ही रुक जाएगा और केन का पानी झांसी को पारीछा में मिलेगा, लेकिन बीच में बने माताटीला और राजघाट बांधों का क्या होगा?” ये दोनों बांध इस बड़े इलाके की सिंचाई और पेयजल व्यवस्था के साथ ही 75 मेगावाट जलविद्युत का उत्पादन भी करते हैं। 300 करोड़ रु. लागत से बना राजघाट बांध तो 31 साल तक बनते-बनते 2006 में पूरा हुआ। इन सवालों पर एनडब्ल्यूडीए की दलील है कि ये बांध अपनी लागत वसूल कर चुके हैं। यानी इनके खत्म होने में कोई बुराई नहीं है।

सरकारी कागजों में उजाड़ दिए गए बसावट वाले गांव


ये सवाल जेहन में घूम ही रहे थे कि इस बीच गंगऊ बांध पर डोढन गांव के 40 वर्षीय मुन्नालाल यादव और 70 वर्षीय श्यामलाल आदिवासी मिल गए। श्यामलाल ने केन-बेतवा लिंक के बारे में कहा, ‘हां, अखबारों में कुछ देखा है लेकिन आज तक किसी सरकारी अफसर ने गांववालों से कोई बात नहीं की।”


केन-बेतवा में विस्थापित होने वाले पिलकोहा गांव के लोगकेन-बेतवा में विस्थापित होने वाले पिलकोहा गांव के लोगउनके साथ एक किमी का सफर कर डोढन गांव पहुंच गए जो पूरी परियोजना का केंद्र बिंदु है। गांव की चौपाल में लोगों ने बताना शुरू किया कि उन्हें न तो योजना के बारे में कुछ पता है और न ही यह पता है कि उन्हें कोई मुआवजा भी मिलेगा या नहीं। 24 घंटे बिजली सुविधा के दावे करने वाले मध्य प्रदेश के इस गांव में बिजली की लाइन नहीं पहुंची है। गांव पन्ना टाइगर रिजर्व के अंदर है, लिहाजा इस आदिवासी बहुल गांव तक आने वाला सड़क की वर्षों से मरम्मत न होने की वजह से पूरी तरह टूट चुके हैं।

जब उनसे पूछा गया कि 2007 में एनडब्ल्यूडीए की तरफ से तैयार प्रावधान के मुताबिक हर विस्थापित होने वाले परिवार को औसतन दो लाख रु. मुआवजा मिलेगा तो 65 वर्षीया पार्वती आदिवासी उखड़ गईं। उन्होंने कोहनी तक हाथ जोड़े (बुंदेलखंड में इस तरह के प्रणाम का मतलब है कि अब आप यहां से दफा हो जाइए) औैर कहा, ‘हम अपने गांव में ठीक हैं. हमें न बांध चाहिए, न चुटकी भर मुआवजा।’

इसी तरह जब हम दूसरे प्रभावित होने वाले गांव पिलकोहा पहुंचे तो लोगों ने यही बताया कि केन-बेतवा लिंक के बारे में उड़ती-उड़ती खबरों के सिवा उनके पास कुछ नहीं है। गांववालों के प्रति व्यवस्था की आपराधिक असंवेदनशीलता का नमूना देखना जरूरी है। पिलकोहा में बाकायदा 8वीं तक का सरकारी स्कूल चल रहा है। ग्राम पंचायत है। लोगों के पास मतदाता पहचान-पत्र हैं और 2,500 लोग यहां रह रहे हैं।

अभी 806 परिवार और विस्थापित होंगे


बांदा के आरटीआई कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित की याचिका पर 1 जुलाई 2010 को एनडब्ल्यूडीए ने बताया , “डीपीआर के मुताबिक पन्ना टाइगर रिजर्व के 10 गांव प्रभावित गांवों की सूची में आते हैं। डोढन बांध से प्रभावित होने वाले 10 गांवों में से चार गांव नामतरू मैनारी, खरयानी, पिलकोहा और डोढन पूर्व में ही वन विभाग द्वारा विस्थापति कराए जा चुके हैं। शेष छह गांव के 806 परिवार विस्थापित कराने शेष हैं।” गांव की चौपाल पर आरटीआई की चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते जैसे ही ये पंक्तियां आईं तो पिलकोहा के सरपंच जगन्नाथ यादव के हाथों से तोते उड़ गए।

सागौन, खैर और बांस के जंगलों से घिरे गांव में सन्नाटा तोड़ते हुए यादव ने कहा, ‘ये क्या मजाक है। वे तो मानते ही नहीं कि हम यहां रहते हैं।’ गांव वालों को कतई उम्मीद नहीं थी कि इस योजना के बारे में पहली आधिकारिक चिट्ठी उन्हें इस तरह देखने को मिलेगी। दो दिन तक दुर्गम गांवों में पहुंचने और गांववालों से बातचीत में यही कहानी दोहराई जाती रही।


केन-बेतवा में विस्थापित होने वाले पिलकोहा गांव के लोगकेन-बेतवा में विस्थापित होने वाले पिलकोहा गांव के लोगकेन की सहायक नदी स्यामरी के किनारे बसे सुकवाहा के 25 वर्षीय बलबीर सिंह यह मान चल रहे थे कि अगर उनके गांव की जमीन डूब क्षेत्र में आती है तो कम-से-कम 50 लाख रुपए मुआवजा तो मिल ही जाएगा। इससे वे छतरपुर में एक स्कूल खोल लेंगे। लेकिन मुआवजे पर छाए धुंधलके में भविष्य की उनकी योजनाएं हिचकोले खाने लगी हैं।

जब इन सारे पहलुओं पर एनडब्ल्यूडीए के चीफ इंजीनियर (मुख्यालय) आर.के. जैन से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, “हमारा काम डीपीआर तैयार करना है। लोगों के विस्थापन या पुनर्वास की जानकारी राज्यों की सरकारों की है। आरटीआई में वही जवाब दिया गया होगा जो आंकड़े वन विभाग से मिले हैं।”

साथ ही उन्होंने कहा, ‘लेकिन अगर कोई भी विसंगति आती है तो उसका पूरा ध्यान रखा जाएगा। मुआवजे के सवाल पर उन्होंने कहा कि 2013 में इस बारे में नया प्लान बनाया गया है और किसी भी सूरत में गांव वालों को बेहतर मुआवजा मिलेगा।’ परियोजना कब तक शुरू होगी, इस बारे में उन्होंने कहा, ‘राज्यों से तकनीकी और पर्यावरण संबंधी नियमों के अनुसार स्वीकृति मिलने के बाद ही काम शुरू होगा।’

डीपीआर में इतनी गंभीर खामियां की वजह से परियोजना के शुरू होने से पूर्व ही विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। क्या ऐसी परियोजना जिसकी कामयाबी देश की सूरत हमेशा के लिए बदल सकती है, कुछ ज्यादा जिम्मेदारी की मांग नहीं करती

साथ में संतोष पाठक