कैसे हो फ्लोराइड से मुक्ति

Author:मनोरमा
Source:शुक्रवार, अप्रैल 2016


.पानी की समस्या तेलंगाना में काफी विकराल हो चली है। राज्य के कुल 10 जिलों के लगभग 1,174 गाँवों के पानी में फ्लोराइड की अधिकता के कारण हालात गम्भीर हो चले हैं। आदिलाबाद करीमनगर, खम्मम और नलगोंडा जिले पिछले कई दशक से पेयजल की कमी और फ्लोरोसिस की समस्या से पीड़ित हैं। इन चारों जिलों में से भी सबसे ज्यादा प्रभावित नलगोंडा जिला है।

यहाँ के पानी में फ्लोराइड की मात्रा मानक से कई गुना ज्यादा होने के कारण लम्बे समय से लोग कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार एक लीटर पानी में एक मिलीग्राम से अधिक फ्लोराइड नहीं होना चाहिए जबकि यहाँ के पानी में प्रति लीटर 7 मिग्रा तक फ्लोराइड पाया गया है।

फ्लोराइड युक्त पानी के ज्यादा इस्तेमाल से दाँत खराब और कमजोर होने लगते हैं साथ ही हड्डियाँ भी कमजोर होने लगती हैं जिन्हें क्रमश: दन्त फ्लोरोसिस और अस्थि या स्केलेटल फ्लोरोसिस कहा जाता है।

फ्लोराइड का असर केवल पेयजल से ही नहीं होता बल्कि कीटनाशकों के प्रयोग के कारण बहुत से खाद्य उत्पादों में भी फ्लोराइड की मात्रा मानक से ज्यादा हो जाती है जैसे सूखे मेवे, अंगूर, कोक पावडर, अखरोट और बींस इत्यादि। इसके अलावा चाय, काला नमक, तम्बाकू, सुपारी में भी फ्लोराइड पाया जाता है। पेयजल के साथ इन सभी का इस्तेमाल किसी के भी स्वास्थ्य के लिये घातक साबित होता है। नालगोंडा के बच्चों और युवाओं में फ्लोराइड के दुष्प्रभावों को देखा जा सकता है उनमें अस्थि, क्षय, हड्डियों में फ्रैक्चर और विकलांगता की समस्या आम है।

पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा के नियंत्रण के लिये कई तकनीक विकसित की गईं। उनमें से एक तकनीक को नलगोंडा विधि भी कहा जाता है। इसके तहत फिटकरी से पानी को साफ किया जाता है। हालांकि पानी में और अधिक घुलनशील खनिज होने पर केवल 20 से 35 प्रतिशत तक ही साफ हो पाता है। ज्यादा कारगर तकनीक विद्युतीय फ्लोराइड अपघटन या इलेक्ट्रोलीटिक डिफ्लोराइडेशन की नवीनतम तकनीक है, जिसके तहत डायरेक्ट करंट से अल्युमिनियम एनोड का फ्लोराइड युक्त पानी में घुलन किया जाता है।

चुनावों के समय पेयजल की उपलब्धता कई सालों से यहाँ मुख्य मुद्दा रहा है और पानी में फ्लोराइड की मात्रा पर विधानसभा से लेकर संसद तक में चिन्ता जताई जाती रही है लेकिन अभी तक उस स्तर पर काम नहीं हो पाया है जिसकी जरूरत है। हालांकि जून 2014 से पहले तेलंगाना आन्ध्र प्रदेश का हिस्सा था और इन इलाकों या तेलंगाना की अनदेखी ही अलग राज्य के गठन का मुख्य मुद्दा रहा था इसलिये मौजूदा सरकार के पास ये तर्क है कि अभी दो साल भी पूरे नहीं हुए हैं।

जिन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है उन्हें पूरा होने में कुछ साल का समय लगेगा। वैसे पिछले कुछ सालों में राज्य सरकार, केन्द्र सरकार और कुछ गैर सरकारी संगठनों की ओर से नलगोंडा में फ्लोराइड की समस्या से निपटने के लिये करोड़ों रुपए खर्च किये गए हैं।

साल 2012 में ही तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष नांदेला मनोहर की अध्यक्षता में नलगोंडा में स्वच्छ पेयजल के लिये 200 करोड़ रुपए आवंटित हुए। 2009 में अमेरिका के तेलुगू संघ की ओर से फ्लोरोसिस प्लांट लगाने के लिये लगभग चालीस लाख रुपए दिये गए। लेकिन इसके अनुपात में काम नहीं दिखता है। हालांकि स्थानीय विधायक के मुताबिक फ्लोराइड से निपटने के लिये नालगोंडा को पिछले दस साल में केवल 800 करोड़ रुपए ही मिले हैं जो नाकाफी हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक इस इलाके में लगातार और दीर्घकालीन काम करने की जरूरत है, जिसके तहत सबसे पहले भूजल की गुणवत्ता को सुधारना होगा जो वर्षाजल संग्रह और रेनवाटर हार्वेस्टिंग से सम्भव है। नालगोंडा में पानी के तीन स्रोत हैं वर्षा जल, बहता जल और भूजल। यहाँ की भौगोलिक बनावट तथा मिट्टी और चट्टानों की संरचना के कारण भी यहाँ पानी में फ्लोराइड की मात्रा तुलनात्मक रूप से ज्यादा है।

बहते जल में ज्यादा फ्लोराइड नहीं होता लेकिन नलगोंडा की पेडा वागु,चंदुर वागु, कोदाबकसुपाली वागु और चिन्नाकापर्थी धारा जैसी नदियों में आश्चर्यजनक रूप से फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा है। आँकड़ों के मुताबिक यहाँ साढ़े चार हजार से ज्यादा टैंक हैं इन्हें पुनर्जीवित करने पर भूजल रीचार्ज होने लगेगा और स्वत: साफ होने लगेगा। इसके अलावा बोरवेल की खुदाई पर रोक लगानी होगी। खुले कुएँ के पानी में उतना फ्लोराइड नहीं होता जितना बोरवेल में।

गौरतलब है कि तेलंगाना में गर्मी के मौसम की शुरुआत मार्च से हो जाती है जो मई में अपने चरम पर होती है। लगभग पूरा राज्य अर्द्धशुष्क जलवायु प्रभाव क्षेत्र में आता है। यानी यहाँ आमतौर पर उच्च तापमान रहता है और कम बारिश होती है। मानसून जून से शुरू होता है और सितम्बर तक रहता है, इस दौरान जो बारिश होती है वो पूरे साल का आधार होती है। सामान्यत: मानसून के दौरान 755 मिमी या 29.7 इंच तक बारिश होती है। ऐसे में पहली कोशिश इस बारिश के पानी को सहेजने की होनी चाहिए।

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