कभी विलुप्ति के कगार पर थी कोसी,आज दे रही है सैकड़ो लोगों को रोजगार

Author:शिवेन्द्र
Source:दैनिक जागरण

वर्ष 1992 में उत्तराखण्ड के जाने माने  शोधकरता और कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीवन सिंह रावत  ने साल 2003 में कोसी नदी को मौसमी नदी घोषित किया था। फिर 9 साल बाद वर्ष 2012 में नदी के पुनर्जीवित के लिए कोशिश करने लगे। साल 2017 में राज्य सरकार ने कुमाऊं में कोसी व गढ़वाल में रिस्पना नदी को संरक्षित करने का संकल्प लिया। अल्मोड़ा के डीएम नितिन सिंह भदौरिया के निर्देशन में 2018 से स्थानीय लोगों को साथ लेकर कोसी के संरक्षण के लिये आवाज उठाई गई और एक मुहिम भी चलाई गई। 

सबसे पहले , पहले चरण में नदी के सभी रीचार्ज क्षेत्रों में पौधे रोपण किया गया है। इसके लिये लगभग 111 स्थालों को विकसित किया गया है। ग्रामीणों में पानी पुनर्जीवित करने की ऐसी ललक थी की एक दिन में करीब 1 लाख पौधे रोप दिए । जो एक बड़ा रिकॉर्ड बना और बाद में  लिम्का बुक में दर्ज हुआ है 

दूसरे चरण में चाल-खाल की खंतियां निर्मित की गई और आखरी और तीसरे में वाटर हार्वेस्टिंग पर पूरा ध्यान केंद्रित किया गया। जनपद के 80 प्रतिशत सरकारी भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग से जमा बारिश का पानी  ट्रीटमेंट कर इस्तेमाल किया जाता है। छोटे-छोटे बांध बनाकर भी पानी को रोकने की कोशिश की गई है जिससे 290 हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई भूमि का विकास किया गया है वही 740 लाख लीटर पेयजल भी संरक्षण किया गया है जिस पर डीएम भदोरिया ने कहा है कि इस मुहिम को हम जल जीवन मिशन से जोड़कर काम तेजी से करेंगे। 

सूपी सतबुंगा की रहने वाले 50 साल के किसान बची सिंह बिष्ट जैसे लोग भी इस मुहिम से जुड़ कर अपने-अपने इलाकों में जल संरक्षित कर रहे हैं। 2015 में उनके जनमैत्री संगठन के बैनर तले गंगोलीहाट, बेरीनाग इलाकों में जल संरक्षण के कई काम शुरू किए गए है। वर्ष 2016 में इन कामों को राज्यपाल द्वारा भी पुरस्कृत किया गया।  इसके साथ ही उन्होंने नैनीताल जिले के रामगढ़ ब्लॉक मैं भी बरसाती पानी को बचाने के लिए एक अभियान छेड़ा था इसके तहत वर्षा जल को बचाने के लिए गड्ढे खोदकर उनमें  प्लास्टिक की सीट  बिछाई गई। गांव वासियों की मदद से उन्होंने करीब 312 बड़े गड्ढे बनाए हैं इनमें जो वर्षा का जल  इकट्ठा होता है वह गांव वासियों के खेतों में सिंचाई करने के लिए काम आ जाता है।

वही पाटा गांव में तो सेब का बगान भी तैयार किया गया है पानी की समस्या को देखते हुए जिन किसानों ने खेती बाड़ी छोड़ दी थी अब वह दोबारा अपने खेतों को संवारने में जुटे हैं। इसका नतीजा यह निकला कि अब यहां मटर टमाटर और हरी मटर सब्जी भी पैदा हो रही है बच्ची सिंह के प्रयासों की भी जल शक्ति मंत्रालय ने तारीफ की है।इसी प्रकार उधम सिंह नगर जिले में भी काम किया गया है यहां पर भी पानी की काफी समस्या उत्पन्न हो गई थी । जिले में भूजल इतना नीचे चला गया था की काशीपुर और  जसपुर क्षेत्र क्रिटिकल घोषित किए गए थे लेकिन आज यहां करीब 400 तालाबों को मनरेगा के तहत जीवित किया गया है तत्कालीन सीडीओ और वर्तमान के डीएम उत्तरकाशी मयूर दीक्षित को इसका पूरा श्रेय जाता है साल 2019 जनवरी महीने में  मयूर दीक्षित में तालाबों को दोबारा पुनर्जीवित करने के लिए काफी प्रयास किए और उसी का नतीजा है कि आज इन इलाकों में पानी की समस्या काफी कम हो गई है पानी की समस्या कम होते ही सैकड़ो लोगों  को रोजगार मिल रहा है  जिससे उनकी आर्थिक स्थिति भी सुधरी है साथ ही धरती को भी लगातार पानी मिल रहा है

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