कहानियाँ बनतीं बावड़ियां

Author:अंजना त्रिवेदी


कुएं, बावड़ियां अब खारिज कर दिए गये है। इनके बदले गहरे नलकूपों और हैण्डपंपों से प्यास बुझाने की आस की जा रही है, किन्तु बेतरतीब और लोभपूर्ण तरीके से भूजल के बेहद दोहन के कारण ये साधन भी जबाव दे चुके हैं, जिसके परिणामस्वरुप लोग भीषण जल संकट भुगतने को विवश हैं। देश के अन्य भागों की तरह मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में भी पानी एक दुर्लभ वस्तु हो चला है, जिसके लिए लोगों को मीलों पैदल चलना पड़ता है। चिन्ता की बात यह है कि यदि इस दिशा में जल्दी ही कोई ठोस उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में मालवा को रेगिस्तान होने से बचाना मुश्किल होगा क्योंकि मालवा की भूगर्भीय परिस्थितियां हमें ज्यादा गहराई से पानी लेने की इजाजत नहीं देतीं। किन्तु इसकी परवाह किए बिना नलकूपों का रास्ता अख्तियार कर मालवावासियों ने स्वयं ही खतरे की मेजवानी की है।

मालवा में कुएं-बावड़ियों की सदियों पुरानी परंपरा रही है। आज भी यहां रियासती जमाने की कई विशाल बावड़ियों के अवशेष देखे जा सकते हैं। जबकि अधिकांश बावड़ियां इमारतों की नीवों में समा चुकी हैं। कहा जाता है कि अकेले इन्दौर शहर में ही 500 से अधिक बावड़ियां रही हैं इनमें से कई इतनी विशाल हैं कि उनका आकार किलोमीटर में मापा जा सकता है। इसी तरह देवास नगर में भी खारी बावड़ी, मीरा बावड़ी, भवानी सागर जैसे कई मोहल्ले बावड़ियों के ऊपर ही बसे हैं। ये बावड़ियां तकनीकी और वास्तुकला की दृष्टि से बीते जमाने की उत्कृष्ट कारीगारी का नमूना हैं, जो तत्कालीन समाज की न सिर्फ पेयजल कि पूर्ति करती थीं, बल्कि सिंचाई के काम भी आती थीं। इसके अतिरिक्त पुरातन कुएं, कुण्डियां और तालाब भी यहां अनगिनत मात्रा में पाए जाते हैं। अनुमान है कि समूचे मालवा में लाखों कुण्डियां रही हैं। इनमें से अधिकांश के अवशेष अब भी देखे जा सकते हैं एवं कई कुण्डियां आज भी पानी की जरूरत पूरा कर रही हैं। इस प्रकार समूचा मालवा क्षेत्र बावड़ियों, तालाबों और कुएं-कुण्डियों से सम्पन्न रहा है और इसीलिए यहां डग-डग रोटी, पग-पग नीर की कहावत लोकप्रिय हुई है। यद्यपि दो सदी पहले मालवा के भूगर्भ को लेकर कोई वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध नहीं थे, किन्तु लोगों को यहां की भूगर्भीय परिस्थितियों का पूरा एहसास था। तत्कालीन बावड़ियां, तालाब और कुण्डियां इस बात के ठोस सबूत हैं। मालवा की जमीन में पाई जाने वाली काली चट्टान (बेसॉल्ट) के कारण यहां भूजल पुनर्भण्डारण की संभावना अत्यन्त कम रही है। जबकि वर्षा के पानी को इकट्ठा कर पाना आसान है। अतः यहां कम गहराई वाली जलस्रोतों को लम्बे समय तक जीवित रखा जा सकता है। क्योंकि ऊपर के स्तर तक (जहां तक काली चट्टान नहीं हो) पानी का पर्याप्त रिसन संभव है। लेकिन ज्यादा गहराई से पानी लेने पर उस पानी का पुनर्भरणडारण नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि यहां बावड़ियों और कुण्डियों की संख्या सर्वाधिक रही है और कमोवेश ये तत्कालीन राज्य व समाज की सम्पन्नता की निशानी भी मानी जा सकती है। किन्तु इस पारंपरिक व्यवस्था को समझे बगैर आज जलापूर्ति के आधुनिक तरीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यह अफसोसजनक है कि जल उपयोग की पुरातन व्यवस्था को न सिर्फ समझने में ही कोताही बरती गई, अपितु इसे सिलसिलेवार खत्म भी किया जा रहा है। पानी के मामले में यह स्थिति समाज के आत्महत्या के रास्ते पर चलने के समान है।

इन्दौर की 500 बावड़ियों और अनगिनत कुए, कुण्डियों व तालाबों की विरासत को भुलाकर जलदोहन की नई पद्धतियों के कारण आज यहां की जमीन में इतना पानी नहीं बचा कि वह लोगों की प्यास बुझा सके। अतः यह शहर नर्मदा के पानी पर निर्भर है, जिसे कई किलोमिटर दूर से सालाना 35 करोड़ रुपये खर्च करके लाया जा रहा है। नर्मदा का पानी इन्दौर लाने के बाद मालवा के कई शहरों में भी इसकी मांग की जाने लगी है। जिनमें देवास, धार, रतलाम के नागरिक तो किसी भी कीमत पर नर्मदा का पानी लाने को तैयार हैं। यानि पानी के मामले में हम विकेन्द्रित व्यवस्था को छोड़कर केन्द्रीकृत व्यवस्था की ओर जा रहे हैं। कुएं-वावड़ियों को खत्म कर नलकूपों को ही समस्या का हल मानने के बाद जब स्थिति और जटिल हो गई तो सुदूर नदियों से पानी लाने की शुरुआत की गई। किन्तु इस तरह के समाधानों का सतत और स्थाई बने रहना संदेहास्पद है। समाधान के इन्हीं तरीकों के चलते इन्दौर की विशाल बावड़ियां कचराघरों में तब्दील हो गईं हैं। शहर के कई वयोवृद्ध और अनुभवी लोगों से इस बाबद चर्चा करने पर वे बेहद गुस्से में पाए जा सकते हैं। वे आज भी इन्हीं बावड़ियों से शहर की प्यास बुझाने का दावा करते हैं। इन्दौर के नारायणबाग के एक वयोवृद्ध नागरिक से बावड़ी का पता पूछने पर उनका प्रतिप्रश्न- बावड़ी क्यों ढूंढ रहे हो? क्या कचरा फेंकना है? हमारे यहां तो लोग कचरा फेंकने के लिए ही बावड़ी तक जाते हैं। हमारी समूची विकास नीति पर कटाक्ष है। वे बताते हैं कि यहां की बावड़ी करब 400 फिट गहरी है, और इसमें भूमिगत राश्ते मौजूद हैं। अनुमान है कि इसका निर्माण होल्कर राजवंश द्वारा सन 1850 में करवाया गया था। इन दिनों लोग इसमें घरों का कचरा फेंकते हैं। पिछले साल कतिपय लोगों द्वारा इस बावड़ी के ऊपर के हिस्से को प्लाट के रुप में बेचने का प्रयास किया गया, किन्तु जनविरोध के कारण वे असफल रहे। इसी मोहल्ले के नानाजी बताते हैं कि यहां 75 प्रतिशत घरों में करीब 400 फिट गहरे टयूबवैल मौजूद हैं, किन्तु गर्मी में यह आलम है कि एक बाल्टी पानी भी नहीं मिल पा रहा है।

इन्दौर के मोतीतबेला की बावड़ी भी इसकी समकालीन है। नगर निगम का सूचना बोर्ड यह पानी पीने योग्य नहीं है, इसकी शोभा बढ़ाता पाया जा सकता है। जबकि इसी के समीप की इमारत के तीसरे माले के परिवारों द्वारा मोटर लगाकर इसका पानी इस्तेमाल किया जा रहा है। बावड़ियों के मामले में इन्दौर की सिंधी कॉलोनी का विशेष महत्व है। यहां के निवासी इसके प्रति ज्यादा संवेदनशील बताए गए हैं। यहां स्थित 7 बावड़ियों में से एक बावड़ी का पानी ही पीने योग्य है। पूर्व पार्षद दयाराम गालाना ने बड़े जतन से इसकी देखरेख की है। आज पूरा मोहल्ला इसी बावड़ी पर निर्भर है। जबकि यहां कि एक अन्य बावड़ी में आज भी पानी का झिर आती हुई देखी जा सकती है। यह करीब 400 फीट गहरी होकर इसमें 200 सीढ़ियां है। किन्तु देखरेख व संधारण के अभाव में यह उपयोग हीन बनी हुई है। 2 बावड़ियां अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुकी है, और शेष 2 का भी यही हश्र होने को है। इसी कॉलोनी के समीप लोहामण्डी की बावड़ी भी खत्म होने के कगार पर है। बताया जाता है कि यह इतनी भव्य है कि इसमें 7 कुओं का पानी समाया जा सकता है। यहां के निवासी इसके सुधार और साफ-सफाई के लिए शासन का ध्यान आकर्षिक करना चाहते हैं। उनका मानना है कि यदि यह बावड़ी पुनर्जीवित हो जाए तो इस क्षेत्र में ही नहीं बल्कि आसपास के इलाकों में भी पानी का संकट दूर किया जा सकेगा। खान नदी के समीप निर्मित नवलखा की बावड़ी में 20 साल पहले तक पर्याप्त पानी रहता था। यहां स्थित हनुमान मंदिर के पंडितजी बताते हैं कि इसके आसपास इतनी ज्यादा कॉलोनियां विकसित हो गई हैं कि इसका पानी उनके टयूबवैल में चला गया।

इन्दौर के प्रसिद्ध लालबाग पैलेस में निर्मित तीन बावड़ियां और एक कुआं अपने भव्य आकार और अनूठी वास्तुकला के लिए विशेष महत्व रखते हैं। पहली बावड़ी भवन के द्वार पर ही कमरे के नीचे निर्मित है, बताया जाता है कि भूमिगत होकर इसका रास्ता राजबाड़े तक जाता है। हमले के वक्त राजा राजबाड़े से लालबाग आने-जाने के लिए इसी सुरक्षित रास्ते का इस्तेमाल करते थे। खान नदी के पास स्थिति लालबाग में ही एक ढ़क्कन खोलने पर एक और विशाल बावड़ी देखने को मिलती है। इन बावड़ियों का पानी लोगों को सप्लाई किया जाता था। इसी पैलेस में एक कुआं भी स्थित है, जिसका पानी राजा के पीने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इसी पैलेस के समीप स्थित एक और बावड़ी मल्हार राव होल्कर द्वारा 1708 में बनवाई गई थी। 1985 तक इस बावड़ी का पानी इस्तेमाल किया जाता था। किन्तु पिछले 10-15 सालों से इसमें गंदगी और कचरा भरा हुआ है।

खजराना की बावड़ी भी अत्यन्त गहरी और विशाल है, जो होल्कर राजवंश द्वारा सन् 1885 में बनवाई गई थी। डेढ़ दशक पहले तक लोग इसके पानी का उपयोग करते थे, किन्तु आज यह बावड़ी कचरापेटी बनी हुई है। इसी तरह 1810 में निर्मित तात्या की बावड़ी भी आज इस्तेमाल करने योग्य नहीं रह गई है। लोग बताते हैं कि यह इतनी विशाल है कि पूरे इन्दौर को पानी पिला सकती है। इन्दौर संग्रहालय के चैनसिंह परिहार बताते हैं संग्रहालय परिसर में 1857 में निर्मित एक कुआं है, जिसमें 1973 में वे खुद एक लोटा डालकर पानी निकाल लेते थे।

इन्दौर के अलावा आसपास के क्षेत्रों में भी बावड़ियों के अनगिनत अवशेष पाए जा सकते हैं। इन्दौर शहर से 10 किलोमिटर की परिधि में प्रत्येक गांव में कम से कम एक बावड़ी अवश्य मौजूद है। ग्राम लिम्वोदी, छोटी विलावली, असरावद, नेहरुवन, नेमीदी, जोशीगुराड़िया, मिर्जापुर, उमरीखेड़ी, मोरद, कैल्लोर आदि में यह आसानी से देखी जा सकती हैं। मालवा के गांवों में बावड़ियों के अलावा कुण्डियां भी बहुतायत में पाई गई हैं। यद्यपि अधिकांश कुण्डियां खत्म हो चुकी है, किन्तु कई कुण्डियां भीषण गर्मी में लोगों की प्यास आज भी बुझा रही हैं। मालवा के जल संकट की पड़ताल के उद्देश्य ये 50 गांवों का भ्रमण करने पर 152 कुण्डियां पाई गई। इनमें 79 कुण्डियां खत्म होने की स्थिति में हैं। जबकि 73 कुण्डियां आज भी उपयोगी हैं। मालवा के करीब 4 प्रतिशत गाँव पेयजल के लिए इन्हीं कुण्डियों पर निर्भर पाए गए। किन्तु लोग बताते हैं कि इस्तेमाल की जा रही कुण्डियां अब ज्यादा दिनों तक साथ नहीं दे पाएंगी। क्योंकि अनगिनत तादाद में खोदे जा रहे नलकूपों के कारण इनका पानी खत्म होने लगा है।

देवास जिले के ग्राम इस्माईलखेड़ी की सदियों पुरानी 12 कुण्डियां पूरी तरह सूख गई हैं। 7-8 साल पहले तक इनमें अच्छा पानी होता था। इस गांव के दौलतसिंह बताते हैं कि अब तक गांव के आसपास के खेतों में 200 से 400 फिट गहरे करीब 1000 नलकूप खुदवाए जा चुके हैं। इनमें अधिकांश में थोड़ा-बहुत पानी आ रहा है। किन्तु सदाबहार 12 कुण्डियां सदा के लिए सूख गई है। इसी तरह ग्राम बिलवली में 500 नलकूपों के कारण यहां की कुण्डियां खत्म हो चूकी हैं। इस प्रकार भूजल दोहन की आधुनिक पद्धति के चलते मालवा में ऐसे गांवों की कमी नहीं है जहां नलकूपों की संख्या सैकड़ों के आंकड़े को पार कर हजार तक पहुंच चुकी हैं।

इस प्रकार भूजल दोहन के नलकूप आधारित तरीकों के कारण मालवा के भूमिगत जल का स्तर इतना नीचे जा चुका है कि लोगों को 400 से 500 फिट गहराई में भी पानी नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा जो नलकूप आज इतनी गहराई से पानी दे पा रहे हैं, उनके सतत बने रहने की भी कोई गारंटी नहीं है। अतः मालवा में जलदोहन की मौजूदा पद्धति पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। बावड़ियों और कुण्डियों की विरासत के साथ ही पानी के विकेन्द्रित और सामुदायिक तरीके हमेशा के लिए खत्म होने को हैं। यदि इस विरासत की रक्षा करने में हम असफल रहे तो निस्संदेह हमें भीषण जल संकट को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा और आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं कर पाएगी।