कैसे जल जीवन मिशन कामयाबी की बुलंदियों को छू रहा है

Author:अनुवाद शिवेंद्र
Source:एन्वाइ टाइम्स

मध्य प्रदेश के एक गाँव इमलिडोल में पानी की कमी का मतलब है कि लोग साल में केवल एक ही फसल उगाते हैं,फोटो साभार : एन्वाइ टाइम्स

पाइप लाइनें बिछ गई है नल लग गए है गांव के लिए एक टंकी का भी निर्माण हो रहा है जिससे गिरजा अहरीवार जैसी तमाम ग्रामीण महिलाओं  को अपने दरवाजे पर पानी मिल सकेगा और अंत में उनका जीवन भर का बोझ उतर जाएगा। मध्य प्रदेश की रहने वाली तीन बच्चों की मां सुश्री अहिरवार कहती है कि

"मैं रोज सुबह 5 बजे गांव के हैंडपंप में अपने पानी के बर्तन को कतार में लगाकर अपने बच्चों के साथ अपनी बारी का इंतजार करती हूं। कभी-कभी यहाँ मुझे पाँच से छह घंटे भी बिताने पड़ जाते है। क्योंकि अगर मैं यहाँ से जाती हूं तो मेरी जगह को कोई और आ जायेगा।"

भारत दुनिया के सबसे अधिक जल संकट वाले देशों में से एक है जो अपने 600,000 गांवों और लगभग 192 मिलियन घरों में 2024 तक स्वच्छ नल का पानी उपलब्ध कराने के लिए एक महत्वाकांक्षी अभियान से थोड़ा ही दूर  है। इस महत्वाकांक्षी अभियान में करीब 18,000 सरकारी इंजीनियर 50 बिलियन डॉलर के उपक्रम की देखरेख कर रहे हैं, जिसमें सैकड़ों हजारों ठेकेदार और मजदूर शामिल हैं जो 2.5 मिलियन मील से अधिक पाइपे बिछा रहे हैं। इस परियोजना से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का एक शक्तिशाली नेता के रूप में उभार हुआ है। जिन्होंने भारत के कुख्यात लालफीताशाही को खत्म कर सभी राजनीतिक मतभेदो को एक तरफ धकेल दिया है। उनकी अब तक की सफलता देश के राजनीतिक परिदृश्य पर उनके प्रभुत्व को समझाने में मदद करती है।

कमजोर अर्थव्यवस्था और प्रारंभिक दौर में कोरोनवायरस की रोकथाम में नाकामी से हुई सैकड़ों हजारों लोगों की मौत के बावजूद पीएम मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई हैं। उन्होंने तेजी से एक हिंदू राष्ट्रवादी के आधार को मजबूत करने के लिए दशकों तक रैलियों का सहारा लिया है लेकिन हर घर में पानी पहुंचाने का उनका संकल्प उनकी दो राजनीतिक ताकतों को दर्शाती  है: भारत के करोड़ों गरीबों की दिन-प्रतिदिन की समस्याओं को लेकर उनकी समझ और महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए झुकाव। एक गरीब गांव में पले-बढ़े पीएम मोदी अपनी मां की पानी लाने में कठिनाई के बारे में भी भावनात्मक रूप से जिक्र कर चुके है।  

जब 2019 में जल जीवन मिशन की शुरुआत हुई थी,तब भारत के घरों में से लगभग 1/6  के पास एक साफ पानी का नल हुआ करता था। और  अब यह संख्या  तकरीबन 1/2 हो गई है। भारत में यूनिसेफ की जल और स्वच्छता इकाई का नेतृत्व कर रहे निकोलस ऑस्बर्ट का कहना है कि शायद ही यह अभियान आपकी सरकार से आप तक पहुंचा हो लेकिन इतना जरूर है,ये अच्छी तरह से वित्त पोषित है। क्योंकि इस अभियान के लिए अच्छा खासा बजट निर्धारित किया गया है। निकोलस ऑस्बर्ट आगे कहते है कि कोरोना से सभी सामाजिक क्षेत्र किसी न किसी तरह से प्रभावित हुए है,लेकिन इस पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि इसे संरक्षित किया गया था।  

देश में पानी की समस्या इसकी वैश्विक आर्थिक महत्वाकांक्षाओं और विकट परिस्थितियों में रहने वाली 1.4 बिलियन आबादी (जिनमें से दो-तिहाई अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है ) के बीच बेमेल दिखाई पड़ती है । लगभग 4 करोड़ भारतीय हर साल जलजनित बीमारियों से प्रभावित होते हैं, जिससे सालाना लगभग 600 मिलियन डॉलर की चिकित्सा लागत और श्रम हानि होती है। 5 साल से कम उम्र के लगभग 100,000 बच्चे हर साल डायरिया से मर जाते है और लाखों का शारारिक विकास रुक जाता है।    

इस अभियान का नेतृत्व कर रहे पीएम मोदी के शीर्ष अधिकारी भरत लाल ने कहा,

"सामाजिक आर्थिक विकास और उच्च आर्थिक विकास में पानी की कमी एक सीमित कारक नहीं बननी चाहिए।"

नई दिल्ली में अपने कार्यालय से भरत लाल अक्सर इस अभियान की  प्रगति का एक विस्तृत कम्प्यूटरीकृत डैशबोर्ड पर जायजा लेते है।आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार हर दिन लगभग 100,000 कनेक्शन जोड़े जाते हैं, भरत लाल का फोन भी लगातार इन सफलताओं को दर्शाने वाले वीडियो और फोटो के साथ घनघनाता रहता है ।  

इस मिशन की प्रगति का आकलन ग्राम परिषदों की संतुष्टि से ही निर्धारित्त होता है ताकि इस परतदार नौकरशाही की लेटलतीफी से बचा जा सके। सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों पर टिप्पणी के लिए जिलों और राज्यों को तकनीकी विश्वविद्यालयों के साथ जोड़ा गया है। ग्राम परिषदों को संभालने का काम स्थानीय संगठन करते हैं क्योंकि वे जनोपयोगी प्रबंधकों की भूमिका में अहम रोल अदा करते हैं। ग्राम निकायों से एक छोटा मासिक शुल्क एकत्र करने की अपेक्षा की जाती है  जो लगभग $ 1 प्रति परिवार होती है - ताकि इससे रखरखाव के लिए धन की कमी न हो और साथ ही भागीदारी और स्वामित्व की संस्कृति को भी प्रोत्सान मिल सके ।

उन क्षेत्रों में जहां भूजल का अत्यधिक दोहन होता है वहां पाइप और पांपो के जरिये  बांधों जैसे स्रोतों से दसियों मील दूर पानी का शोधन किया जाता है ।  ग्रामीणों को पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करने और डेटा को डैशबोर्ड पर अपलोड करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि कैसे अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग किया जाए। इसके अलावा स्वचालित दबाव और गुणवत्ता सेंसर स्थापित करने के लिए कई पायलट परियोजनाएं भी चलाईं जा रही है ।

जहां सरकार में बैठे लोग इस परियोजना की तारीफ कर रहे है तो वही कुछ पर्यावरणविद्  इस पर सवाल खड़े कर रहे है।पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह  कहते है कि

"इस मिशन में जल संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है, आज भारत के भूजल स्रोत तेजी से गिर रहे हैं। सूखे से त्रस्त किसान पंप और पंप के रूप में देश चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना में अधिक भूजल खींचता है। आपके स्रोत सूख रहे हैं, जिस देश में 72 प्रतिशत जलभृतों की अधिकता है,उस देश में आप पाइपलाइनों के माध्यम से पानी कैसे उपलब्ध करा सकते हैं?"

भारत के सबसे अधिक जल संकट वाले राज्यों में से एक मध्य प्रदेश के पांच गांवों में भूजल की चुनौती का आकार भूजल के गिरते स्तरों में, पंप करने के लिए उचित बिजली की कमी में और यहां तक कि ग्रामीणों को छोटे मासिक शुल्क का भुगतान का इनकार करने में भी स्पष्ट दिखाई देता है। कुछ गांवों में  भरत लाल के डैशबोर्ड ने जो दिखाया वो वाकई में चौकाने वाला था।क्योंकि इन गांवों में यह थम-सी  गई थी । क्योंकि यहां वर्षों से पुराने प्रोजेक्ट भी विफल हो रहे थे - पाइप थे, लेकिन पानी क्यों नहीं आ रहा था, यह जरूर प्रश्न खड़े करता है बाकि जगह कार्य बाधाओं के साथ आगे बढ़ रहे थे। सरकार ने रखरखाव के लिए अतिरिक्त अरबों डॉलर भी जुटा लिए हैं, लेकिन स्थानीय शुल्क के माध्यम से स्वामित्व की दीर्घकालिक संस्कृति का निर्माण करने की कोशिश की जा रही है । लेकिन यह प्रक्रिया फिलहाल धीमी गति से आगे बढ़ रही है । 

सिहोरा गांव में सभी घरों में पानी की उपलब्धता थी, लेकिन इनमें में से कुछ लोग ही निर्धारित भुगतान कर रहे थे।जब इस बारे में ग्राम परिषद के सदस्यों ने  पूछा गया तो उन्होंने मुफ्त और राजनीतिक सब्सिडी की संस्कृति का हवाला दिया।

परिषद की सदस्य ज्योति अबादिया कहती हैं कि 

लोग कहते है अगर राशन मुफ्त है, घर मुफ्त है,बच्चे की डिलीवरी मुफ्त है, शादी मुफ्त है, तो पानी भी मुफ्त मिलना  चाहिए।"

एक समृद्ध गांव पनारी में एक चीनी मिल है जहाँ तीन फसलें उगाती हैं, कम बिजली आपूर्ति का मतलब है कि घरों को प्रतिदिन केवल दो घंटे ही नियमित पानी आता है। परंपरागत रूप से घरेलू पानी लाने वाली महिलाओं ने कहा कि अब उन्होंने पानी निकालने में समय की बचत की है लेकिन फिर भी घर में पानी भरने के लिए बाल्टी भर देती है।

पंप संचालक हेमंत कुमार शर्मा ने कहा,

“हर बार कुछ दिनों के लिए लाइट कट जाती है।” "फिर मुझे दो घंटे के लिए बिजली वाले की तलाश करनी पड़ती  है।"

दुबले-पतले गांव के चश्मदीद और प्लंबर नारायण प्रसाद फौजदार कहते है कि

"गांव में केवल 1/5 लोग ही भुगतान कर रहे थे। सिर्फ गरीब लोग ही भुगतान कर रहे हैं," "अमीर नहीं।"

भूजल के स्तर में गिरावट के साथ-साथ  संवेदनशीलता भी बढ़ गई है। हैंडपंप लगाने और नलकूप खोदने के पुराने उपाय भी कभी कारगार नहीं हुए । ऐसे में  सुश्री अहिरवार जैसे ग्रामीणों की उम्मीदें देवेंद्र कुमार जैन जैसे सरकारी इंजीनियरों पर टिकी हैं।  तीन दशकों तक अपनी सेवाएं दे चुके इंजीनियर देवेंद्र कुमार जैन,जल संकट से निपटने में अग्रिम पंक्ति में रहे है। 

देवेंद्र कुमार जैन कहते है कि

" सुश्री अहिरवार के गांव इमलीडोल जैसे इलाकों में भूजल का अत्यधिक दोहन होता है,वहां उनकी टीम करीब 50 मील दूर एक बांध से पानी निकालती है।अब वहाँ तीन चौथाई काम पूरा हो चुका है"

देवेंद्र कुमार जैन मध्य प्रदेश के 3,000 गांवों में लगभग 300,000 घरों में पानी के कनेक्शन लाने के प्रभारी भी हैं।

इमलीडोल में पानी की कमी का मतलब है कि लोग साल में केवल एक ही फसल उगाते हैं।अधिकांश पुरुष कहीं और काम की तलाश करते हैं। सुश्री अहिरवार के पति, राकेश अहरीवार राजमिस्त्री है ने कहा कि  "वह अपनी पत्नी और अपने तीन बच्चों को छोड़कर काम की तलाश में जल्द दिल्ली जाने वाले है"  

सुश्री अहरिवार कहती है "एक बार घर पर पानी आ गया तो मैं परेशानी और दूरियों से बच जाऊँगी"

58 वर्षीय देवेंद्र कुमार जैन के लिए ये मिशन उनकी सेवानिवृत्ति के आस पास ही खत्म होने का अंदेशा दे रहा  है। ऐसे में क्या वह  हैंडपंप और ट्यूबवेल देने की एक मामूली शुरुआत  से 300,000 घरों के लिए नल के पानी की विरासत छोड़ पायेगें, यह एक ऐसी संभावना जिसने उन्हें  भावुक कर दिया है। जैन कहते है अगर ऐसा हो गया तो "मैं अपने आपको सबसे खुशकिस्मत शख्स समझूंगा "