कोसी नदी

Author:विकिपीडिया

कोसी नदी (नेपाली में कोशी) नेपाल में हिमालय से निकलती है और बिहार में भीम नगर के रास्ते से भारत में दाखिल होती है। इसमें आने वाली बाढ से बिहार मेंबहुत तबाही होती है जिससे इस नदी को बिहार का अभिशाप कहा जाता है।

इसके भौगोलिक स्वरूप को देखें तो पता चलेगा कि पिछले 250 वर्षों में 120 किमी का विस्तार कर चुकी है। हिमालय की ऊँची पहाड़ियों से तरह तरह से अवसाद (बालू, कंकड़-पत्थर) अपने साथ लाती हुई ये नदी निरंतर अपने क्षेत्र फैलाती जा रही है। उत्तरी बिहार के मैदानी इलाकों को तरती ये नदी पूरा क्षेत्र उपजाऊ बनाती है। ये प्राकृतिक तौर पर ऐसा हो रहा है। नेपाल और भारत दोनों ही देश इस नदी पर बाँध बना रहे हैं। परन्तु पर्यावरणविदों की मानें तो ऐसा करना नुकसानदेह हो सकता है। चूँकि इस नदी का बहाव इतना तेज़ है और इसके साथा आते पत्थर बाँध को भी तोड़ सकते हैं इसलिये बाँध की अवधि पर संदेह होना लाज़मी हो जाता है।यह नदी उत्तर बिहार के मिथिला क्षेत्र की संस्कृति का पालना भी है। कोशी के आसपास के क्षेत्रों को इसी के नाम पर कोशी कहा जाता है।

नाम

हिन्दू ग्रंथों में इसे कौशिकी नाम से उद्धृत किया गया है। कहा जाता है कि विश्वामित्र ने इसी नदी के किनारे ऋषि का दर्ज़ा पाया था। वे कुशिक ऋषि के शिष्य थे और उन्हें ऋग्वेद में कौशिक भी कहा गया है। सात धाराओं से मिलकर सप्तकोशी नदी बनती है जिसे स्थानीय रूप से कोसी कहा जाता है (नेपाल में कोशी)। महाभारत में भी इसका ज़िक्र कौशिकी नाम से मिलता है।

मार्ग

काठमाण्डू से एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए जाने वाले रास्ते में कोसी की चार सहायक नदियाँ मिलती हैं। तिब्बत की सीमा से लगा नामचे बाज़ार कोसी के पहाड़ी रास्ते का पर्यटन के हिसाब से सबसे आकर्षक स्थान है। बागमती, तथा बूढ़ी गंडक इसकी प्रमुख सहायक नदियों में से एक हैं।

नेपाल में यह कंचनजंघा के पश्चिम में पड़ती है। नेपाल के हरकपुर में कोसी की दो सहायक नदियाँ दूधकोसी तथा सनकोसी मिलती हैं। सनकोसी, अरुण और तमर नदियों के साथ त्रिवेणी में मिलती हैं। इसके बाद नदी को सप्तकोशी कहा जाता है। बराहक्षेत्र में यह तराई क्षेत्र में प्रवेश करती है और इसके बाद से इसे कोशी (या कोसी) कहा जाता है। इसकी सहायक नदियाँ एवरेस्ट के चारों ओर से आकर मिलती हैं और यह विश्व के ऊँचाई पर स्थित ग्लेशियरों (हिमनदों) के जल लेती हैं। त्रिवेणी के पास नदी के वेग से एक खड्ड बनाती है जो कोई १० किलोमीटर लम्बी है। भीमनगर के निकट यह भारतीय सीमा में दाख़िल होती है। इसके बाद दक्षिण की ओर 260 किमी चलकर कुरसेला के पास गंगा में मिल जाती है।

बाँध का इतिहास

कोसी नदी पर बांध बनाने का काम ब्रिटिश शासन के समय से विचाराधीन है। ब्रिटिश सरकार को ये चिन्ता थी कि कोसी पर तटबन्ध बनाने से इसके प्राकृतिक बहाव के कारण यह टूट भी सकता है। ब्रितानी सरकार ने तटबंध नहीं बनाने का फ़ैसला इस बात पर किया कि तटबंध टूटने से जो क्षति होगी उसकी भरपाई करना ज़्यादा मुश्किल साबित होगा।[1] इसी चिन्ता के बीच ब्रिटिश शासन बीत गया और आज़ादी के बाद सन् 1954 में भारत सरकार ने नेपाल के साथ समझौता किया और बाँध बनाया गया। यह बाँध नेपाल की सीमा में बना और इसके रखरखाव का काम भारतीय अभियंताओं को सौंपा गया। इसके बाद अबतक सात बार ये बाँध टूट चुका है और नदी की धारा की दिशा में छोटे-मोटे बदलाव होते रहे हैं। बराज में बालू के निक्षेपण के कारण जलस्तर बढ़ जाता है और बाँध के टूटने का खतरा बना रहता है।

बाँध की क्षमता

बाँध बनाते समय अभियंताओं ने आकलन किया था कि यह नौ लाख घनफ़ुट प्रतिसेकेंड (क्यूसेक) पानी के बहाव को बर्दाश्त कर सकेगा और बाँध की आयु 25 वर्ष आँकी गई थी। बाँध पहली बार 1963 में टूटा था। इसके बाद 1968 में यह 5 स्थानों पर टूटा। उस समय नदी में पानी का बहाव 9लाख 13 हज़ार क्यूसेक मापा गया था। वर्ष 1991 में नेपाल के जोगनिया तथा 2008 में यह नेपाल के ही कुसहा नामक स्थान पर टूटा। वर्ष 2008 में जब यह टूटा तो इसमें बहाव महज़ 1 लाख 44 हज़ार क्यूसेक था।

संदर्भ

1. तटबंध टूटने का मतलब धारा बदलना नहीं है। बीबीसी हिन्दी। अभिगमन तिथि: 2 सितम्बर, 2008

साभार – विकिपीडिया