खेत को आस्था का विषय बनाएँ

Author:पंकज चतुर्वेदी

पिछले साल की तुलना में कोई तीन प्रतिशत कम, लगभग 85 लाख टन अनाज कम पैदा होगा। इस बीच मकान, कारखानों, सड़कों के लिये जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे अधिकांश अन्नपूर्णा रही हैं। इस बात को भी नजरअन्दाज किया जा रहा है कि कम होते खेत एक बार तो मुआवजा मिलने से प्रतिव्यक्ति आय का आँकड़ा बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में भी इजाफा करते हैं। यही नहीं मनरेगा भी खेत विरोधी है। नरेगा में काम बढ़ने से खेतों में काम करने वाले मजदूर नहीं मिल रहे है और मजदूर ना मिलने से हैरान-परेशान किसान खेत को तिलांजली दे रहे हैं।

पूरे मध्य भारत में अभी देवउठानी एकादशी पर गन्ने, बेर, सिंघाड़े, आँवले के साथ पूजा की। ऐसे ही संस्कार देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाते हैं। असल में खेत, किसान, फसल हमारे लोक व सामाजिक जीवन में कई पर्व, त्योहार, उत्सव का केन्द्र है, लेकिन विडम्बना है कि किसान के लिये खेती घाटे का सौदा बन गई है।

अब जमीन की कीमत देकर खेत उजाड़ने की गहरी साजिश को हम समझ नहीं पा रहे हैं। यह जान लें कि कार, भवन, जैसे उत्पादों की तरह पेट भरने के लिये अनिवार्य अन्न किसी कारखाने में नहीं उगाया जा सकता है और जब तक खेत है तभी तक हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हैं।

एक तरफ देश की आबादी बढ़ रही है, लोगों की आय बढ़ने से भोजन की मात्रा बढ़ रही है, दूसरी ओर ताजातरीन आँकड़ा बताता है कि बीते साल की तुलना में इस बार गेहूँ की पैदावार ही 10 फीसदी कम हुई है। दाल की फसल आने से पहले ही पता चल गया कि आवक कम होगी व बाजार रंग दिखा चुका है।

यदि ताजातरीन जनगणना को देखें तो पता चलता है कि देश में पिछले एक दशक के दौरान किसानों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। इन दस वर्षों में किसानों की 90 लाख कम हो गई है। आजादी के बाद पहली बार जनगणना उनकी घटती संख्या दिखाई दी है।

सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि किसानों ने खेती छोड़कर कोई दूसरा काम-धंधा नहीं किया है बल्कि उनमें से ज्यादातर खाली बैठे हैं। इन्होंने जमीन बेचकर कोई नया काम-धंधा शुरू नहीं किया है बल्कि आज वे किसान से खेतिहर मजदूर बन गए हैं। वे अब मनरेगा जैसी योजनाओं में मजदूरी कर रहे हैं।

सन् 2001 में देश में कुल आबादी का 31.7 फीसदी किसान थे जो 2011 में सिमटकर 24.6 रह गया है। जानना जरूरी है कि देश में इस तरह से कृषि भूमि का रकबा घटना बेहद खतरनाक संकेत है। वह देश की अर्थव्यवस्था के लिये कतई ठीक नहीं है। इससे भविष्य में अनाज के मामले में हमारी आत्मनिर्भरता खत्म हो सकती है, जो कि देश के लिये घातक होगा।

दूसरी तरफ इन्हीं 10 सालों में देश में कॉरपोरेट घरानों ने 22.7 करोड़ हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया और उस पर खेती शुरू की है। कॉरपोरेट घराने बड़े रकबों पर मशीनों से खेती करने को फायदे का सौदा मानते हैं। हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में कॉरपोरेट घरानों ने बड़े-बड़े कृषि फार्म खोलकर खेती शुरू कर दी है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेती का भी कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चले जाना शुभ संकेत नहीं है। इससे देश की कोई भी भावी सरकार पूरी तरह से उनकी गुलाम बनकर रह जाएगी। उनका कहना है कि बैंकों की कृषि सम्बन्धी नीतियाँ, लागत से कम उपज, सरकार द्वारा समर्थन मूल्य में अपेक्षाकृत कम वृद्धि, सिंचाई की असुविधा, प्राकृतिक प्रकोप, उद्योगीकरण, शहरीकरण के नाम पर कृषि भूमि का अधिग्रहण और कृषि का क्षेत्र असंगठित होना- ये कारण हैं कि देश में कृषि भू-स्वामियों की संख्या में लगातार कमी होती जा रही है।

कॉरपोरेट घराने जिस तरह से नकदी खेती तथा मशीनीकरण की तरफ बढ़ रहे हैं उससे लाखों किसान विस्थापित होते जा रहे हैं।

देश में किसानों की दुर्दशा का अन्दाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार और कर्नाटक के 50 फीसदी से ज्यादा किसान आज कर्ज में डूबे हैं।

सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश में पाँच लाख से ज्यादा ग्रामीण खुदकुशी कर चुके हैं जिनमें अधिकांश किसान या खेतों में काम करने वाले मजदूर थे। इनमें से अधिकांश देश का पेट भरने के चक्कर में अपने ऊपर कर्जा चढ़वाते गए़। मौसम दगा दे गया या फिर मेहनत की फसल जब लेकर मंडी गया तो वाजिब दाम नहीं मिला।

संसद में स्वीकार किया गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रति किसान केवल 1.16 हेक्टेयर जमीन बची है। पूरे देश में एक हेक्टेयर से भी कम जोत वाले किसानों की तादाद 61.1 फीसदी है। देश में 1950-51 में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 53.1 फीसदी हुआ करता था, जो अब बामुश्किल 14 फीसदी है।

‘नेशनल सैम्पल सर्वे’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 40 फीसदी किसानों का कहना है कि वे केवल इसलिये खेती कर रहे हैं क्योंकि उनके पास जीवनयापन का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।

देश की अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि है। आँकड़े भी यही कुछ कहते हैं। देश की 67 फीसदी आबादी और काम करने वालों का 55 प्रतिशत परोक्ष-अपरोक्ष रूप से खेती से जुड़ा हुआ है।

एक अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में पिछले साल की तुलना में कोई तीन प्रतिशत कम, लगभग 85 लाख टन अनाज कम पैदा होगा। इस बीच मकान, कारखानों, सड़कों के लिये जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे अधिकांश अन्नपूर्णा रही हैं। इस बात को भी नजरअन्दाज किया जा रहा है कि कम होते खेत एक बार तो मुआवजा मिलने से प्रतिव्यक्ति आय का आँकड़ा बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में भी इजाफा करते हैं।

यही नहीं मनरेगा भी खेत विरोधी है। नरेगा में काम बढ़ने से खेतों में काम करने वाले मजदूर नहीं मिल रहे है और मजदूर ना मिलने से हैरान-परेशान किसान खेत को तिलांजली दे रहे हैं। गम्भीरता से देखें तो इस साजिश के पीछे कतिपय वित्त संस्थाएँ हैं जोकि ग्रामीण भारत में अपना बाजार तलाश रही हैं।

खेती की बढ़ती लागत को पूरा करने के लिये कर्जे का बाजार खोल दिया गया है और सरकार इसे किसानों के प्रति कल्याणकारी कदम के रूप में प्रचारित कर रही है।

हकीक़त में किसान कर्ज से बेहाल है। नेशनल सैंपल सर्वें के आँकड़े बताते हैं कि आन्ध्र प्रदेश के 82 फीसदी किसान कर्ज से दबे हैं। पंजाब और महाराष्ट्र जैसे कृषि प्रधान राज्यों में यह आँकड़ा औसतन 65 प्रतिशत है। यह भी तथ्य है कि इन राज्यों में ही किसानों की ख़ुदकुशी की सबसे अधिक घटनाएँ प्रकाश में आई हैं।

यह आँकड़े जाहिर करते हैं कि कर्ज किसान की चिन्ता का निराकरण नहीं हैं। परेशान किसान खेती से मुँह मोड़ता है, फिर उसकी ज़मीन को ज़मीन के व्यापारी खरीद लेते हैं। मामला केवल इतना सा नहीं है, इसका दूरगामी परिणाम होगा अन्न पर हमारी आत्मनिर्भरता समाप्त होना तथा, जमीन-विहीन बेराजगारों की संख्या बढ़ना।

किसान को सम्मान चाहिए और यह दर्जा चाहिए कि देश के चहुँमुखी विकास में वह महत्त्वपूर्ण अंग है।

किसान भारत का स्वाभिमान है और देश के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्त्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका शोषण हर स्तर पर है। किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भण्डारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो व इस व्यवसाय में पूँजीपतियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध -जैसे कदम देश का पेट भरने वाले किसानों का पेट भर सकते हैं।

चीन में खेती की विकास की सालाना दर 7 से 9 प्रतिशत है, जबकि भारत में यह गत् 20 सालों से दो को पार नहीं कर पाई है। अब तो विकास के नाम पर खेत उजाड़ने के खिलाफ पूरे देश में हिंसक आन्दोलन भी हो रहे हैं।

यह वक्त है कि हम खेती का रकबा बढ़ाने पर काम करें, इसे लिये जरूरी है कि उत्पादक ज़मीन पर हर तरह के निर्माण पर पाबन्दी हो। किसान को फसल के सुनिश्चित दाम, उसके परिवार के लिये शिक्षा व स्वास्थ्य की गारंटी हो और खेत व खेती को पावन कार्य घोषित किया जाये। खेती अकेले पेट भरने का नहीं भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक पहचान भी हैं और इसके बेरंग होने का मतलब असली भारत का रंगहीन होना होगा।

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