खेत को मारती युकेलिप्टस की खेती

Author:देबजीत सारंगी, बिचित्र बिस्वास एवं व्लाडी रिवेरा
Source:थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क फीचर्स/ सप्रेस, जून 2012

भारत में जमीन हड़पने के अनेक स्वरूप सामने आ रहे हैं। जबरन कब्जा करने के स्थान पर अब निजी कंपनियां किसानों को अधिक लाभ का लालच देकर एक ही तरह की फसल लगाने के लिए तैयार कर रही हैं। कागज मिलों द्वारा युकेलिप्टस की खेती को दिए जा रहे प्रोत्साहन को इसी नजरिए से देखा जाना आवश्यक है। गरीबी की मार से निकलने के प्रयास में किसान अपनी जमीन ही बंजर बना बैठे।

उड़ीसा के रायगढ़ जिले के सानाबृंदाबदी गांव का किसान अप्पाराव हिकाको आम के पेड़ की छांव में बैठा अपने युकेलिप्टस लगाने के अनुभव को कोस रहा है। 54 वर्षीय इस किसान को महसूस हो रहा है कि उसे कागज कंपनी और बैंक अधिकारियों ने मिलकर स्वयं लाभ कमाने के लिए फसाया है। भले ही आज भूमि उसी के पास है, लेकिन उसे भरोसा नहीं है कि भविष्य में यह उसके पास रहेगी क्योंकि भूमि तो ऋण के बदले बंधक रखी हुई है। उसकी यह त्रासद कहानी वर्ष 2000 में तब शुरू हुई जब जे.के. पेपर लि. और उत्कल ग्रामीण बैंक के कर्मचारी उसके खेत में आए और उससे युकेलिप्टस लगाने को कहा। उन्होंने वायदा किया कि वह इससे काफी धन कमाएगा। उसकी दो एकड़ जमीन के बदले उसे 12 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज पर 48000 रु. ऋण दिया गया। परंतु वास्तव में आधी राशि ही उसके हाथ आई क्योंकि बाकी का आधा जे.के. पेपर लि. ने युकेलिप्टस के 8 हजार पौधों की लागत के रूप में काट लिया। ऋण की बाकी राशि का उपयोग उसने रासायनिक कीटनाशकों और पौधे लगवाई की मजदूरी में कर लिया। उसके बाद वह पहली फसल का इंतजार करता रहा। सन् 2007 में आई अच्छी फसल से उसे 65000 रु. की आमदनी हुई। परंतु कंपनी ने पूरा धन ऋण एवं ब्याज के समायोजन के नाम पर ले लिया।

अप्पाराव हतप्रभ था। उसने लंबा इंतजार किया लेकिन वह कुछ भी कमा नहीं पाया। अब वह अपने परिवार से क्या कहेगा? उनका पेट कैसे भरेगा? उसे बहुत गुस्सा आ रहा था लेकिन वह लाचार था। वह नहीं जानता था कि भविष्य में आने वाली फसलों के बाद भी क्या उसके साथ ऐसा ही व्यवहार होगा? अब तक ग्यारह बरस बीत गए हैं और अप्पाराव हिकोका अभी भी दिल पर पत्थर रख कर अपने खेत पर लगे युकेलिप्टस देख रहा है। ऋण की इस श्रृंखला ने उसे कंगाल बना दिया है।

ऐसा सिर्फ अप्पाराव के साथ ही नहीं हुआ बल्कि जे.के. पेपर लि. ने दो राज्यों के 6 जिलों उड़ीसा के रायगढ़, कालाहांडी एवं कोरापुट और आंध्रप्रदेश के श्रीकाकुलम, विजयनगरम एवं विशाखापट्टनम के करीब 3000 हेक्टेयर में किसानों से युकेलिप्टस की खेती कराई है और सभी जगह किसान अब स्वयं को ठगा एवं फसा हुआ महसूस कर रहे हैं। इन खेतों में पहले विभिन्न फसलें उगाई जाती थीं, जो कि किसान परिवारों के 6 महीनों की खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति करती थीं। लेकिन मिल और बैंक की मिलीभगत ने आज किसानों को दिवालिया होने के कगार पर ला खड़ा किया है।

युकेलिप्टस एक गलत चयन


एक प्रभावशील औद्योगिक फसल होने के बावजूद युकेलिप्टस को कृषिवानिकी के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है। इसकी खास वजह यह है कि इससे निकलने वाले यौगिक पड़ोस के पौधों को अत्यधिक हानि पहुंचाते हैं। उड़ीसा के बिस्साम कटक से कुछ किलोमीटर दूर स्थित रतातिकी गांव के किसानों का कहना है कि तीन साल पुराने युकेलिप्टस की वजह से उनके खेती की फसल नष्ट हो रही हैं। इसी गांव के एक अन्य किसान के अनुसार फसल ही नहीं हमारी सिंचाई प्रणाली भी ध्वस्त हो गई है। चार वर्ष पूर्व पास बहने वाली धारा से सिंचाई के लिए पम्प तक लगाया जा सकता था और वर्ष में 2-3 फसलें हो जातीं थीं। अब वह धारा पूरी तरह से सूख चुकी है और केवल वर्षा ऋतु में खेती हो पाती है। परिणामस्वरूप वर्ष के अन्य महीनों में उसे मजदूरी करना पड़ती है। इस दौरान यह परिवर्तन भी आया कि इस इलाके में विद्यमान खाद्यान्न जैव विविधता भी नष्ट हो गई। अब यहां ज्वार, कोदो, कुट्टी जैसी फसलें नहीं होती और पूरा क्षेत्र खाद्यान्न संकट का शिकार हो गया है।

खेत को बंजर बनाता युकेलिप्टसखेत को बंजर बनाता युकेलिप्टसभारत स्वच्छ विकास प्रणाली (सीडीएम) के माध्यम से ‘हरित अर्थव्यवस्था’ को प्रोत्साहित करता है। लेकिन उसकी नीतियों से भ्रामक टिकाऊपन का आभास होता है। गौरतलब है कि सीडीएम व्यवस्था के अंतर्गत मिलने वाली कार्बन क्रेडिट का लाभ किसानों को मिलना चाहिए। जे.के. पेपर लि.- वेदा- किसान संविदा अनुबंध जिसे विश्व बैंक ने वैधता दी है, में उल्लेख है कि कार्बन क्रेडिट से मिलने वाली धनराशि किसानों की अतिरिक्त आमदनी होगी। परंतु रायगढ़ जिले के कम से कम सात गांव जिन्हें कि फंसाया और धोखा दिया गया है, को कभी यह नहीं बताया गया कि कार्बन क्रेडिट से होने वाली आमदनी के असली हकदार वे हैं। योजना के अंतर्गत यह भी सहमति बनी थी कि सीडीएम कंपनी को विश्व बैंक जैव कार्बन कोष से मिलने वाली कार्बन क्रेडिट किसानों के खातों (किसान-जे.के.-वेदा अनुबंध के मामले में कम से कम 80 प्रतिशत) में हस्तांतरित की जाएगी। किसानों के बीच यह राजस्व हस्तांतरण 150 से 200 रु. प्रति टन या तकरीबन 5000 से 7000 रु. प्रति एकड़ के मध्य संभावित था।

रायगढ़ जिले के किसानों को शक है कि जे.के. पेपर लि. कागज उत्पादन से लेकर कार्बन क्रेडिट तक अंधेरे में रखकर दोगुना लाभ कमा रही है। अनुबंध के अनुसार कंपनी को संबंधित तकनीकें एवं मार्गदर्शन भी उपलब्ध करवाना था। लेकिन किसानों की शिकायत है कि उन्हें कृषि एवं पर्यावरण में युकेलिप्टस से होने वाले दोषों के बारे में बताया ही नहीं गया।

नए तरह की भूमि हड़प


किसानों को दिवालियापन की ओर धकेलना और मिट्टी तथा जल संसाधन को इतना गंभीर नुकसान पहुंचाना जिसमें बाद में कुछ भी उपजाना कठिन हो भूमि हड़पने से कमतर नहीं है। अप्पाराव हिकोका का कहना है उसके पास जमीन हो सकती है, लेकिन वह मृत जमीन से ज्यादा कुछ नहीं है। इन किसानों के खाते बताते हैं कि इस योजना में न तो कुछ साफ-सुथरा है और न ही विकासात्मक फिर वह चाहे कागज बनाना हो या कार्बन का पृथककरण और इससे उनकी आर्थिक बेहतरी में भी कोई योगदान नहीं मिला है। इस संबंध में एक किसान की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है, कि इस एकफसली षड़यंत्र में फसना अत्यंत दुखदायी है। जिस अनवरत मानसिक हिंसा से उनका साबका पड़ा है उसे भूलने में उन्हें लंबा समय लगेगा।