खल्क खुदा का, जैव विविधता इंसानी शिकंजे में

Author:अरुण तिवारी

अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (22 मई) पर विशेष


ध्यान रहे कि भौतिक विकास की दृष्टि से 20वीं सदी भले ही भौतिक शास्त्रियों की रही हो, जीवन विकास की दृष्टि से 21वीं सदी जीव और पर्यावरण विज्ञानियों और प्रेक्टिशनर्स की ही हो, तो बेहतर।पहले मैं दिल्ली के जिस मकान में रहता था, वह मकान छोटा था, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। क्योंकि वह मकान नहीं, घर था। उसमें चींटी से लेकर चिड़ियां तक सभी के रहने की जगह थी। अब मकान थोड़ा बड़ा हो गया है। अब इसमें इंसान के अलावा किसी और के रहने की जगह नहीं है। मंजिलें बढ़ी हैं; लेकिन साथ-साथ रोशनदानों पर बंदिशें भी। मेरी बेटी गौरैया का घोसला देखने को तरस गई है। चूहे, तिलचट्टे, मच्छर और दीमक जरूर कभी-कभी अनाधिकार घुसपैठ कर बैठते हैं। उनका खात्मा करने का आइडिया ‘हिट’ हो गया है। हमने ऐसे तमाम हालात पैदा करने शुरू कर दिए हैं कि यह दुनिया.. दुनिया के दोस्तों के लिए ही नो एंट्री जोन में तब्दील हो जाए। ऐसे में जैव विविधता बचे, तो बचे कैसे ? गौरतलब है कि अब इंसानों की गिनती, दुनिया की दूसरी कृतियों के दुश्मनों में होने लगी है। खल्क खुदा का ! जैव विविधता इंसानी शिकंजे में !!

संसाधन भी गये और सम्बोधन भी
यह तो दुनिया शहर की। देहात के दरवाजे इतने नहीं, पर कुछ संकीर्ण तो जरूर ही हुए हैं। जहाँ सरकारी योजना के शौचालय पहुँच गये हैं, वहाँ शौचालय भले ही बकरी बाँधने के काम आ रहे हों, लेकिन शौच सम्बोधन... ‘लेट्रिन’ हो गया है। इसका जैवविविधता कनेक्शन है। शौच की ताजा सुविधा ने गाँवों मे झाड़ी व जंगलों की रही-सही जरूरत को ही निपटाना शुरू कर दिया है। जंगल के घोषित सफाई कर्मचारी सियार अपनी डयूटी निपटाने की बजाय खुद ही निपट रहे हैं। भेड़-बकरियों के चारागाह हम चर गये हैं। नेवला, साही, गोहटा के झुरमुट झाड़ू लगाकर साफ कर दिए हैं। हँसों को हमने कौवा बना दिया है। नीलगायों के ठिकानों को ठिकाने लगा दिया है। इधर बैसाख-जेठ में तालाबों के चटकते धब्बे और छोटी स्थानीय नदियों की सूखी लकीरें उन्हे डराने लगी हैं और उधर इंसान की हांक व खेतों में खड़े इंसानी पुतले। हमने ही उनसे उनके ठिकाने छीने। अब हम ही उन पर पत्थर फेंकते हैं; कहीं-कहीं तो गोलियाँ भी। वन्य जीव संरक्षण कानून आड़े न आये, तो हम उन्हें दिन-दहाड़े ही खा जायें। बाघों का भोजन हम ही चबा जायें। आखिर वे हमारे खेतों में न आयें, तो जायें, तो जायें कहाँ ?

संसाधन नहीं, संवेदना पर हो जोर


हो सकता है कि जब कभी हम जैव विविधता के मुबाहिसों में मशगूल हों; मेरे मीडिया दोस्त स्पेशल स्टोरी दिखा रहे हों..... मेरे गाँव के सियार प्यास से बिलबिला रहे हों और पत्थर के निशाने पर आकर कोई बेबस नीलगाय चोट से कराह रही हो। ..तो क्या बाघ, गिद्ध, घड़ियाल, डाॅल्फिन आदि...आदि के बाद अब सियार, नीलगाय, गौरैया वगैरह के लिए भी कोई अभ्यारण्य या आरक्षित क्षेत्र बनाया जाये? किसी संस्था ने पढ़ लिया तो शायद वह यही माँग कर बैठे। ...क्योंकि हमारी रुचि बीमारी के इलाज के लिए तंत्र बढ़ाने और संसाधन जुटाने में ज्यादा है; रोकथाम में तो कदापि नहीं।

संरक्षण हेतु संप्रग शासन में जैव सम्पदा रजिस्टर योजना घोषित की। घोषित किया कि बाघ अभ्यारण्य अभी और बढेंगे। मगर हम आँकड़ों की दुनिया को कैसे झुठला सकते हैं ! गुजरात में शेरों की संख्या बढने की खबर हो सकता है कि सच हो; किन्तु सच यह भी है कि देश में अभ्यारण्य बढ़े हैं और बाघ घटे हैं।

दुनिया में दोस्त हुए कम


भारतीय जैव विविधता को दर्शाता चार्टभारतीय जैव विविधता को दर्शाता चार्ट आँकड़े कह रहे हैं कि हमने पिछले 40 साल के छोटे से कलैंडर में प्रकृति के एक-तिहाई दोस्त खो दिए हैं। एशियाई बाघों की संख्या में 70 फीसदी गिरावट आई है। मीठे पानी पर रहने वाले पशु व पक्षी भी 70 फीसदी तक घटे हैं। भागलपुर की गंगा में डाॅलफिन रिजर्व बना है; फिर भी डाॅलफिन के अस्तित्व पर ही खतरे मंडराने की खबरें मंडरा रही हैं। क्यों? उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कई प्रजातियों की संख्या 60 फीसदी तक घट गई है। यह आँकड़ों की दुनिया है। हकीकत इससे भी बुरी हो सकती है। जैव विविधता के मामले में दुनिया की सबसे समृद्ध गंगा घाटी का हाल किसी से छिपा नहीं है। हकीकत यही है कि प्रकृति की कोई रचना निष्प्रयोजन नहीं है। हर रचना के नष्ट होने का मतलब है कि कुदरत की गाड़ी से एक पेच या पार्ट हटा देना। यही हाल रहा, तो एक दिन यह जीव चक्र इतना बिगड़ जायेगा कि इंसान वहीं पहुँच जायेगा, जहाँ था। शायद उससे भी बदतर हालत में। पुनः मूषकः भव !!

लालच बढा, नियामतें घटी


दरअसल हमने अपने लालच इतने बढ़ा लिए हैं कि हर चीज कम पड़ गई है, सिवाय हमारे लालच के। यह काल्पनिक बात नहीं कि धरती, पानी, हवा, जंगल, बारिश, खनिज, मांस, मवेशी... कुदरत की सारी नियामतें अब इंसानों को कम पड़ने लगी हैं। इंसानों ने भी तय कर लिया है कि कुदरत की सारी नियामतें सिर्फ और सिर्फ इंसानों के लिए है; वह भी सबसे पहले मेरे लिए। इसीलिए ये सारी लूट है; विवाद हैं; रसहीन होते रिश्ते हैं। यही रफ्तार जारी रही, तो एक दिन यह पृथ्वी कम पड़ जायेगी, इंसानी लालच के लिए और आँसू कम पड़ जायेंगे अपनी गलतियों पर रोने के लिए।

प्रकृति अपना सन्तुलन खुद करती ही है। एक दिन वह करेगी ही। यह तय है। अब तय तो सिर्फ हमे करना है कि सादगी को शान बनायें, प्रकृति व उसकी दूसरी कृतियों को उनका हक लौटायें, “जिओ और जीने दो’’ का सिद्धान्त अपनायें, जैव विविधता बचायें या गायें, छटपटायें - आ ढूंढ लें ग्रह और कोई ...। दिल्ली गेट के चौराहे पर दाना चुगाने का अवसर, फिलहाल मेट्रो के काम से भले ही कम किया हो, किन्तु आर्य शेखर ने अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद के ठीक सामने स्थित घर की छत पर पक्षियों को दाना-पानी देने का काम बढ़ा दिया है। पुणे की एक संस्था इस गर्मी में पंछियों को पानी पिलाने के मिट्टी के बर्तन बाँट रही है। लक्ष्य है कि पानी पीने के लिए पंछी को 100 मीटर से अधिक न उड़ना पड़े। दिल्ली की अदालत ने भी पंछियों की आजादी का अधिकार एक बार पुनः रेखांकित किया है। ऐसे छोटे-छोटे कदमों से जैव विविधता लौटा लाने का मानसिकता लौटेगी और हमारी संवेदना भी।