खत्म हो गए कुएँ-कुण्डियाँ उलीचने का दौर

Author:मनीष वैद्य

.समय के साथ हमने अपने जन-जीवन से कई महत्त्वपूर्ण चलन रिवाज से बाहर कर दिये। हमने इन्हें चलन से निकालने से पहले यह भी नहीं सोचा कि इनके नहीं निभाने पर हमें किन–किन बड़े संकटों से गुजरना पड़ सकता है और हमारे समाज में यदि ये रिवायत रही थी तो इसके पीछे कितना गहरा अनुभव का ज्ञान रहा होगा।

पानी से जुड़ी एक ऐसी ही रिवायत हुआ करती थी कुआँ – कुण्डियों को हर साल उलीचने की। इससे न केवल कुएँ–कुण्डियों की साल-दर-साल साफ़–सफाई हो जाया करती थी, बल्कि इससे ज़मीन से पानी आने के स्रोत भी पुनर्जीवित हो जाया करते थे। अब भूजल वैज्ञानिक भी मानते हैं कि यह चलन प्राकृतिक जलस्रोत ख़ासतौर पर कुएँ-कुण्डियों के लिये बहुत उपयोगी हुआ करता था और इसीलिये उस जमाने में कुएँ–कुण्डियाँ साल-दर-साल पीढ़ियों तक पानी देते रहते थे।

आज का दौर भयावह जलसंकट का दौर है। देश के करीब–करीब हर हिस्से में हर साल गर्मियों के दिन में लोगों को पीने के पानी के लिये मुश्किल का सामना करना पड़ता है। सर्दियों के खत्म होते–होते पानी का संकट शुरू हो जाता है और आधी गर्मी बीतते तो इतनी किल्लत बढ़ जाती है कि लोगों के लिये कुछ इलाकों में तो बाल्टी–बाल्टी पानी जुटाना मुश्किल हो जाता है।

कुआँ और कुण्डी इसके तमाम कारणों में सबसे बड़ा कारण यह भी है कि हमने अपने परम्परागत और प्राकृतिक पानी के स्रोतों को करीब–करीब भुला सा दिया है। इनकी उपेक्षा हम पर दिन-ब-दिन महंगी पड़ती जा रही है। लेकिन हम हैं कि इसके बावजूद कभी अपनी गलतियाँ सुधारने का जतन तो दूर, इस पर गम्भीरता से सोचने की कोशिश तक नहीं कर रहे। पहले के दिनों में ज्यादातर लोग पीने के पानी के लिये कुएँ–कुण्डियों पर ही आश्रित रहा करते थे।

हर साल बारिश से पहले इनकी अच्छी तरह से साफ़–सफाई की जाती थी और इस तरह साल-दर-साल कुएँ–कुण्डियों की देखभाल भी हो जाया करती थी। पर अब के दौर में तो जैसे यह चलन ही खत्म हो गया है। पहले के सालों में कुएँ–कुण्डी उलीचने के लिये पूरा गाँव साल में नियत दिन इकट्ठा होता था और श्रमदान करते हुए कुएँ–कुण्डी की सफाई करते थे।

मुझे अच्छे से याद है, जब हम लोग छोटे थे तब पिता का तबादला देवास जिले के एक छोटे से गाँव में हो गया था। उस गाँव की चार दिशाओं में चार कुएँ–कुण्डियाँ थीं और पूरा गाँव इन्हीं से पीने का पानी भरता था। तब तक वहाँ नल जल योजना नहीं आई थी। गाँव भर की औरतें अलसुबह से ही पनघट पर जुटना शुरू होतीं। बातचीत का दौर शुरू होता। घर–परिवार की बातें निकल आती तो कभी मायके की...कहीं से भी बातों का सिरा हाथ आ जाता और फिर पानी के साथ-साथ बातें भी चलती रहती।

इसी बहाने कभी उनकी पीड़ा साझा होने लगती तो कभी वे एक दूसरे का सम्बल बनती। सुबह 6 बजे से 10 बजे तक पनघट पर मेला सा रहा करता। यह शायद 1970 के दशक के आखिरी साल रहे होंगे। तब से लेकर 1990 के दशक तक जब तक कि गाँव में नल जल योजना शुरू नहीं हुई। इन चारों कुएँ–कुण्डियों को हर साल आषाढ़ महीना आने के साथ ही उलीच लिया जाता था।

कुआँ और कुण्डी पहले उस कुएँ से पानी भरने वाले गाँव के सारे लोग बैठते फिर सर्व सम्मति से कुआँ उलीचने के लिये कोई दिन तय किया जाता। इस दिन महिलाएँ अपने घरों का पानी जल्दी सुबह ही भर लिया करती। सुबह करीब 10 बजे तक गाँव भर के पुरुष यानी कम-से-कम हर घर से एक सदस्य यहाँ अपनी–अपनी रस्सी-बाल्टी लेकर इकट्ठा हो जाया करते। फिर एक साथ शुरू होता उलीचने का काम।

12-12 लोग एक साथ कुएँ से पानी खींचते हुए उलीचते जाते और इस पानी को कहीं किसी बड़े हौद में इकट्ठा कर लिया जाता। लगातार कुछ घंटों तक पानी खींचने के बाद कुएँ-कुण्डी से नीचे की गाद का पानी आने लगता, उसे एक तरफ नालियों के जरिए बहा दिया जाता। फिर और गाढ़ा गन्दा पानी आने लगता और कुएँ में पानी बहुत कम रह जाता तब उसमें कुछ लोग सीढ़ियों के सहारे उतरते और अब बाल्टियों में कुएँ के तल में जमा गन्दगी, कीचड़, काई और रेत को बाल्टियों में भरते जाते जिन्हें ऊपर खड़े लोग लगातार उलीचते जाते। ऐसा भी करीब एक से दो घंटे तक चलता रहता।

धीरे–धीरे कुएँ की तली बिलकुल-साफ़ हो जाती। फिर कुएँ की आव यानी पानी आने वाली जगहों को भी साफ़ कर लिया जाता। अब पूरा कुआँ साफ़ हो जाता तो सब लोग कुएँ से हट जाते। यहाँ अब हाजरी भरी जाती कि किस-किस घर से लोग आएँ हैं और कहाँ से नहीं। जहाँ से नहीं आएँ हैं वहाँ से आर्थिक जुर्माना भी लिया जाता बहुत न्यूनतम (तब 5 या 10 रुपए) ताकि लोग हर साल आते रहें। इस राशि का उपयोग कुएँ की मरम्मत और अन्य कामों में किया जाता था। दूसरे शब्दों में यह एक तरह से जलस्रोत की सालाना देखभाल का जलसा हुआ करता था।

भूजल वैज्ञानिक मानते हैं कि इस तरह साल-दर-साल कुएँ–कुण्डी को सहेजने और उलीचने की समृद्ध परम्परा हमारे यहाँ रही है और यह जलस्रोतों के हित में ही थी। इससे कुएँ–कुण्डी साल भर के लिये निर्मल और स्वास्थ्यप्रद पीने का पानी देने में सक्षम हो जाते थे। साथ ही बारिश के दौरान जल में मिलने से पहले ही कई अशुद्धियाँ कुएँ से बाहर आ जाती थी। इससे ज़मीन से रिसकर आने वाले ज़मीन के पानी की आव (स्रोत) भी रिचार्ज हो जाया करते थे।

कुआँ और कुण्डी इससे कभी–कभी पुराने और निष्क्रिय हो चुके स्रोत से भी पानी आने के रास्ते खुल जाते हैं। इससे लोग अपने जलाशयों के प्रति संवेदनशील भी रहा करते थे। ये चलन तत्कालीन समाज की सैकड़ों सालों में अर्जित ज्ञान और उनके संचित अनुभवों के बाद व्यवहार में लाए गए थे लेकिन हमने इन्हें बिना परिक्षण और महत्ता समझे ही खारिज कर दिया।

बाद के सालों में जैसे–जैसे गाँवों तक नल–जल योजनाएँ पहुँची, तभी से इस तरह की कई पद्धतियाँ और रिवायतें चलन से बाहर होती गई। लोग पानी के लिये नलों पर आश्रित रहने लगे और उधर सैकड़ों सालों से पानी दे रहे जल स्रोत गुमनामी के अंधेरे में घिरते चले गए।

75 साल के शिवनारायण राठौर बताते हैं कि कुएँ–कुण्डी को लोग इसीलिये पूजते थे। हर मांगलिक काम में हमारी संस्कृति जलाशयों की ओर इंगित करती है। जन्म होने पर सूरज पूजा जलाशयों पर ही होती है तो ब्याह-शादियों की तैयारियाँ भी पानी के मटके कुम्हार के यहाँ लेने जाने से ही शुरू होती है। हर धार्मिक विधि–विधान में कलश पूजन और पानी के प्रतीक वरुण का आह्वान किया जाता है।

मुंडन हो या गंगा पूजन सब कुछ जलाशयों के प्रति हमारे समाज की कृतज्ञता ज्ञापित करने की ही पद्धति है। पहले तो ज्यादातर विधि–विधान, यज्ञ और पूजन, अनुष्ठान भी पवित्र नदियों के किनारे पर ही किये जाते रहे हैं। कुएँ–कुण्डी उलीचना भी एक तरह से बारिश से पहले पानी के लिये मनुहार ही थी और सेहत के लिये भी यह जरूरी ही था पर लम्बे समय से खत्म होती जा रही है। अब यह सिर्फ बुजुर्गों के किस्सों तक ही सिमित होती जा रही है।