लगातार बढ़ रहा है मौसमी आपदाओं का खतरा

Author:सुनीता नारायण
Source:कादम्बिनी, दिसम्बर 2012
दुनिया भर में मौसम में होने वाले बदलाव जन जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। लेकिन इन मौसमी आपदाओं को हम अभी तक जलवायु परिवर्तन का हिस्सा मानने से परहेज करते हैं। अगर इस पूरे साल को देखें तो ऐसे ढेरों उदाहरण दिखाई देते हैं, जहां मौसम में बदलाव अप्रत्याशित से कम नहीं था। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक माइल्स एलन के 11 साल के शोध से यह बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन का मौसमी आपदाओं से कैसा रिश्ता है। उनके अनुसार जलवायु परिवर्तन से ऐसी आपदाओं के आने की आशंकाएं दोगुनी हो जाती हैं। अमेरिका में आए समुद्री तूफान सैंडी के दौरान कई लोगों की मौत हुई और अरबों का नुकसान हुआ। इसी दौरान भारत के दक्षिणवर्ती राज्यों में नीलम तूफान का संकट आया। नीलम से बहुत ज्यादा का नुकसान तो नहीं हुआ लेकिन सैंडी के सुपरस्टोर्म ने अमेरिका जैसे धनी और विकसित देश को हिलाकर रख दिया। अगर इस घटना को ज्यादा व्यापक फलक पर देखें तो यह साफ है कि प्रकृति में इन दिनों तेजी से बदलाव हो रहा है और यह बदलाव आम जन जीवन के लिए आने वाले खतरे की ओर इशारा कर रहा है। सैंडी तूफान का कहर एक झलक है। इस तूफान के बाद बराक ओबामा ने राहत के लिए संसाधनों के दरवाज़े खोल दिए और दूसरी बार राष्ट्रपति बनने में उनकी इस दरियादिली का भी अहम योगदान रहा। बहरहाल, इस मुद्दे पर अमेरिकी रुख की दूसरी झलक मुझे कोपेनहेगन की बैठक में दिखी। डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में हुई भूमंडलीय पर्यावरणीय बैठक में ओबामा प्रशासन का रुख ऐसा था कि वे इस पूरे मसले पर दुनिया का लीडर बनने को तैयार हैं लेकिन जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए वे एक प्रभावी बहुपक्षीय गठजोड़ तैयार करने के पक्ष में नहीं हैं। उनका इरादा ऐसा है जैसे उनका दुनिया को सबसे ज्यादा प्रदूषित करने वाले देशों का एक गैंग हो जो अपने यहां तो यथा स्थिति बरकरार रखे और दूसरी ओर गरीब और विकासशील देशों पर पर्यावरण के नाम पर विकास की रफ्तार को धीमी रखने के लिए दबाव बनाए।

दुनिया भर के विकसित देशों के इसी रवैए से अब तक हम दुनिया भर में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं कर पाए हैं और तानाशाही भरे इस रवैये के चलते दुनिया भर के देशों को एक मंच पर लाना भी संभव नहीं हो रहा है। बहरहाल, सैंडी और नीलम तूफान से कुछ महीने पहले मैं अपनी बहन से बात कर रही थी। भारत में काफी गर्मी चल रही थी, तो मैं उसे यहां के हालात के बारे में बता रही थी वहीं दूसरी ओर उसने अपने शहर वाशिंगटन डीसी के बारे में बताया था कि वहां भी तेज लू जैसी लहर चल रही है और इसमें उसके घर का छत उड़ गया है। मेरी बहन के मुताबिक वहां की लू को झेलना असहनीय स्थिति तक पहुंच चुका था। साफ है कि दुनिया के दो छोरों पर स्थित हम दोनों बहनों की स्थिति एक जैसी थी।

ऐसे में एक बड़ा सवाल यह जरूर उठता है कि हमारा विश्व किस दिशा में जा रहा है। दुनिया भर में मौसम में होने वाले बदलाव जन जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। लेकिन इन मौसमी आपदाओं को हम अभी तक जलवायु परिवर्तन का हिस्सा मानने से परहेज करते हैं। अगर इस पूरे साल को देखें तो ऐसे ढेरों उदाहरण दिखाई देते हैं, जहां मौसम में बदलाव अप्रत्याशित से कम नहीं था। ब्रिटेन में मौसम और जलवायु को लेकर आम लोग कहीं ज्यादा सजग रहते हैं। इस बार वहां की महारानी का डायमंड जुबली सेलिब्रेशन बारिश की भेंट चढ़ गया। ओलंपिक खेलों के आयोजन के दौरान होने वाली मशाल दौड़ भी बारिश और तूफान से प्रभावित रही। पश्चिमी यार्कशायर में बाढ़ के चक्कर में इलाके के लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा (एक महीने के अंदर इलाके में तीन बार बाढ़ की स्थिति पैदा हुई थी)। भारत में भी एक महीने की बरसात महज तीन घंटे में हो गई थी। रूस में बारिश के चलते 174 लोगों की मौत हुई। अमेरिका के कोलारोड में जंगल में आग लगी जो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी।

ऐसे में एक सवाल यह जरूर उठता है कि दुनिया इस तरह के मौसमी बदलावों के असर को किस रूप में देख रही हैं। इसमें एक पहलू तो तय है कि दुनिया भर में मौसम तेजी से बदल रहा है। दुनिया भर के मौसम विभाग इससे जुड़े बदलावों पर नजर बनाए हुए हैं और तापमान में बढ़ोत्तरी का आंकड़ा भी दर्ज कर रहे हैं। वायुमंडल के तापमान में बढ़ोत्तरी तो अब पुराना मसला हो चुका है, तेजी से बदलते मौसम का ट्रेंड और उसका मौसमी आपदा में तब्दील हो जाना अब नई समस्या के तौर पर सामने आ रहा है। लेकिन यह समस्या ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के चलते ही उत्पन्न हो रही है, इसको कैसे माना जाए। यह सवाल भी उठ रहा है, क्योंकि मौसम पर तो कई कारकों का असर पड़ता है और ऐसी आपदाओं के लिए कई और कारक भी जिम्मेदार हैं। मसलन सूखा और बाढ़ से होने वाला नुकसान तो संसाधनों के बेजा इस्तेमाल और बेकार योजनाओं के चलते भी होता है।

यह सोच उन लोगों की होती है जो जलवायु परिवर्तन से होने वाली समस्याओं को मानने से इनकार करते रहे हैं। ऐसे लोगों को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक माइल्स एलन की रिपोर्ट देखनी चाहिए जिन्होंने बताया कि मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन का मौसमी आपदाओं से कैसा रिश्ता है। 2000 में एलन का घर बाढ़ की चपेट में आ गया। तब से उन्होंने इस दिशा में काम करना शुरू किया और पूरे ग्यारह साल के लंबे शोध के आधार पर उन्होंने अपनी रिपोर्ट पूरी की जो बताती है कि जलवायु परिवर्तन के चलते ऐसी आपदाओं के आने की आशंका दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी है।

यह सच है कि जलवायु परिवर्तन का विज्ञान काफी नया है और इसमें अभी काफी कुछ जानने और समझने की गुंजाइश बाकी है। लेकिन हम पहले से काफी कुछ ज्यादा जान रहे हैं। ऐसी सूरत में हम यह भी जान रहे हैं कि अगर ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में हालात कैसे हो सकते हैं। मेरी समझ से जलवायु परिवर्तन और उसका असर शतरंज के खेल की तरह है जिसमें कई अप और डाउन होते हैं, लेकिन इसके बारे में ज्यादा जानकारी हासिल किए जाने के लिए कहीं ज्यादा शोध किए जाने की जरूरत है। जब तक इनके खतरों को विश्वसनीय तरीके से लोगों को बताया नहीं जाता तब तक आम लोग इन खतरों से बचने के लिए अपने तौर तरीकों में बदलाव ला ही नहीं सकते। हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों के बेजा इस्तेमाल से बचना होगा, हमें उनका दोहन हर तरह से रोकना होगा। इसके लिए आम लोगों से लेकर सरकारों तक को सक्रिय भागीदारी निभानी होगी नहीं तो वह समय दूर नहीं है जब प्राकृतिक आपदाओं के साए में हमारी दुनिया नष्ट होने के कगार तक पहुंच जाएगी।

(निदेशक, सेंटर फॉर साइंस एंड इनवारनमेंट)

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