लोगों का गुस्सा बादल की तरह फटेगा

Author:स्वतंत्र मिश्र
Source:जल, जंगल और जमीन उलट-पुलट पर्यावरण (2013) किताब से साभार

आपदा में बड़ी संख्या में पशु भी मारे गए हैं। पशुपालन निदेशालय में बने आपदा प्रबन्धन नियंत्रण कक्ष के मुताबिक विभिन्न जनपदों में 12 हजार से अधिक पशुओं की मौत हुई और 697 पशु घायल हुए हैं। पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक एके सच्चर ने बताया कि मारे गए पशुओं में 449 गाएँ हैं। इनमें सबसे ज्यादा 222 गाएँ टिहरी जिले में आपदा की शिकार हुई हैं। हैरत की बात है कि राज्य में एक आँकड़े के मुताबिक पशुओं की देखभाल के लिये 17 पंजीकृत संस्थाएँ हैं। एक संस्था ‘कल्याण’ के नाम से भी है। उत्तराखण्ड में आई तबाही को एक महीना बीत गया और आज से इस त्रासदी की वजह से लापता हुए लोगों को मृतक मान लिया गया। मरने वालों का कोई पुख्ता आँकड़ा नहीं है। एक संगठन 15 हजार बता रहा है तो एक हिंदूवादी राजनीतिक पार्टी 10 हजार से ज्यादा लोगों के मरने की बात कर रही है। वहीं खुद को ‘विजय’ बताने वाले उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा संकोचवश कभी 500 लाशों के देखे जाने की बात कर रहे थे पर धीरे-धीरे संकोच कम हुआ तो उन्होंने भी 4000 लोगों के इस विपदा में जान गँवाने की बात स्वीकार ली।

लाश देखने की बात वे इसलिये कर रहे थे क्योंकि उन्होंने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (संप्रग) की अध्यक्ष सोनिया गाँधी की तर्ज पर विपदाग्रस्त इलाकों का हवाई दौरा ही अब तक किया है। उन्हें डर था कि लाशों से उठती बदबू और घायलों के बजबजाते मवादों से उड़कर कोई जीवाणु और विषाणु उन्हें संक्रमित न कर दे। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक मदनमोहन मालवीय भी दलितों की बस्ती में जाते और उनसे अपने सम्मान में माला डलवाते और घर लौटकर खूब मल-मलकर नहाते थे।

सूबे के मुख्यमंत्री ‘विजय’ इस मामले में भी ‘पराजित’ साबित हुए अन्यथा घर के सदस्य किसी संक्रमण वाली बीमारी के शिकार हो जाएँ तब कुछ सावधानी बरत कर उनकी सेवा की जाती है न कि उन्हें मरने के लिये छोड़ दिया जाता है। लापता लोगों की संख्या लगभग 5600 तो राज्य सरकार भी मान चुकी है और अब इतने लोग नहीं मिले तो इन्हें भी अब मृतकों में जोड़ लें तब भी आँकड़ा 10000 के आसपास तो पहुँच ही गया।

एक नई घोषणा मुख्यमंत्री ने यह भी कि है कि एक-एक लाश को मलबे के भीतर से निकाल कर उसकी अन्त्येष्टि करेंगे। 25-30 फीट भीतर मलबे में धँसी हुई लाशें किस इच्छाशक्ति और किस तकनीक के बलबूते पर मुख्यमंत्री निकलवा पाएँगे, ये तो वही बता सकेंगे। वहीं दूसरी ओर यह खबरें भी आ रही हैं कि आपदा प्रभावित इलाकों के जंगलों में 20-25 लाशें इकट्ठी पाई जा रही हैं जो ठंड और भूख की वजह से मारे गए। ये लाशें आपस में एक-दूसरे से चिपटी हुई हैं।

अनुमान है कि इन्होंने खुद को ठंड से बचाने के लिये शरीर को गर्म करने का यह तरीका ढूँढा होगा, लेकिन पेट की आग तभी परवान चढ़ पाती है जब उसे अनाज की आँच मिलती है। सेना के कमांडों जंगलों में घूम-घूमकर लाशों को एसिड से जला रहे हैं ताकि लाशों की गिनती कम ही रहे। बाद में जब स्थितियाँ थोड़ी सामान्य होंगी तब जंगल के संसाधनों पर बहुत ही मामूली तरीके से गुजारा करने वाले लोगों का इन कंकालों से वास्ता पड़ेगा और वे अपने खोये लोगों को इनमें ढूँढने की भावनात्मक और स्वाभाविक भूल भी करेंगे। यहाँ बताना जरूरी है कि उत्तराखण्ड में ही नंदादेवी के रास्ते में एक जगह रूपकुंड है, जहाँ आज भी नरकंकाल मिलते हैं।

पशु ‘कल्याण’ वाले भी लापता!


इस आपदा में बड़ी संख्या में पशु भी मारे गए हैं। पशुपालन निदेशालय में बने आपदा प्रबन्धन नियंत्रण कक्ष के मुताबिक विभिन्न जनपदों में 12 हजार से अधिक पशुओं की मौत हुई और 697 पशु घायल हुए हैं। पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक एके सच्चर ने बताया कि मारे गए पशुओं में 449 गाएँ हैं। इनमें सबसे ज्यादा 222 गाएँ टिहरी जिले में आपदा की शिकार हुई हैं।

हैरत की बात है कि राज्य में एक आँकड़े के मुताबिक पशुओं की देखभाल के लिये 17 पंजीकृत संस्थाएँ हैं। एक संस्था ‘कल्याण’ के नाम से भी है। इनके अलावा भी बहुत सारी गैर-सरकारी दर्जनों संस्थाएँ भी संचालित की जा रही हैं, जो राज्य और केन्द्र सरकार से पशुओं की देखभाल के नाम पर ‘मदद’ लेती हैं, लेकिन आपदा के बाद ये सभी संस्थाएँ गायब हैं।

पशुपालन निदेशालय ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड को पत्र भेजकर देश भर में पशुओं के नाम पर चलने वाली गैर-सरकारी संगठनों से मदद दिलाने की माँग की थी, लेकिन अब तक एक भी संस्था आगे नहीं आई है। भारत में कुछ हिंदूवादी संगठन जो ‘गाय प्रेम’ की माला दिन-रात भजते हैं, इस मौके पर उनका प्रेम भी न जाने कहाँ काफूर हो गया है। खैर, इस पर कभी अलग से बात की जा सकती है, फिलहाल उत्तराखण्ड में आई आपदा पर ही बात को केन्द्रित करना ठीक होगा।

नफा हमारा और नुकसान तुम्हारा


उत्तराखण्ड की आपदा के बारे में विमर्श करते हुए इसे ‘मानवीय भूल’ बताया जा रहा है। यहाँ थोड़ा इस शब्दावली को गम्भीरता से समझने की दरकार है। दरअसल, ऐसा कहकर जाने-अनजाने पूँजीवादी विकास के मॉडल के अपराध को कम करने की कोशिश की जा रही है। राज्य के गठन से पहले और राज्य के गठन के बाद यहाँ संसाधनों के दोहन का सिलसिला बहुत तेज गति से चल रहा है। यहाँ की नदियों पर ऊर्जा पैदा करने के लिये लगभग छोटे-बड़े 550 बाँध बनाए जा चुके हैं।

बड़े पूँजीपति घरानों के अलावा ऊर्जा उत्पादन के लिये टरबाइन खरीदने के लिये मुम्बई के सिनेमा जगत से जुड़े लोग भी यहाँ मुनाफा कमाने के आकर्षण में खींचे चले आते हैं। फिल्मों में संघर्ष कर रहे कुछ मंझोले किस्म के लोग अपनी जीवनचर्या के खर्च को यहाँ की आमदनी से व्यवस्थित करते हैं। इससे इतर यहाँ पैदा की गई ऊर्जा का अधिकांश हिस्सा उत्तर प्रदेश और दूसरे प्रदेश को स्थानान्तरित कर दिया जाता है। सच तो यह है कि पहाड़ों के बहुत सारे गाँव आज भी अन्धेरे में हैं। वहाँ आज भी रोशनी के लिये लालटेन का ही सहारा लिया जाता है।

इस समय लगातार बारिश और भूस्खलन के चलते ऊर्जा वितरित करने वाले विद्युत स्टेशन और उप-विद्युत स्टेशन भी खतरे की जद में है। ऊखीमठ स्थित उप-विद्युत स्टेशन भी खतरे की जद में आ गया है। वहीं दूसरी ओर मनेरी भाली स्टेज-टू में 16 जून से ही ठप पड़ा हुआ है। उत्पादन बन्द होने की वजह से मनेरी भाली स्टेज-टू को हर रोज 60 लाख यूनिट बिजली का नुकसान हो रहा था इसलिए ‘नफा हमारा और नुकसान तुम्हारा’ के दर्शन को आधार बनाकर अपना घाटा पाटने के लिये जल विद्युत निगम ने ज्ञानसू बस्ती को खतरे में डालकर बिजली उत्पादन शुरू कर दिया है।

बैराज में पानी रोकने तथा रोककर छोड़ने की स्थिति में हो रहे कटाव से ज्ञानसू बस्ती के जलमग्न होने का खतरा मँडरा रहा है। सुरक्षा का कोई इन्तजाम किये बगैर ही जलाशय भरे जाने से क्षेत्र की जनता में भय और रोष व्याप्त है, लेकिन इसकी परवाह किसको है। सरकारी बिजली कम्पनी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर कॉरपोरेशन (एनएचपीसी) के शेयरों के भाव धौलीगंगा विद्युत संयंत्र (280 मेगावाट) में पानी घुसते ही धड़ाधड़ गिर गए। जयप्रकाश पावर (जेपी) के विष्णुप्रयाग विद्युत संयंत्र (400 मेगावाट) को भी 16 जून को आई बाढ़ के बाद बन्द कर दिया गया। जेपी की उत्तराखण्ड में दो जल विद्युत परियोजनाएँ हैं।

जेपी का उत्तर प्रदेश विद्युत निगम लिमिटेड के साथ करार है। जाहिर है कि इन कम्पनियों को बाढ़ के खतरों को देखते हुए कम-से-कम दो-तीन महीने अपनी विद्युत परियोजनाएँ या तो बन्द करनी पड़ेगी या उत्पादन कम करना पड़ेगा। यही वजह है कि ये कम्पनियाँ अब अपने-अपने नुकसान का हिसाब लगा रही हैं।

गौरतलब है कि उत्तराखण्ड में गंगा की बेसिन में चल रहे छोटे-छोटे जल-विद्युत परियोजनाओं से कुल 6000 मेगावाट बिजली पैदा की जा रही है। बीके. चतुर्वेदी समिति ने इन परियोजनाओं के भविष्य को लेकर 2012 में चिन्ता जताई थी और कहा था कि गंगा में आने वाली बाढ़ और भू-स्खलन की वजह से इन परियोजनाओं को नुकसान झेलना पड़ सकता है।

इस समिति ने जल-विद्युत परियोजना के भविष्य को लेकर बहुत उत्साह नहीं दिखाया था। यही वजह है कि बहुत सारी जल-विद्युत उत्पादन में लगी कम्पनियों ने सौर-ऊर्जा से बिजली हासिल करना शुरू भी कर दिया है। उत्तराखण्ड में ही 69 जल-विद्युत परियोजनाओं से 9000 मेगावाट बिजली पैदा करने का प्रस्ताव भी विभिन्न मंत्रालयों के पास विचाराधीन है। बीके चतुर्वेदी समिति ने इन विचाराधीन 69 परियोजनाओं के बाद एक भी नई परियोजना नहीं शुरू करने की सलाह दी है।

उत्तराखण्ड में लोगों की जानमाल की सुरक्षा की उपेक्षा दशकों से हो रही है। कोटद्वार में एक गाँव पुलिंडा है जहाँ के लोग 1970 से ही खुद को विस्थापित करने की माँग करते आ रहे हैं। बरसात में हर साल यहाँ के मकान जमीन में कुछ फीट धँस जाते हैं। कुछ साल पहले तो यहाँ पन्द्रह परिवार के कुल 75 लोग जमींदोज हो गए थे। विकास की दुदुंभि बजाने वाली राज्य गठन के बाद से लेकर अब तक की सारी सरकारों ने इन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह पर नहीं बसाया इसलिये वे अक्सर कोटद्वार और देहरादून में अपनी माँग मनवाने की आस में पहुँचते रहते हैं। पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरोध के बावजूद यहाँ हर रोज नई विद्युत परियोजनाएँ शुरू करने की बात हो रही है। भू-माफिया यहाँ बहुत सक्रिय हैं जो सभी मानदंडों की अनदेखी करके पहाड़ों को काटकर कई मंजिलों वाले होटल और आलीशान मकान धड़ल्ले से बना रहे हैं। यहाँ चौड़ी-चौड़ी सड़कें बनाई जा रही हैं। तेज गति से दौड़ने वाली कारों के लिये हाइवे बनाए जा रहे हैं ताकि पर्यटन उद्योग फल-फूल सके। इस आपदा से दो महीने पहले मैं पौड़ी गया था।

सतपुलिया के पास नयार नदी की कल-कल ध्वनि एक ओर मोहकता प्रदान कर रही थी तो दूसरी ओर सड़क बनाने के लिये पहाड़ काटे जाने का शोर निरापद शान्ति को भंग कर रहा था। पहाड़ का मलबा इसी नदी में ही गिराया जा रहा था। वहीं खड़े एक बुजुर्ग आदमी से इस नदी के बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि नदी का जलस्तर लगातार कम हो रहा है, देखो यह कब तक बची रहती है। उस बुजुर्ग की आँखें बातें करते हुए नम हो गईं और उनकी आँखों में उत्तराखण्ड में चल रहे इस अतार्किक विकास की वजह से प्रदेश की हो रही तबाही का मंजर साफ-साफ दिख रहा था।

गाँवों को बर्बाद होने से बचाने की चिन्ता किसको है?


मुनाफाखोर व्यवस्था ने प्रकृति द्वारा दी जा रही चेतावनियों की लगातार उपेक्षा की है। पिछले ही साल उत्तरकाशी के पास असी गंगा में आई बाढ़ की वजह से सैकड़ों लोग मारे गए थे। उत्तराखण्ड में बाढ़ और भू-स्खलन का सिलसिला जारी है। अलकनन्दा घाटी का भू-स्खलन (1978), भागीरथी घाटी का कनोरिया गाद भू-स्खलन (1978), काली और मध्यमेश्वर नदी घाटी का मालपा और उखीमठ भू-स्खलन (1978), उत्तरकाशी का वरुणावत पर्वत भू-स्खलन (2003), मुनस्यारी भू-स्खलन (2009) आदि घटनाएँ आगाह करती रहीं कि केन्द्र और राज्य सरकार उत्तराखण्ड के पहाड़ों की भौगोलिक बनावट का गम्भीर अध्ययन करवाए और आधुनिक विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल केवल पहाड़ और जल संसाधनों के दोहन भर के लिये न हो बल्कि लोगों के जीवन को ज्यादा-से-ज्यादा आसान और सुरक्षित बनाने के लिये भी हो।

हैदराबाद की ‘नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी’ ने अपनी 2005 की रिपोर्ट में कहा था कि यहाँ के 1200 गाँव आपदा सम्भावित भू-स्खलन क्षेत्र में पड़ते हैं, इसके बावजूद सूबे की सरकार अमन-चैन की नींद सोती रही। न ही इस खतरे को देखते हुए कोई नया अध्ययन कराया गया और न ही इन गाँवों को बचाने के सम्बन्ध में कोई एहतियात ही बरता गया।

एक अनुमान के अनुसार वर्तमान आपदा में कम-से-कम 350-400 गाँव पूरी तरह बर्बाद हो गए। बहुत सारे गाँवों तक पहुँचने के सारे रास्ते भी बन्द हो चुके हैं। इन गाँवों में बचे लोगों के पास न ही खुद के खाने के लिये अनाज बचे हैं और न ही पशुओं के लिये चारा। यही वजह है कि इन भूख से पीड़ित पशुओं द्वारा आदमियों पर हमला करने की खबरें भी आ रही हैं। इनके जलस्रोत नष्ट हो चुके हैं।

उत्तराखण्ड में लोगों की जानमाल की सुरक्षा की उपेक्षा दशकों से हो रही है। कोटद्वार में एक गाँव पुलिंडा है जहाँ के लोग 1970 से ही खुद को विस्थापित करने की माँग करते आ रहे हैं। बरसात में हर साल यहाँ के मकान जमीन में कुछ फीट धँस जाते हैं। कुछ साल पहले तो यहाँ पन्द्रह परिवार के कुल 75 लोग जमींदोज हो गए थे। विकास की दुदुंभि बजाने वाली राज्य गठन के बाद से लेकर अब तक की सारी सरकारों ने इन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह पर नहीं बसाया इसलिये वे अक्सर कोटद्वार और देहरादून में अपनी माँग मनवाने की आस में पहुँचते रहते हैं।

हाल ही में यहाँ ‘छारबा’ गाँव में शीतलपेय पदार्थ बनाने वाली कम्पनी ने भी 6000 करोड़ रुपए के निवेश से अपना प्लांट लगाना तय किया है। इस गाँव का इतिहास यह है कि 40 साल पहले यहाँ के सारे जलस्रोत सूख गए थे। स्थानीय आबादी ने गाँव में बहुत बड़ी संख्या में पेड़ लगाए और फिर से अपने गाँव को हरा-भरा किया। अब उनके भागीरथ प्रयास से लाये गए पानी को कोकाकोला सोख लेना चाहती है।

गाँव वाले इस प्लांट के विरोध में हैं जबकि सूबे की सरकार इसे राज्य के विकास में मील का पत्थर बता रही है। इससे रोजगार सृजन होने की बात कर रही है। स्थानीय नागरिक सरकार से यह आग्रह कर रही है कि हमें अपने हाल पर जीने-मरने के लिये छोड़ दिया जाये। वे मानते हैं कि बहुराष्ट्रीय कम्पनी का यह प्लांट गाँव के अमन-चैन को लील लेगा।

गरीबों की रोटी छीनने के लिये बने हैं ‘इको सेंसिटिव जोन’


देश के अलग-अलग हिस्सों में ‘इको सेंसिटिव जोन’ बनाए जा रहे हैं। यह काम बड़ी उदारता के साथ उत्तराखण्ड में भी हुआ है। गोमुख से लेकर उत्तरकाशी तक ‘सेंसिटिव जोन’ घोषित किये जाने की वजह से सरकारी आँकड़ों के मुताबिक 88 गाँव प्रभावित हो रहे हैं। पूरे देश की बात की जाये तो पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लगभग 668 संरक्षित क्षेत्रों के अन्तर्गत 1,61,221.57 वर्ग किलोमीटर जमीन है।

इस जमीन के प्राकृतिक संसाधनों के बलबूते ही इन इलाकों के आम लोगों के छोटे-छोटे रोजगार चलते हैं। यहाँ से वे खदेड़े जा रहे हैं। वास्तव में इससे प्रकृति और उसके संसाधनों को नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। उत्तराखण्ड के चमोली में ‘फूलों की घाटी’ एक जगह है। इस इलाके में एक किस्म की घास पनपती है जो इस इलाके की भेड़-बकरियों के लिये सहज उपलब्ध चारा हुआ करती थी। इस इलाके को ‘इको सेंसिटिव जोन’ के अन्तर्गत डाल दिया गया।

अब यहाँ आसपास के गाँवों की भेड़-बकरियाँ चारा के लिए नहीं आती हैं। नतीजा यह हुआ कि अब यह घास आवारा किस्म से बड़ी होती जा रही हैं और इससे फूलों को फलने-फूलने में मुश्किलें पेश आ रही हैं। यह काम पूरे देश में हो रहा है। कहीं मगरमच्छ, कहीं डॉल्फिन, कहीं बाघ, कहीं हाथी बचाने के नाम पर यह धन्धा अपने परवान पर है। निश्चित तौर पर सरकार को इनकी चिन्ता करनी चाहिए लेकिन आम अवाम की चिन्ता को पहली प्राथमिकता तो मिलनी ही चाहिए। सूबे में भू-माफियों का प्रकोप बहुत ज्यादा है और वे अपने मुनाफे के लिये पर्यावरण को बचाने के लिये बनाए गए सभी नियमों को ताक पर रख रहे हैं।

इस बात का प्रमाण जिम कॉर्बेट में चलने वाली ‘देर रात चलने वाली पार्टी’ को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है। रही बात जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों के विलुप्त होने की तब आपको लगभग साढ़े चार अरब वर्ष पुरानी पृथ्वी के पिछले 80-90 लाख सालों के इतिहास में झाँक लेना चाहिए। उस दौर में भी वनस्पतियों व जीव-जन्तुओं के विलुप्त होने की घटनाएँ घटी हैं। आर्किओप्टेरिक्स से लेकर डायनासोर तक के विलुप्त होने के प्रमाण हैं।

हमारी सरकार की पृथ्वी को बचाने की चिन्ता साम्राज्यवादी देश अमेरिका की तरह है। अमेरिका जैसे एशियाई देशों भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका आदि विकासशील या अविकसित देशों को ग्लोबल वार्मिंग के लिये जिम्मेदार ठहराता है वैसे ही अपने देश की सत्ता कमजोर लोगों पर पर्यावरण को दूषित और नुकसान पहुँचाने के लिये जिम्मेदार ठहराती है। उन पर संगीन गैर-जमानती धाराएँ लगाकर जेल में ठूँस देती है।

यह सब उत्तराखण्ड में बड़े पैमाने पर हो रहा है। मुनाफा के इस खेल पर अगर लगाम नहीं लगाया गया तो जो लड़ाई उत्तराखण्ड के गठन के लिये लड़ी गई थी जो कि एक सुन्दर और सम्पन्न राज्य बनाने का सपना देखा गया था, वह विखण्डित हो रहा है और राज्य के आम लोगों में राज्य सत्ता के प्रति पनप रहा असन्तोष कभी भी ‘बादल फटने की घटना’ की तरह ही फट जाएगा।