मेरी व्यथा सुन ले हे! इन्सान

Author:बी.सी. पन्त
Source:जल चेतना तकनीकी पत्रिका, सितम्बर 2011

नमस्कार दोस्तों, मैं तुम्हारा मित्र पानी हूँ,

मैं जहाँ हूँ, वहाँ जीवन है, खुशहाली है, हरियाली है,
मैं तुम्हारे हर काम में भागीदार हूँ-चाहे वे छोटे-छोटे काम हों
या बड़े-बड़े “डाम”
तुम्हारी रसोई से लेकर, टाॅयलेट व स्नानागार तक,
सफाई-धुलाई से लेकर, खेत-खलिहान तक,
रेलगाड़ी से लेकर, हवाई-जहाज तक,
हेयर सैलून से लेकर, कल-कारखानों तक
मेरे बिना तुम अधूरे हो, मेरे बिना तुम अंधेरे में जीओगे,
जरा सोचो, मेरे बिना तुम्हारा क्या होगा?
तुमने मेरी बहुत बर्बादी की है,
तुम्हारे कारण मैं समाप्ति की ओर हूँ
तुम नल खुला छोड़ देते हो,
कार को बाल्टी से नहीं पाइप से धोते हो
दाढ़ी बनानी हो या दन्त-मन्जन, वो भी नल खोलकर,
फर्श धोना हो या आँगन, सब पाइप जोड़ कर
कब तक बर्बाद करोगे मुझे, क्या खत्म कर ही छोड़ोगे मुझे
तुम्हारी फ़ैक्टरियों ने, तुम्हारी मिलों ने, तुम्हारे ट्यूबवेलों ने,
मेरे गोदामों में भी डाका डाला है
मेरा घर उजाड़ कर क्या मिलेगा तुम्हें
थोड़ा बहुत बचा भी था तो,
तुम्हारे प्रदूषण ने मुझे जहर बना दिया
मैं जल था, मैं जीवन था, मैं आज भी जीवन हूँ,
मुझे मेरा असली स्वरूप लौटा दो,
मैंने तो हमेशा तुम्हारी भलाई की,
फिर तुम भलाई के बदले बदी क्यों देते हो
अरे! अब भी संभल जाओ, मुझे बचाओ, जीवन पाओ,
जल है तो जीवन है, अरे मूर्खों! “जल ही तो जीवन है।”

बी.सी. पन्त
रा.इ.का. सैजना (खटीमा)
जनपद - ऊधमसिंह नगर

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