महाराष्ट्र एक्वीफर मैपिंग द्वारा जलस्रोत स्थिरता सुनिश्चित करना 

Author:संजय वी कराड और इंद्रजीत एम डाबराव 
Source:वरिष्ठ भूवैज्ञानिक, भूजल सर्वेक्षण और विकास एजेंसी - जीएसडीए, जल जीवन मिशन, जनवरी हिंदी अंक, जलशक्ति मंत्रालय

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महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में सतही जल आपूर्ति अपर्याप्त या अनुपलब्ध है। जिससे भूजल ही पानी की आपूर्ति का एकमात्र व्यावहारिक स्रोत बन जाता है। धाराएं एवं नदियां भूजल का स्रोत हैं। विशेष रूप से सूखे और जलवायु परिवर्तन के दौरान, जो खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए जलभृत्त (एक्वीफर) एक्वीफर मैपिंग करके भूजल की सुनिश्चित करने की आवश्यकता को दर्शाता है। भारत के कृषि उत्पादों की बढ़त यात्रा में वर्ष 1950 में खाद्यान्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाहरी अनाज पर निर्भरता से लेकर आत्मनिर्भरता की पूरी कहानी भूजल संसाधनों से जटिल रूप से जुड़ी है। जल संसाधनों की अत्यधिक कमी इन महत्वपूर्ण संसाधनों के निरंतर बढ़ती मांग के लिए एक तरह से भूजल की पहचान, परिमाण और प्रबंधन की आवश्यकता उत्पन्न होती है। जो प्रतिस्पर्धा वाले क्षेत्रों की पानी की आपूर्ति की मांग को पूरा करने हेतु अतिदोहन और परिणाम स्वरूप आर्थिक और पर्यावरणीय क्षति को रोकता है। सहभागी भूजल प्रबंधन की परिकल्पना की गई है। ताकि जमीनी स्तर पर भूजल प्रबंधन में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सके ताकि समुदाय और हितधारक सामान्य पुल संसाधनों की निगरानी और प्रबंधन कर सकें। जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण घरों में सप्लाई नल से जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भूजल निगरानी एक प्रमुख घटक है।

फिलहाल तो भूजल ही जल सुरक्षा की जीवन रेखा बना हुआ है। इसका समाधान करने के लिए भूजल सर्वेक्षण और विकास एजेंसी (जीएसडीए) संसाधन मानचित्रण पर तत्काल ध्यान दे रही है। भूजल संसाधन मानचित्रण (जिसे हम एक्वीफर मैपिंग के रूप में जानते हैं।) के माध्यम से जीएसडीए समग्र रूप से अमरावती पिंपरी-नेपाणी और ताकली-गिल्बा (वर्धा-बेम्बाला नदी बेसिन क्षेत्र के अंतर्गत) के दो गांव में पानी की कमी की जांच कर रही है। और खेती की गतिविधियों के लिए जल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के तरीकों की पहचान कर रही है।

ऐसे जलभृत्त की स्थितियों को समझने के लिए जल भूवैज्ञानिक, भू भौतिकी और हाइड्रो जियोकेमिकल सहित कई जांच की गई। जो शुष्क क्षेत्र में उच्च संवेदनशीलता और कम लचीलापन प्रदर्शित करता था, भूभौतिकी जांच के माध्यम से जलभृत्त की मोटाई पर परिरोध संतृप्ति स्तर पाए गए हैं। जबकि हाइड्रो जियोकेमिकल मूल्यांकन में पानी की गुणवत्ता (घुलनशील ठोस के संदर्भ में) पाई गई जो मान भारतीय मानक ब्यूरो -BIS द्वारा निर्धारित अनुज्ञेय सीमा के भीतर है।

जांच के आधार पर एक सहभागी भूजल प्रबंधन कार्य-योजना तैयार की गई। जिसके तहत 13.36 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली पुनर्भरण संरचनाओं (43 खाईयों, 70 शाफ्ट, 6 गॅबियन बांध सहित) निर्माण किए गए। रिचार्ज शॉफ्ट के साथ रिचार्ज ट्रेंच की श्रृंखला भूजल को बढ़ाने में फायदेमंद हैं।

इन मध्यबर्तनों के माध्यम से भूजल स्तर में डेढ़ मीटर की वृद्धि देखी गई। इससे पानी की आपूर्ति अच्छी तरह से प्रतिदिन 2 घंटे से 8-9 घंटे तक बढ़ जाती है।

रवी फसलों की खेती का क्षेत्र 5 से 300 एकड़ तक विस्तारित है, जिसके परिणाम स्वरूप किसानों को उत्पादन और आय में 70% की वृद्धि हुई है। मार्च 2018 में परियोजना के समाप्ति के बाद से तीन मानसून चक्र बीत चुके हैं। जिसके परिणाम स्वरूप जलभृत्तों में पानी का स्तर बढ़ गया है। जिससे ग्रामीणों की टैंकरों पर निर्भरता कम हो गई है। जीएसडीए यूनिसेफ की सहायता से सेवाओं और व्यवहारों को सुदृढ़ करने का कार्य कर रही है। जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक लचीले हैं। जल संसाधनों को लक्षित करने के लिए जल विज्ञान डाटा के उपयोग जैसे नवाचारों को बढ़ाकर महाराष्ट्र में कृषक समुदाय को आपात स्थिति के दौरान सुरक्षित पानी और आपदा की स्थितियों में उपलब्ध कराया जाता है। यूनिसेफ महाराष्ट्र सरकार के जल जीवन मिशन (हर घर जल) कार्यक्रम के कार्य में एक प्रमुख सहायक भागीदार है।

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