मिजोरम संक्षेत्र का संक्षिप्त भूवैवर्तनिक विश्लेषण

Author:राहुल वर्मा
Source:अश्मिका, जून 2015

अवस्थिति एवं पहुँच मार्ग : मिज़ोरम राज्य भारत के सीमान्त उत्तर पूर्व में स्थित है। सामरिक दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मिज़ोरम राज्य दो देशों से घिरा है। मिज़ोरम के पूर्व में म्यांमार तथा पश्चिम में बांग्लादेश स्थित हैं। मिज़ोरम भौगोलिक निर्देशांक विस्तार 210 56‘ उत्तर-240 31‘ उत्तर अक्षांश एवं 920 16‘ पूर्व-130 26‘ पूर्व देशान्तर के बीच है (चित्र-1 : स्थिति एवं पहुँच मार्ग)।

Fig-1मिज़ोरम की राजधानी आइज़ोल 230 40‘ उत्तर- 230 45‘ उत्तर एवं 920 81‘ पूर्व- 230 45‘ पूर्व के बीच निर्देशांकित है। यह एक दुर्गम पर्वतीय स्थल है जिसकी समुद्र तल से ऊँचाई 800 मीटर से 1188 मीटर तक है। यह देश के मुख्य भागों से सड़क एवं वायुमार्ग से जुड़ा हुआ है। कोलकाता एवं गुवाहाटी से आइज़ोल के लिये नियमित विमान सेवा उपलब्ध है। राष्ट्रीय राजमार्ग 54, आइज़ोल को सिलचर, शिलांग और गुवाहाटी से जोड़ता है। निकटतम रेलवे स्टेशन सिल्चर आइज़ोल से 180 किमी. दूर है।

भौगोलिक विशेषता : मिज़ोरम का भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 21,087 वर्ग किमी है। उत्तर से दक्षिण तक का विस्तार 284 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक का विस्तार 115 किमी है। मिज़ोरम राज्य का क्षेत्रफल भारत का 0.64% मात्र है। कर्क रेखा 230 30’ अक्षांश पर राजधानी आइज़ोल के सीमान्त उत्तर से गुजरती है, तथा चौरतुई दारलुग एवं खदूड्ंग्से आदि स्थानों को रेखांकित करती है। कर्क रेखा मिज़ोरम राज्य को दो समान भागों में विभाजित करती है। मिज़ोरम राज्य पश्चिम में बांग्लादेश की चटगाँव पर्वत श्रृंखला तथा त्रिपुरा की जामपुई पर्वत माला से, पूर्व एवं दक्षिण में म्यांमार की चिन पर्वत श्रृंखला, उत्तर में आसाम के कछार जिले तथा मणिपुर के चूढ़ाचान्दपुर जिले से घिरा हुआ है।

जलवायु : मिज़ोरम क्षेत्र, उष्‍णकटिबंधीय अक्षांश में स्थित होने के पश्चात भी मध्यम जलवायु का आनंद उठाता है। चरम शीत एवं चरम ग्रीष्म यहाँ नहीं होते हैं। एक प्रकार से यहाँ की जलवायु को वातानुकूलित कहा जा सकता है। यहाँ तीन ऋतुएँ पायी जाती हैं - शीत (नवम्बर से फरवरी तक), ऊष्म अथवा वसंत ऋतु (मार्च से मई तक) एवं वर्षा ऋतु (मई से अक्टूबर तक)।

वर्षा : समस्त क्षेत्र दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून के प्रबल प्रभाव के अन्तर्गत आता है। बंगाल की खाड़ी से उत्पन्न होने वाले आंधी तूफान एवं चक्रवात, दक्षिण दिशा से राज्य पर आक्रमण करते रहते हैं। राज्य की औसत वर्षा 257 से.मी. है। राज्य के पश्चिमी एवं दक्षिणी भाग में वर्षा अधिक होती है।

स्‍थलाकृति : मिज़ोरम की स्थलाकृति ‘‘पर्वत एवं घाटी” शैली की है। पर्वत श्रृंखला की नति उत्तर से दक्षिण की ओर है तथा उसी दिशा में विस्तृत नदी घाटियों का बाहुल्य है। उच्चावच में खड़ी ढलानों का बाहुल्य है। समस्त क्षेत्र युवावस्था में तथा निर्माण की प्रक्रिया के अंतर्गत सतत अनाच्छदित हो रहा है। स्थलाकृति विविधता का अभाव स्पष्ट है, किन्तु विशेष रूप से पर्वतों की पश्चिमी ढलानों की प्रवणता, पूर्वी ढलानों की अपेक्षा अधिक है। अधिकांश ऊँची पर्वत चोटियाँ भी पश्चिमी भाग में स्थित हैं, जिनमें फांग्पुई 2157 मीटर तथा लेंगते 2149 मीटर, प्रमुख हैं (चित्रः स्थलाकृति मानचित्र)।

.प्रवाह प्रणाली : उत्तर से दक्षिण की ओर विस्तृत घाटियां, उच्चावच आदि विशेषता के कारण लगभग सभी नदियां राज्य के मध्य भाग से उद्गमित होती हैं तथा उत्तर अथवा दक्षिण की ओर प्रवाहित होती हैं। प्रवाह की दिशा के आधार पर मिज़ोरम की प्रवाह प्रणाली को दो भागों में बाँटा जा सकता है :-

(क) उत्‍तर वाहिनी प्रवाह प्रणाली : मिज़ोरम की समस्त उत्तर वाहिनी नदियाँ, ‘‘बरक नदी तंत्र’’ में समाहित होती हैं इनमें से प्रमुख हैं- त्लोंग, तुइवाल, तुइरियल, लंगकाइन एवं तुइवाई। इनमें से त्लोंग नदी प्रमुख हैं, जिसकी लंबाई 185 किमी है। तुत एवं टेरेई, त्लोंग की मुख्य सहायक नदियां हैं। ये समस्त नदियां असम के कछार क्षेत्र में बरक नदी में मिलती हैं। उल्लेखनीय है, कि बरक नदी, पूर्व-दक्षिणपूर्व की ओर प्रवाहित होते हुए, बांग्लादेश में मेघना नदी के नाम से जानी जाती है, ढाका से 50 किमी. स्थित चाँदपुर के निकट गंगा-ब्रह्मपुत्र के संयुक्त प्रवाह से मिलती है एवं वृहद मेघना के रूप में बंगाल की खाड़ी में मिलती है अतः यह सत्यापित होता है कि मिज़ोरम की समस्त उत्तरवाहिनी नदियां अंततः गंगा-ब्रह्मपुत्र प्रणाली में समाहित होती हैं।

(ख) दक्षिण वाहिनी प्रवाह प्रणाली : मिज़ोरम की समस्त दक्षिण वाहिनी नदियां, चिमतुईपुई या कलडॉन की सहायक नदियां हैं तथा इन्हें ‘‘कलडॉन प्रवाह प्रणाली’’ का अंग कहा जा सकता है। प्रमुख नदी कलडॉन की लंबाई 138 किमी. है। इसके अतिरिक्त मैट, टुइचांग, टियाऊ राज्य के पूर्वी भाग में प्रवाहित होती हैं। टियाऊ नदी भारत और म्यांमार के बीच सीमा निर्धारित करती है। राज्य के पश्चिमी भाग में कर्णफूली या ख्वात्लंग्तुईपुई अपनी सहायक नदियों कारपुई, टुइच्वांग, काऊ और डे के साथ भारत एवं बांग्लादेश के बीच प्राकृतिक सीमा का निर्धारण करती हैं। चिमतुईपुई (कलडॉन) नदी म्यांमार के सित्वे बन्दरगाह क्षेत्र में बंगाल की खाड़ी में समाहित होती है। मिज़ोरम का प्रवाह तंत्र चित्र-3 में प्रदर्शित है।

मिट्टी : मिज़ोरम की मिट्टी निर्बध तलछटी संरचना प्रभावित है। यहाँ की मिट्टी, युवा, अपरिपक्व एवं रेतीली है। लाल रंग की दुम्मटी, बुनावट की लेटेराइट मिट्टी का बाहुल्य है। साथ ही यहाँ की मिट्टी उच्च अम्लीयता, निम्न पोटाश तथा फास्फोरस युक्त है।

वनस्‍पति : क्षेत्रीय विभिन्नताएं अक्षांश, ऊँचाई, वर्षानुपात तथा मिट्टी के स्वभाव पर निर्भर करती हैं। इन विशेषताओं के आधार पर मिज़ोरम में मुख्यतया तीन प्रकार के वनों का विस्तार है।

1. उष्‍णकटिबंधीय सदाबहार वन : इनका विस्‍तार राज्‍य के पश्चिमी क्षेत्र बांग्‍लादेश एवं त्रिपुरा से सटे इलाकों में हैं।

2. उष्‍णकटिबंधीय अर्ध-सदाबहार वन : मिजोरम के लगभग 50% वन इसी प्रकार के हैं। इन वनों का क्षेत्र विस्‍तृत है, उत्‍तर में मणिपुर की सीमा से लेकर दक्षिण में चिमतुईपुई या कलडॉन नदी की घाटी के मुहाने तक विस्‍तृत है।

Fig-33. उपोष्‍णकटिबंधीय पर्वतीय वन : इस प्रकार के वन, राज्य के ऊँचाई वाले स्थानों, मुख्यतया पूर्वी किनारों पर पाये जाते हैं। पश्चिमी क्षेत्र में कुछ पट्टिकाओं के रूप में भी पाये जाते हैं। चित्र-4 में मिट्टी, प्रवाह प्रणाली एवं वनस्पति का सम्मिश्र प्रस्तुत किया गया है।

विवर्तनिक विकासक्रम का इतिहास


समस्त आसाम क्षेत्र के अधोस्तर के विश्लेषण के परिणामों के आधार पर यह संकेत मिलते हैं कि आसाम द्रोणी के आरंभिक निर्माण का प्रादुर्भाव ‘विभंजन चक्र’ के दौरान आधार-बालुका पत्थर एवं सिलथेट चूना पत्थर के निक्षेपण से हुआ है। कुछ स्थानों पर निम्न अधोस्तर में पर्मियन काल की गोंडवाना समूह की चट्टानों का मिलना, विभंजन-चक्र के पूर्व, ‘तनावमूलक-विवर्तन’ जनित ग्रेबन की उपस्थिति का प्रमाण प्रस्तुत करता है। भूगर्भिक, भौकंपीय एवं गुरुत्वीय साक्ष्य, यह इंगित करते हैं कि द्रोणी का ढाल दक्षिण पूर्व की ओर है।

Fig-4मिज़ोरम द्रोणी से संलग्न ‘‘भारत-म्यांमार गतिमान पट्टिका’’ में वृहद स्तर के वैवर्तनिक प्रभाव के कारण, इस क्षेत्र में उग्र संरचनात्मक गतिविधियां, सदैव सक्रिय रही हैं। फलस्वरूप, द्रोणी में अनेक भ्रंश पाये जाते हैं। यह गतिविधियां मायोसीन काल तक अत्यन्त उग्र रही हैं। भ्रंशों की प्रबलता पूर्व की ओर वलन की तीव्रता के साथ-साथ बढ़ती जाती हैं। अनेक तिर्यक एवं संकर भ्रंश जैसे कि मैट, तुईपुई, साइटतुवाल एवं सातेक वामावर्त हैं, जबकि आइज़ोल एवं कॉलडन भ्रंश दक्षिणावर्त हैं।

‘‘भारत-म्यांमार गतिमान पट्टिका’’ में वलन एवं उत्क्रम के कारण अनेक लघु द्रोणियों का प्रादुर्भाव हुआ, जिनमें नियोजीन काल में अवसादन तीव्र गति से हुआ। अवसादन की तीव्रता के कारण अनेक सामान्य भ्रंशों का निर्माण हुआ। भारतीय प्लेट के पूर्व दिशा में स्थित, बर्मीय प्लेट के नीचे तिर्यक क्षेपण की प्रतिक्रिया के कारण, सामान्य भ्रंश, उत्क्रम भ्रंश की शृंखला में रूपांतरित हो गए। इन गतिविधियों के फलस्वरूप, भारतीय प्लेट का उत्तर पूर्वी किनारा संरचनात्मक दृष्टि से पार्श्वीय या नतिलंबीय भ्रंश एवं सामान्य भ्रंश की पच्चीकारी प्रस्तुत करता है।

इस मोलासे द्रोणी का उद्गम निश्चित रूप से ओलिगोसीन काल में, भारत-म्यांमार गतिमान पट्टिका के मुख्य अक्ष के समान्तर सक्रिय उग्र विवर्तनिक पर्वत निर्माणक गतिविधियों से सम्बद्ध है। इन गतिविधियों के फलस्वरूप, ‘‘भारत-म्यांमार गतिमान पट्टिका’’ के पश्चिमी भाग में संकीर्ण एवं रेखीय अग्रदीप का निर्माण हुआ। भारतीय प्लेट के उत्तर में यूरेशीय प्लेट तथा पूर्व में म्यांमारीय प्लेट के नीचे निरंतर क्षेपण के कारण उत्तरी किनारा एवं पूर्वी किनारा अपेक्षाकृत उठता चला गया। इस कारण उत्तर एवं पूर्व में स्थित उच्च स्थलखंड तलछट का स्रोत बने। इन्हीं स्रोतों से मिज़ोरम की द्रोणी में मध्य मायोसीन एवं बाद की अवधि में इस अग्रदीप में वृहद स्तर पर तलछटी अवसादन हुआ। उत्तर की दिशा में डौकी भ्रंश, सुर्मा द्रोणी की उत्तरी सीमा में स्थित सिलथेट नाँद एवं शिलोंग पठार की संपर्क सीमा निर्धारित करता है (चित्र 5 : सूरमा द्रोणी का वैवर्तनिक मानचित्र). ‘‘भारत-म्यामांर चाप’’ का क्षेत्र, निचले क्रिटेशियस काल से ही जटिल विवर्तनिक प्रक्रियाओं एवं क्षेपण का क्षेत्र रहा है। यह गतिविधियां, क्वाटरनरी काल तक अधिक सक्रिय रही हैं तथा अभी भी सक्रिय हैं। ‘‘भारत-म्यांमार पर्वत श्रृंखला में अराकान, योमा तथा चिन पर्वत समाहित हैं। इस श्रेणी के पश्चिमी किनारे पर स्थित नागा उत्क्रम भ्रंश क्षेत्र एवं बंगाल द्रोणी में स्थित वलन एवं भ्रंश क्षेत्र क्रमशः भारतीय प्लेट की उत्तरी एवं पश्चिमी सीमा निर्धारित करते हैं।

Fig-5

भूकम्पीय संरचना एवं इतिहास


मिज़ोरम के भूकम्पीय इतिहास की विवेचना, समस्त उत्तर-पूर्व की भू-संरचना के संदर्भ में की जा सकती है। उत्तर-पूर्व को चार भूकम्पीय क्षेत्रों में विभाजित किया गया है (चित्र 6 : मिज़ोरम की भूकम्पीय संरचना)-

i. पूर्वीहिमालय क्षेत्र
ii. मिशमी खंड
iii. पूर्वी सीमांत क्षेत्र
iv. शिलोंग क्षेत्र

समस्त क्षेत्र पूर्वी हिमालय एवं ‘‘भारत-म्यांमार चाप’’ के बीच स्थित है। ‘‘भारत-म्यांमार चाप’’ लगभग 3500 किमी. क्षेपण सीमा क्षेत्र है एवं यह, पूर्वी हिमालयी चाप तथा सुंडा चाप के बीच की संपर्क कड़ी है। पूर्वी हिमालय के भाग सिक्किम एवं अरुणाचल हिमालय हैं। ‘‘भारत-म्यांमार चाप’’ के अंतर्गत नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा-मिज़ोरम, अराकान-योमा एवं सुदूर दक्षिण में अंडमान-निकोबार द्वीप आते हैं। उत्तरी क्षेत्र में, भारतीय प्लेट यूरेशीय प्लेट से टकरा रही है तथा पूर्व में भारतीय प्लेट का बर्मीय प्लेट के नीचे क्षेपण हो रहा है। इन्हीं भूगर्भिक गतिविधियों के कारण, समस्त क्षेत्र भूकम्पीय रूप से सक्रिय है। अंडमान चाप भी संभवतः क्षेपण क्षेत्र में सक्रिय है।

Fig-6 ‘‘भारत-म्यांमार चाप’’ की सक्रियता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि विगत 100 वर्षों में इस क्षेत्र में 6 से अधिक तीव्रता के 10 भूकम्प आ चुके हैं। ‘पोचु भ्रंश’ के कारण 1950 में 8.7 की तीव्रता का आसाम भूकम्प, 1897 में शिलांग पठार के उत्थान से जनित 8.1 तीव्रता का भूकम्प, 1869 में कोपिली भ्रंश द्वारा जनित 7.4 तीव्र का कछार भूकम्प तथा ‘‘भारत-म्यांमार चाप’’ के पटकोई-नागा-मणिपुर एवं चीन पर्वत शृंखला में खिसकाव के कारण 1988 में 7.2 तीव्रता के मणिपुर भूकम्प कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।

सौभाग्यवश, मिशमी खंड भारतीय प्लेट एवं बर्मीय प्लेट के बीच पुश्ते या बंध का कार्य करता है तथा अभिसरण से जनित विकृतियों के प्रभाव को अल्पीकृत करता है। नागा एवं दिसांग उत्क्रम भ्रंशों का परिचालन आरेख भारतीय तथा बर्मीय प्लेट, के उत्तर दिशा में गति तथा टकराव के बाद भारतीय प्लेट के दक्षिणावर्त घूर्णन का संकेत देते हैं।

भारतीय प्लेट के बर्मीय प्लेट के नीचे क्षेपण के कारण उत्तर से दक्षिण नतिलम्ब में विस्तृत वलित क्षेत्र का निर्माण हुआ, जोकि पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर रेखीय संकुचन का द्योतक है। इस क्षेत्र में दो प्रमुख भ्रंश चिन्हित किए गए हैं- (अ) कबाओ भ्रंश तथा (ब) सगइंग भ्रंश इनमें से कबाओ भ्रंश ‘‘भारत-म्यांमार पर्वत शृंखला’’ एवं म्यांमार द्रोणी के बीच एक प्रमुख विवर्तनिक विराम या मध्यांतर का कार्य करता है। यह भ्रंश दक्षिण तक विस्तृत है तथा पश्चिमी अंडमान भ्रंश से जा मिलता है। (चित्र 7 ‘‘भारत-म्यांमार चाप’’ का वैवर्तनिक वैशिष्ट्य मानचित्र)। विगत 100 वर्षों में 1 से कम तीव्रता के 996, 1.2 तीव्रता के 47, 2.3 तीव्रता के 276, 3-4 तीव्रता के 339, 4-5 तीव्रता के 176 एवं 5 से अधिक तीव्रता के 58 भूकम्प आ चुके हैं। उल्लेखनीय है कि 5 से अधिक तीव्रता के अधिकांश भूकम्प ‘‘भारत-म्यांमार सचल पट्टिका’’ के क्षेत्र में आए।

Fig-7इस क्षेत्र में कम गहरे (छिछले) मूल (0-40 किमी.) के भूकम्पों की संख्या सर्वाधिक (1672) है, जबकि ज्यादा गहरे मूल (> 60 किमी.) के भूकम्पों की संख्या 90 है जो कि मुख्यतः ‘‘भारत-म्यांमार सचल पट्टिका’’ के क्षेत्र में पाये गए। (चित्र 8 : ‘‘भारत-म्यांमार पर्वत शृंखला’’ में भूकम्पीय इतिहास)। सारांशतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उत्तर-पूर्व में, मणिपुर-म्यांमार एवं मिज़ोरम का सीमांत क्षेत्र भूकम्पीय दृष्टि से सर्वाधिक सक्रिय हैं। नागा-दिसंग, डाॅकी, सिलथेट, एवं कोपिली भ्रंश भूकम्पजनक हैं।

भूस्‍खलन परिदृश्‍य


वस्तुतः समस्त मिज़ोरम, देश के सर्वाधिक भूस्खलन-संवेदी क्षेत्रों में से एक है। मिज़ोरम की चट्टानों का कोमल स्वभाव, अत्यधिक वर्षा, अधिक ढाल प्रवणता, विवर्तनिक गतिविधियाँ आदि के सम्मिलित प्रभाव के फलस्वरूप, भूस्खलन की घटनाओं की बारंबारता, एक वृहद सामाजिक समस्या का रूप ले चुकी है। तीव्र नगरीकरण के कारण राजधानी आइजोल में यह समस्या अत्यन्त गंभीर है। इस गंभीरता का आकलन इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि सन 2000 से 2010 के दशक में 400 व्यक्ति भूस्खलन के कारण हताहत हुए तथा लगभग 800 आवास क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। भूस्खलन के कारक मानसून की वर्षा के समय अत्यन्त सक्रिय हो जाते हैं तथा मानसून जाते-जाते हताहतों की संख्या में और भी वृद्धि कर जाता है। भूकम्प की आपदा के अतिरिक्त भूस्खलन की समस्या का समाधान अत्यंत आवश्यक है अतः इस दिशा में विशेष भूस्खलन निवारक गतिविधियों एवं वृहद आपदा प्रबंधन की आवश्यकता है।

Fig-8

सूरमा द्रोणी का भौगर्भिक इतिहास


नूतनकल्प में जनित सूरमा बेसिन की पूर्वी सीमा, कल्डान भ्रंश एवं परि-बरेल असंबद्धता, उत्तरी सीमा-पूर्व-पश्चिम नतिलंब में विस्तृत डॉकी भ्रंश, उत्तर पूर्वी सीमा-उत्तर पूर्व-दक्षिण पश्चिम नतिलम्ब में विस्तृत दिसंग उत्क्रम भ्रंशय पश्चिम एवं उत्तर पश्चिमी सीमा-उत्तर पूर्व-दक्षिण पश्चिम नतिलंब में विस्तृत सिल्थेट भ्रंश जो ढाका के समीप से बंगाल द्रोणी के उत्तर पूर्वी किनारे एवं बांग्लादेश में विस्तृत जलोढ़ अवसाद से चिन्हित होती है। दक्षिणी सीमा अराकान (म्यांमार) के तटीय क्षेत्र में मिलती है। (गांगुली, 1993), सूरमा द्रोणी में उत्तर-दक्षिण नतिलंब में 550 किमी. तक विस्तृत, पश्चिम की ओर उत्तल वलित पर्वत शृंखला है, जिसकी चौड़ाई अधिकतम 200 किमी. है। यह द्रोणी असम के कछार एवं करीमगंज जिले, मणिपुर राज्य के पश्चिमी भाग, सम्पूर्ण त्रिपुरा एवं मिज़ोरम राज्य तथा बांग्लादेश के सिल्थेट एवं चटगाँव क्षेत्र को, समाविष्ट करती है (चित्र 9 : सूरमा द्रोणी का भौगर्भिक मानचित्र)।

.सूरमा द्रोणी के पूर्व में पुराकल्प काल का जटिलतापूर्वक वलित, भ्रंशित एवं उत्क्रमित ‘‘भारत-मयांमार गतिमान पट्टिका’’ का बाह्य चाप संकुल; एवं पश्चिम में मंद ढाल एवं समनत वलन युक्त तृतीयक कल्प के बांग्लादेश की जलोढ़ अवसादी जमाव युक्त ‘‘बांग्लादेश द्रोणी’’ का विस्तार है। सांराशतः, सूरमा द्रोणी उत्तर की ओर चौड़ी एवं दक्षिण की ओर संकरी एक घंटाकार द्रोणी है, जिसकी पुरा प्रवणता उत्तर-उत्तर पूर्व की ओर है, एवं यह द्रोणी दक्षिण में स्थित समुद्र से सम्बद्ध थी।

सूरमा द्रोणी का स्‍तरिकीय अनुक्रम


मिज़ोरम, त्रिपुरा मिज़ोरम वृहद भूसन्नित का भाग है एवं ‘‘आसाम-आराकन’’ भूसन्नित का संभाग है यह समस्त मिज़ोरम क्षेत्र भारतीय एवं बर्मी प्लेट प्रभाव के अंतर्गत गतिमान हैं। इस वृहद भूसन्नित में प्रमुखतया मोलासे प्रकार के अवसादी शैलों की प्रचुरता है। यहाँ की चट्टानें आसाम की तृतीयक महाकल्प के बरेल एवं सूरमा कल्प का भाग है। यहाँ की चट्टानें सूरमा कल्प के भुबन संस्तर का प्रतिनिधित्व करती हैं। यहाँ की चट्टानों में बलुआ-पत्थर शेल एवं मृदा-पत्थर की बहुलता है। इन शैलों का विस्तार उत्तर से दक्षिण की ओर है। यह समस्त क्षेत्र ‘‘नूतन कल्प’’ का प्रतिनिधित्व करता है तथा ‘‘क्रिटेसियस तथा ‘‘तृतीयक’’ कल्प में वृहद प्लेट विवर्तनिकीय गतिविधियों से प्रभावित रहा है।

मिज़ोरम की शैल संरचना कछार पर्वत एवं पटकोई पर्वत क्षेत्र की संरचना से काफी समानता रखती है। संभवतः, इन चट्टानों का निर्माण तृतीयक महाकल्प के दौरान, हिमालय जनित नदियों के द्वारा लाये गये कणों से निर्मित डेल्टा अथवा मुहानों के संघनन से हुआ है। तृतीयक कल्प के समय मिज़ोरम में लुंगले नगर के समीप बलुआ पत्थर में सामुद्रिक जीवाश्मों के अवशेषों का पाया जाना, शैल निर्माण की इस अवधारणा का समर्थन करता है। मिज़ोरम की चट्टानों में प्रमुखतया बलुआ संस्तर एवं मृदा संस्तरों का पुनरावृत्तीय चक्र पाया जाता है जोकि उत्तर उत्तर-पश्चिम-दक्षिण दक्षिण-पूर्व की दिशा में लम्बवत विस्तृत असममित अपनतियों एंव अभिनतियों का निर्माण करती है। इन वलनों के अक्ष लम्बवत हैं।

भौगर्भिक दृष्टि से, मिज़ोरम में दो समूहों –सूरमा तथा बरेल, की चट्टानों का बाहुल्य है, जिनमें कि प्रमुखतया उच्च बरेल, निम्न एवं उच्च भुबन (सूरमा समूह), मिज़ोरम का प्रतिनिधित्व करती हैं। सूरमा समूह की चट्टानें, राज्य के पश्चिमी भाग में पायी जाती हैं। इस क्षेत्र में चट्टानों का संयोजन, ‘‘कगार एवं घाटी’’ स्थलाकृति के रूप में पाया जाता है जो कि उत्तर से दक्षिण की ओर विस्तृत हैं। पश्चिमी भाग में प्रवाह प्रणाली विशेषतया ट्रेलिस अथवा समानान्तर प्रकार की है, जिसमें सहायक नदियां, मुख्य नदी से लम्बवत आकर मिलती हैं।

बरेल समूह की चट्टानें राज्य के पूर्वी भाग में पायी जाती हैं। इन चट्टानों को सूरमा समूह की चट्टानों से आसानी से अलग किया जा सकता है। पूर्वी भाग में प्रवाह प्रणाली मुख्यतया, पादपकार होती है, जिसमें सहायक नदियां, मुख्य नदियों से वृक्ष की शाखों की तरह मिलती हैं। एक अन्य विशेषता के अन्तर्गत, पूर्वी भाग में असमान रूप से अपरदित पर्वतों की बहुलता है। राज्य के उत्तर-पूर्वी म्यांमार सीमान्त क्षेत्र में उत्तर से दक्षिण की ओर विस्तृत समानान्तर पर्वत श्रेणियों की बहुलता है, जिनके बीच में संकरी घाटियां हैं। इस संरचना का कारण कठोर एवं कोमल चट्टानों का प्रत्यावर्तन है। यह चट्टानें बरेल समूह का अंश हैं।

उपसंहार


मिज़ोरम, त्रिपुरा मिज़ोरम वृहद भूसंन्नति का भाग है एवं ‘‘आसाम-आराकन’’ भूसन्नति का संभाग तथा यह समस्त क्षेत्र भारतीय एवं बर्मी प्लेट संपर्क प्रभाव के अंतर्गत गतिमान है। इस वृहद भूसन्नति में प्रमुखतया मोलासे प्रकार के अवसादी शैलों की प्रचुरता है। यहाँ की चट्टानें आसाम की तृतीयक महाकल्प के बरेल एवं सूरमा कल्प के ‘‘भुबन संस्तर” का प्रतिनिधित्व करती हैं। मिज़ोरम की चट्टानों में बलुआ-पत्थर, शेल एवं मृदा-पत्थर, प्रमुखतया बलुआ संस्तर एवं मृदा संस्तरों के पुनरावृत्तीय चक्र की बहुलता है जो कि उत्तर उत्तर पश्चिम-दक्षिण दक्षिण पूर्व की दिशा में लम्बवत विस्तृत असममित अपनतियों एवं अभिनतियों का निर्माण करती हैं।

मिज़ोरम द्रोणी से संलग्न ‘‘भारत-म्यांमार गतिमान पट्टिका’’ में वृहद स्तर के वैवर्तनिक प्रभाव के कारण, इस क्षेत्र में उग्र संरचनात्मक गतिविधियां, सदैव सक्रिय रही हैं। फलस्वरूप, द्रोणी में अनेक भ्रंश पाये जाते हैं। यह गतिविधियां मायोसीन काल तक अत्यंत उग्र रही हैं। ‘‘भारत-म्यांमार चाप’’ के अन्तर्गत नागालैंड- मणिपुर, त्रिपुरा-मिज़ोरम, अराकान-योमा एवं सुदूर दक्षिण में अंडमान-निकोबार द्वीप आते हैं। इन्हीं भूगर्भिक गतिविधियों के कारण, समस्त क्षेत्र भूकम्पीय रूप से सक्रिय है। उत्तर-पूर्व में, मणिपुर-म्यांमार एवं मिज़ोरम का सीमान्त क्षेत्र भूकम्पीय दृष्टि से सर्वाधिक सक्रिय है। नागा-दिसंग, डॉकी, सिलथेट, एवं कोपिली भ्रंश भूकम्पजनक हैं।

भूकम्प की आपदा के अतिरिक्त भूस्खलन की समस्या का समाधान अत्यन्त आवश्यक है। मिज़ोरम की चट्टानों का कोमल स्वभाव, अत्यधिक वर्षा, अधिक ढाल-प्रवणता, विवर्तनिक गतिविधियां, आदि के सम्मिलित प्रभाव के फलस्वरूप, भूस्खलन की घटनाओं की बारंबारता, एक वृहद सामाजिक समस्या का रूप ले चुकी है। सामरिक दृष्टि से भी दो देशों के बीच स्थित इस क्षेत्र के समग्र आधारभूत एवं चिरस्थायी विकास हेतु विशेष अध्ययन एवं शोध की आवश्यकता है।

सम्पर्क


राहुल वर्मापाछुन्गा यूनिवर्सिंटी कॉलेज, आईज़ोल, मिजोरम

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