मणिपुर के जैव संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबन्धन

Author:एन.सी. तालुकदार
Source:योजना, दिसम्बर 2009
यदि वैज्ञानिक ढंग से प्रबन्धन हो तो मणिपुर के पौधीय, पशु और सूक्ष्मजीवी जैव संसाधन राज्य की अर्थव्यवस्था के उत्थान में महत्त्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। परन्तु इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए की जाने वाली पहल को वैज्ञानिक अनुसन्धान के उचित वातावरण के सहारे की आवश्यकता है। जैव संसाधन, पृथ्वी की जैव विविधता के वे अवयव हैं जिनका उपयोग मानव समाज सनातन काल से भोजन, औषधि, वस्त्र और आवास के रूप में करता आ रहा है। मानव समाज के विकास और प्रगति में जैव संसाधनों की भूमिका अनिवार्य है। इस बात की पहचान के लिए कि कौन-से पौधे, पशु और सूक्ष्म जीव जैव संसाधनों की विभिन्न आवश्यकताओं पर खरे उतरते हैं, औपचारिक तथा अनौपचारिक रूप से जैव विविधता पर अनेक प्रकार के प्रयोग मानव बस्तियों के आसपास के बाशिन्दों पर किए जाते रहे हैं और उनके निष्कर्ष जनजातीय और पारम्परिक समाज को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बताए जाते रहे हैं। अति विकसित समाजों में वैज्ञानिक अनुसन्धानों ने न केवल जैव संसाधनों की उपयोगिता को मूल्य संवर्धित किया है बल्कि वैज्ञानिक प्रगति की त्वरित गति ने पृथ्वी की जैव विविधता पर दबाव भी जबरदस्त रूप से बढ़ा दिया है। यह जैव विविधता ही मानव सहित सभी प्रकार के जीवों के सामंजस्य पूर्ण अस्तित्व की जीवनरेखा है।

जैव विविधता का संरक्षण और वैश्विक जैव विविधता से जैव संसाधनों का प्रबन्धन दो ऐसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं जिनका समाधान स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तरों पर खोजा जाना चाहिए। इन दिशाओं में वैज्ञानिक प्रयासों को जैव विविधता की दृष्टि से विश्व के समृद्ध क्षेत्रों को जैव विविधता के हॉट स्पॉट अर्थात सम्पन्न क्षेत्र के रूप में वर्गीकरण से काफी मदद मिली है। समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्रों के मानचित्र पर एक नजर डालने से पता चलता है कि इन क्षेत्रों में जो लोग रहते हैं वे आर्थिक रूप से अत्यन्त निर्धन हैं। इनमें वे जनजातीय लोग भी शामिल हैं, जो अपने आसपास के जीव रूपों से अपनी शैली में प्राप्त अनुभवों के कारण पारम्परिक ज्ञान का खजाना लिए घूम रहे हैं कि कौन-सा जैव संसाधन पौष्टिक आहार के रूप में उपयुक्त है तो कौन-सा स्वास्थ्य के लिए उपयोगी औषधि के रूप में। संयुक्त राष्ट्र अन्तरराष्ट्रीय संरक्षण के वर्गीकरण के अनुसार वर्तमान में 34 जैव विविधता वाले हॉट स्पॉट हैं। इन समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्रों में से तीन भारत में स्थित हैं। इनमें से दो क्षेत्र—इण्डो-बर्मा बायोडायवर्सिटी हॉट स्पॉट और ईस्टर्न हिमालयन बायोडायवर्सिटी हॉट स्पॉट भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में और एशिया के दक्षिण पूर्वी क्षेत्र में फैले हुए हैं।

भारत का समूचा पूर्वोत्तर क्षेत्र जैव विविधता और जैव संसाधनों की दृष्टि से अति सम्पन्न हैं परन्तु इस सम्पदा का क्षेत्र के आर्थिक विकास और शान्ति के लिए उपयोग करने हेतु विकास और अनुसन्धान की गतिविधियाँ अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पा रही हैं। क्षेत्र के जैव संसाधनों को पूर्वोत्तर क्षेत्र की समृद्धि की सम्भावना से जोड़ने की आवश्यकता हमेशा से रही है। यह तभी सम्भव है जब इन जैव संसाधनों को समाज के लिए मूल्यवान बनाने की प्रक्रिया को मूर्तरूप देने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक संस्थान खड़े किए जाएँ। इन संस्थानों को अत्याधुनिक जैव प्रौद्योगिकी सम्बन्धी अनुसन्धान सुविधाएँ जुटा कर इन बेजोड़ जैव विविधताओं और जैव संसाधनों का वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार करना होगा। भारत और पूर्व के देशों के भू-भागों के जैव-भौगोलिक जंक्शन के दस्तावेज तैयार कर स्थायी विकास और जैव संसाधनों के आयोग के लिए जैव प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेप, रोजगार सृजन और क्षेत्र की आर्थिक प्रगति के लिए प्रौद्योगिकीय पैकेजों का विकास, जैव संसाधन संरक्षण विकास और उपयोगिता में क्षमता विकास (मानव संसाधन विकास), जैव संसाधनों के क्षेत्र में अनुसन्धान कार्यों को आगे बढ़ाने में अन्य राष्ट्रीय/अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं/संगठनों/विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग और समन्वय के जरिये इन जैव संसाधनों का उपयोग क्षेत्रीय समृद्धि और प्रगति के साधन के रूप में किया जा सकता है। इस दिशा में भारत सरकार ने वर्ष 2000 में इम्फाल में जैव संसाधन और धारणीय विकास संस्थान (आईबीएसडी) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य इण्डो-बर्मा बायोडायवर्सिटी हॉट स्पॉट के भारतीय क्षेत्र के पौधों, पशुओं और सूक्ष्मजीवी जैव संसाधनों का वैज्ञानिक ढंग से प्रबन्धन करना था।

मणिपुर हालाँकि एक छोटा भौगोलिक प्रदेश है, इसे कई तरह की जलवायु के प्रतिनिधित्व का श्रेय प्राप्त है। पहाड़ों के शीतोष्ण से लेकर अत्यन्त गर्म जलवायु वाले इस प्रदेश में अनेक प्रकार के वन और जैव विविधताएँ मौजूद हैं।इण्डो-बर्मा हॉट स्पॉट में 13,500 प्रकार के पौधों की प्रजातियाँ (समूचे विश्व की 2.3 प्रतिशत) और कशेरुकी जीवों की 2,185 प्रजातियाँ (कुल प्रजातियों का 1.9 प्रतिशत) पाई जाती हैं जिनमें से क्रमशः 7,000 और 528 प्रजातियाँ केवल इसी इलाके में पाई जाती हैं। इस हॉट स्पॉट में 1,170 उड़ने वाली और 329 स्तनधारी प्रजातियाँ भी पाई जाती हैं। सरिसृप की अनेक प्रजातियाँ भी इस हॉट स्पॉट में बसेरा करती हैं। मणिपुर हालाँकि एक छोटा भौगोलिक प्रदेश है, इसे कई तरह की जलवायु के प्रतिनिधित्व का श्रेय प्राप्त है। पहाड़ों के शीतोष्ण (न अधिक गर्म न अधिक ठण्डा) से लेकर अत्यन्त गर्म जलवायु वाले इस प्रदेश में अनेक प्रकार के वन और जैव विविधताएँ मौजूद हैं। मणिपुर में सात जैव विविधताओं में 4,000 ऐंजियोस्पर्मिक पौधों की प्रजातियाँ, 430 औषधीय पौधों की प्रजातियाँ, 34 खाद्य फफून्द प्रजातियाँ, 500 आर्किड प्रजातियाँ, बाँस की 55 प्रजातियाँ, 40 धान की देसी प्रजातियाँ, मछलियों की 160 प्रजातियाँ और प्रवासी जलीय पक्षियों की 21 प्रजातियाँ शामिल हैं। ऊँची और कम ऊँचाई पर उड़ने वाली अनेक प्रकार की तितलियाँ भी यहाँ उपलब्ध हैं, परन्तु उनके बारे में कोई अधिकृत ब्यौरा उपलब्ध नहीं है।

आर्थिक एवं वाणिज्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कुछ पौधों पर आईबीएसडी में प्राथमिकता के आधार पर अनुसन्धान हो रहा है। इनमें अदरक प्रजाति, नीम्बू प्रजाति और ऑर्किड प्रजातियाँ शामिल हैं। पूर्वोत्तर भारत में उपलब्ध 19 आम की और 88 अदरक की प्रजातियों में अकेले मणिपुर से ही प्राप्त 42 प्रजातियों का सन्धारण आईबीएसडी ने किया है। अदरक प्रजाति के रेशे और तैलीय अंश और हल्दी प्रजाति के कुरक्यूमिन और तैलीय अंश में काफी विविधता पाई जाती है। स्थानीय रूप से उपलब्ध कम रेशे और अधिक तेल वाली अदरक प्रजातियाँ किसानों के लिए अधिक लाभ कमाने वाली प्रजातियाँ हो सकती हैं क्योंकि कम रेशा होने के कारण इनमें से तेल निकालना सरल होता है। कुछ अदरक प्रजातियाँ ऐसी भी हैं जिनका स्थानीय लोग औषधि के रूप में उपयोग करते हैं। स्थानीय वैद्यों का दावा है कि ये प्रजातियाँ मधुमेह के उपचार में लाभदायक हैं। ये पौधे खाँसी, पेट दर्द, कान दर्द और अतिसार के इलाज में भी काम आते हैं। जंगली और उगाए गए दोनों प्रकार के जिंजीबर जेरमबेट के पौधों के तेल में 88.5 प्रतिशत तक जेरमबोन होता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसमें कैंसर और वायरल एवं सूजन से लड़ने वाले तत्व पाए जाते हैं। वैज्ञानिक अनुसन्धान से इन दावों की सच्चाई का पता चल सकता है। यदि ये दावे सही सिद्ध होते हैं तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में जैव सक्रिय सिद्धान्तों की नयी खोज हो सकती है। इनका योगदान अमूल्य हो सकता है।

भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र के नीम्बू प्रजाति के आनुवंशिक विविधता के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र में नीम्बू वर्ग की 17 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। मणिपुर में भी साइट्रस की अनेक प्रजातियाँ उपलब्ध हैं और साइट्रस मैक्सिमा जैसी कुछ प्रजातियाँ बहुतायत से उगती हैं। इनका उत्पादन तो बहुत होता है परन्तु वाणिज्यिक दृष्टि से ये अधिक लाभप्रद नहीं होती। परन्तु वैज्ञानिक हस्तक्षेप से इसका रस निकालते समय जो कड़वापन इसमें आ जाता है उसे समाप्त किया जा सकता है। यदि ऐसा हो जाए तो यह एक अत्यन्त लाभप्रद सामग्री प्रमाणित हो सकती है। साइट्रस फलों के छिलके के तेल का उपयोग बेकरी और शीतल पेयों उत्पादों में सुगन्ध और स्वाद के लिए किया जाता है। साइट्रस जूस और छिलके के तेल का उपयोग इत्र, साबुन, सौन्दर्य प्रसाधन, लोशन और मोमबत्तियों जैसे गैर-खाद्य सामग्रियों में भी किया जाता है। स्थानीय रूप से उपलब्ध साइट्रस संसाधनों के तैलीय तत्वों का तुलनात्मक वैज्ञानिक अध्ययन खाद्य और प्रसाधन सामग्री उद्योगों को सुगन्ध के लिए बेहतर विकल्प उपलब्ध करा सकता है।

ऑर्किड को विश्व का सबसे आकर्षक और मोहक फूल कहा जाता है। यूरोप, अमेरिका और जापान जैसे देशों में करोड़ों डॉलर के सजावटी फूल उद्योग में ऑर्किड के फूलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इनका सजावटी मूल्य बेजोड़ है। मणिपुर के ऑर्किड की 472 चिह्नित प्रजातियाँ राज्य की जैव संसाधन सम्पदा की प्रचुर स्रोत हैं। मणिपुर की संकटग्रस्त 13 प्रजातियों सहित 22 बहुमूल्य ऑर्किड प्रजातियों को आईबीएसडी की ऑर्किड पौधशाला में सही हालत में रखा जा रहा है। समय की माँग है कि ऑर्किड के बारे में और जागरुकता लाई जाए। उसे लोकप्रिय बनाया जाए, संरक्षित किया जाए और उसका वाणिज्यिक उपयोग बढ़ाया जाए ताकि ऑर्किड सम्पदा को लाभदायक संसाधन में परिवर्तित किया जा सके। व्यापारिक उद्देश्य के लिए जंगलों से ऑर्किड के संग्रह को कम करने के लिए चुनिन्दा और अत्यधिक संकटग्रस्त प्रजातियों के प्रचार के लिए प्रयोगशाला में उपचार की विधि विकसित की गई है। कुछ विशेष प्रकार की ऑर्किड प्रजातियों के उत्पादन को वायरस से मुक्त करने, कुछ अन्य का उत्पादन बढ़ाने तथा कुछ दूसरी प्रजातियों के खिलने के लिए वैज्ञानिक उपचार की विधि संस्थान ने विकसित की है। इसके साथ ही साइट्रस के पौधों को मुरझाने से बचाने के लिए उनकी कलमें लगाने का काम शुरू किया गया है।

औषधीय पौधों की करीब 430 प्रजातियाँ ऐसी हैं जिनका संग्रह स्थानीय लोग मणिपुर की लोकतक झील और खेतों से करते हैं और उनका इस्तेमाल स्थानीय पारम्परिक औषधि (जड़ी-बूटी) के रूप में किया जाता है। अनेक औषधीय पौधों को यहाँ के लोग सब्जियों और फलों के रूप में उपयोग करते हैं। इन पौधों पर वैज्ञानिक अनुसन्धान की आवश्यकता है ताकि उनके जैव सक्रिय सिद्धान्तों का निर्धारण किया जा सके। आईबीएसडी ने अनेक प्रकार के महत्त्वपूर्ण तात्विक तेल पैदा करने वाले औषधीय और सुगन्धित पौधों की पहचान की है। तेजपत्ता की चुनिन्दा प्रजातियों में 1.3-2.1 प्रतिशत तेल पाया गया है जिसमें यूजिनॉल तत्व 82 प्रतिशत तक हो सकता है। यूजिनॉल का उपयोग दर्द निवारक और एँटीसेप्टिक एजेण्ट के रूप में होता है। क्षेत्र में पाई जाने वाली कुछ वनस्पतियों में 1.8 सिनेओल पाया जाता है। यह अति सूक्ष्म रोगाणुओं को नष्ट करने में सक्षम तत्व है। शिलाँग के पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाने वाली एक विशेष प्रकार की वनस्पति में 99.8 प्रतिशत तक मिथाइल सैलिसिलेट जैसा तात्विक तेल पाया जाता है। इसका उपयोग सरदर्द, मांसपेशियों के दर्द और साधारण सर्दी-जुकाम से राहत पाने के लिए किया जाता है। भारत में मिथाइल सैलिसिलेट की आपूर्ति आयात द्वारा की जाती है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में उसका विकल्प बनाने की सम्भावना है।

मणिपुर की जलवायु ‘पैशन’ फल के उत्पादन के लिए बहुत उपयुक्त है। इस फल के रस में नींद लाने का तत्व पाया जाता है। यह फल पाचन शक्ति को भी बढ़ाने वाला माना जाता है। पैशन फल में 7.45 प्रतिशत बीज होते हैं। इन बीजों में लिनोंलिक और ओलेइक अम्ल क्रमशः 69.3 प्रतिशत और 14.4 प्रतिशत होता है। इन फलों के औषधीय तत्व हृदय रोग के उपचार में उपयोगी प्रमाणित हुए हैं।

इन प्राथमिकता वाली फसलों पर अनुसन्धान जारी है। इनके अलावा औषधीय पौधों की करीब 430 प्रजातियाँ ऐसी हैं जिनका संग्रह स्थानीय लोग मणिपुर की लोकतक झील और खेतों से करते हैं और उनका इस्तेमाल स्थानीय पारम्परिक औषधि (जड़ी-बूटी) के रूप में किया जाता है। अनेक औषधीय पौधों को यहाँ के लोग सब्जियों और फलों के रूप में उपयोग करते हैं। इन पौधों पर वैज्ञानिक अनुसन्धान की आवश्यकता है ताकि उनके जैव सक्रिय सिद्धान्तों का निर्धारण किया जा सके। इसके साथ ही उनका प्रचार करने और स्थानीय उपयोग के लिए उपयुक्त बनाकर खेती करने की जरूरत है ताकि उनके प्राकृतिक उत्पत्ति स्थलों पर दबाव कम हो सके। इन पौधों के वैज्ञानिक आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इनका वाणिज्यिक उपयोग बढ़ाने में बाधा आ रही है। परन्तु मणिपुर के कुछ औषधीय पौधों के बारे में उपलब्ध सूचना से पता चलता है कि दालचीनी, लौंग, काली मिर्च और स्माइलेक्स का प्रतिवर्ष क्रमशः 83,598; 43,940 और 69,600 किलोग्राम संग्रहण होता है। इन पौधों के प्रसार और उत्पादन तकनीक को बढ़ावा देने की तत्काल जरूरत है ताकि उनके नैसर्गिक उत्पादन क्षेत्रों पर दबाव कम किया जा सके और उनकी पैदावार पर पड़ रहे खतरे को दूर किया जा सके।

बाँस उच्च वाणिज्यिक सम्भावनाओं वाला मणिपुर का एक और पौधीय जैव संसाधन है। ताजे भोज्य बाँस के अंकुर में 88 प्रतिशत जल, 3.9 प्रतिशत प्रोटीन, 0.5 प्रतिशत वसा, 5.7 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट और 1.1 प्रतिशत खनिज होता है। इस लोकप्रिय सब्जी में 17 प्रतिशत अमीनो अम्ल भी होते हैं। इसमें प्रोटीन के पाचक गुणों सहित अनेक औषधीय गुण पाए जाते हैं। राज्य में बाँस के अंकुर वनों से महत्त्वपूर्ण जैव संसाधन प्राप्त हो सकते हैं परन्तु इस बात का पता लगाने का कोई वैज्ञानिक आँकड़ा नहीं है कि यह बाँस के नैसर्गिक उत्पादन स्थलों पर कितना दबाव पैदा कर रहा है। इस महत्त्वपूर्ण जैव संसाधन से और अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के बाँस के अंकुरों के पौष्टिक प्राचलों में परिवर्तन पर अध्ययन, पूरे वर्ष उनकी उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए बेहतर संरक्षण तकनीक का विकास और उनकी पैदावार बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक हस्तक्षेप और बेहतर प्रबन्धन अनिवार्य है।

बाँस उच्च वाणिज्यिक सम्भावनाओं वाला मणिपुर का एक और पौधीय जैव संसाधन है। ताजे भोज्य बाँस के अंकुर में 88 प्रतिशत जल, 3.9 प्रतिशत प्रोटीन, 0.5 प्रतिशत वसा, 5.7 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट और 1.1 प्रतिशत खनिज होता है। इस लोकप्रिय सब्जी में 17 प्रतिशत अमीनो अम्ल भी होते हैं। इसमें प्रोटीन के पाचक गुणों सहित अनेक औषधीय गुण पाए जाते हैं।पूर्वोत्तर क्षेत्र और विशेषकर मणिपुर में मछली के रूप में एक महत्त्वपूर्ण जैव संसाधन उपलब्ध है। दलदली पर्यावरण में अनेक प्रकार की ऐसी मछलियों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो इसी क्षेत्र की विशेषता है। लोकतक और अन्य झीलों में पाई जाने वाली मछलियों के अभिलेख तैयार किए जा चुके हैं। चिन्दविन-इरावदी और बराक नदी प्रणालियों में पाई जाने वाली कई प्रवासी मछलियों को भी सूचीबद्ध किया जा चुका है। कुल मिलाकर अकेले मणिपुर में ही 140 मत्स्य प्रजातियों का पता चला है। इनमें पहाड़ी जलधाराओं में पाई जाने वाली अनेक सजावटी छोटी मछलियाँ भी शामिल हैं। इसके अलावा अनेक भोज्य घोंघे और सीपी भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं। ताजे पानी में पाई जाने वाली सीपियों और झींगा के वाणिज्यिक विकास की अपार सम्भावनाएँ हैं। पर्वतीय जलधाराओं में पाई जाने वाली मछलियों की बड़ी कीमत है। स्थानीय बाजारों में उपलब्ध अधिकांश मछलियाँ निर्जन स्थानों से प्राप्त होती हैं और यह एक बड़ा कारण है देसी मछलियों की सूची से स्वादिष्ट स्थानीय मछलियों को हटाने का या फिर उनका अस्तित्व ही समाप्त करने का। मत्स्य-पालन और मत्स्योत्पादन की उत्प्रेरित तकनीक और उपचार तकनीक से परिदृश्य में पर्याप्त सुधार हो सकता है। आईबीएसडी में दो देसी मछलियों के प्रजनन की उत्प्रेरित तकनीक हाथ में ली गई और वह काफी सफल रही है। मत्स्य बीजों और छोटी-छोटी मछलियों को मत्स्य-उत्पादकों और मत्स्य-पालकों को वितरण से इन उन्मुक्त प्रजातियों के उत्पादन में बड़े पैमाने पर वृद्धि होने की आशा है। इससे मछली संरक्षण को भी काफी बढ़ावा मिलेगा।

कीट जैव संसाधनों के स्थायी रूप से वैज्ञानिक दोहन के लिए संस्थान में अनुसन्धान की एक विशेष पहल की गई है। कीट जैव संसाधनों का बड़ा औद्योगिक महत्व है। उदाहरणार्थ, रेशम, शहद और लाख सभी कीटजनित उत्पाद हैं। इनके उत्पादन के लिए क्रमशः रेशम कीट पालन, मधुमक्खी पालन और लाख कीट पालन किया जाता है। कपड़ों की रानी (रेशम) का उत्पादन रेशम के कीड़ों द्वारा होता है। भारत के रेशम उत्पादक राज्यों में मणिपुर का छठा स्थान है और राज्य में शहतूत, टसर और ऐरी से कुल मिलाकर 286 मीट्रिक टन रेशम का उत्पादन होता है। लाख के कीड़े अनेक प्रकार के जंगली पेड़ों पर रहते हैं और रंग, लाख, राल आदि जैसे वाणिज्यिक रूप से उपयोगी वनोपज के लिए उनका दोहन किया जाता है। कीड़ों से प्राप्त किरमीदाने के चूर्ण जैसे रंगों का इस्तेमाल खाने के काम भी आता है।

‘लेथोसेरस इण्डिकस’ का उपयोग कैंसर और बवासीर के उपचार के लिए किया जाता है। ‘सायविस्टर कन्यूhtसस’ नाम के कीड़े का इस्तेमाल मूत्र विकारों और अतिसार रोगों के इलाज के लिए होता है। सर्वेक्षण के परिणामों ने दर्शाया है कि अनेक जनजातीय समूह कीड़ों के खाद्य सामग्री के रूप में उपयोग की वकालत करते हैं। उनका विश्वास है कि वे पशु प्रोटीन के सरलता से उपलब्ध रास्ते और पौष्टिक स्रोत हैं। पीढ़ियों से ज्ञात इन कीट जैव संसाधनों के अलावा, सर्वेक्षणों में यह तथ्य लिपिबद्ध किया जा चुका है कि ऐसे अनेक कीट पाए जाते हैं जिनका मणिपुर के पारम्परिक चिकित्सक (वैद्य) विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए करते आ रहे हैं। उदाहरण के लिए ‘लेथोसेरस इण्डिकस’ का उपयोग कैंसर और बवासीर के उपचार के लिए किया जाता है। ‘सायविस्टर कन्यू’ीसस’ नाम के कीड़े का इस्तेमाल मूत्र विकारों और अतिसार रोगों के इलाज के लिए होता है। सर्वेक्षण के परिणामों ने दर्शाया है कि अनेक जनजातीय समूह कीड़ों के खाद्य सामग्री के रूप में उपयोग की वकालत करते हैं। उनका विश्वास है कि वे पशु प्रोटीन के सरलता से उपलब्ध रास्ते और पौष्टिक स्रोत हैं। वर्ष के कुछ महीनों में इम्फाल के बाजार में बड़े पैमाने पर भोज्य कीड़ों को बिकते हुए देखा जा सकता है। इन कीड़ों को जंगलों से इकट्ठा किया जाता है परन्तु पर्यावरण सन्तुलन पर पड़ने वाले इसके प्रभाव के बारे में कोई जानकारी नहीं है। यदि वे कीड़े जीवभक्षी की भूमिका निभाते हुए अन्य पतंगों आदि का भक्षण करते हैं तो यह पारम्परिक पद्धति वांछित नहीं कही जा सकती। इन सब वैज्ञानिक मुद्दों पर वर्तमान में अनुसन्धान जारी हैं। पारम्परिक ज्ञान के आधार पर कीड़ों के पौष्टिक और औषधीय मूल्यों का विश्लेषण और उनके विषैले तथा औषधीय मूल्यांकन में इन भोज्य और औषधीय महत्व के कीड़ों के वाणिज्यिक दोहन की सम्भावना छिपी हुई है।

प्रकट रूप से दृष्टिगोचर इन जैव संसाधनों के अतिरिक्त अनेक सूक्ष्मदर्शी जीव राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में बहुतायत से पाए जाते हैं। पृथ्वी की जैव विविधता में इनका बड़ा भारी योगदान है। आधुनिक सभ्यता के समग्र विकास तथा कृषि उद्योग और स्वास्थ्य क्षेत्रों को सूक्ष्म जीवों के योगदान से सभी परिचित है। मणिपुर के सूक्ष्मजीवी भण्डारों के बारे में बहुत कम वैज्ञानिक आँकड़े उपलब्ध हैं (34 की जानकारी है)। इनकी भोज्य प्रजातियाँ प्रोटीन, खाद, सुगन्ध और पौष्टिक मूल्यों के साथ-साथ अपने वाणिज्यिक महत्व के लिए जानी जाती हैं। लाल रंग की भोज्य शैवाल (ऐलगी) ‘लमनिया ऑस्ट्रेलिस’ को स्थानीय तौर पर ‘नुंगसम’ कहा जाता है और इसको मणिपुर के नैसर्गिक जलीय निवास स्थलों से प्राप्त कर बाजार में बेचा जाता है। इस शैवाल की विशेषता है कि यह 30-50 से.मी. की उथली गहराई में खूब फैलती है। इस अनूठे जैव संसाधन का वैज्ञानिक ढंग से प्रबन्धन करने के लिए इस पर तुरन्त ध्यान देने की आवश्यकता है।

मणिपुर समेत पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र की विभिन्न पर्यावरण प्रणालियाँ विविध सूक्ष्म जीवों से परिपूर्ण हैं और उनका अभी भली-भाँति दोहन (वाणिज्यिक उपयोग) नहीं हुआ है। क्षेत्र में कृषि की पारम्परिक पद्धति और कृषि रसायनों के कम उपयोग के कारण इन पर्यावरणों की सूक्ष्म वनस्पतियों में अनूठी प्रजातियों को आश्रय मिला हुआ है। नये-नये प्रकार की एण्टीबायोटिक, जैव उर्वरकों और जैव कीटनाशकों की खोज के लिए इन जीवों की सम्भावनाओं का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक अनुसन्धान आवश्यक हैं।

कृषि रसायनों के सघन उपयोग वाले कृषि और उद्यानिकी क्षेत्रों से मिले अनुभव से ज्ञात हुआ है कि राज्य की कृषि फसलों में पौष्टिक तत्वों और रोगों के प्रबन्धन के लिए जैव उर्वरकों के विकास के वास्ते अनुसन्धान में तेजी लाने की आवश्यकता है। मणिपुर घाटी में एक लाख हेक्टेयर की खेती योग्य भूमि को अकेले जैविक खादों से ही उर्वर बनाया जा सकता है। जैविक कचरे (बायोमास) की प्रचुरता के कारण जैविक खादों के उत्पादन की सम्भावनाएँ भी काफी अच्छी हैं। जलीय निकायों पर बड़ी मात्रा में वानस्पतिक जैव कचरे का उत्पादन होता है। लोकतक झील को छोड़कर अन्य जलीय निकायों के कुल 52,956 हेक्टेयर में वानस्पतिक कचरा पैदा होता है। एक अनुमान के अनुसार लोकतक झील में 5 करोड़ टन जलीय जैव कचरा तैरते हुए मंच के रूप में पाया जाता है। इम्फाल नगर की नगरपालिका जो कूड़ा-कचरा उठाती है उससे प्रतिदिन 24.2 मीट्रिक टन जैव कचरा पैदा होता है। इसके अलावा फसलों के अवशेष और पशुओं का कचरा (गोबर आदि) भी बड़ी मात्रा में उपलब्ध है। वैज्ञानिक पद्धति और नियोजन से इन जैविक पदार्थों का उपयोग उच्च गुणवत्ता वाली खाद के उत्पादन के लिए किया जा सकता है।

साइट्रस पौधों की मुरझाने की बीमारी इस क्षेत्र के मैंडरिन सन्तरे की लाभप्रद खेती में एक प्रमुख बाधा बनी हुई है। सूक्ष्मस्तरीय प्रचार के जरिये अंकुर की कलम लगाने और जीवाणु मुक्त पौधे लगाने की सामग्री के उत्पादन के प्रयासों के साथ-साथ, बारहमासी बागानों के पोषण में पिछड़े होने की समस्या का समाधान पौधों के विकास में वैज्ञानिक पद्धति के इस्तेमाल से किए जाने का प्रयास किया गया है। अनेक प्रकार के आकाशीय और जलीय पर्यावरणों को जैव उर्वरकों, एकल कोशिका प्रोटीन, प्राकृतिक रंजक और औषधीय उत्पादों के स्रोत के रूप में उपयोग करने के लिए अलग से चिह्नित किया गया है।

पारम्परिक रूप से मृदा कीटाणु जैसे सूक्ष्म जीव विभिन्न रोगों के उपचार में एण्टीबायोटिक्स के स्रोत के रूप में इस्तेमाल होते रहे हैं। नयी वैज्ञानिक खोजों ने जैव सक्रिय अणु के स्रोत के तौर पर विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से राहत पाने के लिए इन कीटाणुओं की प्रबल सम्भावनाओं का पता लगाने का काम शुरू किया है। पारम्परिक उपचार तकनीक से वास में मौजूद कुल कीटाणु के केवल 10 प्रतिशत का आकलन किया जा सकता है। परिणामस्वरूप इन कीटाणुओं की सम्भावनाओं के बारे में बहुत-सी जानकारियों का पता ही नहीं लगाया जा सकता। परन्तु आधुनिक आणविक तकनीकें कीटाणुओं की सम्भावनाओं का आकलन करने में उपयोगी साबित हुई हैं। निकोलस पीरामल को औद्योगिक भागीदार और आइबीएसडी सहित देश की नौ अन्य शोध एवं विकास संस्थाओं के साथ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की भागीदारी में शुरू की गई बहु-संस्थानी परियोजना के तहत पूर्वोत्तर भारत की 13,900 कीटाणुओं की जाँच से पता चला है कि 319, 51, 16 और 74 कीटाणुओं में क्रमशः संक्रमण-रोधी, सूजन-रोधी, कैंसर-रोधी और मधुमेह-रोधी गुण पाए गए हैं।

खमीरीकरण खाद्य संरक्षण और उत्पादन की प्राचीनतम और सबसे किफायती विधियों में से एक है। खमीरीकृत भोजन संरक्षण के अलावा स्वाद, पाचन, पौष्टिकता और औषधीय गुणों को बढ़ाने के अतिरिक्त गुणों से भरे होते हैं। प्रत्येक खमीरीकृत भोजन में सूक्ष्म वनस्पतियों का झूण्ड समाया होता है जो प्रोटीन, विटामिन, तात्विक अमीनो अम्ल और फैटी एसिड का स्तर बढ़ाते हैं। इनमें कुपोषण की समस्या से निपटने की प्रचुर सम्भावना है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में खमीरीकृत भोजन और पेय पदार्थों के 50 से अधिक प्रकार पाए जाते हैं। इनमें खमीरीकृत सोयाबीन उत्पादन हवाईजार, किनेमा, बड़ी, थुरगबाई, ऐक्सोन, एखुनी, आसा, पेरोननेमिगं, यन्नी, पेरुंग, चुकचोरो, पेरुयान, बेकंग) खमीरीकृत बाँस अंकुर उत्पाद (सोईबम, सोइडॉन हिरिंक, मेसू, एकुंग, एहुंग, इयुप, लुंग-सीज), खमीरीकृत सब्जियाँ (जियांग दुई, गुन्द्रुक, लाईसाग, अनिशी, गोयांक, सिंकी) खमीरीकृत मत्स्योत्पाद (एंगारी, हेंटक, तुंगतैप, लोनाइलिस), खमीरीकृत मांस उत्पाद (सा-युम, खेयुइरी, चिलू, करग्योंग), खमीरीकृत याक दुग्ध उत्पाद (चुरापी, चुरखम, चुई युप्पा/फुरुंग), चावल आधारित मादक पेय पदार्थ (जुथू, एथिंग्बा, इन्नोंग, भाती, जानर, पोना) ज्वार/बाजरा से बने मद्य पेय (एप्पो, अपांग, मकई जानर, थेमसिंग, राक्शी, मिंगरी) और फलों से बनी वाइन (मद्य) कटहल, वन सेब, पैशन फल, केला, अन्नानास और अन्य जंगली फल) शामिल हैं।

पूर्वोत्तर भारत के पारम्परिक खमीरीकृत भोजन के बारे में ज्ञान केवल बाजार में बिकने वाले अन्तिम उत्पादों के बारे में उपलब्ध है। बैसिलस, लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया (एलएपी) और कुछ खमीरी प्रजातियाँ खमीरीकृत भोजन से जुड़े सूक्ष्म जीवों के प्रमुख समूह हैं। विश्व भर में मानव कल्याण के लिए जीन पूल की खोज में माइक्रोबियल जर्मप्लाज्म की पहचान, खोज और संग्रह में दिलचस्पी बढ़ रही है ताकि जैव-प्रौद्योगिकीविदों को मूल्य संवर्धित उत्पाद विकसित करने में मदद मिले।

विगत वर्षों में अनुसन्धानकर्ताओं द्वारा स्वच्छ और वैज्ञानिक ढंग से उत्पादन प्रौद्योगिकी अपनाने के गम्भीर प्रयास नहीं किए गए। स्थानीय निर्माता अभी भी पुरातन पारम्परिक कला को ही अपनाए हुए हैं। परन्तु विकसित देशों में उनके पारम्परिक खमीरीकृत भोजन जैसे योगर्ट, चीज, सावरक्रोट, नैट्टो, टेम्पे, मिसो आदि की विशद वैज्ञानिक जाँच की गई है, नयी उत्पादन प्रौद्योगिकियों का विकास किया गया है और इन उत्पादों को स्वास्थ्य के प्रति लाभदायक बताने वाले लेबल के साथ अन्तरराष्ट्रीय बाजारों में उतारकर उसका व्यावसायिक लाभ लिया जा रहा है। उत्तम निर्माण पद्धति (जीएमपी) के अनुसार उत्पादन के बुनियादी हाईजेनिक ज्ञान के प्रति जागरुकता की आवश्यकता है। एचएसीपी प्रणाली के अनुसार बाजार में उतारे गए उत्पादों की सुरक्षा के बारे में जागरुकता की जरूरत है। इन दोनों विषयों पर तुरन्त ध्यान देने की आवश्यकता है।

हाल के दिनों में प्रकाशित वैज्ञानिक लेखों में मानव स्वास्थ्य और बीमारियों के विभिन्न पहलुओं पर खमीरीकृत भोजन के सकारात्मक प्रभाव का विस्तार से उल्लेख हुआ है। वैज्ञानिक ढंग से स्वास्थ्यवर्धक गुणों के अनुसार नये खमीरीकृत भोजन का विकास राज्य के लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। पूर्वोत्तर भारत के कम आय वाले लोगों को इससे विशेष लाभ मिल सकता है।

अन्त में यह कहा जा सकता है कि यदि वैज्ञानिक ढंग से प्रबन्धन हो तो मणिपुर के पौधीय, पशु और सूक्ष्मजीवी जैव संसाधन राज्य की अर्थव्यवस्था के उत्थान में महत्त्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। परन्तु इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए की जाने वाली पहल को वैज्ञानिक अनुसन्धान के उचित वातावरण के सहारे की आवश्यकता है। साथ ही जैव संसाधन प्रबन्धन के बारे में वैज्ञानिक ज्ञान को अन्तिम उपयोगकर्ता तक पहुँचाने के लिए सुदृढ़ प्रसार/विस्तार तन्त्र की भी जरूरत है। भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच के गलियारे में स्थित होने के कारण मणिपुर को अपने उत्पादों और जैव संसाधनों से विकसित प्रक्रियाओं के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में व्यापक बाजार मिलने की अच्छी सम्भावना है। मणिपुर की स्थिति इस सम्बन्ध में लाभप्रद है। इस सम्बन्ध में भारत सरकार की ‘पूरब चलो’ नीति राज्य के जैव संसाधन व्यापार की गति को तेज करने में उत्प्रेरक का काम कर सकती है।

[लेखक भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अन्तर्गत इम्फाल स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ बायोरिसोर्सेज एण्ड सस्टेनेबल विकास के निदेशक (प्रभारी) हैं]
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