मनरेगा के रास्ते स्थानीय आपदा प्रबंधन

Author:श्याम सुन्दर प्रसाद
Source:योजना, जनवरी 2017

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन निकाय, राज्य स्तरीय आपदा प्रबंधन निकाय तथा जिला आपदा प्रबंधन निकाय की आपदा प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका है, जो पारस्परिक रूप से राहत केन्द्रित उपागम के स्थान पर आपदाओं से निपटने की तैयारी, आपदाओं के प्रभाव को कम-से-कम करना, आपदा से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण तथा आपातकालीन व्यवस्था जैसे मुद्दों को सुदृढ़ करने के समग्र एवं सम्बन्धित उपागम पर अधिक ध्यान देते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में ‘मनरेगा कार्य बल’ के निर्माण की ओर कदम बढ़ाना अति आवश्यक हो जाता है

आपदा सम्भावित क्षेत्र में आपदाओं पर आकस्मिक नियंत्रण हेतु महात्मा गाँधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) कार्यक्रम एक अच्छा विकल्प है। क्योंकि इसके प्रबंधन के लिये मानवों की संख्या एकमुश्त मिल जाती है। केवल इन मजदूरों को थोड़ा आपदा प्रबंधन हेतु प्रशिक्षण देने की जरूरत है। ‘मनरेगा कार्य बल’ का निर्माण किया जाए जो स्थानीय स्तर पर ‘आपदा कार्य बल’ की तरह कार्य करे। इसके निर्माण की आवश्यकता और साबित हो गई, जब 18 मई, 2016 को प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को जारी किया गया। यह योजना 2015-2030 की अवधि में आपदा जोखिम में कमी लाने के लिये एक ढाँचा एवं दिशा-निर्देश प्रदान करती है। मनरेगा से सरकार/प्रशासन को पंजीकृत मजदूरों की एक बड़ी संख्या मिल जाती है। जिसे जब चाहे कार्य में लगाया जा सकता है। कहीं पर मानवशक्ति की तुरन्त जरूरत हो तो इनसे दबावपूर्ण भी काम करवाया जा सकता है। इस तरह, मनरेगा आपदा प्रबंधन में बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है।

आपदा का अर्थ एवं प्रबंधन की आवश्यकता


आपदा एक अचानक व अनिश्चित घटने वाली घटना है जो मानवजनित या प्राकृतिक हो सकती है। इसके कारण देश या समाज की क्षति होती है। आपदाओं से बड़े पैमाने पर मानव, सामग्री, आर्थिक या पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। विभिन्न प्रकार की आपदाएँ होती हैं और उससे सम्बन्धित खतरे भी हैं। जैसे- भूभौतिकीय (भूकम्प, सुनामी), हाइड्रोलॉजिकल (बाढ़, भूस्खलन, तरंग अभिक्रिया), मौसमविज्ञानी (मौसमी परिवर्तन), जलवायु सम्बन्धी (असामान्य जलवायु, मौसमी दशाएँ), जैविक (कीटाणुओं, विषाणुओं, जहरीले पदार्थों से जनित) तथा मानव जनित (मानव त्रुटियाँ, आतंकवादी गतिविधियाँ, युद्ध, आगजनी, आन्दोलन, हड़ताल) आदि।

इस तरह की आपदाओं से उत्पन्न खतरों और आफतों के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिये इन आपदाओं को रोकने के लिये कुशल प्रबंधन की आवश्यकता है। आपदा प्रबंधन के द्वारा योजनाओं का निर्माण होता है। यह आपदाओं के खतरों को खत्म नहीं करता बल्कि कम करता है। यह आपदा के प्रभाव को कम करने के लिये योजना बनाने पर बल देता है।

मनरेगा और आपदा प्रबंधन


भारत सरकार ने मनरेगा (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005) जैसे रोजगारपरक कार्यक्रम के अन्तर्गत ग्रामीण लोगों को ‘काम का अधिकार’ दिया है। महात्मा गाँधी मनरेगा, 2005 को 7 सितम्बर, 2005 को अधिसूचित तथा 2 अक्टूबर, 2006 को लागू किया गया। यह सरकार का गरीब मजदूरों के हित में बनाया गया विश्व का सबसे बड़ा, महत्त्वाकांक्षी व ऐतिहासिक सार्वजनिक कार्यक्रम है। जिसने भारत जैसे विशाल देश के 682 जिलों, 6,860 प्रखंडों और 2,62,248 पंचायतों को अपनी छत्रछाया में समाहित किया है। वर्तमान में मनरेगा कार्यक्रम में पन्जीकृत 25.55 करोड़ मजदूरों में सक्रिय मजदूरों की संख्या 10.84 करोड़ है। प्रत्येक पंचायत में लगभग 50-100 सक्रिय मजदूर मिल जाएँगे।

आपदा जोन में आपदाओं पर आकस्मिक नियन्त्रण हेतु मनरेगा कार्यक्रम एक अच्छा विकल्प है। क्योंकि इसके प्रबंधन के लिये मानवों की संख्या एकमुश्त मिल जाती है। केवल इन मजदूरों को आपदा प्रबंधन हेतु थोड़ा प्रशिक्षण देने की जरूरत है। इस तरह, मनरेगा आपदा प्रबंधन में बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। मनरेगा कार्यक्रम दो तरह से आपदा प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकता है। पहला, आपदा घटित होने वाली सम्भावनाओं को मनरेगा कार्यक्रम में प्राथमिकता देकर, जैसे-सूखा प्रभावित क्षेत्रों में नहरों का निर्माण, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बाँध का निर्माण कर या खराब सड़क की मरम्मत आदि। इस तरह के कार्य सामान्य मनरेगा मजदूरों के द्वारा सम्पन्न किए जा सकते हैं। दूसरा, ‘मनरेगा कार्य बल’ को बनाकर, जिसमें शामिल मजदूरों का वर्ग केवल आपदा से जुड़े कार्यों को अन्जाम देगा, जैसे-आपदा बचाव, राहत, जागरूकता, पहल एवं पुनर्वास आदि। मनरेगा के माध्यम से पश्चिम बंगाल में आपदा प्रबंधन तथा सिक्किम में जीवनशैली बदलते हुए देखा गया है। बिहार के गोपालगंज जिले में बाढ़ के कारण नदियों के बाँध टूटने पर वहाँ के जिलाधिकारी ने मनरेगा मजदूरों की मदद से फौरन पानी के बहाव को काबू में कर लिया। जिससे भीषण आपदा को टाला जा सका।

मनरेगा कार्य बल की संरचना व कार्यप्रणाली


मनरेगा को आपदा प्रबंधन में उपयोगी साबित करने के लिये मनरेगा मजदूरों के एक वर्ग को लेकर ‘मनरेगा कार्य बल’ का एक समूह बनाना पड़ेगा, जो स्थानीय स्तर पर विशेष रूप से ‘आपदा कार्य बल’ की तरह कार्य करेंगे। इस कार्यबल में 20 वर्ष से लेकर 40 वर्ष के मजदूरों को शामिल करना है। जिसमें पुरुष और महिला का अनुपात 75:25 रखा जाना चाहिए। पुरुष के लिये यह अनुपात वास्तविक इसलिये है क्योंकि आपदा से राहत व बचाव कार्यों में अत्यधिक शारीरिक बल का प्रयोग होता है। लेकिन महिलाएँ आपदा जागरूकता और घायल व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से मदद करने में सक्षम हैं। मनरेगा में देखा गया है कि कुछ लोगों की शिकायत होती है कि मनरेगा में योग्यता के अनुसार गरिमापूर्ण काम नहीं है। आपदा प्रबंधन में 8 कक्षा के ऊपर के योग्यताधारी मजदूरों को इस तरह का रचनात्मक कार्य देकर इस शिकायत को दूर किया जा सकता है। मनरेगा में दिन-प्रतिदिन रोजगार सृजन में कमी देखी जा सकती है। मनरेगा में कार्य योजनाओं और रोजगार के विस्तार के लिये आपदाओं जैसे- बाढ़, आगजनी, सूखा, सड़क और रेल दुर्घटना आदि को शामिल करना पड़ेगा। मनरेगा मजदूरों का एक समूह आपदा प्रबंधन चक्र 1. आपदा रोकथाम 2. आपदा तैयारी 3. आपदा अनुक्रिया 4. आपदा राहत और 5. आपदा पुनर्वास में पूर्णतया सहयोग देने में सक्षम है। लेकिन जरूरत है चयनित मजदूरों को आपदा प्रबंधन में प्रशिक्षित करने की। प्रशिक्षण उन्हें आपदा की विपरीत परिस्थितियों में कार्य करने के लिये सक्षम बनाएगा।

सशक्त आपदा प्रबंधन में ‘मनरेगा कार्य बल’ और टीम वर्क की आवश्यकता


स्थानीय स्तर पर सशक्त आपदा प्रबंधन में ‘मनरेगा कार्य बल’ को प्रशिक्षित कर मानव संसाधन में परिवर्तित करना जरूरी है। प्रत्येक पंचायत स्तर पर तैयार कार्यबल की श्रृंखला बनानी होगी। प्रशासन द्वारा समय-समय पर आपदा से जुड़ी विभिन्न कार्य योजनाओं और पहल पर इन्हें उचित मजदूरी देकर कार्य लिया जा सकता है। आपदा प्रबंधन और राहत कार्यक्रम को विकास कार्यक्रमों से जोड़ने की आवश्यकता है। प्रशासन को इन कार्यबलों का सारा ब्यौरा रखना होगा। साथ ही इसे विभिन्न माध्यमों द्वारा नाम, पता और सम्पर्क नम्बर के साथ प्रकाशित करना होगा। 25 लोगों के एक समूह में एक नेतृत्वकर्ता होगा, जिसका नाम, पता और सम्पर्क नम्बर विभिन्न विभागों को उपलब्ध होगा और विभिन्न विभागों के स्थायी नम्बर नेतृत्वकर्ता के मोबाइल में प्रविष्ट होगा।

क्षमता निर्माण


मनरेगा कार्य बल को समय-समय पर प्रशिक्षित करने के साथ विभिन्न तरह के कार्य जैसे- स्थानीय-स्तर पर जागरूकता फैलाने, समुदाय के लोगों को किसी मुद्दे पर एकमत बनाने आदि में उपयोग में लेना होगा। आपदा राहत और बचाव दल के जवानों के साथ अभ्यास कार्यक्रम करना भी जरूरी है। इनमें टीमवर्क की भावना को विकसित करना पड़ेगा। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के द्वारा भी इन मजदूरों का आपदा प्रबंधन में कौशल को बढ़ाया जा सकता है।

वित्तीय व्यवस्था


मनरेगा कार्य बल के लिये वित्तीय व्यवस्था आपदा प्रबंधन योजना से सरकार के द्वारा उपलब्ध करवाया जाए या मनरेगा के मजदूरी बजट से दिया जा सकता है। मनरेगा वेबसाइट पर ऐसा देखा जा सकता है कि मनरेगा की उपलब्ध राशि का प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 75-80 प्रतिशत ही खर्च की जाती है। इसलिये वापस लौटे धन का सदुपयोग मजदूरों के कौशल विकास में किया जा सकता है।

समन्वय की संरचना


आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अन्तर्गत राष्ट्रीय, प्रान्तीय, जनपदीय एवं स्थानीय स्तरों पर प्रभावी आपदा प्रबंधन हेतु संस्थानिक एवं समन्वयकारी तन्त्र का प्रावधान है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन निकाय, राज्य स्तरीय आपदा प्रबंधन निकाय तथा जिला आपदा प्रबंधन निकाय आपदा प्रबंधन को पारस्परिक रूप से राहत केन्द्रित उपागम के स्थान पर आपदाओं से निपटने की तैयारी, आपदाओं के प्रभाव को कम-से-कम करना, आपदा से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण, तथा आपातकालीन व्यवस्था जैसे मुद्दों को सुदृढ़ करने के समग्र एवं सम्बन्धित उपागम पर अधिक ध्यान देते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में मनरेगा कार्य बल के निर्माण की ओर कदम बढ़ाना अति आवश्यक हो जाता है। मनरेगा से ही कम कीमत पर मानव संसाधन मिल सकते हैं। जिससे स्थानीय स्तर पर समस्या का स्थानीय लोगों द्वारा निदान कर पाना सम्भव है। लेकिन पंचायत स्तरीय मनरेगा मजदूरों का जिला नियोजन और जिला स्तरीय आपदा प्रबंधन निकाय में उपयुक्त सम्पर्क और समन्वय जरूरी है। इसके लिये उपरोक्त बताए गए सम्पर्क माध्यम को अपनाना पड़ेगा।

मनरेगा के रास्ते स्थानीय आपदा प्रबंधन

आपदा प्रबंधन में मनरेगा कार्य बल की भागीदारी


आरेख 1 स्पष्टतः ‘मनरेगा कार्य बल’ की महत्ता को बखूबी बयान करता है। इसके अलावा पंचायत स्तर पर आपदा से निपटने वाले कुछ लोगों के रहने से अन्य लोगों को एक आत्मबल भी मिलता है। वे आपदा से सुरक्षा कैसे करें? उसे सीखते हैं। जिसे समय पड़ने पर कार्यरूप दे सकते हैं। इस तरह की कार्यप्रणाली ने आपदा से निपटने के लिये एक सशक्त समाज के निर्माण की ओर बढ़ने को प्रोत्साहित किया है।

स्थानीय आपदा के न्यूनीकरण में पंचायती राज संस्थाएँ


चूँकि मनरेगा का क्रियान्वयन पंचायती राज संस्थाओं के द्वारा किया जाता है। इसलिये इन संस्थाओं की भूमिका स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन में अधिक हो सकती है। सरकार द्वारा प्रदत्त योजनाओं से पंचायतों में लोगों की भागीदारी, आत्मनिर्भरता, जागरूकता तथा विश्वास बढ़ा है इससे लोकतंत्र में और मजबूती आ रही है। इन संस्थाओं के द्वारा सरकार के पास ऐसा बड़ा तंत्र खड़ा हो जाता है, जो बिना खर्च के कार्य करने के लिये तत्पर रहता है। जिसमें धरातलीय स्तर पर ‘स्वयं की समस्या और स्वयं द्वारा समाधान’ करने पर जनता का विश्वास निहित होता है। भारत के गाँवों की संख्या में 2,279 (2011 की जनगणना में 6,40,867 गाँव एवं 2001 की जनगणना में 6,38,588 गाँव अर्थात 2,279 गाँवों की वृद्धि) हुई है। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जाने वाली कई योजनाओं को पंचायती राज लागू कर रहा है। सरकार के निर्णयों का अक्षरतः पालन करने में भी पंचायती राज संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। सरकार पंचायती राज संस्थाओं को भी जमीनी-स्तर पर मजबूत बनाने के लगातार प्रयास में लगी है। इस कारण स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिये सामुदायिक सक्षमता के विकास के संदर्भ में स्थानीय स्वशासन/पंचायती राज संस्थाओं की उपयोगिता होगी।

आरेख 2 आपदा प्रबंधन के सबसे जरूरी पहलुओं को पाने में मदद करता है। क्योंकि देखा गया है कि आपदा के घटित होने वाले स्थानों पर पर्याप्त संसाधन और बेहतर भागीदारी सुनिश्चित होने में देरी होती है। ये संस्थाएँ नजदीक के परिचित व्यक्तियों को त्वरित प्रयोग कर दुर्घटनाग्रस्त लोगों को तात्कालिक मदद पहुँचा सकती हैं। यह मनरेगा से बेहतर सम्भव है क्योंकि काम के बदले में मजदूरी मनरेगा कोष से पंचायती राज संस्थाएँ दे सकती हैं।

मनरेगा के रास्ते स्थानीय आपदा प्रबंधन

विभिन्न मनरेगा कार्यक्रमों का सड़क एवं रेल दुर्घटनाओं के न्यूनीकरण में योगदान


देश में प्राकृतिक आपदाओं की संख्या कम होती है लेकिन इससे ज्यादा नुकसान होने की उम्मीद होती है। वहीं मानवजनित आपदाओं की संख्या ज्यादा है लेकिन प्राकृतिक आपदाओं से क्षति की तुलना में नुकसान कम होते हैं। प्राकृतिक आपदाओं के आने के पीछे ही कहीं-न-कहीं मानव का हाथ होता है। मानव के असंतुलित प्राकृतिक दोहन के बाद प्रकृति स्वयं संतुलन बनाने में असमर्थ हो जाती है। जिसके कारण कई प्रकोप धरती पर आते रहते हैं। मानवजनित आपदाओं में रेल और सड़क जैसी दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती है। अगर ट्रेन हादसों को देखें तो भारतीय रेलवे की 2015 में आई स्टैटिक्सकल ईयर बुक के अनुसार, पाँच वर्ष में 313 बार ट्रेन पटरी से उतरी जबकि 293 समपार हादसे हुए। इसके अलावा 2014 में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरों के मुताबिक रेल सम्बन्धित दुर्घटनाओं में 27,581 लोगों की मौत हुई थी। अभी हाल में 20 नवम्बर, 2016 को इंदौर-पटना एक्सप्रेस की दुर्घटना लगभग 200 लोगों की मौत का सबब बनी और 250 से ज्यादा लोग घायल हुए। यह हादसा रेल की खराब पटरियों की वजह से हुआ। इसलिये मनरेगा के मानव संसाधन का इस्तेमाल पटरियों के रख-रखाव या पटरियों को बदलने में किया जा सकता है। देखा जाता है कि राहत व बचाव कार्य में रेस्क्यू टीम को मौके पर पहुँचने में देरी होती है या उनकी संख्या कम होती है।

इस संदर्भ में भी मनरेगा कार्य बल की मदद रेल प्रशासन ले सकता है। राहत और बचाव दल के जवान मनरेगा टीम के साथ घायलों को तात्कालिक चिकित्सीय सुविधा मुहैया करवाने का सर्वोत्तम प्रयास कर सकते हैं। इसको लेकर रेल अधिकारियों द्वारा रेल सुरक्षा सुधार के ‘रेल नेटवर्क’ बना सकती है। जिसे जब चाहे सुरक्षा-संरक्षा कार्यों में लगाया जा सकता है। रेल मंत्रालय की जारी अप्रैल, 2016 की ‘आपदा प्रबंधन योजना’ में आपदा के अर्थ को और व्यापक बनाया गया है। इसमें न केवल रेल दुर्घटनाएँ शामिल हैं बल्कि अन्य घटनाओं जैसे आतंकवाद सम्बन्धित संकट/गतिविधियों और प्राकृतिक आपदाएँ भी शामिल हैं। अतः इसके लिये रेल मंत्रालय को स्थानीय स्तर पर कार्य योजना बनानी होगी।

सड़क दुर्घटनाओं पर गौर करें तो आए दिन देश में हजारों की संख्या में सड़क से सम्बन्धित दुर्घटनाओं का पता चलता है। इसमें से अधिकांश दुर्घटनाएँ चालक की लापरवाही और ओवर स्पीडिंग से होती हैं। 09 दिसम्बर, 2016 के प्रसारित एबीपी न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार, यमुना एक्सप्रेस वे (दिल्ली-आगरा) पर ओवर स्पीडिंग के कारण साल में 150 से ज्यादा घटनाएँ घटती हैं। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जा रहा है। जगह-जगह बैनर लगाए गए हैं लेकिन स्थानीय व ग्रामीण इलाकों में सड़क सुरक्षा और इससे जुड़ी पहल जैसे-चालकों को जागरूक करने और जानकारी देने या सड़क की मरम्मत एवं दुर्घटनाओं के बाद राहत कार्य में मनरेगा मजदूरों को शामिल किया जा सकता है। कई स्थानों पर उन्हें लिखी तख्ती लेकर खड़े रहने या समझाने का कार्य दिया जा सकता है।

मनरेगा के रास्ते स्थानीय आपदा प्रबंधनअगर मनरेगा कार्य बल के केवल बेल्ट सेफ्टी के बारे में समझाने और अमल में लाने के प्रयास सफल हो जाएँ तो 60 प्रतिशत मौतें टल सकती हैं। इसके अलावा धार्मिक सम्मेलनों में भगदड़ से होने वाली मौतों को मनरेगा योजनाओं से रोका जा सकता है और घायलों को बेहतर चिकित्सीय सुविधाएँ भी दी जा सकती हैं। 15 अक्टूबर, 2016 को बनारस के पास जयगुरुदेव समागम में बाबा गुरुदेव के समर्थकों के पैदल मार्च में मची भगदड़ ने 30 से अधिक श्रद्धालुओं की मौत और लगभग 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए। इस हादसे की वजह अनावश्यक और अनियंत्रित भीड़ थी। अतः भीड़ नियंत्रण और प्रबन्धन में जिला प्रशासन मनरेगा कार्य बल की मदद ले सकता है और काफी हद तक इस तरह की दुखद घटनाओं को टाला जा सकता है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि सरकार का आपदा प्रबंधन पर विशेष ध्यान स्थानीय स्तर पर मानव संसाधन की जरूरत को उजागर करता है। स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन को मनरेगा से जोड़ कर देखना ही पड़ेगा। इसके लिये सरकार को एक रोडमैप पर काम करना चाहिए। स्थानीय स्तर पर भविष्य में मनरेगा कार्यक्रम और आपदा प्रबंधन को एक-दूसरे का पूरक बनाने पर सोचना होगा। इस तरह के प्रयास से एक ओर सशक्त आपदा प्रबंधन को बल मिलेगा और दूसरी ओर ग्रामीण जनसंख्या का एक ऐसा वर्ग तैयार होगा जिसे जिसे रोजगार प्राप्ति के साथ एक सक्रिय नागरिक बनने का मौका मिलेगा, जो एक जागरूक समाज के निर्माण में योगदान दे सकता है।

संदर्भ
1. गोयल, एस. एल. 2006 : चैप्टर-8 ‘पीपुल्स पार्टिसिपेशन इन डिजास्टर मैनेजमेंट’ इन ‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट’, दीप एंड दीप पब्लिकेशन्स प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, पेज 243-258

2. जनसत्ता (दैनिक), 21 नवम्बर, 2016 पेज-02

3. ज्योर्तिमय राय (2012) : ‘मनरेगा ने बदली ग्रामीणों की तकदीर’, कुरुक्षेत्र, वर्ष 59, अंक : 02, दिसम्बर, पृष्ठ-29

4. वर्मा, के. बी. एंड भूषण, ब्रीज (1994) : ‘डिजास्टर मैनेजमेंट इन इंडिया : ए कम्युनिटी पर्सपेक्टिव्स’, एन. शर्मा, के. विनोद, (एडिट), ‘डिजास्टर मैनेजमेंट’, आई.आई.पी.ए., नई दिल्ली, पृष्ठ 46-59

5. शर्मा के. अरविंद (1996) : ‘पीपल्स एम्पावरमेंट’, आई.जे.पी.ए., जुलाई-सितम्बर, नई दिल्ली, पेज-236

6. www.amarujala.com

7. www.indianrailway.gov.in

8. www.morth.nic.in

9. www.ndma.gov.in

10. www.nrega.nic.in

लेखक परिचय


लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के श्याम लाल कॉलेज (प्रातः) में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय तथा अन्य संस्थानों में भी अतिथि अध्यापक के तौर पर अध्यापन में संलग्न हैं। ईमेल: shyamzrd@gmail.com

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