मृदा संरक्षण से मिली कामयाबी

Author:रघु शर्मा
Source:कुरुक्षेत्र, नवंबर 2011
मिट्टी में अपार संभावनाएं हैं। जो लोग मिट्टी की ताकत को पहचान लेते हैं वे इससे सोना निकालने में सफल होते हैं। यह सोना निकलता है विभिन्न फलों और अनाज के रूप में। बांसवाड़ा के किसान दिग्पाल सिंह ने भी कुछ ऐसा ही किया। उन्होंने मृदा संरक्षण का फंडा अपनाया। नकारा पड़ी जमीन की ताकत को समझा और उस पर बगीचे लगा दिए। मिट्टी की प्रवृत्ति के अनुरूप लगाए गए पौधों से जब फल प्राप्त होना शुरू हुआ तो फिर काम चलता ही गया। इसके बाद उन्होंने नर्सरी स्थापित की और मधुमक्खी पालन के साथ ही पशुपालन को भी अपना लिया। एक साथ किए गए नए प्रयोगों की वजह से उन्हें राज्य-स्तरीय किसान श्री सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्होंने जन-प्रतिनिधि के रूप में भी सम्मान प्राप्त किए।जिन लोगों में कुछ कर गुजरने का जज़्बा होता है, उनकी राह में चाहे जितनी भी बाधाएं आए, वे किसी न किसी रूप में हटती चली जाती हैं। जिन किसानों ने हरित क्रांति की नब्ज को पकड़ा, आज वे खेती के जरिए विकास की नई कहानी लिख रहे हैं। ऐसे किसानों के साथ केंद्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न योजनाएं भी खड़ी नजर आईं। इन योजनाओं का लाभ लेकर ये किसान आज अपने-अपने इलाके में मिसाल कायम किए हुए हैं। ऐसे प्रगतिशील किसान न सिर्फ आर्थिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं बल्कि समाज भी उन्हें अपना मार्गदर्शक मानता है। सरकार की कोई भी योजना बनती है तो उन किसानों की भी राय ली जाती है। इन प्रगतिशील किसानों की राय के अनुरूप चलने के लिए सरकार विवश होती है। लेकिन ऐसा रुतबा हासिल करने के लिए पहले कुछ करके दिखाना होता है।

कुछ ऐसा ही कर दिखाया है राजस्थान बांसवाड़ा जिले के किसान दिग्पाल सिंह सिसोदिया ने। मृदा संरक्षण के क्षेत्र में किए गए कई नवाचार के कारण ही इन्हें सरकार की ओर से सम्मानित भी किया गया। इन्होंने हरित क्रांति के सपने को न सिर्फ साकार किया बल्कि अनुपयोगी मिट्टी को सोना उगलने के काबिल बना दिया। यह सब कुछ साकार हुआ हरित क्रांति के साथ ही कृषि, उद्यानिकी और पशुपालन को एक धागे में पिरोने से। समयानुकूल फसल चयन और वैज्ञानिकों के हर सवाल को गंभीरता से स्वीकार करने से। आज इस इलाके में दिग्पाल सिंह की कामयाबी को देखते हुए दूसरे लोग भी नए-नए प्रयोग कर रहे हैं।

राज्य सरकार अपनी विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों से इस इलाके के किसानों के खेत-खलिहानों को समृद्ध बनाकर खुशहाली लाने के लिए जुटी हुई है। खेती-बाड़ी और पशुपालन के जरिए विकास की नई-नई विधाओं और वैज्ञानिक विधियों के साथ शासन की योजनाओं का मेल कृषि क्षेत्र में तरक्की के तराने सुना रहा है। राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ हासिल कर बांसवाड़ा जिले की गढ़ी पंचायत समिति के मेतवाला के किसान दिग्पाल सिंह सिसोदिया ने जो रास्ता दिखाया, अब उसी राह पर इलाके के तमाम किसान चल पड़े हैं।

अब दिग्पाल सिंह की भूमिका सिर्फ एक प्रगतिशील किसान की नहीं है बल्कि उन्हें एक मार्गदर्शक भी माना जाने लगा है। राज्य-स्तरीय कृषक सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कृषक श्री पुरस्कार से सम्मानित कर उनका मान बढ़ाया। आमदनी बढ़ी तो उन्होंने कृषि संसाधनों से भी खुद को सुसज्जित करना शुरू किया। पहले ट्रैक्टर खरीदा और फिर सीड कम फर्टिलाइजर ड्रील मशीन, डस्टर, कल्टिवेटर, डिस्क प्लो, डिस्क हेरो, पेडलर, पॉवरचलित गन्ना कोल्हू, पॉवरचलित स्प्रेयर, नेपसेक स्प्रेयर, तीन विद्युतीकृत कुएं आदि की भी व्यवस्था कर ली। यानी कृषि संबंधी सभी सुविधाएं उनके पास मौजूद हैं। दिग्पाल सिंह को यह संतोष है कि वे नौकरी नहीं किए, लेकिन अपने परिवार को हर तरह की सुविधाएं मुहैया कराने में कामयाब हैं। उन्होंने कामयाबी का जो ऐतिहासिक सफर तय किया है वह अपने बगीचों से प्राप्त आय के बूते ही किया है।

खेती-बाड़ी से शुरुआत


दिग्पाल सिंह के पास करीब 12 हेक्टेयर कृषि भूमि है। इस भूमि पर उनके परिवार के लोग परंपरागत तरीके से खेती करते आए हैं, लेकिन कुछ खास मुनाफा हुआ हो, इसके बारे में दिग्पाल को ठीक से याद नहीं है। वे बताते हैं कि खेती होते तो बचपन से देखता आया हूं, लेकिन परंपरागत तरीके अपनाए जाने के कारण इसमें कोई खास फायदा नहीं मिलता था। बस परिवार को खानेभर का अनाज मिल जाता था। जीविका चल रही थी।

वर्ष 1976 में जीव विज्ञान विषय में स्नातक की डिग्री ली। उस समय नौकरी के लिए तमाम विकल्प थे, लेकिन मन नहीं माना। हमने तय किया कि खेती के जरिए ही कुछ ऐसा करूं, जिसे देख कर लोग दंग रह जाएं। इसी उम्मीद के साथ नौकरी के तमाम विकल्पों को ठुकराते हुए खेती में जुट गया। आरंभ में मैं परंपरागत कृषि से उत्पादन लेता रहा, लेकिन अपेक्षित लाभ नजर नहीं आया। इस पर कुछ नया करने और आय के बहुआयामी स्रोत विकसित करने का मन बनाया।

इसी दौरान कृषि एवं उद्यान विभाग के अधिकारियों/कर्मचारियों के संपर्क में आया। विभाग की ओर से दिए गए निर्देशों को आत्मसात करने लगा। सरकारी नीतियों के अनुरूप खेती करने से परंपरागत खेती की अपेक्षा ज्यादा लाभ होने लगा। इससे विभाग की योजनाओं पर विश्वास बढ़ा और लगा कि यदि वैज्ञानिक तरीके से खेती करूं तो अपनी मंजिल मिल सकती है।

विभिन्न राज्यों में देखा खेती का तरीका


उद्यान विभाग के माध्यम से संचालित अंतर्राज्यीय कृषक भ्रमण कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला। इस कार्यक्रम के तहत कृषक दल को गुजरात एवं महाराष्ट्र राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण कराया गया था। वहां की उन्नत खेती और समृद्ध किसानों से बातचीत करके उनके द्वारा अपनाई जा रही विभिन्न बारीकियों को खुद के फार्म पर अपनाने की कोशिश की। दिग्पाल बताते हैं कि इस भ्रमण कार्यक्रम ने हौसला बढ़ाया और कुछ अलग करने की ललक पैदा हुई।

ऐसा लगा कि हमारे पास सब कुछ मौजूद है, लेकिन हम कर नहीं पा रहे हैं। विभिन्न स्थानों के प्रगतिशील किसानों से संपर्क बढ़ा तो मंजिल नजदीक दिखने लगी। इसके बाद हमने भी वही तरीका अपनाया, जो दूसरे स्थानों के प्रगतिशील किसान अपना रहे हैं। जैसे मिट्टी को उर्वर कैसे बनाए रखा जाए? मिट्टी का संरक्षण कैसे किया जाए? कितनी रासायनिक खाद का प्रयोग किया जाए? आदि तमाम बातें थीं, जिनके बारे में जानकारी मिली तो कुछ ही दिनों बाद फायदा भी मिलने लगा।

मिट्टी संरक्षण से शुरू हुई नई पहल


कृषि विकास की दिशा में नए कदम रखते हुए हमने सबसे पहले मिट्टी के संरक्षण पर ध्यान दिया। विभिन्न स्थानों पर भ्रमण के दौरान भी मिट्टी संरक्षण के तरीके सीखे। कृषि विभाग, उद्यान विभाग एवं कृषि विश्वविद्यालयों के कृषि वैज्ञानिकों से यह सीखा कि किस तरह से मिट्टी का संरक्षण किया जाए। चूंकि मैं साइंस का विद्यार्थी था। इस बात से वाकिफ था कि किसी भी तत्व का अधिक प्रयोग किया जाना फायदेमंद नहीं हो सकता, उल्टे नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। जैसे आजकल रासायनिक खाद का प्रयोग जमकर किया जाता है।

रासायनिक खाद का ज्यादा प्रयोग करके हम अपनी फसल को फायदा तो नहीं दे पाते हैं, उल्टे मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है। इसका दोहरा नुकसान हमें उठाना पड़ता है। यही वजह थी कि हमने हमेशा ही संतुलित उर्वरक प्रयोग पर ध्यान दिया। इससे हमारा पैसा भी कम खर्च हुआ और मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित नहीं हुई। दिग्पाल बताते हैं कि उन्होंने खाद के मामले में पुराना फंडा अपनाया। जब रासायनिक खाद नहीं थी तो कंपोस्ट खाद का ही प्रयोग किया जाता था।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन ने दिखाई राह


भ्रमण के दौरान राष्ट्रीय बागवानी मिशन के बारे में जानकारी मिली। हमें लगा कि परंपरागत खेती तो वर्षों से करते आ रहे हैं, क्यों न एक बार बागवानी में आजमाइश की जाए। इसी उद्देश्य को लेकर उद्यान विभाग के कृषि पर्यवेक्षक एवं क्षेत्र के सहायक कृषि अधिकारी से संपर्क कर बगीचा लगाने के लिए तकनीकी मार्गदर्शन लिया। उद्यान विभाग द्वारा संचालित राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत लाभ लेने के लिए आवेदन किया। विभाग की ओर से पूरी तरह से सहयोग मिला और कुछ दिन बाद ही एक बगीचे की स्थापना की गई। हमने तय किया कि इस बगीचे को इस तरह से संवारूंगा कि लोग देखते ही रह जाएंगे।

विभाग की ओर से लगातार मिले सहयोग का नतीजा था कि मेरा बगीचा मेरी मंशा के अनुरूप संवरने लगा। कुछ ही दिन में यह बगीचा बांसवाड़ा ही नहीं आसपास के जिलों के लिए भी दर्शनीय बन गया। जो भी मेरे बगीचे के बारे में सुनता, इसे देखने जरूर आता। आमतौर पर लोग एक ही फल के बगीचे लगाते हैं, लेकिन हमने बहुप्रयोग किया। एक ही बगीचे में आम, चीकू, संतरा, अमरूद, कटहल, नींबू के पौधे लगवाए। हालांकि जमीन थोड़ी ज्यादा खर्च हुई क्योंकि सुनियोजित खंड बनाकर पौधों से पौधों की दूरी विभागीय मापदंडानुसार रखनी पड़ी, लेकिन इसका फायदा यह हुआ कि एक खंड की फसल खत्म होती थी तो दूसरे खंड की फसल तैयार हो जाती थी। इससे फसल तुड़ाई से लेकर निराई-गुड़ाई और उसकी देखरेख का जो खर्च आया वह भार नहीं लगा। कुछ समय बाद ही बगीचे से आमदनी होने लगी। इस तरह बगीचे पर होने वाला खर्च बगीचे से ही निकलने लगा।

नकारा भूमि हुई आबाद


दिग्पाल सिंह बताते हैं कि उन्होंने बगीचे ऐसी भूमि पर लगाए, जो नकारा थी। वह बताते हैं कि उनके पास करीब 7.5 हेक्टेयर ऐसी भूमि थी, जिस पर खेती नहीं होती थी। हमने तय किया कि इस भूमि पर खेती के बजाय बगीचे लगाएंगे। इससे दो फायदे हुए। एक तो बारिश के दिनों में अनायास बहने वाले पानी का प्रयोग होने लगा। दूसरे पानी के साथ बहने वाली मिट्टी भी रुकने लगी क्योंकि बाग लगने से पौधों की जड़ों ने मिट्टी को पकड़ लिया। मिट्टी के तत्व पौधों को मिलने लगे। इस तरह नकारा पड़ी भूमि हमारे काम आई। इस तरह ऐसी भूमि पर फलों के बगीचे लहलहाने लगे जहां पहले कोई फसल तक नहीं हो पाती थी। स्थिति यह है कि अब इन बगीचों से प्रतिवर्ष करीब आठ लाख रुपये की आय हो रही है।

पूरा परिवार खुशहाल


फलों की खेती करने वाले दिग्पाल सिंह का पूरा परिवार आज खुशहाल है। अब उन्हें इस बात का जरा भी दुख नहीं है कि उन्होंने तमाम नौकरियां ठुकरा दी थी। वह बताते हैं कि उनके एक पुत्र और तीन पुत्रियां भी खेती-बाड़ी के काम में मदद कर रहे हैं। बगीचों के फलों से आयी खुशहाली की बदौलत उनकी तीनों संतानों को उच्च-स्तर की शिक्षा पाने का फल मिला, वहीं पुत्र तकनीकी शिक्षा में दक्ष हुआ। पूरी तरह कृषि पर निर्भर होने के बावजूद प्रयोगधर्मी और प्रगतिशील काश्तकार होने की वजह से दिग्पाल सिंह ने नई तकनीकों और वैज्ञानिकों की राय के अनुसार अपनी खेती की दिशाएं तय की और आज वे पूरी संपन्नता के साथ खुशहाल जीवन जी रहे हैं।

नर्सरी भी स्थापित की


दिग्पाल सिंह ने करीब 6 हेक्टेयर भूमि में उद्यान विभाग द्वारा अनुदान का लाभ उठाकर सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों (ड्रिप संयंत्र एवं फव्वारा संयंत्र) की स्थापना की। इसके साथ ही उन्होंने फार्म पर 0.50 हेक्टेयर क्षेत्रफल में छोटी नर्सरी भी स्थापित कर रखी है, जहां वे विभिन्न प्रकार के फलों के पौधे तैयार कर क्षेत्र के कृषकों को विक्रय कर अच्छी आय प्राप्त करते रहे हैं। उनके फार्म में उत्पादित उन्नत पौध की स्थानीय स्तर के साथ ही दूर-दूर तक मांग बनी रहती है।

औषधीय पौधों और मसालों की भी खेती


खेती-बाड़ी में नवाचारों और विविधताओं को अपनाने में दिग्पाल सिंह का कोई सानी नहीं है। उनके बगीचों में फलों के साथ-साथ औषधीय पौधों में सफेद मूसली एवं अश्वगंधा तथा मसालों में लहसुन, प्याज, मिर्च, धनिया आदि का भी नियमित उत्पादन लिया जाता रहा है।

कंपोस्ट के लिए पशुपालन का फंडा


बगीचे के बाद दिग्पाल ने पशुपालन को भी अपनाया। क्योंकि उनका आगे का प्रयोग था खेती में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग खत्म करना। अब उन्हें कंपोस्ट खाद की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने पशुपालन का रास्ता चुना। इससे उन्हें दूध तो मिला ही, साथ ही गोबर की खाद भी मिलने लगी। उन्होंने पशुपालन की आधुनिकतम विधियों का प्रयोग करते हुए अपनी डेयरी गतिविधियों के माध्यम से अच्छा दुग्ध उत्पादन लेकर अतिरिक्त आय का सृजन किया है।

जैविक खेती को भी अपनाया


दिग्पाल सिंह ने अपने फार्म पर जैविक खेती को भी अपना रखा है। इसके लिए उनके बगीचों में नेडेप कंपोस्ट एवं वर्मी कंपोस्ट इकाइयों की स्थापना कर रखी है जिनसे उत्पादित जैविक खाद का वे अपने बगीचों में फल, सब्जियों, मसाला-फसलों एवं अन्य कृषि फसलों में उपयोग करते रहे हैं।

मधुमक्खी पालन भी


बगीचे स्थापित होने के बाद उन्हें बताया गया कि वे बगीचों से फल लेने के साथ ही शहद भी हासिल कर सकते हैं। इसके लिए दिग्पाल ने ट्रेनिंग ली और फिर उद्यान विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन से उन्होंने मधुमक्खी पालन को भी अपना रखा है। इससे शहद तो मिलता ही है साथ ही बगीचे में परागण की प्रक्रिया भी काफी तेज होती है। यानी बगीचे को भी फायदा और काश्तकार को भी फायदा मिल रहा है।

मिट्टी ने दिलाया सम्मान


दिग्पाल सिंह बताते हैं कि हमने मिट्टी का सम्मान किया और आज मिट्टी की बदौलत हमें सम्मान मिल रहा है। हमने मिट्टी की ताकत को समझा। उद्यान विभाग के बताए मार्ग को अपनाया, जिसकी वजह से मिट्टी से सोना निकलना शुरू हुआ। बंजर भूमि वर्षों से पड़ी थी। उसकी ताकत क्षीण हो रही थी, लेकिन जब हमने उसी मिट्टी में बगीचा लगा दिया तो वह मेरे जीवन-स्तर को सुधारने में मील का पत्थर साबित हुआ है। यही नहीं इस बगीचे की स्थापना के बाद मुझे सम्मानजनक कृषकों में गिना जाने लगा।

दिग्पाल सिंह बताते हैं कि प्रगतिशील किसान के रूप में जो मेरी छवि बनी, उसी की बदौलत बाद में मुझे राजनीतिक लाभ भी मिला चूंकि मैंने खेती में नया प्रयोग किया था। तमाम किसानों का मार्गदर्शन किया। लोगों को बताया कि किस तरह से खेती को फायदे का सौदा बनाया जा सकता है। किस तरह से मिट्टी से सोना निकाला जा सकता है। इससे लोगों का मेरे प्रति विश्वास बढ़ा। गांव के लोगों ने मुझे सरपंच के पद से नवाजा। इस पद पर रहते हुए मैंने विकास के तमाम कार्य किए। लोगों ने जिस विश्वास से जिम्मेदारी सौंपी थी, उसे पूरा किया।

इसके बाद इलाके के लोगों ने पंचायत समिति गढ़ी का उपप्रधान चुना। इस पद पर भी पूरी ईमानदारी से कार्य किया। अब पूरे जिले के लोग मुझे जानते हैं और यह मानते हैं कि यदि खेती में मैं कोई नया प्रयोग कर रहा हूं तो उसके सफल होने में कोई रुकावट नहीं आ सकती है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
ई-मेल : rghs.sharma91@gmail.com