मूर्ति विसर्जन पर रोक का विरोध कितना उचित

Author:अरुण तिवारी
दुर्गापूजा प. बंगाल का पर्व है। वाराणसी, फैजाबाद, इलाहाबाद, कानपुर आदि कुछ चुनिंदा शहरों में कुछ बंगाली परिवारों के रहने के कारण यह पर्व अवश्य काफी लंबे समय से इस समुदाय विशेष द्वारा मनाया जाता है। जिस तरह महाराष्ट्र में गणपति पूजा, गुजरात से डांडिया छाता जा रहा है उसी तरह बंगाल से निकल कर दुर्गापूजा भी अब पूरे भारत का उत्सव बन गया है। यह भारतीय संस्कृति का एक अच्छा गुण ही है। लेकिन इससे मूर्ति विसर्जन की संख्या व चमक-दमक में जितनी तेजी से वृद्धि हो रही है, उसे देखते हुए अब जरूरी है कि मूर्तियों को प्राकृतिक बनाने और मूर्तियों के विसर्जन से नदियों की प्रकृति बचाने का यह आदेश अब और आगे बढ़ें। इसी से हमारी आस्था भी बचेगी और नदियां भी। इलाहाबाद नगरीय दुर्गा पूजा प्रतिमाओं को इस वर्ष गंगा-यमुना में मूर्ति विसर्जन की छूट के हाईकोर्ट के आदेश से भले ही स्थानीय बारवड़ियों को राहत महसूस हो रही हो, लेकिन यह राहत की बात है नहीं। गंगा और यमुना को प्रदूषित करने का जितना बड़ा कलंक खासकर उत्तर प्रदेश के माथे पर पहले से ही है, इसे देखते हुए तो कतई नहीं। इलाहाबाद की गंगा-यमुना में प्रतिमा विसर्जन पर एक वर्ष पहले 2012 में लगी इस रोक को लेकर इलाहाबाद प्रशासन व उत्तर प्रदेश शासन ने पिछले एक वर्ष के दौरान जो उपेक्षित भाव प्रदर्शित किया है, वह तो कतई राहत देने वाला नहीं है। आदेश के इस उजले पक्ष को देखते हुए भी गंगा-यमुना के धर्म समाज ने आस्था पर चोट का जो तर्क पेश किया है; राहत की बात यह भी नहीं है।

प्रशासन ने लगातार की मूल आदेश की अनदेखी


उल्लेखनीय है कि इको ग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन (याचिका संख्या-41310) ने वर्ष 2010 में यमुना के सरस्वती घाट पर मूर्ति विसर्जन पर रोक का अनुरोध किया था। मूर्तियों से होने वाले प्रदूषण संबंधी पेश तथ्यों को महत्वपूर्ण मानते हुए इस याचिका को गंगा प्रदूषण संबंधी दायर एक पूर्व याचिका (4003/2006) में जोड़ दिया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इलाहाबाद में गंगा और यमुना.. दोनों में मूर्ति विसर्जन पर वर्ष-2012 में ही रोक लगा दी थी। उसने इलाहाबाद प्रशासन और विकास प्राधिकरण की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित की थी कि वह वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था कर कोर्ट को सूचित करे। प्रशासन ने समय की कमी का रोना रोते हुए पिछले वर्ष भी यह छूट हासिल की थी कि वह अगले वर्ष वैकल्पिक व्यवस्था कर लेगा। छह नवंबर, 2012 के बाद से हाईकोर्ट द्वारा इलाहाबाद प्रशासन को बार-बार चेताया। बावजूद इसके इलाहाबाद प्रशासन साल भर सोता रहा। कोर्ट की तारीखों पर वह रास्ते तलाशता रहा कि कोर्ट मूर्ति को एक बार नदी में विसर्जित कर तुरंत निकाल देने की अनुमति दे दी। संपर्क में आते ही मूर्ति के पेंट आदि का प्रदूषण नदी में चला जाता है। इस बिना पर कोर्ट ने इसकी इजाजत नहीं दी। प्रशासन ने यह भी हलफनामा दाखिल किया कि उसने स्थानीय दुर्गा पूजा समितियों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया है कि आगे से वे नदियों के लिए नुकसानदेह सिंथेटिक पेंट और प्लास्टर ऑफ पेरिस की जगह मूर्ति निर्माण में प्राकृतिक रंग और रुई आदि का प्रयोग करेंगे। कोर्ट ने नुकसानदेह सामग्री का इस्तेमाल किए जाने पर सजा की भी बात कही। क्या यह हुआ?

प्रशासन ने कोर्ट को यह भी बताया कि उसने सोरांव, करछना, फूलपुर और सदर तहसील उपजिलाधिकारियों को शहर के 10 किलोमीटर के दायरे में मूर्ति विसर्जन के वैकल्पिक स्थान तलाशने व तद्नुसार व्यवस्था करने के निर्देश जारी कर दिए हैं। हकीक़त यही है कि प्रशासन लगातार झूठ बोलता रहा। पूरे एक वर्ष का समय होने के बावजूद उसने इस बाबत कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया। वह इस बार भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था न कर सका। इस बार वह स्थानीय खुफ़िया रिपोर्ट के आधार पर कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर दिखाकर कोर्ट से छूट हासिल करने में सफल रहा है।

रोक की जरूरत तो हर नदी को


हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि वर्ष 2014 से गंगा-यमुना में मूर्ति विसर्जन पर यह रोक पूरे उत्तर प्रदेश में लागू हो जाएगी। इसके लिए उसने उत्तर प्रदेश को गंगा-यमुना प्रवाह मार्ग के जिलाधिकारियों को आवश्यक निर्देश व आवश्यक धन जारी करने का निर्देश भी उसने उ. प्र. शासन को दे दिया है। 22 नवबंर की अगली सुनवाई पर शासन-प्रशासन फिर पेश होगा; वैकल्पिक व्यवस्था बताएगा। प्रमुख गृह सचिव आर एम श्रीवास्तव का बयान अखबारों में छपा है कि गंगा-यमुना की बजाय अन्य नदियों में मूर्ति विसर्जन के विकल्प पर विचार किया जा रहा है। स्पष्ट है कि स्थानीय प्रशासन व उत्तर प्रदेश के दिल में गंगा और यमुना को राहत देने का कोई संकल्प नहीं है। क्योंकि सच तो यही है कि यमुना समेत उत्तर प्रदेश की शायद ही कोई नदी हो, जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से आकर अंततः गंगा में न मिलती हो। प्रदूषण किसी भी नदी में गिरे, अंततः जाएगा तो वह मां गंगा के गर्भ में ही। प्रदूषित तो वह भी होगी ही। अतः रोक तो सभी नदियों में मूर्ति विसर्जन पर लगनी चाहिए। कोर्ट ने कहा ही है कि प्रदेश भर में कई जगह मूर्ति विसर्जन होता ही है। क्या सभी जगह नदियां हैं? अतः यह कहना कि नदियों में ही मूर्तियों का विसर्जन होगा; गलत है।

आस्था का विरोधाभास


दिलचस्प यह देखना भी है कि पिछले वर्ष जिस बंगाली वेलफेयर एसोसिएशन ने मूर्ति विसर्जन के लिए खुद बोट क्लब व शिवाला घाट जैसे अन्य स्थान सुझाए थे; इस वर्ष इसी बंगाली वेलफेयर एसोसिएशन ने कोर्ट से अनुरोध करते हुए कहा कि वह अपने आदेश पर पुनर्विचार करे और उसे उसके परंपरा के अनुसार मूर्ति विसर्जन करने दे। होना तो यह चाहिए था कि मलीन गंगा में निर्मल मूर्ति का विसर्जन करते-कराते वक्त हमारे पुरोहितों व दुर्गा भक्तों के हाथ स्वतः कांप जाते। हम आदिशक्ति से पूछते- “हे मां! क्या तुझे मलीनता में विसर्जन स्वीकार्य है?’’ किंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि विवादित ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानन्द और बाघम्बर पीठ के नरेन्द्र गीरि ने भी रोक को आस्था पर चोट बताकर मामले को उलझाने की कोशिश की और कुछ हद तक वे सफल भी हो गए हैं।

दिलचस्प है कि मूर्ति स्थापना, पूजन और विसर्जन सनातनी परंपरा है और इसके पक्ष में तर्क वैदिक शास्त्रों से बताए जा रहे हैं। एक मां की मूर्ति की विदाई के लिए एक जीती-जागती मां को मारने की कोशिश को कोई आस्था पर चोट बताए; यह बात मेरी समझ से परे है। याद करने की बात है कि यह वही धर्म समाज है, जो गंगा को कहता तो देवनदी और मां है; लेकिन इनके आश्रमों और घरों के शौचालयों की नालियां गंगाजी में खुलते देख इनकी आस्था पर कभी चोट नहीं पहुँचती। आस्था के नाम पर अदालत के एक निर्मलकारी आदेश का विरोध गंगा की निर्मलता की कोशिशों के विरोध जैसा है। क्या यह समाज को स्वीकार्य है?

नदी में मूर्ति विसर्जन कितना शास्त्रसम्मत?


इस ताजा प्रकरण से उठा एक सवाल यह है कि क्या नदियों में मूर्ति विसर्जन पर रोक से हमारी धार्मिक आस्था पर वाकई कोई चोट पहुंचनी चाहिए? क्या शास्त्रों में कहीं यह उल्लेख है कि मूर्ति का विसर्जन नदियों में ही होना चाहिए? जानकार कहते हैं जल में प्रतिमा विसर्जन का उल्लेख शास्त्रों में भले ही है; लेकिन नदी में विसर्जन को जरूरी बताने वाला उल्लेख आदि सनातनी शास्त्रों में कहीं नहीं है। मुझे याद है कि गंगा सेवा अभियानम् के संरक्षक शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी ने सभी द्वादश ज्योतिषलिंगों में मलीन गंगाजल अर्पण पर रोक लगाते हुए कहा था कि शिव को मल का अर्पण स्वीकार नहीं है। अभी पुरी शंकराचार्य स्वामी निश्छलानंद जी ने भी वृंदावन में प्रतिज्ञा की कि वह राजस्व व विकास के नाम पर गौ-गंगा को विकृत नहीं होने देंगे। फतेहपुर के स्वामी विज्ञानानंद के अलावा कानपुर और चित्रकूट के कई धर्माचार्यों ने तो आदेश आने से पहले ही नदी में मूर्ति विसर्जन पर रोक के अपना संकल्प जता दिया था। कोलकाता की हुगली में से प्रतिमा को डुबकी लगाकर तुरंत बाहर निकालते मैंने 2009 में ही देखा था। पिछले कुंभ में इसी इको ग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन की पहल प्रशासन ने पॉलीथीन मुक्त ‘ग्रीन कुंभ’ की छोटी सी कोशिश की थी। सामाजिक चेतना के ऐसे प्रयासों को धर्मसमाज ही आगे बढ़ा सकता है। वह प्रेरित हो और दूसरों को भी प्रेरित करे। यह कब होगा?

नदी बचाने से ही बचेगी आस्था


ग़ौरतलब तथ्य यह भी है कि दुर्गापूजा प. बंगाल का पर्व है। वाराणसी, फैजाबाद, इलाहाबाद, कानपुर आदि कुछ चुनिंदा शहरों में कुछ बंगाली परिवारों के रहने के कारण यह पर्व अवश्य काफी लंबे समय से इस समुदाय विशेष द्वारा मनाया जाता है। वरना तो 20 वर्ष पहले तक शायद ही उत्तर प्रदेश के किसी अन्य गांव या शहर में आपने में दुर्गामूर्ति विसर्जन की बात सुनी होगी। रामलीला और दशहरा अवश्य जमाने से उत्तर प्रदेश में आबाद रहे हैं। जिस तरह महाराष्ट्र से निकलकर ‘गणपति बप्पा मौर्या’ की गूंज और मूर्ति विसर्जन पूरे देश में फैल रही है; गुजरात की गलियों से निकलकर डांडिया छाता जा रहा है; उसी तरह दुर्गापूजा भी अब पूरे उत्तर भारत का उत्सव बन गया है। हालांकि यह भारतीय संस्कृति का एक अच्छा गुण ही है। लेकिन इससे मूर्ति विसर्जन की संख्या व चमक-दमक में जितनी तेजी से वृद्धि हो रही है, उसे देखते हुए अब जरूरी है कि मूर्तियों को प्राकृतिक बनाने और मूर्तियों के विसर्जन से नदियों की प्रकृति बचाने का यह आदेश अब और आगे बढ़ें। इसी से हमारी आस्था भी बचेगी और नदियां भी; वरना ये दोनों तो गईं।

गंगा यमुना नदी में नहीं होगा मूर्ति विसर्जन : मनोज श्रीवास्तव



ईजी ग्लोबल ग्रीन्स संस्था के अध्यक्ष मनोज श्रीवास्तवईजी ग्लोबल ग्रीन्स संस्था के अध्यक्ष मनोज श्रीवास्तव इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना नदी में मूर्ति विसर्जन को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया है संस्था द्वारा 2010 में यमुना संरक्षण के लिए इलाहाबाद में पी.आई.एल. की गई थी। अधिवक्ता सुधांशु श्रीवास्तव ने इस मुद्दे पर बहस कर पहले पॉलीथीन के विसर्जन को प्रतिबंधित कराया फिर मूर्ति विसर्जन को। ग्लोबल ग्रीन्स संस्था पूरी तरह से नदी संरक्षण के लिए समर्पित है। अतः जलीय जीव जन्तु वनस्पति एवं स्वच्छ जल सब को मिल सके यही प्रयास है यह मुद्दा धार्मिक आस्था का नहीं है क्योकि गंगा यमुना जीवनदायनी हैं और पानी का सबसे बड़ी स्रोत है आधे से अधिक आबादी नदियों के पानी पर ही आश्रित हैं। वैज्ञानिक संजय श्रीवास्तव का कहना है कि किसी भी प्रकार के विसर्जन से पानी में प्रदूषण कारक बढ़ जाते हैं और वह पानी पीने एवं नहाने लायक नहीं होता है।

इलाहाबाद में इस फैसले का सभी ओर स्वागत है पर कुछ तथाकथित लोग इसे धार्मिक विद्वेस का रूप देने के लिए न्यायालय के फैसले को धर्म विरूद्ध बता रहे हैं पूजनीय शंकराचार्य एवं अन्य धर्माचार्यों जिन्होंने कुम्भ के समय गंगा के प्रदूषित होने पर मेले के बहिष्कार की बात की थी उसी चरण में गंगा एवं यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए यह सराहनीय फैसला है इसे सभी को मानना चाहिए एवं कोर्ट को ऐसे निणर्य लाने के लिए प्रेरित करना होगा जिससे भारत सरकार एवं राज्य सरकारें हमारी नदियों को बचाने एवं स्वच्छ बनाने का कार्य कर सकें।

याचीकर्ता मनोज श्रीवास्तव, ‘ईजी ग्लोबल ग्रीन्स संस्था’ के अध्यक्ष हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश देखने के लिए डाउनलोड करें।