नामिक किससे करे निवेदन

Author:शेखर पाठक
Source:नैनीताल समाचार, 15 जुलाई 1985
कभी यहाँ वन, वनस्पति, जीव-जन्तु देखने आओगे तो रह लेना हमारी चाख में, लेकिन जिस दिन यह सुनोगे कि लसपालपानी गाड़ और रामगंगा ने नामिक गाँव को काट-काट कर बगा दिया है, उस दिन नेता, अफसर, समाजसेवक या पत्रकार मेरी लाश देखने मत आना!मैं कोई बड़ा नगर-कस्बा या तीर्थ स्थान होता तो आप मेरा नाम जानते या जानने में दिलचस्पी रखते, वहाँ कोई बड़ी दुर्घटना हो गई होती तो तमाम लोगों में मैं जाना जाता, जरा सी मेरा नाम जाना भी जाता है तो मेरी गर्दिशों या पिछड़ेपन के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि रामगंगा के स्रोत प्रदेश में जाते हुए मैं पड़ता हूँ और मेरा नाम ही ग्लेशियर का नाम भी है।

हाँ, मेरा नाम नामिक, मैं हिमालय के हजारों आम गाँवों तथा सैकड़ों दूरस्थ गाँवों में से एक हूँ, जिला पिथौरागढ़ की मुनस्यारी तहसील की गिरगाँव पट्टी का 60 मवासों और 450 जनसंख्या वाला मैं बिचारा गाड़ी सड़क से तो 20 ही किमी. दूर हूँ और रामगंगा के स्रोत प्रदेश की राह का अन्तिम गाँव भी, पर इस देश की आम सुविधाओं से बहुत दूर हूँ।

मैं जनजातीय अवशेषों के साथ जातीय जाले से ग्रस्त हूँ, लेकिन मैं मध्यकालीन गाँव भी नहीं हूँ, कि जाति को आदमी से बड़ा मानने लगूँ, शौका जनजाति के जैमाल और शिल्पकारों के अलावा यहाँ मुख्य रूप से दाणू, भण्डारी, टाकुली और कन्यारी रहते हैं, सबकी गर्दिशें और खुशियाँ एक सी और जुड़ी हुई हैं, मेरे 2-3 बेटे ही नौकरी में हैं, 2-4 रिटायर होंगे, खेती, जानवर, ऊन, जड़ी-बूटी से हम जिन्दा हैं, सरकार की कृपाओं से हम अभी तक अधिकांश बचे हैं, सरकार की कृपाऐं लखनऊ से चल भी गईं तो पिथौरागढ़ नहीं पहुँचती और कुछ पिथौरागढ़ से चल भी गईं तो नामिक जैसे दूर गाड़-गधेरों से घिरे गाँव में नहीं ही पहुँच पाती हैं।

मैं भी खेती बाड़ी से जुड़ा हूँ जो अब कीड़ेदार हो गई है, जब से भोपाल में कीड़े मारने के कारखाने ने आदमी मार दिये, मुझे अपनी फसल के बचने की उम्मीद नहीं होती। पाँच साल से फसल उगते ही चौपट हो जाती है, खेत ऐसे जैसे कुछ बोया ही नहीं, 20 किलोमीटर दूर से सरकारी गल्ला अपनी पीठ में मेरे बेटे-बेटियों को लाना पड़ता है, कभी तो यह भी लगता है कि ‘विकास गुरू’ पैदल नहीं चल सकते। जिन्दा तो रहना ही ठहरा। ऊन, जड़ी-बूटी और रिंगाल से काम चलाते हैं, कुछ बनाओ, फिर बेचने नीचे जाओ और किसी के हाथों ठगे जाओ, सरकारी दाणे खरीदने के लिए कुछ कमा सके तो अपने घट में पीस लेते हैं, पानी खूब है, सरकारी नल से मेरे धारे में ज्यादा ठीक आता है। यह पानी पीसता भी है और काटता भी है। कभी-कभी लगता है एक दिन मुझको यह पानी ही खा जायेगा। एक ओर से रामगंगा मुझे काट रही और दूसरी ओर से लसपाल पानी गाड़ है जो मुझे बगा रही है। जब ये दोनों औतरती हैं तो मेरे प्राण खतरे में पड़ जाते हैं।

सरकार की उधार देने की किरपा नामिक भी पहुँची, लेकिन साहबों ने हरेक से दो-दो सौ रूपये हड़का लिये। मैं परेशान रहा कि ये रूपये इनको पचेंगे! पार साल अस्कोट-आराकोट अभियान वालों ने कन्फर्म किया कि ये तो पूरे देश को पचा रहे हैं, मैं तो यहाँ तक सोच गया कि अपने गेहूँ बिकाने के लिए सरकार उधार देती है, मेरी इस बात को बगल के गाँव कीमू, जो जिला अल्मोड़ा का है, ने भी सही माना, पॉलीटिक्स वाले यहाँ आने वाले नहीं ठहरे। हम तो प्रजातंत्र के ताल की बूँद तो अलग ‘कच्यार’ भी नहीं समझे जाते हैं महाराज! ऐसे में अगर कुछ लोग चकती बना कर ही चुप रहते हैं तो क्या करें। आन्दोलन करते तो गुस्सा होने की बात थी। आन्दोलन के कितने विषय हैं यह आप हमारे सभापति बलवन्त सिंह कन्यारी और पोस्ट मास्टर पोखर सिंह भण्डारी से पूछ लो।

अस्पताल नहीं है, अनेक गाँवों की तरह यहाँ भी मरने से संकट पैदा नहीं होता, अगर कोई बीमार हो गया तो सौभाग्य से हमें सिर्फ 30 किमी. दूर तेजम जाना पड़ता है, जहाँ कम्पाउण्डर के हाथ पड़ जाने का सौभाग्य हमें कम ही मिलता है, जानवरों का अस्पताल भी 27 किमी. दूर घणमणा में है, गाँव में ले देकर एक पोस्ट ऑफिस तथा एक प्राइमरी स्कूल है, 2 मास्टर जी लोग, 30 लड़को और 12 लड़कियों को ब्याव लगाते हैं, एम मास्साप तो किच्छा से आये हैं, उनका बच्चा भी उनके साथ हैं, वर्ना छनचरिया मास्टर तो गाँव की ही गत खराब कर देते हैं, कोई पाँच पास हो गया तो उसे 18 किमी. दूर बिर्थी मिडिल स्कूल जाना पड़ता है। कोई वहाँ से भी पास हो गया तो उसे 25 किमी. दूर फूली हाईस्कूल ही नजदीक ठहरा, एक बात कान में कहूँ ? इतने साल की आजादी और विकास के बाद भी गाँव में कोई ग्रेजुएट नहीं हुआ। दो लड़के इन्टर, 4 हाईस्कूल है और लड़कियों को तो पाँच के आगे जैसे मना हो, गाँव में मिडिल होता तो क्या नहीं पढ़ती?

बहुत बखत बाघ ने हमारे जानवर और बकरियाँ खा दीं, किससे कहें ? सुना कि पर्यावरण के कानून बाघ के पक्ष में है, वह चाहे तो दो-चार हाथ आदमी को मार दे, सभ्य लोगों को हानि होने पर ‘मुआवजा’ मिलता है करके सुना। हमारे गाँव में शायद दूर होने से यह नहीं आ पाता होगा, पेशाब की बीमारी से बहुत परेशान रहे लोग, फिर अपने आप ठीक हो गई। ज्यादा आलू खाने से तो नहीं होता है ऐसा? फिर भी मेरे लोग उत्सव प्रिय हैं। वे गाते-गाते भी गाते हैं, डिगर सिंह मिट्टी के खिलौने बनाता है गजब के, सभी चाँचरी गाते हैं, ‘छोड़ि दे भिना मेरि धपेली’, खुशाल सिंह तो बाँसुरी बजाता है ऐसी कि सब भूल जाओगे और इस सब में माँ-बेटियाँ भी पीछे नहीं रहती हैं। नाचने-गाने से गर्दिश भूली ही तो जाती है हल तो नहीं होती, मन में दुर-दुर होती रहती है कि अहा! सड़क बन जाती, स्कूल मिडिल हो जाता, भूमि कटान रूक जाता, पुल बन जाता, अस्पताल हो जाता, नामिक गल की राह में बंगला बन जाता, विधवा हरूली देवी टाकुली को पेंशन मिल जाती। खेतों को दवा मिल जाती। बाघ को डरा दिया जाता। पर ये तो मनसूबे ही ठहरे।

मैं शेरसिंह, पोखर सिंह, कल्याण, रूप राम, धरम राम, दीवान, मानसिंह, जैमाल, हरूली, पनूली की ओर से कहूँगा कि कभी नामिक गल जाते हुए आ जाना नामिक। दूध, मट्ठा पी जाना या कभी यहाँ वन, वनस्पति, जीव-जन्तु देखने आओगे तो रह लेना हमारी चाख में, लेकिन जिस दिन यह सुनोगे कि लसपालपानी गाड़ और रामगंगा ने नामिक गाँव को काट-काट कर बगा दिया है, उस दिन नेता, अफसर, समाजसेवक या पत्रकार मेरी लाश देखने मत आना!

हाँ मैं नासिक गाँव यह कह रहा हूँ, सीमान्त का सिमटा, पिछड़ा, छोटा गाँव।

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