नदियों को मलीन बनाएगा निर्मल ग्राम का सपना

Author:अरुण तिवारी

आज़ादी के पहले बनारस में जलापूर्ति की पाइप लाइन भी आ गई थी और अस्सी के गंदे नाले को गंगा से जोड़े जाने के घटना पर मदनमोहन मालवीय ने विरोध भी जता दिया था। लेकिन आज़ादी से पहले गंगा व दूसरी नदियों के ज्यादातर शहरों में न जलापूर्ति के लिए कोई पाइप लाइन थी और न सीवर ढोकर ले जाने के लिए। नाले भी सिर्फ बारिश का ही पानी ढोते थे। पीने के पानी के लिए कुंए और हैंडपम्प ही ज्यादा थे। समृद्ध से समृद्ध परिवार भी मोटर से पानी नहीं खींचते थे। जैसे ही जलापूर्ति की लाइनें पहुंची, पानी और बिजली की खपत तेजी से बढ़ गई। इनके पीछे-पीछे फ्लश शौचालयों ने घरों में प्रवेश किया। राजस्व के लालच में सीवर पाइप लाइनें सरकारें ले आईं।

देवालय से पहले शौचालय’ संबंधी नरेन्द्र मोदी के बयान से किस पार्टी को कितना नफा-नुकसान होगा, यह राजनैतिक विश्लेषकों के विश्लेषण का विषय है, लेकिन मैं कह सकता हूं कि यह बयान देकर जाने-अनजाने मोदी ने देवालयों और शौचालयों की जरूरत और प्रभाव पर एक गंभीर बहस का अवसर सुलभ करा दिया है, जिस पर चर्चा जरूरी है।

देवालय बनाम शौचालय


यूं देवालय और शौचालय की तुलना के पक्ष में आप कई तर्क पेश कर सकते हैं। कह सकते हैं कि देवालय और शौचालय... दोनों की श्रेष्ठता की पहली कसौटी स्वच्छता ही है। दोनों ही स्थान विशेष ध्यान की मांग करते हैं। देवालय गए बगैर काम चल सकता है, लेकिन शौचालय गए बगैर... कम से कम शहरी आबादी का तो बिल्कुल नहीं। देवालय अलग-अलग संप्रदायों का विषय है, शौचालय प्रत्येक नागरिक का। अतः यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। कोई कह सकता है कि देव तो सर्वव्यापी हैं। इस दृष्टि से यह पूरी दुनिया ही देवालय है। आस्था मन का विषय है, मंदिर का नहीं; तो देवालयों की क्या जरूरत?

पहले देवता बनाएं, तब देवालयग्रामीण शौचालयों की आवश्यकता पर केन्द्रित इस लेख में और देवालयों के निर्माण को लेकर मैं फिलहाल इतना ही कह सकता हूं कि इस बीच समाज के एक अंग द्वारा आसाराम को ‘गुनाहों का देवता’ करार दिए जाने के बाद एक देवालय के देवता की तस्वीर का फ्रेम जिस तरह चटका है; यह चिन्हित करना ही मुश्किल होता जा रहा है कि कौन सा इबादतगाह देवालय की परिभाषा के अनुरूप है और कौन सा नहीं। बमुश्किल एक पखवाड़ा पहले जिस तरह विवश होकर पंजाब के एक प्रमुख सिख संगठन को शराब, सिगरेट.. आदि नशीले पदार्थों की मौजूदगी वाले घरों/परिसरों में पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब रखे जाने पर पाबंदी लगानी पड़ी, इससे समझ सकते हैं कि देवालय बनाने से पहले जरूरी है इस मन और तन की सफाई। अभी हाल में ही सिख समुदाय के विरुद्ध होने पर अमेरिका के एक पब को पब से श्री गुरु नानक देव जी की तस्वीरें हटानी पड़ी। यह एक सराहनीय कदम है। आवश्यकता इसकी है।

आप कह सकते हैं कि देवालयों को बनाने की नहीं, पहले से मौजूद देवालयों के देवत्व को बचाने की है। अतः पहले देवता बनाएं, तब देवालय। देवालय बनाने से पहले धन, लालच और लिप्सा के असुरालय बन चुके हमारे शिक्षा मंदिरों, व्यावसायिक गृहों और कार्यालयों को नैतिकता, राष्ट्र और मानवधर्म के लिए हम खुद बाध्य करें। मंदिर जाने से ज्यादा जरूरी है कि हम अपने घरों को मंदिर बनाएं। इस 21वीं सदी के दूसरे दशक में भी हम जिस पवन, अग्नि, जल, धरती, तुलसी, धरती, गौ, गंगा, पीपल.. आदि को देवी या देवता कह कर पूजते हैं। जरूरी है कि हम इनकी जान बख्स दें। इन देवालयों को बचाएं और इनके जरिए खुद को भी। यह तभी होगा, जब पहले हम खुद सुधरें।

सवालों के घेरे में गांव-गांव शौचालय


अब जरा शौचालय की बात करें। तर्क देने वाले कह सकते हैं कि शौचालय न होने के कारण करोड़ों आबादी को आज भी खुले में शौच जाना पड़ता है। इससे गंदगी बढ़ती है। खुले में शौच करने के कारण हमारे जलस्रोतों में कोलीफॉर्म बढ़ता है। बीमारियाँ बढ़ती हैं। महिलाओं को शर्मिदंगी का सामना करना पड़ता है। यह देश के लिए शर्म की बात है। अतः शौचालय पहले होने चाहिए, देवालय बाद में। ऐसे कई तर्क सुनने में वाजिब मालूम हो सकते हैं। लेकिन यदि हम आइना रखकर भारत की 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी वाले नए भारत का अक्स देखें, तो हकीक़त इससे जुदा है।

हां, यह सच है कि शहरों की बसावट आज शौचालयों की मांग करती है। लेकिन जब बात पूरे भारत के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कह रहा हो, तो नज़रअंदाज़ भारत के गाँवों की आबादी को भी नहीं कर सकते; खासकर तब, जब निर्मल ग्राम की एक राष्ट्रीय योजना का लक्ष्य हमारे गाँवों में बसी यह 75 फीसदी आबादी ही है। प्रश्न यह है कि यदि आज गाँवों को शौचालयों की इतनी ही जरूरत है, तो ग्रामीण विकास मंत्रालय की निर्मल ग्राम योजना में बांटे शौचालय दिखावटी होकर क्यों रह गए हैं? योजना के तहत निजी शौचालयों के निर्माण में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान जैसे कई और राज्य के ग्रामीण रुचि क्यों नहीं दिखा रहे हैं? मैं इस योजना के तहत बने शौचालयों में बंधी बकरी या भरे हुए भूसे के चित्र खूब दिखा सकता हूं। आखिर कोई तो वजह होगी कि लाख चाहने के बावजूद निर्मल ग्राम योजना केन्द्र सरकार की एक अधूरा सपना होकर रह गई है? बताने वाले वजह ग्रामीणों के अनपढ़ होने को भी बता सकते हैं। बूढ़े कहते हैं कि उन्हें शौचालय में पाखाना साफ नहीं उतरता। गांव की मां जी को शौचालय में घिन आती है।

अधूरे सपने का पूरा सच


वजह कुछ भी हो, भविष्य का संकेत साफ है। निर्मल ग्राम के तहत घर-घर शौचालय का यह सपना आगे चलकर प्रकृति और इसके जीवों की सेहत के लिए एक बड़े खतरे का कारण बनने जा रहा है। अनुपात यह है कि जितने ज्यादा शौचालय, उतनी ज्यादा पानी और बिजली की खपत, उतनी ज्यादा सीवर लाइनें, उतने ज्यादा मल शोधन संयंत्र, उतना ज्यादा कर्ज-खर्च, उतना ज्यादा प्रदूषण और उतनी ज्यादा मरती नदियां, उतने ज्यादा विवाद और नदी और हमारी सेहत सुधारने के नाम पर उतना ज्यादा भ्रष्टाचार। आइये! समझें कि कैसे?

Nirmal Bharat Yatra (Great Wash Yatra)

अतीत के अनुभव


याद करने की बात है कि आज़ादी के पहले बनारस में जलापूर्ति की पाइप लाइन भी आ गई थी और अस्सी के गंदे नाले को गंगा से जोड़े जाने के घटना पर मदनमोहन मालवीय ने विरोध भी जता दिया था। लेकिन आज़ादी से पहले गंगा व दूसरी नदियों के ज्यादातर शहरों में न जलापूर्ति के लिए कोई पाइप लाइन थी और न सीवर ढोकर ले जाने के लिए। नाले भी सिर्फ बारिश का ही पानी ढोते थे। पीने के पानी के लिए कुंए और हैंडपम्प ही ज्यादा थे। समृद्ध से समृद्ध परिवार भी मोटर से पानी नहीं खींचते थे। जैसे ही जलापूर्ति की लाइनें पहुंची, पानी और बिजली की खपत तेजी से बढ़ गई। इनके पीछे-पीछे फ्लश शौचालयों ने घरों में प्रवेश किया। राजस्व के लालच में सीवर पाइप लाइनें सरकारें ले आईं। लोगों ने त्रिकुण्डीय मल शोधन प्रणाली पर आधारित सेप्टिक टैंक तुड़वा दिए। बारिश का पानी ढोने वाले ज्यादातर नाले शौच ढोने लगे। यह शौच आज नदियों की जान की आफ़त बन गया है। भारत में आज कोई ऐसा शहर ऐसा नहीं, जिसके किनारे की नदी का पानी बारह मास पीना तो दूर, स्नान योग्य भी घोषित किया जा सके। देश में कोई एक ऐसी बारहमासी मैदानी नदी नहीं, जिसे मलीन न कहा जा सके। ‘निर्मल ग्राम योजना’ इस मलीनता को और बढ़ायेगी।

भविष्य के खतरे


गाँवों में अभी शौक-शौक में शौचालय पहुंच रहे हैं। बाद में जलापूर्ति और सीवर की पाइप लाइनें पहुँचेगी ही। कचरा भी साथ आएगा ही। दुनिया में हर जगह यही हुआ है। हमारे यहां यह ज्यादा तेजी से आएगा। क्योंकि हमारे पास न मल शोधन पर लगाने को पर्याप्त धन है और न इसे खर्च करने की ईमानदारी। शौचालयों की भारतीय चुनौतियां साफ हैं। परिदृश्य यह है कि हमारे यहां मलशोधन के नाम पर संयंत्र बढ़ रहे हैं। खर्च-कर्ज बढ़ रहा है। कचरा साफ करने का उद्योग बढ़ रहा है। ठेके और पीपीपी बढ़ रहे हैं। नदियों की मलीनता को लेकर विवाद और आंदोलन बढ़ रहे हैं। लेकिन नदी, हम और इसके दूसरे जीव व वनस्पतियों का बीमार होना घट नहीं रहा। अभी शहरों के मल का बोझ हमारी नगरनिगम व पालिकाओं से संभाले नहीं संभल रहा। जो गांव पूरी तरह शौचालयों से जुड़ गए हैं, उनका तालाबों से नाता टूट गया है। गंदा पानी तालाबों में जमा होकर उन्हें बर्बाद कर रहा है। जरा सोचिए! अगर हर गांव-हर घर में शौचालय हो गया, तो हमारी निर्मलता कितनी बचेगी?

खोखले दावे


मलशोधन संयंत्रों से ऊर्जा निर्माण के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। मलशोधन पश्चात शेष शोधित अवजल के पूरे या आधे पुनरुपयोग का दावा करने की हिम्मत तो खैर! कोई संयंत्र जुटा ही नहीं पा रहा। हकीकत यही है। देश में जलीय प्रदूषण व भूजल का संकट पहले ही कम नहीं है, गांव-गांव शौचालय की जिद्द इसे और गहराएगी। कचरा साफ करने वाली कंपनियां इससे मुनाफ़ा कमाएंगी। किंतु इससे गांव आगे चलकर बीमारी के साथ-साथ, पानी के बिल और सीवर के टैक्स में फंसेगा और देश कर्ज में। यह सुनियोजित है और सुनिश्चित भी, लेकिन सुखांत नहीं। विश्वास मानिए! अंततः गांव-गांव शौचालय का नारा एक ऐसा बाजारु कुचक्र साबित होगा, जिससे हम चाहकर भी निकल नहीं सकेंगे। क्या हम-आप यही चाहते हैं?

खुले में शौच का उजला पक्ष


यदि नहीं, तो बयान देने वाले हमारे इन प्रिय नेताओं को कोई हकीक़त से रुबरु कराए। कोई बताए कि खेतों में पहुंचा मानवीय मल खेती को समृद्ध करता है। सोपान जोशी की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘जल मल थल’ इस बारे में कुछ खुलासा करती है। वह बताती है कि खेतों पर पड़ा मानव मल बेकार की वस्तु नहीं है। लद्दाख की जिस ठंडी रेती पर बीज को अंकुरित होने मात्र के लिए जूझना पड़ता है, वहां सिर्फ और सिर्फ मानव मल के बूते ही जमाने तक अन्न का दाना पैदा हो रहा। आज भी जो कुछ थोड़ी-बहुत खेती है, वह खेतों को उपलब्ध हमारे मानव मल के कारण ही है। बंगलुरु के ‘हनी शकर्स‘ आज भी मानव मल को घरों से उठाकर खेतों में ही पहुँचाते हैं।

Toilet Construction in Kotaसच है कि खुले में पड़े शौच के कंपोस्ट में बदलने की अवधि दिनों में है और सीवेज टैंक व पाइप लाइनों में पहुंचे शौच की कंपोस्ट में बदलने की अवधि महीनों में; क्योंकि इनमें कैद मल का संबंध मिट्टी, हवा व प्रकाश से टूट जाता है। इन्हीं से संपर्क में बने रहने के कारण खेतों में पड़ा मानव मल आज भी हमारी बीमारी का उतना बड़ी कारण नहीं है, जितना बड़ा कि शोधन संयंत्रों के बाद हमारी नदियों में पहुंचा मानव मल।

सच यह भी है कि भारत की घूंघट वाली ग्रामीण बहुओं के लिए आज भी खुले में शौच जाना ही घर की चारदीवारी से बाहर निकलने का एकमात्र सर्वसुलभ माध्यम है। महाराष्ट्र समेत देश के कई इलाकों में ‘निर्मल ग्राम’ के उदाहरण यही हैं। यही वह वक्त होता है, जब वे अपने मन व जुबां को कुछ खोल पाती हैं या यूं कहें कि खुले में शौच जाना ही इन्हें हर रोज सामाजिक होने का एक अवसर देता है, वरना सास बनने से पहले तक एक ग्रामीण बहू की जिंदगी में सामाजिक होने के अवसर आज भी कम ही हैं।

निष्कर्ष


रही बात दिन में खुलें में शौच जाने की शर्मिंदगी से बचने की, तो समझ लेने की बात है, हमारे यहां खुले में शौच जाने को खेते, मैदाने, झाड़े या जंगल जाना यूं नहीं कहा जाता था। इनका मतलब ही होता है खेत, झाड़ी या मैदान की ओट में शौचकर्म करना। जहां ये झाड़ी-जंगल बचे हैं, वहां आज भी खुले में शौच जाना हर वक्त सुरक्षित विकल्प है। कहना न होगा कि झाड़ी-जंगलों के साथ-साथ अपनी नैतिकता को पुनजीर्वित करना बेहतर विकल्प है, न कि शौचालय बनाना। जाहिर है कि जरूरत दो संस्कृतियों और पीढ़ियों के बीच के अंतराल और भ्रष्टाचार की बढ़ती खाई को इस तरह पाटने की है, ताकि फिर कोई देवालय.. असुरालय बन न सके और जब हम सार्वजनिक शौचालयों में जाएं, तो वहां बेशर्म जुमले लिखने और सड़ांध के पैदा होने के लिए कोई जगह ही न हो। तब तक इस देश के बहुमत को न शौचालय चाहिए और न देवालय।