नई औद्योगिक नीति एवं पर्यावरण

Author:एस.सी. लाहिरी, कुसुम तिवारी
Source:योजना, जून 1994

क्रियात्मक स्तर पर, उद्योगों पर नियंत्रण के लिये एक जिम्मेदार और सक्षम पर्यावरण प्रबंधन ग्रुप का होना आवश्यक है। राज्य पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड पेशेवर वित्तीय एवं संरचनात्मक सहायता व समर्थन के अभाव में अनुकूलतम स्तर पर कार्य नहीं कर पाते। अतः राज्य पर्यावरण नियंत्रण बोर्डों को मजबूत बनाने की नितांत आवश्यकता है, जिसके लिये विभिन्न विषयों के पेशेवर विद्वानों की नियुक्ति और निर्धारित संरचनात्मक समर्थन की व्यवस्था जरूरी है।

उन्नीसवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के आगमन के साथ-साथ मनुष्य के लिये बेहतर जीवन सुविधाएँ प्रदान करने की दिशा में विश्व तेजी से आगे बढ़ा अर्थात आर्थिक विकास की गति तेज हुई। परन्तु इसके साथ ही, सभी रूपों में प्रकृति की शुद्धता के स्तर में गिरावट भी आनी प्रारम्भ हो गई। विश्व में आज भीड़ बढ़ रही है क्योंकि जनवृद्धि पर प्रभावशाली नियंत्रण नहीं हो पा रहा है जबकि आर्थिक क्रियाओं के बढ़ने से पृथ्वी की सीमित क्षमताओं पर दबाव पड़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप प्रतिव्यक्ति प्राकृतिक सुविधा की उपलब्धि कम हो रही है और आर्थिक वृृद्धि के परोक्ष प्रभाव जनसंख्या के बड़े भाग पर ऐसा असर डाल रहे हैं, कि विकास के सकारात्मक योगदान को भी निष्प्रभावी कर दिया है। ये प्रभाव हैं, भूमि की गुणवत्ता में ह्रास, वायु एवं जल प्रदूषण, प्रदूषण से जुड़ी हुई बीमारियों की बढ़ती संख्या और पशु एवं वनस्पतियों की कई प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद औद्योगिकरण का महत्त्व तेजी से बढ़ा परन्तु उस समय पर्यावरण की अवनति के विषय में लोगों को ज्यादा चेतना नहीं थी। फिर भी कुछ बातों ने राष्ट्रों का ध्यान जैविक सन्तुलन के दबावों में पड़ने वाले प्रभावों की ओर खींचा है। लांस ऐंजिल्स का स्मौग, प्रमुख नदियों जैसे मौसल, एल्क और राइन में जल प्रदूषण एवं मिनामाता (जापान) में पारे द्वारा रासायनिक प्रदूषण राष्ट्रों के ध्यान में आया है।

सन 1972 में स्टाॅकहोम में मानव पर्यावरण पर एक सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें विभिन्न प्रयासों द्वारा पर्यावरण की समस्याओं से जूझने की आवश्यकता पर बल दिया गया। वास्तव में 1970 के दशक से ही पर्यावरण के सम्बन्ध में बढ़ती हुई जागरुकता में संस्कारों को प्रतिरोधात्मक कदम उठाने के लिये बाध्य कर दिया गया है। आज की परिस्थितियों में विकास को प्राप्त करने के साथ-साथ पर्यावरण को भी सुरक्षित रखने के लिये पर्यावरण की सुरक्षा के उपायों को अपनाया जाना जरूरी हो गया है। भारत जैसे विकासशील देश के लिये तो यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है, जहाँ लोगों की बढ़ती हुई आवश्यकताओं व मांग को पूरा करने के लिये औद्योगिक प्रगति अनिवार्य है।

ऐसा देखा गया है कि, औद्योगीकरण ने अछूते क्षेत्रों में जहाँ कि अभी तक कोई उद्योग नहीं लगे थे। औद्योगिक इकाइयों का काफी मात्रा में सकेंद्रण कर दिया है। अभी तक जो क्षेत्र उद्योगों की स्थापना की दृष्टि से ठीक नहीं समझे जाते थे, वे भी अब आधारभूत संरचना के विस्तार के कारण आर्थिक विकास के सम्भावनायुक्त क्षेत्र बन गए हैं। फलस्वरूप ये नए अछूते क्षेत्र भी अब औद्योगीकरण की सम्भावित बुराइयों और दुष्प्रभावों की चपेट में आ रहे हैं। नई नीति में निजीकरण एवं लाभ बढ़ाने पर जोर दिया गया है और लाभदायकता का विचार पर्यावरण की सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं देता। अधिकतर उद्योग, प्रदूषण नियंत्रण के उपायों पर किए जाने वाले खर्च को मात्र पैसे की बर्बादी मानते हैं। भारत में लघु स्तरीय या असंगठित क्षेत्र ही इसके लिये दोषी नहीं हैं। बल्कि अक्सर तो बड़े औद्योगिक घराने ही ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं।

केन्द्र और राज्य सरकारें पर्यावरण की रक्षा के लिये कोष आवंटित करती हैं परन्तु क्रियान्वयन के स्तर पर अनेकों बाधाएँ आ खड़ी होती हैं जैसे- कार्यालयीन उदासीनता, निहित स्वार्थ, कठोर पर्यावरणीय मानक तय कर देना आदि। भारत में वर्तमान प्रदूषण स्तर को देखते हुए इस मानक को प्राप्त कर पाना मुश्किल ही है।नई औद्योगिक नीति के अनुसार, नई औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित करने के लिये क्लीयरेंस देने हेतु अब प्रत्येक स्थिति या केस का मूल्यांकन करने की जरूरत नहीं है। हालाँकि पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन एवं क्लीयरेंस अभी भी विद्यमान है पर यह उतना प्रभावशाली नहीं है। यह पाया गया है कि क्लीयरेंस के बाद प्रदूषण नियंत्रण उपायों को जो सतत निरीक्षण होना चाहिए वह बहुत ही कमजोर है। इसके अलावा पर्यावरण प्रबंधन के क्षेत्र में पेशेवर लोगों की कमी भी एक बाधा है। नई नीति में सुधारों के एकीकृत भाग के रूप में प्रदूषण नियंत्रण को प्रभावशाली ढंग से बढ़ावा नहीं दिया गया।

लगभग सभी क्षेत्रों में विदेशी निवेश को छूट मिलने से बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ तथा अन्य विदेशी निवेशक अब भारत में बहुत सी वस्तुओं का उत्पादन कर सकेंगे, जिनमें से कुछ ऐसी भी होंगी जिन्हें वे अपने देश में उत्पादित नहीं कर सकते क्योंकि वहाँ महँगे व कठोर पर्यावरण नियमन की बाधाएँ हैं। और वहाँ की जनता भी इनके खिलाफ सजग हैं। भोपाल गैस त्रासदी अभी तक लोगों के मस्तिष्क में ताजा है।

भारत में श्रमिकों एवं स्थानीय लोगों को कार्यप्रक्रिया सम्बन्धी उपयोग में लाए जा रहे रसायनों की संकटपूर्ण प्रकृति तथा प्रक्रिया एवं उत्पादों के दुष्प्रभावों की जानकारी उपलब्ध नहीं होती अतः जन समुदाय को स्वास्थ्य सम्बन्धी संकटों से अवगत करायें। श्रम संघों को भी चाहिए कि वे निरन्तर ऐसी अन्तरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय एजेन्सियों पर दबाव डालें, जो औद्योगिक संकटों व प्रदूषण से सम्बन्धित हैं और उनसे ऐसी सूचनाएँ प्राप्त करें जिससे श्रमिकों व जन साधारण के स्वास्थ्य की रक्षा हो सके।

दुर्भाग्य से, अभी तक ऐसे कोई सुनिश्चित एवं दोषरहित तरीके नहीं ढूंढे गए हैं जोकि गैस त्रासदी जैसे आकस्मिक दुर्घटनाओं से निपटने में सहायक हो सकें। हालाँकि ऐसे संयन्त्रों से इन तरीकों की अत्यधिक जरूरत है, पर अभी भी इस ओर विशेष प्रयास नहीं हुए हैं। वास्तव में, इन संयन्त्रों को सम्भावित खतरों से अवगत कराना तथा उन्हें सुरक्षित रहने के उपायों की जानकारी देना कानून अनिवार्य होना चाहिए और इसके क्रियान्वयन को पर्याप्त महत्त्व भी दिया जाना चाहिए। सभी कम्पनियों के लिये यह अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए कि वे अपनी उत्पादन गतिविधियों से जुड़े हुए स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरों से लोगों को सूचित करें। वर्तमान परिस्थितियों में तो यह और भी आवश्यक हो गया है, क्योंकि नई नीति में ज्यादा जोर इसी बात पर है कि वस्तुओं के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाया जाए और विदेशी निवेश के विशाल प्रवाह को प्रोत्साहित किया जाए। आयातित तकनीकों पर आधारित अनेकों औद्योगिक इकाइयाँ अब तक अछूते रहे नए-नए क्षेत्रों में स्थापित की जा रही हैं और इस क्रम में वनों को नष्ट किया जा रहा है, स्थानीय निवासी विस्थापित हो रहे हैं और औद्योगिक प्रदूषण बढ़ रहा है। पावर, रसायन, तेल जैसे उच्च तकनीक वाले उद्योग लग रहे हैं जिससे इन क्षेत्रों का पर्यावरणीय सन्तुलन बहुत अधिक प्रभावित हो रहा है। भारत में वर्तमान में विद्यमान स्थिति के चलते, औद्योगिक वस्तुओं के अधिक उत्पादन से प्रदूषण में वृद्धि ही होगी। विदेशों से आयातित प्रौद्योगिकी के पर्याप्त ज्ञान के अभाव में तथा कमजोर नियंत्रण की वजह से औद्योगिकरण भारतीय जनसंख्या के लिये प्रदूषण का संकट उपस्थित कर देगा।

जहाँ तक नई खनिज नीति का सवाल है, 13 खनिज, जिनमें ताम्बा, सोना, हीरा, सीसा, जिंक, टिन, वोल्फ्राम, मोलीबडेनम आदि शामिल हैं इन्हें आरक्षित श्रेणी से हटा दिया गया है और खनन उद्योग में बड़ी मात्रा में निजी निवेश को अनुमति दी जा रही है। यह जाहिर है कि निजी उद्यमी प्रतियोगिता में बने रहने के लिये अपनी उत्पादन की लागत को नीचे रखना चाहते हैं इसलिये उनके द्वारा पर्यावरण के पहलू पर ध्यान देने की सम्भावना बहुत कम है। पाश्चात्य विश्व में पर्यावरण के नियम बहुत सख्त हैं क्योंकि लोग उसके दुष्प्रभावों के प्रति बहुत सचेत हैं। इन देशों की सरकारों ने यह नीति अपनाई हुई है कि जो उद्यमी प्रदूषण फैलाएगा उसे ही उसके नियंत्रण के लिये व्यय करना पड़ेगा। विकासशील देशों में प्रचलित कमजोर पर्यावरण कानूनों ने भी विदेशी निवेश को एक बड़ी सीमा तक आकर्षित किया है।

नियमित एवं स्थायी विकास


स्थायी विकास एक बहु आयामी अवधारणा है जिसके तीन परस्पर क्रिया करने वाले आयाम हैं। जैविक सन्तुलन, अर्थशास्त्र एवं नीतिशास्त्र। नियमित एवं स्थायी विकास प्राप्त करने के लिये पर्यावरण सुरक्षा, आर्थिक कुशलता एवं सामाजिक क्षमता की दशाओं का होना आवश्यक है।

इसके लिये एक अच्छी साफ सुथरी प्रविधि अपनाने की आवश्यकता है। एक अच्छी साफ सुथरी प्रविधि का अर्थ है वह उत्पादन प्रक्रिया जिसमें कच्चे पदार्थों एवं प्राकृतिक संसाधनों, वायु, जल व भूमि का न्यूनतम उपयोग हो और न्यूनतम कूड़ा-करकट (वेस्ट मैटीरियल) उत्पन्न हो। आज पूरे विश्व में पर्यावरणीय प्रकृतियाँ उद्योगों को पुनः आकार दे रही हैं और साफ-सुथरी हानिरहित प्रविधि के काफी उदाहरण विश्व में देखे जा सकते हैं। भारत जैसे विकासशील सभी देशों को भी अति शीघ्र यह साफ-सुथरी उत्पादन प्रविधि प्राप्त कर लेनी चाहिए।

सुझाव/अनुशंकाएं


भारतीय जनता की बढ़ती हुई आवश्यकताओं को देखते हुए औद्योगिक प्रगति अनिवार्य हो गई है। फिर भी, औद्योगिक विकास के नाम पर बिना किसी सोच विचार के पर्यावरण की अवनति करना अवांछनीय है। सच तो यह है कि औद्योगिक प्रगति एवं औद्योगिक प्रदूषण के कारण उत्पन्न हुए पर्यावरण ह्रास के मध्य सन्तुलन लाना आवश्यक है। भारत में तीव्र गति से औद्योगिक विकास की आवश्यकताओं को देखते हुए आयातित प्रविधि पर आधारित नए उद्योगों को सम्भावनायुक्त नए क्षेत्रों और कृषि अयोग्य, व्यर्थ पड़ी भूमि पर स्थापित करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

इस प्रकार के निवेशों को आकर्षित करने के लिये केन्द्र व राज्य सरकारों को आधारभूत संरचना सम्बन्धी सुविधाएँ प्रदान करनी चाहिए। उन्हें पहुँच मार्ग, भूमि जल, विद्युत तथा आधुनिक संचार, नेटवर्क आदि की सुविधाएँ देनी चाहिए। इसके लिये यातायात, विपणन, एवं संग्रहण सुविधाओं में प्रोत्साहन की व्यवस्था पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। औद्योगिकरण पर विचार करते समय स्थानीय जनसंख्या और उनकी आवश्यकताओं को अलग नहीं किया जा सकता।

क्रियात्मक स्तर पर, उद्योगों पर नियंत्रण के लिये एक जिम्मेदार और सक्षम पर्यावरण प्रबंधन ग्रुप का होना आवश्यक है। राज्य पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड पेशेवर वित्तीय एवं संरचनात्मक सहायता व समर्थन के अभाव में अनुकूलतम स्तर पर कार्य नहीं कर पाते। अतः राज्य पर्यावरण नियंत्रण बोर्डों को मजबूत बनाने की नितांत आवश्यकता है, जिसके लिये विभिन्न विषयों के पेशेवर विद्वानों की नियुक्ति और निर्धारित संरचनात्मक समर्थन की व्यवस्था जरूरी है। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि स्थानीय स्तरों पर बोर्ड के कार्यों का सतत मूल्यांकन, अधिक अधिकार प्राप्त शक्तिशाली स्वतंत्र ग्रुप से कराया जाए ताकि बोर्ड के अधिकारियों की जवाबदेही तय हो सके।

चूँकि भारत में श्रमिकों एवं स्थानीय लोगों को कार्यप्रक्रिया सम्बन्धी उपयोग में लाए जा रहे रसायनों की संकटपूर्ण प्रकृति तथा प्रक्रिया एवं उत्पादों के दुष्प्रभावों की जानकारी उपलब्ध नहीं होती अतः जन समुदाय को स्वास्थ्य सम्बन्धी संकटों से अवगत करायें। श्रम संघों को भी चाहिए कि वे निरन्तर ऐसी अन्तरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय एजेन्सियों पर दबाव डालें, जो औद्योगिक संकटों व प्रदूषण से सम्बन्धित हैं और उनसे ऐसी सूचनाएँ प्राप्त करें जिससे श्रमिकों व जन साधारण के स्वास्थ्य की रक्षा हो सके।

एस.सी. लाहिरी, कुसुम तिवारी, उप सलाहकार योजना आयोग