नये वर्ष में पुरानी सुगबुगाहटें

Author:मार्टिन खोर
Source:सर्वोदय प्रेस सर्विस, 29 जनवरी, 2016

अनेक मामलों में वर्ष 2015 काफी नैराश्य पैदा करने वाला रहा है। पेरिस जलवायु सम्मेलन और नैरोबी विश्व व्यापार संगठन में विकसित देशों का रुखा रवैया साफ दर्शा रहा है कि उन्हें अपने अलावा किसी अन्य की चिन्ता नहीं है। इतना ही नहीं वे विकासशील देशों की एकता को भेदने में कुछ हद तक सफल भी हो गए हैं।

पिछले वर्ष को बिदाई देने के साथ ही नये वर्ष से तमाम उम्मीदें लगा ली गई हैं। हालाँकि पिछला वर्ष पर्यावरण एवं आर्थिक पक्षों को लेकर काफी हलचल भरा था और ऐसा प्रतीत होता है कि वर्ष 2016 भी इससे कमतर नहीं रहेगा। ऐसे लोग जो इस ग्रह को लेकर भावावेश में हैं उनके लिये वर्ष 2015 एक धमाके के साथ समाप्त हुआ। दिसंबर में जलवायु परिवर्तन को लेकर वैश्विक समझौता हुआ तो जरूर लेकिन सम्मेलन के आखिरी दिन जो कुछ हुआ उससे पेरिस सम्मेलन ही संकट में पड़ गया था। अंततः जो समझौता हुआ उसने कमोवेश विकासशील और विकसित दोनों ही देशों को मन मारकर संतुष्ट किया। जी-77, चीन तथा इसी तरह के सोच वाले देश (एलएमसीडी) अपनी माँगों को लेकर दृढ़ बने रहे और अपने अधिकांश बिन्दुओं पर समझौतावादी दृष्टिकोण के चलते उन्हें आधा अधूरा ही मनवा पाए। विकासशील देशों की ओर से मलेशिया ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की, क्योंकि वह एलएमसीडी का प्रवक्ता होने के साथ ही साथ जी-77 देशों और चीन का समन्वयक भी था।

दूसरी ओर अमेरिका और उसके साथी भी अपना रास्ता निकाल ले गए। इस सबका परिणाम एक ऐसे कमजोर समझौते के रूप में सामने आया जिसमें प्रत्येक देश को अपने यहाँ उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य तय करने के बारे में स्वयं ही तय करना था और इस लक्ष्य की पूर्ति न करने पर किसी भी देश पर कार्यवाही का कोई प्रावधान तय नहीं हुआ। यदि सिर्फ पर्यावरणीय परिप्रेक्ष्य से बात करें तो पेरिस समझौते में ऐसा कुछ भी नहीं था जिस पर कि जोर-शोर से बात की जा सके। कुछ लोग तो इस सम्मेलन को पूर्ण असफल मान रहे हैं। तमाम देशों द्वारा ग्रीन हाउस गैसों के संदर्भ में दिए गए वचन इतने अपर्याप्त हैं कि इससे वैश्विक तापमान वृद्धि के 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाने का खतरा पैदा हो रहा है। जबकि पेरिस समझौते के अनुसार वैश्विक जलवायु संकट से बचने के लिये तापमान वृद्धि को 2 डिग्री या 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर रोका जाना चाहिए। वैसे वैश्विक पर्यावरणीय भू-राजनीति की स्थिति के मद्देनजर अनेक देश जिनमें अमेरिका भी शामिल है ‘ऊपर से नीचे’ वाली उस योजना पर राजी नहीं हुए जिसके अन्तर्गत प्रत्येक देश को अपना उत्सर्जन कम करने का लक्ष्य दिया गया था। गौरतलब है 200 देशों को शामिल करने वाले इस समझौते के लिये आम सहमति अनिवार्य है। ऐसे में पेरिस समझौता ऐसा ही मनमारता हुआ समझौता है और जिसके माध्यम से अन्तरराष्ट्रीय सहयोग जारी रह सकता है।

पेरिस सम्मेलन में ‘वैश्विक हिसाब किताब’ जैसी एक प्रणाली भी थी जिसके माध्यम से देश अपने द्वारा दिए गए वचन तक पहुँच सकते हैं और दूसरे देशों द्वारा बेहतर किए जाने से उन्हें प्रोत्साहित करने से लेकर उन पर दबाव भी बना सकते हैं। यह हिसाब किताब इस बात का आकलन भी करेगा कि विकसित देशों ने जिन वित्तीय एवं तकनीकी संसाधनों को विकासशील देशों को मुहैया कराने का आश्वासन दिया है वह समुचित मात्रा में अब तक पहुँच रहे हैं कि नहीं ? यह बात भी सामने आई कि विकसित देशों द्वारा यथोचित धन एवं तकनीक उपलब्ध कराए बिना विकासशील देश जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी अपनी जवाबदेही को ठीक से पूरी नहीं कर पाएँगे। वर्ष 2016 में चुनौती इस बात की है कि किस तरह से दबाव बनाया जाए कि सभी देश जलवायु के सम्बन्ध में सक्रिय हों। खतरा यह है कि समझौते के बाद मिली राहत के चलते स्थिति पुनः पहले जैसी न हो जाए।

वास्तविकता तो यही है कि जलवायु संकट एक यथार्थ है और इस दिशा में तुरन्त कार्यवाही किए जाने की आवश्यकता है। वर्ष 2015 में एक बड़ा पर्यावरणीय मुद्दा ‘धुँध’ का रहा जो कि वास्तव में इंडोनेशिया से उठा गहरा धुआँ है। जिसने मलेशिया और सिंगापुर के अधिकांश हिस्सों के साथ ही साथ सुमात्रा और कालिमंटन को भी अपने आगोश में ले लिया था। इस धुँध को छटने में कई हफ्ते लगे। इस ‘धुँध’ ने लोगों को परेशानी में डाला और यह प्रश्न खड़े किए कि इतने वर्षों बाद भी इंडोनेशिया अपने पौधरोपण पर नियंत्रण सुनिश्चित क्यों नहीं कर पा रहा है जिससे कि वे वनों को जलाना बंद करें। वैसे दिसंबर में इंडोनेशिया की सरकार ने घोषणा की है कि वह 16 फर्मों पर मुकदमा चलाएगी। यह वास्तव में एक अच्छा समाचार है।

यदि आर्थिक मोर्चे की बात करें तो वर्ष 2016 में तकरीबन वही मुद्दे केन्द्र में बने रहेंगे जोकि वर्ष 2015 में भी केन्द्र में थे। उम्मीद है कि तेल की कीमतें कमजोर बनी रहेंगी। क्योंकि ओपेक (पेट्रोलियम निर्यात करने वाले देशों का संगठन) या तो अपने सदस्यों के लिये उत्पादन की सीमा तय कर पाने में असमर्थ है या ऐसा करना ही नहीं चाहता। वैसे तेल की कम कीमतें, तेल आयात करने वाले देशों के लिये फायदे का सौदा है। उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों दोनों के लिये वर्ष 2015 कठिन साबित हुआ है और इस वर्ष उनकी तकलीफें और भी बढ़ने की आशंका है क्योंकि वैश्विक वित्त अनेक तरह से ज्यादा अन्तःनिर्भर होता जा रहा है। इस बात का जोखिम भी बढ़ रहा है कि अन्तरराष्ट्रीय निवेशक विकासशील देशों से अपनी वित्तीय पूँजी बाहर निकाल लेंगे।

यह बात इसलिए विशेष ध्यान देने योग्य है क्योंकि अमेरिका ने इस वर्ष अपनी ब्याज दरों में वृद्धि कर दी है और पूरी सम्भावना है कि वर्ष 2016 में भी यह प्रवृत्ति जारी रहेगी। वर्ष 2015 में मलेशिया में विदेशी फंड (प्रबंधकों) ने वहाँ के अपने बॉड एवं शेयर से स्वयं को अलग कर लिया। यह मानसिकता वर्ष 2016 में भी जारी रह सकती है। वैसे वर्ष 2016 में सबकी निगाहें चीन पर टिकी रहेंगी कि क्या उसकी अर्थव्यवस्था इसी धीमी गति से विकास करेगी और वह अपने व्यापारिक साझेदारों को इसी तरह प्रभावित करती रहेगी ? चीन पर कुछ अन्य कारणों से भी बहुत पैनी निगाह रखी जा रही है। दिसंबर 2015 के अंत में एशियन इंफ्रास्ट्रकचर इन्वेस्टमेंट बैंक को आधिकारिक रूप से प्रारम्भ किया गया। अनुमान है कि वह एक वर्ष में 10 अरब से 13 अरब डाॅलर तक ऋण देगा। अत्यधिक महत्वाकांक्षी चीन की एक नई पहल को ‘वन बेल्ट वन रोड’ के नाम से जाना जाता है। इस महाकाय निवेश योजना को चीन ने वर्ष 2015 में प्रारम्भ किया और उम्मीद है कि इस वर्ष इसे और अधिक जोशोखरोश से क्रियान्वित किया जाएगा। अनेक देश इस व्यापक पहल से लाभ लेने के इच्छुक हैं और हिसाब लगा रहे हैं कि इसमें किस प्रकार शामिल हुआ जाए।

वर्ष 2015 में ट्रांसपेसिफिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (टीपीपीए) अंततः अपने निष्कर्ष पर पहुँच ही गया। टीपीपीए एक विवादास्पद ‘जंतु’ है जिसे कुछ (यानि 21) देशों ने अपनाया है। यह इन सदस्य देशों को ही लाभ पहुँचाएगा। परन्तु अन्य देशों ने इस दस्तावेज को धिक्कारते हुए कहा है कि बड़ी ताकतें इसका इस्तेमाल कमजोर साझेदारों को अपने आधीन या परतंत्र बनाने के लिये करेंगी। इस पर हस्ताक्षर करने के लिये वर्ष 2016 में भी विमर्श के जारी रहने की सम्भावना है।

अंत में इतना ही कि वर्ष 2015 में जो घटनाएँ एवं धारणाएँ स्थापित हुई हैं उनके वर्ष 2016 में भी निरन्तर बने रहने की सम्भावना है। केवल समय ही बता पाएगा कि देशों को इसके प्रभावों से किस हद तक लाभ या हानि पहुँच पाती है।

श्री मार्टिन खोर जेनेवा स्थित साउथ सेन्टर के कार्यकारी निदेशक हैं।