पानी की रिहाई

Author:सुरेश भाई
Source:कादम्बिनी, मई 2019

बरसात के समय मे 90 प्रतिशत आपदाओं का कारण पानी है। दूसरी ओर पानी जीवन का आधार है। वह चाहे नदियों, जल स्रोतों, जलाशयों, बारिश की बूंदों के आदि के रूप में जहां से भी आ रहा हो, इनमें मानसून  के समय मे पानी की मात्रा बढ़ जाती है, लेकिन यही समय है कि जब अधिक-से-अधिक पानी को जमा करके सालभर की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है। मकानों की छतों से बरसात में बहने वाले पानी को पीने के लिए, फैरोसीमेंट टैंक बनाकर जमा किया जा सकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में चाल-खाल बनाकर जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। 

लेकिन पनिबकी चिंता गर्मियों में तब अधिक होने लगती है, जब जल स्रोत सूखने लगती हैं। घरों की पाइप लाइन में पानी नहीं आता है। गर्मियों में कई स्थानों पर लोगों की प्यास बुझाने के लिए गाड़ियों और मालवाहक पशुओं की पीठ पर बस्तियों में पानी पहुंचाया जाता है। कहा जा रहा है कि पूरी दुनिया के हिसाब से हर 10 में से 4 लोगों को पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है, जो मिलता भी है, वह इतना प्रदूषित है कि जिसके कारण 3.4 लाख बच्चे हर साल डायरिया के कारण मर जाते हैं। 

गर्मियां आते ही चारों ओर पानी का संकट शुरू हो जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हम वर्षा जल का समुचित प्रबंधन नहीं कर पाते। जिन पारंपरिक तरीकों से पहले वर्षा जल का प्रबंधन होता था वे नष्ट हो चले हैं। ऐसे में यदि गर्मियों में इस संकट से निपटना है तो सालभर उसकी व्यवस्था करनी होगी।

यूएनओ ने जुलाई, 2010 में हर व्यक्ति को प्रतिदिन 50-100 लीटर पानी दिलाने का अधिकार दिया है। इनके इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि प्रति व्यक्ति के लिए पानी का स्रोत एक कि.मी. से अधिक दूर नहीं होना चाहिए, और वहां पानी एकत्रित करने में 30 मिनट से अधिक का समय न लगे। इसके अनुसार प्रत्येक देश को अपने पानी का बंदोबस्त करने के लिए स्थानीय लोगों की पारंपरिक व्यवस्था को ही मजबूती प्रदान करनी होगी। गांव एवं शहर में पानी के स्रोतों को चिन्हित करके लोक ज्ञान के अनुसार स्थानीय जल प्रणाली के सुधार के लिए मास्टर प्लान तैयार करना चाहिए। इसको कार्यरूप देने के लिए संबंधी विभागों को अपनी चिर-परिचित जल व्यवस्था को छोड़ना पड़ेगा। ठेकेदारों और प्रभावशाली लोगों के दबाव से पानी को मुक्त रखना होगा। 

यह काबिल-ए-गौर है कि देश में पानी की नीति में सबसे पहले पेयजल, इसके बाद सिंचाई और उद्योगों व कारोबारियों को जलापूर्ति करने की प्राथमिकता को स्वीकारा गया है, परंतु इसकी जमीनी हकीकत देखें, तो पानी व्यापारियों के मुनाफे की वस्तु बन गई है। पानी की बर्बादी और जल स्रोतों के विनाश में मानवीय हस्तक्षेप सबसे बड़ा कारण है। दूसरी ओर बारिश के पानी का प्रबंधन व संरक्षण न होने से वह मुद्रित व महासागरों में मिट्टी काटकर ले जा रहा है। 

बरसात के तीन महीनों में ही कुल बारिश का 75 प्रतिशत बरसता है। कहा जाता है कि इसमें से 5 प्रतिशत पानी भी बाकी महीनों के उपयोग के लिए हम इकट्ठा नहीं कर पा रहे हैं। इसी लापरवाही से ही आजादी के बाद प्रति व्यक्ति 74 प्रतिशत पानी की उपलब्धता घट गई है। आंकड़े बताते हैं कि 1947 में 6042 तक घन मीटर पानी प्रति व्यक्ति था, जो 2011 तक 1545 घन मीटर रह गया है। भविष्य में 2025 तक 1340 घन मीटर और 2050 तक 1140 घन मीटर पहुंचने का अनुमान है। ऐसा ही नजारा बनता रहेगा, तो पानी ढूंढने से भी नहीं मिल सकेगा। इस में सत्यता इसलिए भी नजर आती है कि जितना पानी इंसान प्रयोग कर रहा है, उसका 50% भी धरती को शुद्ध रूप में नहीं लौटा रहा है। 

इस बार के मौसम ने सही समय पर पहाड़ों में बर्फ की सफेद चादर बिछा दी। यह पिछले 15-20 वर्षों के बाद की घटना है कि जब पर्वतीय इलाकों की खूबसूरत वादियों में चोटी से घाटी तक बर्फ से लकदक दिखाई दे रही है। इससे सूखते जल स्रोतों को पुनः पंख लग गए हैं

बारिश के पानी को संरक्षित करने की पारंपरिक और वैज्ञानिक तकनीकी है, जिसका इस्तेमाल करके पानी का रोना कम किया जा सकता है। उत्तराखंड में नई तालीम के शिक्षक विहारीलाल जी ने लोक जीवन विकास भारती के द्वारा बनाए गए सैकड़ों तालाबों के साथ पहाड़ों में जल संरचनाओं की बुनियादी रूपरेखाएं प्रस्तुत की हैं और पौड़ी-गढ़वाल के उफरैखाल में सच्चिदानंद भारती ने हजारों तालाबों को जिंदा कर के जल-संरक्षण की एक मिसाल समाज के साथ मिलकर पेश की है। इसी तरह हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान ने जलकुर घाटी में 400 तालाबों का निर्माण किया है। यहां स्थानीय स्थल पर तालाबों को चाल-खाल के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि भारत में अब 1869 अरब घन मीटर के बराबर पानी उपलब्ध है। इसमें से कुल 1123 अरब घन मीटर पानी उपयोग करने लायक है, जिसमें 690 अरब घन मीटर नदियों व जल स्रोतों में है और 433 अरब घन मीटर भूमिगत पानी के रूप में मौजूद है। वर्तमान में नदियों और भूमिगत पानी का अधिकांश भाग प्रदूषित हो चुका है। अतः बरसात के मौसम में पानी जितनी आफत पैदा करता है, यदि उसी समय इसे एकत्रित व संरक्षित करने की व्यवस्था की जाए, तो यह भविष्य की सुख-समृद्धि लौटा सकता है।

इस बार के मौसम ने सही समय पर पहाड़ों में बर्फ की सफेद चादर बिछा दी। यह पिछले 15-20 वर्षों के बाद की घटना है कि जब पर्वतीय इलाकों की खूबसूरत वादियों में चोटी से घाटी तक बर्फ से लकदक दिखाई दे रही है। इससे सूखते जल स्रोतों को पुनः पंख लग गए हैं। नदियों के जल स्तर में अचानक बढ़ोतरी दिखाई दे रही है।


बर्फीले इलाकों के रूप में पहचान रखने वाले उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तर पूर्व के राज्यों में लंबे समय बाद बर्फबारी से किसानों की पैदावार बढ़ने की भी संभावना है। इस बर्फबारी के कारण यहां के ग्लेशियर इतने मोटे हो गए हैं कि आने वाली गर्मी का सामना करने के बाद भी इनके पिघलने की दर घट सकती है। उच्च और मध्य हिमालय क्षेत्र में बर्फ गिरने का सही समय नवंबर से फरवरी के बीच माना जाता है, इसी दौरान ग्लेशियरों को भी अपने आकार बढ़ाने का मौका मिलता है। इसके बाद आ रही फसल की सेहत भी बहुत अच्छी है। स्वस्थ बसंत के आगमन पर जमा हुए पानी के भंडार के प्रभाव से उत्तराखंड के राज्य वृक्ष बुरांश के लाल फूल खिलने से पहाड़ों में फिर रौनक लौट आई है।


यद्यपि इस दौरान जंगली जानवर घुरड, हिरण, बाघ,पक्षियाँ आदि बस्तियों की तरफ बड़ी मात्रा में आते देखे गए हैं, उन्हें भी बर्फीले माहौल के कारण नुकसान नहीं हुआ है। इस वक्त 6-9 हजार  फीट पर निवास करने वाले काश्तकार और पशु पालक अपने मवेशियों के साथ घरों में बंद रहते हैं, इसलिए इन बर्फीले इलाकों के लोग अपने घरों में महीने भर का पर्याप्त चारा, भोजन, जलावन जमा करके रखते हैं, जिसका वह बर्फ पड़ने के समय इस्तेमाल करते हैं।


उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के वैज्ञानिक प्रोफेसर एम.पी.एस बिष्ट के अनुसार ‘पहले ग्लेशियरों का मैन्युअल अध्ययन होता था, लेकिन वर्तमान में ‘हाई रेजोल्यूशन सेटेलाइट’ से सटीक मैपिंग की जा रही है। वर्ष 2018 में अंतरिक्ष उपयोग केंद्र हैदराबाद के एक अध्ययन द्वारा बताया गया कि गंगा की बड़ी सहायक नदी अलकनंदा बेसिन के ग्लेशियरों के पिघलने की दर सालाना औसत 30 वर्ग मीटर थी जो अब 20 वर्ग मीटर हो गई है। इसी तरह गंगोत्री ग्लेशियर के पिघलने की दर 25 मीटर से घटकर 12 मीटर प्रति वर्ष हो गई है, जबकि अन्य स्रोतों की जानकारी के आधार पर इसके पिघलने की दर 18 से 20 मीटर प्रति वर्ष बताई जाती है, परंतु जमीनी सच्चाई यह भी है कि गोमुख  के आसपास जुलाई 2017 में हुए भारी भूस्खलन के कारण यहाँ के ग्लेशियर की तस्वीर खंडहर के रूप में दिखाई देने लगी थी। यहाँ सन 2002 में  अधिकतम 10 फीट ऊंची बर्फ पड़ने का अनुमान लगाया गया था। इसके बाद प्रतिवर्ष 5-7 फीट ऊंची बर्फ ही यहां पड़ती रही है, जिसके कारण ग्लेशियर पिघलने की दर में इजाफ़ा हुआ है। अब 16 वर्षों बाद 15 फीट से अधिक बर्फ पड़ने की सूचना है। फरवरी 2019 के अंतिम सप्ताह तक भी यहाँ बर्फ लगातार गिर रही थी। उत्तरकाशी शहर में भी बर्फ पड़ने पर लोग बहुत खुश हुए हैं, इसी तरह अल्मोड़ा, नैनीताल बूढ़ाकेदारनाथ, बड़कोट, बागेश्वर, चमोली, टिहरी आदि स्थानों पर जमकर बरसों बाद बर्फ देखकर रौनक आई है।


जीवनदायिनी गंगा और यमुना की 10 बड़ी सहायक नदियां जैसे टौंस, पिंडर, मंदाकिनी, बालगंगा, भिलंगना, महाकाली, सरयू आदि नदी के उद्गम में रिकॉर्ड बर्फबारी से उत्तर भारत की सिंचाई, पेयजल और जलाशयों को पर्याप्त पानी मिलेगा। यही लाभ हिमाचल व जम्मू कश्मीर की हिम पोषित नदियों से मिलेगा। यहां पानी की कमी आने वाले महीनों के लिए दूर हो जाएगी, लेकिन इस बार की तरह हर वर्ष ऐसी ही बर्फ पड़े, तो बदलते मौसम के बावजूद भी धरती के अधिकतम भागों में पानी के लिए हाहाकार रुक सकता है, लेकिन प्रकृति के संतुलन के साथ समाज व सरकार को मिलकर जल भंडारों को जीवित रखना होगा।

(लेखक उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान व रक्षा सूत्र आंदोलन से जुड़े रहे हैं।)

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