पौधारोपण से गंगा को बचाने की योजना

Author:जनसत्ता टीम
Source:जनसत्ता, 27 अगस्त 2012

विभिन्न शोधों से पता चला है कि देश में कई पौधों की प्रजातियां ऐसी हैं जो केवल गंदे पानी के कीटाणुओं को अपना भोजन बनाकर ही पनपती हैं। ऐसे पौधे खासतौर पर उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में आसानी से पाए जाते हैं। गांवों में गंदे पानी को इकट्ठा किया जाएगा। उसके बाद उसमें उन पौधों का रोपण कर दिया जाएगा। पौधे गंदे पानी के कीटाणुओं को अपना भोजन बनाकर उसे प्राकृतिक रूप से शुद्ध करने में मदद करेंगे।

उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में गायत्री मंत्र के माध्यम से भारतीय संस्कृति और विज्ञान को प्रसारित करने में जुटी संस्था ‘शांति कुंज’ ने अब पूरे देश में पौधारोपण के माध्यम से गंगा प्रदूषण को कम करने की नायाब योजना शुरू की है। शांतिकुंज में देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर चिन्मय पंड्या ने बताया कि इस योजना के तहत हजारों की संख्या में स्वयंसेवकों के माध्यम से ऐसे पौधे लगाए जाएंगे जो गंगा प्रदूषण को रोकने में कारगर साबित होते हैं। उन्होंने कहा कि इस योजना में केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय की राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय का भी सहयोग लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस पूरी योजना को मूर्त रूप देने के लिए विश्वविद्यालय में पिछले दिनों एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था।

उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला में यह तय किया गया कि प्राकृतिक ढंग से गंगा प्रदूषण को कम करने के लिए विशेष प्रजाति के पौधों की रोपाई का कार्य अत्यंत ही कारगर साबित होगा। इस योजना के तहत गांवों में उन छोटे-छोटे नालों के लिए एक-एक टैंक बनाए जाएंगे जिनका गंदा जल अभी भी किन्हीं कारणों से गंगा में जाकर गिर रहा है। विभिन्न शोधों से पता चला है कि देश में कई पौधों की प्रजातियां ऐसी हैं जो केवल गंदे पानी के कीटाणुओं को अपना भोजन बनाकर ही पनपती हैं। ऐसे पौधे खासतौर पर उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में आसानी से पाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि जिन गांवों में गंदे पानी को इकट्ठा किया जाएगा। उसके बाद उसमें उन पौधों का रोपण कर दिया जाएगा। पौधे गंदे पानी के कीटाणुओं को अपना भोजन बनाकर उसे प्राकृतिक रूप से शुद्ध करने में मदद करेंगे।

पंड्या ने कहा कि जब पानी कीटाणु मुक्त हो जाएगा तो उस पानी को दूसरे नालों से आगे भेजा जाएगा। इस पानी से सिंचाई और दूसरे कार्य किए जा सकते हैं। पंड्या ने कहा कि यह योजना बड़े-बड़े महानगरों के लिए तो उतनी कारगर साबित नहीं होगी क्योंकि महानगरों में तो भारी मात्रा में गंदा जल निकलता है और वहां इस तरह के नाले बनाना एक टेढ़ी खीर होगी। लेकिन गांवों में ऐसी योजना पर कारगर ढंग से काम किया जा सकता है। गांवों में तो छोटे नाले ही होते हैं और प्राकृतिक रूप से भी उन नालों में झाड़ी प्रजाति के पौधे उग आते हैं। लेकिन ऐसे पौधों की प्रजातियों पर इस योजना के तहत शोध कर उन्हें लगाया जाएगा जो केवल गंदे पानी के कीटाणुओं को अपना भोजन बनाकर ही विकसित होते हैं और गंदगी भी नहीं फैलाते हैं। ऐसे नालों का निर्माण कर एक अच्छी-खासी जगह में आर्द्र भूमि का निर्माण कर लिया जाएगा जहां ये पौधे अच्छी तरह से भारी मात्रा में विकसित हो सकेंगे।

इससे एक तरफ तो पानी शुद्ध होगा और मानव को नुकसान पहुंचाने वाले कीटाणु विकसित नहीं होगा। दूसरी तरफ यह पर्यावरण के लिए भी काफी लाभदायक होगा। इस योजना को विश्वविद्यालय की मातृ संस्था हरिद्वार स्थित शांतिकुंज के परिसर में अत्यंत ही सफलता पूर्वक चलाया जा रहा है। इसे एक मॉडल के तौर पर वहां प्रदर्शन के लिए रखा गया है।