प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त

Author:नया इण्डिया
Source:नया इण्डिया, 07 जनवरी 2015
.भौतिक भूगोल, भू-आकृति विज्ञान एवं भू-विज्ञान में प्लेट विवर्तनिकी का विचार नवीन है जिसके आधार पर महाद्वीपों व महासागरों की उत्पत्ति, ज्वालामुखी एवं भूकम्पों की क्रिया तथा वलित पर्वतों के निर्माण आदि का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण दिया जा सकता है। प्लेट विवर्तनिकी का सिद्धान्त बीसवीं शताब्दी के 60वें दशक में प्रस्तुत किया गया जिसका प्रभाव समस्त भू-विज्ञानों पर पड़ा। इसके आधार पर महाद्वीपों एवं महासागरों के वितरण को भी एक नवीन दिशा मिली।

इससे पूर्व 1948 में एविंग नामक वैज्ञानिक ने अटलांटिक महासागर में स्थित मध्य अटलांटिक कटक की जानकारी दी। इस कटक के दोनों ओर की चट्टानों के चुम्बकन के अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों ने उत्तर दक्षिण दिशा में दुम्बकीय पेटियों का स्पष्ट एवं समरूप प्रारूप पाया। इसके आधार पर निष्कर्ष निकाला गया कि मध्य महासागरीय कटक के सहारे नवीन बेसाल्ट परत का निर्माण होता है।

सर्वप्रथम् हेस ने 1960 में विभिन्न साक्षियों द्वारा प्रतिपादित किया कि महाद्वीप तथा महासागर विभिन्न प्लेटों पर टिके हैं। प्लेट विवर्तनिकी की अवधारणा को 1967 में डीपी मेकेंजी, आरएल पार्कर तथा डब्ल्यूजे मॉर्गन आदि विद्वानों ने स्वतन्त्र रूप से उपलब्ध विचारों के आधार पर प्रस्तुत किया। यद्यपि इससे पहले टूजो विल्सन ने प्लेट शब्द का प्रयोग किया था, जो व्यवहार में नहीं आ पाया था।

पृथ्वी का बाह्य भाग दृढ़ खण्डों से बना है जिसे प्लेट कहा जाता है। प्लेटल विवर्तनिकी लैटिन शब्द (Tectonicus) टेक्टोनिकस से बना है।प्लेट विवर्तनिकी एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है, जो स्थल मण्डल गति को बड़े पैमाने पर वर्णित करता है। यह मॉडल महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की परिकल्पना पर आधारित है। पृथ्वी का ऊपरी भाग स्थल मण्डल कहलाता है, जो कि तीन परतों में विभाजित है।

ऊपरी भूपृष्ठ जिसकी औसत गहराई 25 किलो मीटर है, नीचला भूपृष्ठ जिसकी गहराई 10 किलोमीटर है। ऊपरी मेंटल जिसकी औसत गहराई 65 किलोमीटर है। यह भाग कठोर है जिसका औसत घनत्व 2.7 से 3.0 है। इस स्थल मण्डल के ठीक नीचे दुर्बलता मण्डल है जिसकी औसत मोटाई 250 किलोमीटर है। इस मण्डल का घनत्व 3.5 से 4.0 तक है। स्थल मण्डल अधिक ठण्डा अधिक कठोर है, जबकि गर्म एक कठोर है एवं सरलता से प्रवाह करता है।

स्थल मण्डलीय प्लेटों की संख्या के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं। डीट्ज एवं हेराल्ड ने इनकी संख्या 10 बताई। डब्ल्यूजे मॉर्गन ने इनकी संख्या 20 बताई। सामान्यतः भूपटल पर सात बड़ी व चौदह छोटी प्लेटें हैं, जो दुर्बलता मण्डल पर टिकी हुई हैं, ये प्लेटें तीन प्रकार की हैं। महाद्वीपीय, महासागरीय एवं महाद्वीपीय व महासागरीय।

उत्तरी अमरीकन प्लेट इसका विस्तार उत्तरी अमरीका तथा मध्य अटलांटिक कटक तक अटलांटिक के पश्चिमी भाग पर है। कैरेबियन तथा कोकोस छोटी प्लेटें दक्षिणी अमरिकी प्लेट से पृथक करती हैं।

दक्षिणी अमरीकन प्लेट


यह दक्षिण अमेरिका महाद्वीप तथा दक्षिणी अटलांटिक के पश्चिमी भाग में मध्य अटलांटिक कटक तक विस्तृत है।

प्रशान्त महासागर प्लेट


यह महासागरीय प्लेट है जिसका विस्तार अलास्का क्यूराइल द्वीप समूह से प्रारम्भ होकर दक्षिण में अंटार्कटिक रिज तक सम्पूर्ण प्रशान्त महासागर पर है। इसके किनारों पर फिलीपाइन्स, नजका तथा कोकोस लघु प्लेटें स्थिति हैं। यह प्लेट सबसे बड़ी है।

यूरेशियाई प्लेट


यह प्लेट मुख्य रूप से महाद्वीपीय है जिसका विस्तार यूरोप एवं एशिया पर है। इसमें कई छोटी प्लेटें भी संलग्न हैं जैसे पर्शियन प्लेट तथा चीन प्लेट। इसकी दिशा पश्चिम से पूर्व है।

इण्डो ऑस्ट्रेलियाई प्लेट


यह महाद्वीपीय व महासागरीय दोनों प्रकार की प्लेट है। परन्तु इसमें सागरीय क्षेत्र अधिक है। इसका विस्तार भारतीय प्रायद्वीप, अरब प्रायद्वीप, आस्ट्रेलियाई तथा हिन्द महासागर के अधिकांश भाग पर है। इसकी दिशा दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व है।

अफ्रीकन प्लेट


यह समस्त अफ्रीका, दक्षिण अटलांटिक महासागर के पूर्वी भाग तथा हिन्द महासागर के पश्चिमी भाग पर विस्तृत है। इसकी दिशा उत्तर पूर्व है।

अंटार्कटिक प्लेट


इसका विस्तार अंटार्कटिक महाद्वीप तथा इसके चारों विस्तृत सागर पर है। यह महाद्वीप व महासागरीय प्लेट है। इन प्लेटों के अतिरिक्त महत्वपूर्ण छोटी प्लेटें निम्नलिखित हैं -कोकस प्लेट- यह प्लेट मध्यवर्ती अमरीका और प्रशान्त महासागरीय प्लेट के मध्य स्थित है। नजका प्लेट- इसका विस्तार दक्षिणी अमरीकी प्लेट तथा प्रशान्त महासागरीय प्लेट के मध्य है। अरेबियन प्लेट- इस प्लेट में अधिकतर अरब प्रायद्वीप का भाग सम्मिलित है। फिलीपाइन प्लेट- यह प्लेट एशिया महाद्वीप एवं प्रशान्त महासागरीय प्लेट के मध्य स्थित है। कैरोलिन प्लेट- यह न्यूगिनी के उत्तर में स्थित है।

प्लेटो की सीमाएँ


प्लेटों में दो प्रकार की गतियाँ होती हैं जिनके आधार पर ये दो प्रकार की सीमाएँ बनाती हैं जो निम्नानुसार है-

अपसारी सीमाएँ


पृथ्वी के आन्तरिक भाग में संवहन तरंगों की उत्पत्ति के कारण जब दो प्लेटें विपरित (एक दूसरे से दूर) दिशा में गतिशील होती हैं तो ये अपसारी किनारों का निर्माण करती हैं। इन सीमाओं के मध्य बनी दरार में भूगर्भ का तरल मैग्मा ऊपर आता है। तथा दोनों प्लेटों के मध्य तीन नवीन ठोस तली का निर्माण होता होता है।

इसे रचनात्मक किनारा भी कहा जाता है। इस प्रकार का नवीन तली का निर्माण महासागरीय कटक व बेसिन में पाया जाता है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण मध्य अटलांटिक कटक है जहाँ अमरीकी प्लेटें यूरेशियन प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट से अलग हो रही हैं। इन सीमाओं पर ज्वालामुखी क्रिया भी देखने को मिलती है।

अभिसारी सीमाएँ


जब दो प्लेटें विपरित दिशा से एक दूसरे की ओर अग्रसर होती हैं तब वे टकराती हैं। ऐसी प्लेटें अभिसारी कहलाती हैं। तथा इसके किनारे को अभिसारी किनारा कहा जाता है। इसे विनाशात्मक किनारा भी कहा जाता है। जब एक महासागरिय प्लेट महाद्वीपीय प्लेट से टकराती है तो महासागरीय प्लेट महाद्वीपीय प्लेट के नीचे धँस जाती है क्योंकि वह भारी होती है। अधिक गहराई में जाने पर इसका कुछ भाग पिघल कर मेंटल में विलीन हो जाता है। इस प्रकार का धँसाव महासागरों की गर्तों व खाइयों में पाया जाता है। ऊपरी चट्टानों के दबाव के कारण ऊष्मा उत्पन्न होती है जिससे धँसी हुई प्लेटें भी पिघल जाती हैं। इसके पिघले हुए मैग्मा के महाद्वीपीय किनारे के निकट आने से ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण होता है।