प्रकृतिक का उपहार — मैंग्रोव वन

Author:नवनीत कुमार गुप्ता
Source:योजना, नवम्बर 2013
.हमारी धरती अनोखी एवं जीवनदायी है। इसे विभिन्न कारक जीवनदायी बनाए हुए है। जल, जमीन और जंगल हमारी पृथ्वी को अनोखापन प्रदान करते हैं। इन कारकों में से जंगल की जीवन को बनाए रखने में अहम भूमिका है। जंगल या वन हमारी पृथ्वी पर वायुमण्डल में गैसों का सन्तुलन बनाए हुए हैं जिससे यहाँ जीवन सुचारू रूप से चल रहा है।

मैंग्रोव या कच्छ वनस्पतियाँ खारे पानी को सहन करने की क्षमता रखने वाली दुर्लभ वनस्पतियाँ हैं जिनकी ऊँचाई 40 मीटर तक होती है। मैंग्रोव वनस्पतियों के कारण ही तटवर्ती क्षेत्रों में सूनामी, चक्रवात और समुद्री तूफान की विनाशलीला काफी हद तक कम हो जाती है। पृथ्वी पर अलग-अलग मिट्टी, मौसम और परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न प्रकार के जंगल या वन पाए जाते हैं। वनों की यही विविधता असीम जैव-विविधता को जन्म देती है। ऐसे ही एक अनोखे वन है मैंग्रोव वन। प्रकृति ने इन वनों के रूप में जीवन के विविध रूपों को एक आश्रय स्थल सौंपा है। वास्तव में प्रकृति की रचना विचित्र है। उसने तटबन्धों की रक्षा करने, वृहद समुद्री व थलीय जैव-विविधता को फलने-फूलने के लिए इस धरती पर मैंग्रोव जिसे कच्छ वनस्पति भी कहा जाता है, को खारे पानी में पनपने की क्षमता प्रदान की है। तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वनस्पतियों ने समुद्र की अनेक विनाशकारी लहरों को धरती पर आने से रोका है।

मैंग्रोव या कच्छ वनस्पतियाँ खारे पानी को सहन करने की क्षमता रखने वाली दुर्लभ वनस्पतियाँ हैं जिनकी ऊँचाई 40 मीटर तक होती है। मैंग्रोव वनस्पतियों से आच्छादित मैंग्रोव वन, भूमि और समुद्री जल के अन्तःसम्बन्धों का अद्भुत उदाहरण हैं। 60 से 70 प्रतिशत तटों पर मैंग्रोव वनस्पतियों को देखा जा सकता है। मैंग्रोव वनस्पतियों के कारण ही तटवर्ती क्षेत्रों में सूनामी, चक्रवात और समुद्री तूफान की विनाशलीला काफी हद तक कम हो जाती है।

मैंग्रोव वनस्पतियों के खारे पानी को सहन करने की क्षमता ही इनके समुद्र तटीय क्षेत्रों में पनपने में सहायक होती है। मैंग्रोव के विकास में खारे पानी का अहम योगदान है इसीलिए यह वनस्पतियाँ ज्वारीय क्षेत्रों में बहुतायत में मिलती हैं। मैंग्रोव वन ज्वारीय खाड़ियों, पश्च-जल (बैक-वाटर), क्षारीय दलदलों में पाए जाते हैं। मैंग्रोव वनस्पतियाँ समुद्र-तटों पर और नदियों के मुहानों पर भी पाई जाती हैं। यह वनस्पति विश्व के उष्ण तथा उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में अच्छी फलती-फूलती हैं। मैंग्रोव वनस्पतियों का सर्वोत्तम विकास 20 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले उन उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में होता है जहाँ मिट्टी महीन और तट दलदली प्रकृति वाला हो। इस प्रकार की भूमि जैव-तत्वों से भरपूर होने के कारण मैंग्रोव के तीव्र विकास में सहायक होती है।

मैंग्रोव वनस्पतियाँ ‘लवण सहनशीलता गुणों’ के कारण ही समुद्री तटों में पाई जाती हैं। मैंग्रोव वृक्षों की प्रजातियों के निर्धारण में उस क्षेत्र में शुद्ध जल की मात्रा विशेष प्रभाव डालती है। सर्वाधिक लवण सहनशीलता वाले वृक्ष समुद्री तट रेखा के समीप पाए जाते हैं क्योंकि ज्वार का प्रभाव सबसे ज्यादा समुद्री तट रेखा के नजदीक ही देखा जाता है। इस प्रकार स्थलीय क्षेत्र की ओर बढ़ने पर क्रमशः कम लवण सहनशील वृक्षों की संख्या बढ़ने लगती है। मैंग्रोव की कुछ प्रजातियों में लवण के प्रति अद्भुत सहनशीलता देखी गई है।

मैंग्रोव वनस्पतियाँ आंशिक रूप से जल में डूबे रहने पर भी अच्छी पनपती हैं। प्रकृति ने मैंग्रोव वनस्पतियों को समुद्र से जमीन प्राप्त करने की अद्भुत क्षमता प्रदान की है। यह वनस्पतियाँ ज्वारीय क्षेत्रों में मिट्टी रोककर जमीन बनाने में सक्षम हैं। इस प्रकार मैंग्रोव वनस्पतियाँ ज्वार-भाटे के बीच में पनपती रहती हैं और इनकी जड़ें बहती मिट्टी को रोक लेती हैं। मैंग्रोव वनों के तट की ढलान से समुद्र की लहरों का वेग मन्दा हो जाता है और उथली ढलानें जमीन को क्षरण से बचाने के साथ ही ये हवाओं के विरुद्ध भी अवरोधक का कार्य करती हैं।

तालिका-1: मैंग्रोव कार्ययोजना के अन्तर्गत भारतीय मैंग्रोव क्षेत्र
क्रमांक
संरक्षण प्राप्त मैंग्रोव क्षेत्र
राज्य
1
सुन्दरवन
पश्चिम बंगाल
2
भितरकनिक
उड़ीसा
3
महानदी
उड़ीसा
4
सुवर्णरेखा
उड़ीसा
5
देवी
उड़ीसा
6
धामरा
उड़ीसा
7
कालीभंजा डीए द्वीपसमूह
उड़ीसा
8
कोरिंगा
आन्ध्र प्रदेश
9
पूर्व गोदावरी
आन्ध्र प्रदेश
10
कृष्णा
आन्ध्र प्रदेश
11
पिचवरम
तमिलनाडु
12
केजुहुवेली
तमिलनाडु
13
मुथुपेट
तमिलनाडु
14
रामानाड
तमिलनाडु
15
अचरा-रत्नागिरी
महाराष्ट्र
16
देवगढ़
महाराष्ट्र
17
विजयदुर्ग
महाराष्ट्र
18
मुम्ब्रा-दीवा
महाराष्ट्र
19
वितीरलर नदी
महाराष्ट्र
20
कुण्डलिका-रवदाना
महाराष्ट्र
21
वसासी-मनोरी
महाराष्ट्र
22
श्रीवर्धन-वेरल-टुरूमबादी और कालसुरी
महाराष्ट्र
23
चारो
गोवा
24
उत्तरी अण्डमान
अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह
25
दक्षिणी अण्डमान
अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह
26
खम्भात की खाड़ी
गुजरात
27
कच्छ की खाड़ी
गुजरात
28
कूण्डापुर
कर्नाटक
29
होनावर क्षेत्र
कर्नाटक

अनोखी जड़ें


मैंग्रोव की विशिष्ट जड़ संरचना मलवे को जमाने में सहायक होती है। इन वनस्पतियों द्वारा नदियों में बहकर आया हुआ मलवा समुद्री तटों पर ही रोक दिया जाता है। एक लम्बे अन्तराल के बाद लगातार मलवे के जमा होते रहने से डेल्टाओं का निर्माण होता है। मैंग्रोव की जड़ें मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं। एक प्रकार की मैंग्रोव जड़ें तने के ऊपरी भाग से निकलते हुए मलवे तक पहुँच जाती हैं। मैंग्रोव वनस्पतियों में जड़ की दूसरी संरचना ‘मुड़े घुटने’ जैसी दिखाई देती है। यह जड़ें समस्तर रूप से फैलती हुई ऊपर नीचे की ओर निकलती हैं। इन वनस्पतियों में एक तीसरी प्रकार की जड़ संरचना भी देखी जाती है जिसमें जड़ समस्तर आकार में फैलती तो हैं, पर कुछ जड़ें ऊपर की ओर भी निकलती हैं। इस प्रकार मैंग्रोव वनस्पतियों की पुरानी जड़ें धीरे-धीरे मलवे में समाती रहती हैं।

पेड़ों पर अँकुरित होते बीज


मैंग्रोव वनस्पतियों में फलों के बीज जमीन पर गिरने से पूर्व ही इस प्रकार अँकुरित हो जाते हैं जैसे किसी पौधे को कलम द्वारा लगाया जाता है। कुदरत ने मैंग्रोव को यह विशिष्ट गुण इसलिए दिया है ताकि इसके बीज दलदल में गिरने पर अपनी जड़ें आसानी से जमा सकें। यह तो हम जानते ही हैं कि खारे पानी में बीजों के अँकुरण की सम्भावना कम होती है, इसलिए विकास की उत्तरोत्तर प्रक्रिया के कारण मैंग्रोव वनस्पतियों ने बीज अँकुरण की विशिष्ट प्रक्रिया को अपनाया। इन वनस्पतियों में बीज अँकुरण के इस असाधारण गुण को जयायुज या पिण्डज (विविपैरस) के नाम से जाना जाता है।

मैंग्रोव में फलों के आने का मुख्य समय जून से सितम्बर के मध्य होता है। हालाँकि कम मात्रा में फल व बीज तो इनमें वर्ष भर देखे जा सकते हैं। कई बार तो मुख्य पेड़ से गिरने के पहले ही बीज की अँकुरित जड़ें नीचे की ओर झुकती हुई जमीन तक पहुँच जाती हैं। मैंग्रोव के बीज की एक विशेषता इसका भारीपन व गूदेदार होना भी है, जो इसको पेड़ से गिरने पर स्थायित्व प्रदान करने में सहायक होता है। इस प्रकार मैंग्रोव के बीज पानी के बहाव में भी कई दिनों तक जीवित रह पाते हैं।

अनोखा पारिस्थितिकी तन्त्र


मैंग्रोव वन समृद्ध पारिस्थितिकी तन्त्र का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। मैंग्रोव वन क्षेत्र जीव-जन्तुओं और पौधों की ऐसी प्रजातियों के संरक्षण क्षेत्र हैं जो विकास की दीर्घकालीन प्रक्रिया से आपस में जुड़े हुए हैं। मैंग्रोव क्षेत्र उच्च उत्पादक और पोषक तत्वों से भरपूर होता है। यह पारिस्थितिकी तन्त्र, स्थलीय और जलीय दोनों जीवों से समृद्ध है। इस क्षेत्र में पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप एवं मत्स्य वर्ग के जीवों की प्रधानता होती है। मैंग्रोव पारिस्थितिकी तन्त्र में समृद्ध जैव बहुलता के कारण आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

इस क्षेत्र में सीप, केकड़ा, झींगा, घोंघा और मछली पालन की अपार सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। मैंग्रोव औषधीय महत्व के कारण भी महत्वपूर्ण वनस्पति है। इनसे अनेक दवाइयाँ बनाई जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में मैंग्रोव पत्तियों का उपयोग प्राकृतिक चाय के रूप में किया जाता है। मैंग्रोव का उपयोग घरेलू ईन्धन के रूप में किए जाने के साथ-साथ खाद्य पदार्थ के रूप में भी किया जाता है। मैंग्रोव से चारकोल, मोम, टेनिन, शहद और जलावन लकड़ी भी प्राप्त की जाती है।

मैंग्रोव क्षेत्र की प्रचुर जैव-विविधता के लिए प्रकृति ने विशेष व्यवस्था की है। मैंग्रोव पारितन्त्र में फफूंदी और बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्म-जीव जैविक पदार्थों का विघटन कर इस क्षेत्र की भूमि को पोषक तत्वों से समृद्ध रखते हैं। इससे इस पारितन्त्र में शैवाल और समुद्री घासों की विभिन्न प्रजातियाँ बहुतायत में मिलती हैं जिन पर शाकाहारी जीव निर्भर होते हैं और शाकाहारी प्राणियों की अधिक संख्या होने पर मांसाहारी जीव भी इन क्षेत्रों में आसानी से अपना जीवनयापन करते हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र जैव-विविधता से समृद्ध होता है। भारत के मैंग्रोव वनों में लगभग 1,600 वनस्पतियाँ एवं 3,700 जीव पहचाने गए हैं।

प्रमुख मैंग्रोव क्षेत्र


पूरे विश्व में मैंग्रोव दो समूहों में विभाजित है। पहले वर्ग में हिन्द-प्रशान्त समूह में करीब 40 मैंग्रोव प्रजातियाँ हैं जो अफ्रीका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिम प्रशान्त महासागर के तटीय क्षेत्रों में विद्यमान हैं। दूसरे क्षेत्र में पश्चिम अफ्रीका, कैरेबियन और अमेरिकन समूह में पाए जाने वाली 8 मैंग्रोव प्रजातियाँ हैं। विश्व में सर्वाधिक सघन मैंग्रोव वन मलेशिया के तटवर्ती क्षेत्रों में पाए जाते हैं। विश्व का सर्वाधिक विशाल (51,800 वर्ग किलोमीटर) मैंग्रोव क्षेत्र भारत एवं बांग्लादेश की सीमा में स्थित सुन्दरवन क्षेत्र है। भारत की बात की जाए तो पश्चिम बंगाल का सुन्दरवन क्षेत्र देश का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है।

भारत में स्थित मैंग्रोव क्षेत्र


भारत विश्व के उन देशों में से एक है जहाँ मैंग्रोव वनस्पतियों की सर्वश्रेष्ठ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यहाँ विश्व के कुल मैंग्रोव वनों का सात प्रतिशत उपलब्ध है। भारत में 42 वर्गों और 28 समूहों में मैंग्रोव की 69 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमे में 26 अण्डमान और निकोबार क्षेत्र में एवं 18 प्रजातियाँ पूर्वी तट में पाई जाती हैं। भारत की वर्ष 2011 की वन रिपोर्ट के अनुसार देश में 4,462 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में मैंग्रोव वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। भारत में मैंग्रोव की दो देशज प्रजातियाँ हैं, पहली राइजोफोरा एन्नामलायाना जो कि पिचवरम तमिलनाडु में और दूसरी उड़ीसा के भितर कनिक क्षेत्र में पाई जाती है। पर्यावरण और वन मन्त्रालय ने 1987 से मैंग्रोव वनस्पति संरक्षण योजना शुरू की। अब तक वन मन्त्रालय द्वारा 39 मैंग्रोव वनस्पति क्षेत्रों की पहचान की गई है, जिनमें गहन संरक्षण और प्रबन्धन का कार्य किया जा रहा है। इन क्षेत्रों की पहचान 'नेशनल कमेटी ऑन मैंग्रोव एण्ड कोरल रीफ' द्वारा उन क्षेत्रों की जैव-विविधता के आधार पर की जाती है।

मैंग्रोव क्षेत्र प्रबन्धन कार्यक्रम के अन्तर्गत मैंग्रोव वनस्पतियों का रोपण, सुरक्षा केचमेंट एरिया उपचार, प्रदूषण शमन, गाद नियन्त्रण, जैव-विविधता संरक्षण, सर्वेक्षण और सीमांकन के साथ-साथ जागरुकता सम्बन्धित गतिविधियाँ चलाई जाती हैं। भारतीय वन एवं पर्यावरण मन्त्रालय ने मैंग्रोव वनस्पतियों की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए उड़ीसा में ‘राष्ट्रीय मैंग्रोव वनस्पति आनुवांशिक संसाधन केन्द्र' स्थापित किया है। मैंग्रोव वनस्पति संरक्षण और प्रबन्ध योजना वाला यह कार्यक्रम मैंग्रोव वनों को बढ़ाने, बचाने, प्रदूषण मुक्त रखने, जैव-विविधता संरक्षण के साथ उन क्षेत्रों के सीमांकन और सर्वेक्षण का कार्य करते हुए मैंग्रोव वनस्पतियों के बारे में जागरुकता के प्रसार का कार्य कर रहा है।

लम्बे समय तक मैंग्रोव वनों को व्यर्थ मान कर इन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान नहीं दिए जाने से भी मैंग्रोव वनों की स्थिति बिगड़ती गई। इसके अलावा विगत कुछ दशकों में मैंग्रोव पारिस्थितिकी तन्त्र को अत्यधिक मानवीय और जैवीय दबाव को सहन करना पड़ा है जिसके परिणामस्वरूप भारत के लगभग आधे मैंग्रोव वन समाप्त हो गए हैं। इन वनों के समाप्त होने से स्थानीय जैव-विविधता पर भी नकारात्मक परिणाम देखे गए हैं। क्षेत्रीय जैव-विविधता के प्रभावित होने के साथ मैंग्रोव रहित तटीय क्षेत्रों को तूफान की विभीषिका झेलनी पड़ती है। मैंग्रोव वनों को मानव अतिक्रमण से भारी क्षति पहुँची है। मानव द्वारा कृषि क्षेत्र के विस्तार, झींगा पालन और मछली पालन के लिए मैंग्रोव क्षेत्रों के अतिक्रमण से भी इन वनों के अस्तित्व को गम्भीर चुनौती मिलने लगी है। बांग्लादेश में सुन्दरवन मैंग्रोव क्षेत्र के तीव्र क्षरण से तटवर्ती क्षेत्रों को समुद्री तूफान का सामना करना पड़ रहा है। भारत में भी आन्ध्र प्रदेश और उड़ीसा में समुद्री तट रेखा के विकास के नाम पर बिना सोचे-समझे मैंग्रोव वनों को काट देने से आए दिन समुद्री तूफान की विपत्ति झेलनी पड़ती है।

खतरे में है मैंग्रोव वनस्पतियाँ


मैंग्रोव वन सबसे अधिक उत्पादक और जैव-विविधता वाले क्षेत्र हैं लेकिन आज इन तटीय वनों पर सबसे अधिक खतरा मण्डरा रहा है। मैंग्रोव वन आन्तरिक वर्षावनों से भी अधिक तेजी से खत्म हो रहे हैं। नदी मुख, भूमि और समुद्रों के अन्तःसम्बन्धित क्षेत्रों में कायम मैंग्रोव वन थलीय और जलीय जीवों के लिए अनोखे आवास स्थल हैं। इसीलिए मैंग्रोव वन किसी भी समुद्री पारिस्थितिकी के स्वास्थ्य की निशानी होते हैं। लेकिन आने वाले समय में विश्व के सामने मैंग्रोव वनों की सुरक्षा बड़ी पर्यावरणीय चुनौती होगी। भारत में पिछले एक सदी के दौरान मैंग्रोव वनों के क्षेत्रफल में 40 प्रतिशत की कमी आई है। नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी के अनुसार 1975 से 1981 के दौरान मैंग्रोव वनों के क्षेत्रफल में करीब 7,000 हेक्टेयर की कमी आई है।

मैंग्रोव वनों के विनाश से कीटनाशकों, रासायनिक व औद्योगिक बहिःस्रावों के कारण प्रदूषण की समस्या में भी वृद्धि होगी। मैंग्रोव वनस्पतियों को प्राकृतिक व मानवीय गतिविधियों से खतरा बढ़ने लगा है। चक्रवात व जलवायु परिवर्तन जैसी प्राकृतिक क्रियाओं से इन वनस्पतियों को काफी नुकसान पहुँचता है। यदि मानव समझदारी से काम ले तो इस समृद्ध वन का उचित लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

मैंग्रोव वनस्पतियों का संरक्षण


समृद्ध जैव-विविधता वाले मैंग्रोव वनों के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय महत्व के कारण इनका संरक्षण अति आवश्यक है। असल में भारत में मैंग्रोव वनों के प्रबन्धन की दीर्घकालीन परम्परा रही है। सुन्दरवन मैंग्रोव क्षेत्र विश्व का पहला मैंग्रोव क्षेत्र है जहाँ वैज्ञानिक तरीके से इस वन का प्रबन्धन किया गया। भारतीय मैंग्रोव वनों की पुनर्समृद्धि स्थानीय पारितन्त्र के साथ तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए भी लाभकारी होगा। मैंग्रोव वनों की उपयोगिता को देखते हुए विश्व भर में इनके बचाव और विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है। समुद्र तटवर्ती क्षेत्रों में मैंग्रोव के विकास के कई कार्यक्रम आरम्भ किए गए हैं। भारत में भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हो रहा है। तमिलनाडु के पिचवरम क्षेत्र में मैंग्रोव वृक्षारोपण के लिए वृहद अभियान चलाया जा रहा है। इसी तरह 15 जनवरी, 1996 को सेवारी मैंग्रोव उद्यान की घोषणा की गई। बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी ने इस क्षेत्र में पक्षियों के संरक्षण के लिए विशेष कार्य किए।

मैंग्रोव वनों को राजस्व कमाने के नजरिये से न देख कर एक जीवित इकाई के रूप में देखने, समझने व उपयोग करने की आवश्यकता है तभी हम आने वाली पीढ़ियों को धरोहर के रूप में समृद्ध मैंग्रोव वन विरासत में दे पाएँगे। हमें सदैव यह बात याद रखनी चाहिए कि मैंग्रोव पारिस्थितिकी तन्त्र अनोखा पारिस्थितिकी तन्त्र होने के साथ ही जैव-विविधता का भी भण्डार है जहाँ जीवन के विविध रूप खिलखिला रहे हैं।

(लेखक विज्ञान प्रसार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, नई दिल्ली में परियोजना अधिकारी हैं एवं 'जलवायु परिवर्तन : एक गम्भीर चुनौती' पुस्तक के लिए राजभाषा पुरस्कार से सम्मानित हैं)
ई-मेल : ngupta@vigyanprasar.gov.in

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