प्रतापगढ़ में सई संवाद-एक

Author:अरुण तिवारी

कुण्डों, बीहड़ों और घुमावों वाली सई नदी की संवाद-यात्रा के दौरान सई के विभिन्न पहलुओं से परिचय हुआ। यह संवाद-यात्रा अगस्त 2011 में हुई। सई का भूगोल, प्रदूषण तथा प्रदूषण के खतरनाक प्रभाव पर लोक-अनुभवों का संस्मरण यहां प्रस्तुत है।

श्रीराम की वनवास यात्रा में उत्तर प्रदेश की जिन पांच प्रमुख नदियों का जिक्र है, उनमें से एक है - सई। ‘सई उतर गोमती नहाये। चैथे दिवस अवधपुर आये।।’ शेष चार नदियां हैं - गंगा, गोमती, सरयू और मंदाकिनी। सई का समाज आज भी इस कथा का जिक्र कर स्वयं को गौरवान्वित तो महसूस करता है; किंतु इस कुदरती गौरवशाली प्रवाह के गौरव को बचाने के लिए विशेष चिंतित नहीं दिखाई देता। मैंने सई संवाद यात्रा के दौरान इस हकीकत को बडी बेचैनी के साथ महसूस किया। ताज्जुब हुआ कि ज्यादातर आबादी इसके भूगोल तक से परिचित नहीं है।

यह संवाद यात्रा जिला - प्रतापगढ़ में उप्र जलबिरादरी व इरादा संस्थान के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित की गई। इस यात्रा के दौरान मुझे कई बेचैन मन भी मिले। उन्हीं की संगत से मुझे सई की प्रौढ़ावस्था से परिचित होने का मौका मिला। संभव है इसकी विशेषताओं को जानकर आपके मन में भी इसे संरक्षित करने का संकल्प उठे।

सई गोमती की प्रमुख सहायक नदी है। सई नदी हरदोई जनपद की एक विशाल झील से निकलकर लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ होते हुए जौनपुर जिले के सई जलालपुर नामक स्थान पर गोमती नदी में समाहित हो जाती है। जनपद प्रतापगढ़ में सई का बेसिन का देशान्तरीय विस्तार 81 30’ E से 82 15’ E है। अक्षांशीय विस्तार 25 40’ N से 265 5’ N तक है। इस तरह बेसिन की आकृति लंबाकार है। अठेहा के निकट रामनगर कोल गांव के पश्चिमी भाग से प्रतापगढ़ जिले में प्रवेश करती है।

रामनगर कोल मुस्तफाबाद ग्राम पंचायत का एक गांव है। जौनपुर की दानवान ग्रामसभा की सीमा पर सई प्रतापगढ़ को विदा कह देती है। इस दौरान सई के किनारे पर मुस्तफाबाद, घुइसरनाथ धाम, चंदिकन धाम, देवघाट, पांचों सिद्ध, बेल्हा देवी धाम, बेलखरनाथ तथा चैहरजनघाम जैसे आस्था के केंद्र रौनक लगाते दिखाई दे जाते हैं। भयहरणनाथधाम, संकटहरणी धाम इसकी सहायक धाराओं पर स्थित हैं। थरियाघाट, गायघाट जैसे घाटों के नाम आकार के आघार पर रखे मालूम होते हैं।

प्रतापगढ़ में प्रवेश के समय उत्तर से दक्षिण की ओर का प्रवाह मार्ग आगे चलकर मात्र एक किलोमीटर बाद ही एक कठिन मोड़ इसे अचानक पूर्व की ओर घुमा देता है। यही सई की खासियत है और सई के नामकरण का आधार भी। अकेले प्रतापगढ़ में सई का प्रवाह मार्ग 167.5 किमी. लंबा है। सीधे-सीधे नापें तो यह दूरी मात्र 72 किमी. ही है। समझ सकते हैं कि सई कितना घूम-घूमकर अपना सफर पूरा करती है।

सरीसृप प्रजाति के जीवों की भांति अत्याधिक विषर्पाकार होने के कारण इसका नाम पहले सरी और कालांतर में अपभ्रंश होकर सई हो गया। सई में दस-दस किलोमीटर लंबे यू टर्न वाले सैकड़ों घुमाव हैं। इतने कठिन घुमाव तथा घुमावों की इतनी अधिक संख्या उत्तरप्रदेश की और किसी नदी में हो, मैंने नहीं देखा। इन घुमावों के कारण इसमें प्राकृतिक रूप से बडी संख्या में गहरे कुण्डों का निर्माण होना स्वाभाविक है। इन कुण्डों के कारण ही ऊपर प्रवाह और नीचे गहरे तक जल का ठहराव ... दोनों साथ-साथ बने रहते हैं। कुण्डों में जल के ठहराव के साथ - साथ तलछट में दरारें हों, तो भूजल पुनर्भरण के लिए इससे बडा वरदान और क्या हो सकता है ? इन ठहरावों के कारण ही तमाम बेसमझियों के बावजूद सई में जेठ की गर्मी में भी पानी बना रहता है। घुमाव और ठहराव से सई में जलीय जीव व वानस्पतिक समृद्धि हमेशा रही है। तमाम विषमताओं के बावजूद सई आज भी मछुआरों को ट्रक भर- भरकर मछलियां देती है। सई की रोहू, सउर, बेलगगरा आदि मछलियां व कछुए मशहूर हैं। हालांकि कमी आयी है, कभी इसमें इतनी वजनी मछलियां पाईं जाती रही हैं, देशी अनुमान के मुताबिक जिन्हे उठा लाने में सात-सात लोग लगते थे। सई के किनारे आंवले, कटहल और आम के लिए मशहूर है।

घुमावों के कारण सई में प्राकृतिक रूप से बडी संख्या में गहरे कुण्डों का निर्माण होना स्वाभाविक है। इन कुण्डों के कारण ही ऊपर प्रवाह और नीचे गहरे तक जल का ठहराव ... दोनों साथ-साथ बने रहते हैं। कुण्डों में जल के ठहराव के साथ - साथ तलछट में दरारें हों, तो भूजल पुनर्भरण के लिए इससे बडा वरदान और क्या हो सकता है ? इन ठहरावों के कारण ही तमाम बेसमझियों के बावजूद सई में जेठ की गर्मी में भी पानी बना रहता है। घुमाव और ठहराव से सई में जलीय जीव व वानस्पतिक समृद्धि हमेशा रही है। तमाम विषमताओं के बावजूद सई आज भी मछुआरों को ट्रक भर- भरकर मछलियां देती है। सई की रोहू, सउर, बेलगगरा आदि मछलियां व कछुए मशहूर हैं।

सई के उत्तर में 15 सौ मीटर तक विषम तल व कटाव वाले बीहडों का निर्माण किया है। इनमे जल पुनर्भरण की अकूत संभावनायें हैं। अतः उत्तरी क्षेत्र में कुंओं का जलस्तर ऊपर दिखाई देता है। दक्षिण की ओर कहीं -कहीं पांच सौ मीटर तक बीहड़ दिखाई देता है। सामान्तया दायां तट अधिकांशतः सपाट, उथला व नदी के विपरीत दिशा की ओर ढालू है। अतः इस ओर के इलाके पानी की कमी वाले व अत्यंत खारे हैं।

सई के बीहड़ ही इसके वनक्षेत्र हैं। सई पर कई शोध हुए हैं। डा. संजीत शुक्ला के शोध के मुताबिक सई के बेसिन में 402.8 हैक्टेयर भूमि पर आरक्षित वन क्षेत्र है। इनकी संख्या कुल 12 है। सुंदरपुर, कलापुर, मधुकरपुर, भागीपुर, सण्डवा चंद्रिका, सराय लक्ष्मण देव, क्षेभर सरैंया, तेलियाही, शीतलामउ, चिलबिला, पहाड़पुर गंजहेडा और खरवई। इन जंगलों में खासकर अजगर, लकडबग्घा, पीछे की ओर जहरीले कांटें फेंकने वाली शाही, सियार तथा नीलगाय काफी संख्या में आज भी मिलते हैं।

सई की समृद्धि में एक बडा योगदान इसमें बडी संख्या में मिलने वाली छोटी नदियां और नाले हैं। अकेले प्रतापगढ़ बेसिन में 250 से अधिक नामी-बेनामी जलधारायें सई में मिलती है। इनमें से लोनी, चमरौरा, सकरनी, छोयया, परैया, मालती और पट्टी नाला प्रमुख सहायक धारायें हैं। किनारे की मिट्टी बलुही, जलभराव क्षेत्रों की चिकनी तथा दोआब की मिट्टी दोमट है। किनारे की मिट्टी का पीएच मान कम, जबकि दोआब का अधिक पाया गया।

सई सचमुच अद्भुत भूगोल वाली नदी है। किंतु गहरे दुर्भाग्य वाली भी। हमारा दुर्भाग्य व बेसमझी न होती, तो क्या इतने कुण्ड, घुमाव, बीहड. तथा आरक्षित वनक्षेत्र के रहते कोई नदी सूख सकती है? फिर दो- तीन वर्ष पहले उन्नाव व लखनऊ के बीच में क्यों सूख गई थी सई ?? किसने सूखाया सई को?? कहां गई सई की पारदर्शी नीलिमा?? किसने इसे भर दिया सई को कालिमा के कंलक से?? यह कालिमा और सूखापन कैसे मिटा रहे हैं प्रतापगढ़ के समाज की सेहत व गौरव ...दोनों ही क्या खुद प्रतापगढ का समाज भी इसके लिए दोषी है? क्या सई के दोषियों को दंडित करने के लिए प्रतापगढ़ का समाज कभी जागेगा? कैसे लौटेगा सई का नैसर्गिक प्रवाह?? क्या सई का समाज इस दिशा में अपना पसीना लगाने को तैयार होगा?? ऐसे ही कई बेचैन कर देने सवालों के जवाब तलाशने के लिए डा. अर्जुन प्रसाद, आर्यशेखर, आलोक तथा सच्चिदानंद जी के साथ मैंने भी सई की पदयात्रा की। जवाब भी मिले और मन में कई सवाल भी खड़े हुए। उनकी चर्चा भाग दो में।