पर्यावरण एवं ईको-मार्क स्कीम

Author:एस. आर. बालोच एवं लोखो पूनी
Source:अश्मिका, जून 2011

पर्यावरण एक देश विशेष तक सीमित न होकर आज एक विश्वव्यापी समस्या बन गया है। पर्यावरण के महत्व को देखते हुए भारतीय मानक ब्यूरो ने मुख्यालय में पर्यावरण प्रबंध पद्धति नामक पृथक विभाग की स्थापना की है। अन्तरराष्ट्रीय मानकीकरण संस्था (आईएसओ) ने पर्यावरण प्रबंध पद्धति पर आईएओ, 14000 मानकों की श्रृंखला का प्रकाशन किया।

हमें जो स्वस्थ पर्यावरण विरासत में मिला है वह हमारे पास भावी पीढ़ियों की धरोहर है। भावी पीढ़ी को यह धरोहर स्वच्छ पर्यावरण सहित सौंपना हमारा दायित्व व कर्तव्य है। स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण स्वस्थ मानव जाति के अस्तित्व व विकास के लिये भी आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण की समस्या मूलत: 20वीं सदी की देन है। पर्यावरण में वायु, जल, पहाड़, मैदान, हरीतिमा, विविध जीव-जंतु शामिल हैं। इन सभी के बीच अन्योन्याश्रित अंत:संबंध रहता है और प्रकृति स्वयं अपना पारिस्थितिक-संतुलन स्थापित करती है। किंतु इस सृष्टि की सर्वोत्तम कृति मनुष्य ने अपनी बुद्धि का आश्रय लेकर जीवन को सुखमय और विलासितापूर्ण बनाने के लिये अनेकानेक उपकरणों का आविष्कार किया है। ये नित नये आविष्कार और औद्योगिकीकरण जीवन को आराम दायक तो बना रहे हैं लेकिन प्रकृति के संतुलन को नष्ट भी कर रहे हैं। परिणामस्वरूप आज वायु, जल और भूमि तीनों अत्यंत प्रदूषित हो चुके हैं।

महानगरों में यह समस्या और भी गंभीर हो गई है। स्थिति यह है कि विकास आज विनाश का पर्याय बनता जा रहा है। वायु को मोटर वाहनों और उद्योगों की चिमनियों से निकले विषैले धुएँ ने प्रदूषित कर दिया है तथा जल को औद्योगिकी निर्माण के दौरान निकलने वाले घातक रसायनों के रिसाव और जल-मल ने। भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिये जिन रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल हम कर रहे हैं वही उर्वरक भूमि को प्रदूषित कर रहे हैं, फसल पर भी रसायनों के घातक प्रभाव पड़ रहे हैं। बढ़ते वाहनों का धुआँ, औद्योगिकीकरण की तीव्र गति कचरे का बढ़ता ढेर, सफलता और विलास के साधन पर्यावरण को तेजी से प्रदूषित कर रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने भी हमारे समक्ष इन संसाधनों की विकल्प सामग्री तलाशने की और सीमित संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल की चुनौती रखी है।

पर्यावरण एक देश विशेष तक सीमित न होकर आज एक विश्वव्यापी समस्या बन गया है। पर्यावरण के महत्व को देखते हुए भारतीय मानक ब्यूरो ने मुख्यालय में पर्यावरण प्रबंध पद्धति नामक पृथक विभाग की स्थापना की है। अन्तरराष्ट्रीय मानकीकरण संस्था (आईएसओ) ने पर्यावरण प्रबंध पद्धति पर आईएओ, 14000 मानकों की श्रृंखला का प्रकाशन किया। इन अन्तरराष्ट्रीय मानकों के महत्व को देखते हुए भामा ब्यूरो ने इन्हें आईएस/आईएसओ 14000 परिवार के मानक के रूप में अपनाया है। पर्यावरण संबंध पद्धति पर प्रकाशित इन मानकों में एक सुनिश्चित, स्वैच्छिक तथा निवारणीय मार्गदर्शन दिया गया है जिसके द्वारा उद्योग अपनी गतिविधियों, उत्पादों तथा सेवाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का प्रबंधन तथा निवारण कर सकते हैं। ये मानक अपने आप में विशिष्ट पर्यावरणीय नीति, गतिविधियों की प्रकृति व परिस्थितियों के आधार पर उन पर्यावरण से संबंद्ध पहलुओं पर लागू होते हैं जिन पर कोई भी संगठन नियंत्रण कर सकता है अथवा जिनपर इसके प्रभाव की संभावना हो सकती है।

इसी प्रकार पर्यावरण के बारे में उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ाने के लिये भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 1991 में पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों की पहचान के लिये ईको मुहर योजना आरंभ की। इस योजना का लक्ष्य नागरिकों को ऐसे उत्पाद खरीदने के लिये प्रोत्साहित करना है, जिनका पर्यावरण पर प्रभाव कम घातक हो और जिनसे अंतत: पर्यावरण की गुणता में सुधार हो और संसाधनों के धारणीय प्रबंध को प्रोत्साहन मिले।

ईको मुहर योजना : भारत सरकार ने पर्यावरण और वन मंत्रालय के माध्यम से ईको मुहर योजना आरंभ की जो एक सुस्पष्ट पद्धति से विकसित और संचालित की जानी है। इस क्रियाविधि के अंतर्गत जब संचालन समिति द्वारा किसी उत्पाद-संवर्ग की पहचान कर ली जाती है तो उसके बाद तकनीकी समिति, विभिन्न रुचि रखने वाले समूहों जैसे निर्माताओं, उपभोक्ताओं, संगठनों, तकनीकी निकायों तथा प्रयोगशालाओं के साथ परामर्श करके उस विशिष्ट उत्पाद-संवर्ग के लिये ईको मानदण्डों का निर्धारण करती है। इस प्रकार तैयार किये गये ईको मानदण्डों की अधिसूचना के मसौदे के रूप में आम जनता से सम्मतियाँ प्राप्त करने के लिये अधिसूचित किया जाता है। इस प्रक्रिया में यदि कोई सम्मति प्राप्त हुई हो तो उस पर तकनीकी समिति पुन: विचार करती है और अंतिम सिफारिश संचालन समिति के पास विचारार्थ भेजी जाती है। संचालन समिति इसके पश्चात ईको मानदंडों को अंतिम रूप देती है और इन्हें पुन: सार्वजनिक सूचना के लिये अंतिम राजपत्र अधिसूचना के रूप में पुन: अधिसूचित किया जाता है, 1991 से लेकर अब तक ईको मुहर संचालन समिति ने निम्नलिखित 18 उत्पाद संवर्गों की पहचान की है :-

(1) साबुन तथा अपमार्जक (2) कागज (3) खाद्य सामग्री (4) स्नेहन तेल (5) पैकेजबंदी के लिये सामग्री/पैकेज (6) वास्तुकला संबंधी रंग-रोगन तथा पाउडर कोटिंग (7) बैटरियाँ (8) विद्युत/इलैक्ट्रॉनिक वस्तुएँ (9) खाद्य संयोजी पदार्थ (10) लकड़ी के स्थानापन्न (11) सौंदर्य प्रसाधन सामग्री (12) ऐरासोल प्रोपैलेंट (13) प्लास्टिक के उत्पाद (14) वस्त्रादि (15) कीटनाशी (16) औषधियाँ (17) अग्निशामक उपकरण तथा (18) चमड़ा, इसके पश्चात विभिन्न रुचि रखने वाले समूहों से प्राप्त प्रतिक्रिया और विभिन्न सम्मतियों पर विचार करके दो उत्पाद संवर्गों कीटनाशक तथा औषधियों को निकालने का निर्णय लिया गया। इसके परिणामस्वरूप इस समय ईको मुहर योजना के अंतर्गत 16 समूह हैं।

लाइसेंस प्रदान करने की कार्य प्रणाली : भामा ब्यूरो द्वारा ईको मुहर योजना के अंतर्गत लाइसेंस प्रदान करने के लिये अपनाई जाने वाली कार्य प्रणाली वही है जो भामा ब्यूरो द्वारा उत्पाद प्रमाणन योजना के अंतर्गत लाइसेंस देने के लिये अपनाई जाती है। इस कार्य प्रणाली की महत्त्वपूर्ण खास बातें निम्नलिखित हैं :-

भामा ब्यूरो के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय अथवा देशभर में फैले इसके किसी भी क्षेत्रीय अथवा शाखा कार्यालय से निर्धारित आवेदन पत्र प्राप्त किया जाए। विधिवत भरा हुआ आवेदन पत्र अपेक्षित शुल्क के साथ ब्यूरो के उस शाखा कार्यालय में प्रस्तुत किया जाए जिसके कार्य क्षेत्र में आवेदनकर्ता की इकाई स्थित हो। आवेदन पत्र जमा करते समय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति प्रस्तुत करना भी अपेक्षित है। विधिवत भरा हुआ आवेदन पत्र प्राप्त होने पर भामा ब्यूरो आवेदक की इकाई के आरंभिक निरीक्षण की व्यवस्था करता है। यह निरीक्षण आवेदक के साथ परस्पर सहमति से तय की गई सुविधाजनक तारीख पर किया जाता है। भामा ब्यूरो प्रमाणन मुहर योजना के संतोषप्रद प्रचालन के लिये आवेदन के निर्माण और गुणता नियंत्रण के उपस्करों तथा उसके परीक्षण करने वाले कार्मिकों की सक्षमता का मूल्यांकन किया जाता है। निरपेक्ष परीक्षण के लिये नमूना प्रारंभिक निरीक्षण के समय ही ले लिया जाता है और संबद्ध भारतीय मानक के प्रति अनुरूपता के मूल्यांकन के लिये इस नमूने का परीक्षण निरपेक्ष प्रयोगशाला में कराया जाता है।

ब्यूरो द्वारा निर्धारित की गई परीक्षण और निरीक्षण की योजना भी आवेदक को उसकी स्वीकृति के लिये दी जाती है। इस योजना में सांख्यिकीय गुणवत्ता नियंत्रण के माध्यम से तथा प्रक्रमण के दौरान गुणता नियंत्रण उपायों से उत्पाद में वांछित गुणवत्ता प्राप्त करने के उपाय एवं साधन निर्दिष्ट होते हैं। नमूनों के निरीक्षण और परीक्षण के लिये शुल्क का भुगतान आवेदक द्वारा ही किया जाता है। संतोषजनक प्रारंभिक निरीक्षण रिपोर्ट और प्रयोगशाला से संतोषजनक परीक्षण रिपोर्ट मिलने के बाद भामा ब्यूरो के सक्षम अधिकारी द्वारा उस इकाई को एक निर्दिष्ट अवधि के लिये मानक मुहर (इस मामले में ईको मुहर के साथ) लगाने का लाइसेंस प्रदान किया जाता है। यदि किसी इकाई के पास अपने उत्पाद के लिये भामा ब्यूरो प्रमाणन मुहर लाइसेंस पहले से ही है और वह अपने उत्पाद को ईको मुहर के अंतर्गत शामिल करना चाहती है तो इसके लिये अलग से आवेदन भेजना अपेक्षित नहीं है। इस मामले में वह इकाई ब्यूरो के संबद्ध कार्यालय से विशिष्ट अनुरोध कर सकती है जो उसी लाइसेंस में नई किस्में/ग्रेड शामिल करने के लिये वर्तमान प्रक्रिया के अनुसार उत्पाद पर ईको मुहर के मानदण्ड शामिल करने के लिये आवश्यक कार्यवाही करेगा।

इकाई को प्रदान किये गये लाइसेंस की वैधता अवधि के दौरान प्रमाणन मुहर योजना के प्रचालन का मूल्यांकन करने के लिये भामा ब्यूरो आवेदक के उस परिसर जिसमें निर्माण कार्य किया जाता है के आकस्मिक आवधिक निरीक्षण की व्यवस्था करता है। निरपेक्ष परीक्षण के लिये फैक्ट्री से नमूने भी लिये जाते हैं, तथा लाईसेंसधारी की कार्यकारिता के मूल्यांकन के लिये उपभोक्ता फोरम/संगठनों से प्राप्त फीडबैक को भी ध्यान में रखा जाता है। विभिन्न दुकानों तथा ग्राहकों के परिसर से इकट्ठे किये गये नमूने भी लाइसेंसधारी की कार्यकारिता के मूल्यांकन के मानदण्ड हैं, जिस अवधि के लिये लाइसेंस प्रदान किया गया है यदि उस अवधि के दौरान लाइसेंस का प्रचालन संतोषजनक है तो लाइसेंस पुन: अगली अवधि के लिये नवीकृत कर दिया जाता है।

ईको लोगो : भारत में मुहर के लोगों के रूप में मिट्टी का बर्तन चुना गया है। जाने-पहचाने मिट्टी के बर्तन के निर्माण में मिट्टी जैसे पुन: उपयोग में लाए जा सकने वाले संसाधन का उपयोग किया जाता है। इससे खतरनाक अवशिष्ट उत्पन्न नहीं होते और इसको बनाने में ऊर्जा की खपत कम होती है। इसका पुष्ट और आकर्षक रूप सामर्थ्य और विनश्वरता, दोनों का ही प्रतिनिधित्व करता है जो ईको सिस्टिम की विशिष्टिता का भी वर्णन करता है। ईको मुहरयोजना के लोगों का अभिप्राय है कि वह उत्पाद जिस पर यह लोगो अंकित है वह पर्यावरण को कम से कम क्षति पहुँचाता है।

अन्तरराष्ट्रीय मार्गदर्शी सिद्धांत : अन्तरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (आईएसओ) ने पर्यावरण संबंधी लेबल लगाने के विषय पर आईएसओ/टीसी 207 ‘‘एन्वायर्नमेंट मैनेजमेंट’’ के माध्यम से निम्नलिखित अन्तरराष्ट्रीय ‘आईएसओ 14020- एन्वायर्नमेंट लेबल्स एण्ड डिक्लेयरेशन्स-जनरल प्रिंसीपल्स’ प्रकाशित किया है ये दो मानक ‘‘टाईप प्रथम’’ पर्यावरण लेबलिंग योजना के मार्गदर्शी सिद्धांत करते हैं जो तृतीय पक्ष के प्रमाणन के प्रयोजन से बनाये गये हैं। यदि हम जानना चाहें कि भारतीय ईको मुहर योजना उपर्युक्त आईएसओ के मार्गदर्शी सिद्धांतों के अनुरूप है तो हम पाते हैं कि ये सिद्धांत पूर्णत: अन्तरराष्ट्रीय मार्गदर्शी सिद्धांतों के अनुरूप हैं। अत: यह आशा की जाती है कि प्रत्यायन मिलने के उपरांत भारतीय ईको मुहर योजना भी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य होगी।

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एस. आ. बालोच एवं लोखो पूनी
वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून