पर्यावरण-पर्यटन और हिमालय

Author:एम.एस. कोहली
Source:योजना, अगस्त 2002

हिमालय क्षेत्र का कठोर संरक्षण ही समाधान नहीं है। इसके विकास के लिये यहाँ के स्थानीय निवासियों के जीवन-स्तर को ऊपर उठाना होगा और क्षेत्र के आर्थिक विकास पर ध्यान देना होगा। असीम सहयोग के इस युग में समाधान इसी में निहित है कि हिमालय के पारिस्थितिक तंत्र में परिवर्तन लाए बिना ऐसा किया जाए।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सन 2002 को अन्तरराष्ट्रीय पर्वत वर्ष के रूप में ज्ञापित किया है। चूँकि पर्यटन क्षेत्र की अधिकांश गतिविधियाँ पर्वतीय क्षेत्रों में होती हैं, अतः पारिस्थितिक पर्यटन और हिमालय विश्व की धरोहर है, उसे महत्व देना बेहद जरूरी है। हिमालय में प्रवेश कर चुका पर्यावरणीय ह्रास एक आपदा है। ठीक इसी प्रकार की आपदाएँ ‘इंडिज’ और उत्तरी अफ्रीका में देखी गई हैं। हालाँकि पिछली शताब्दी में आल्प्स में विनाशकारी जलप्रवाह को सन्तुलित करने के लिये बड़े कदम उठाए गए, लेकिन नई पर्यावरणीय समस्याओं के लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं।

यूरोपीय अल्प्स पर्वत पर लाखों की तादाद में आने वाले सैलानियों की वजह से होने वाले क्षरण की ओर हाल ही में पर्यावरणीय समूहों का ध्यान गया है। क्या हम लोगों को आल्प्स से सबक नहीं लेना चाहिए और उस समय तक इंतजार करना चाहिए जब तक विनाश प्रतिउत्तरदायी न हो जाए? पर्यावरणीय समस्याएँ हिमालय जितनी गम्भीर और कहीं भी नहीं हैं, क्योंकि यह वृहद पारिस्थितिक तंत्र एक भयावह खतरे से गुजर रहा है।

वैभवशाली हिमालय अपने अपार सौन्दर्य और महत्व के लिये विख्यात है, जो इसकी स्थिरिता और भव्यता को प्रदर्शित करता है, लेकिन वास्तव में यह पृथ्वी का सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र है। चीन, भारत, नेपाल, पाकिस्तान, भूटान, बर्मा और रूस तक फैले हिमालय क्षेत्र में 3 करोड़ लोग रहते हैं, इसके अतिरिक्त 35 करोड़ लोग इसके नदी बेसिनों में रहते हैं। यह क्षेत्र सिन्धु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और हांगहो-यांगसी का स्रोत है, जो विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक खनिज सम्पदाओं से भरा हुआ है। यह करोड़ों लोगों के हित के लिये महत्त्वपूर्ण है। ‘देवताओं की धरती’ के रूप में प्रसिद्ध हिमालय का कई संस्कृतियों और प्रजातियों के उत्थान और विकास में योगदान रहा है। इनमें से कुछ अलग-थलग हो गई और अन्य दूसरी लाखों के समूह में विकसित र्हुईं।

पिछले तीन दशकों से बर्फ और अनेकों वनस्पतियों से भरा यह पर्वत कई भू-गर्भिक परिवर्तनों का साक्षी रहा है। भूस्खलन एवं भू-क्षरण, जनसंख्या का दबाव और पर्वतों में प्रवास, वनस्पतिक एवं जैव परिवर्तन, पर्वतीय अभियान और पर्वतारोहणों की बढ़ती संख्या, आदि इसके कारण रहे हैं।

हिमालय क्षेत्र का कठोर संरक्षण ही इन समस्याओं का समाधान नहीं है। इसके विकास के लिये यहाँ के स्थानीय निवासियों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना होगा और क्षेत्र के आर्थिक विकास पर ध्यान देना होगा। असीम सहयोग के इस युग में समाधान इसमें निहित है कि हिमालय के पारिस्थितिक तंत्र में परिवर्तन लाए बिना यह कार्य किया जाए। यह स्थानीय निवासियों, वहाँ की सरकारों और अन्तरराष्ट्रीय पर्वतारोहण समितियों के लिये श्रमसाध्य कार्य है।

49 वर्ष पूर्व जब सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोरगे माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचे थे, तब हिमालय में दर्जन भर से कम पर्वतारोहण और 100 से कम अभियान हुए थे। आज पाँच लाख से अधिक अभियान और 1000 से अधिक रोमांचक पर्यटन सहित पर्वतारोहण हिमालय में तेजी से बढ़ रहा है।

इसके साथ ही 50 लाख तीर्थ यात्री जिनमें बौद्ध, हिन्दू और सिख शामिल हैं, वे हिमालय में फैले अपने तीर्थ स्थानों की यात्रा करते हैं।

समेकित पर्वतीय विकास का अन्तरराष्ट्रीय केन्द्र- (आईसीमोड):
पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र के विकास पर विचार करने, अंतर्सहयोग बढ़ाने और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग को इन समस्याओं के समाधान में शामिल करने के उद्देश्य से मार्च 1979 में म्यूनिख में अन्तरराष्ट्रीय विकास के लिये जर्मन फाउंडेशन द्वारा एक अन्तरराष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई। इसका लक्ष्य था- पर्वतीय क्षेत्रों का सघन विकास और सम्पदा की विभिन्नता व संरक्षणात्मक कार्यों के बीच तालमेल बिठाना। कार्यशाला में एक स्वशासी अन्तरराष्ट्रीय संस्था बनाने का सुझाव आया जो वैज्ञानिक जानकारी एकत्र करने, बनाने, जाँच करने और उपयोग करने से सम्बन्धित कार्य करे। साथ ही यह संस्था पर्वतीय विकास के प्रयोगात्मक डाटा से सम्बन्धित कार्य भी सम्पादित करे। इस प्रकार की संस्था एक क्लीयरिंग हाउस जैसी हो, जो जानकारी उपलब्ध कराने के अलावा विशेषज्ञ सेवा भी उपलब्ध करा सके। एक मुख्य संस्थापक ने प्रस्ताव दिया कि नई संस्था की कम से कम तीन देशों में शाखाएँ हों।

आईसीमोड के इतिहास में दूसरा मील का पत्थर साबित हुआ ‘समेकित पर्यावरणीय शोध और प्रशिक्षण की आवश्यकता’ पर आयोजित बैठक। यह क्षेत्रीय बैठक दक्षिण एशियाई पर्वतीय तंत्र, विशेष तौर पर हिमालय के हिन्दूकुश पर विचार करने के लिये यूनेस्को के कार्यक्रम ‘मनुष्य और क्षोभ मंडल’ के तहत रखी गई थी। इसमें महामहिम नेपाल सरकार ने पूरा सहयोग दिया। इस बैठक में विभिन्न देशों के प्रतिनिधिमंडलों और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसमें क्षोभ मंडल की समस्याओं और जागरुकता के प्रस्तावों, प्रशिक्षण कार्य और पुस्तकीकरण के इर्द-गिर्द विचार-विमर्श केन्द्रित रहा। समेकित शोध एवं प्रशिक्षण तथा तकनीकी सलाहकारीय सेवा क लिये संस्था की स्थापना की अनुशंसा की गई। प्रस्तावित संस्था के लिये नेपाल सरकार द्वारा जगह मुहैया कराने के प्रस्ताव का स्वागत किया गया। आईसीमोड ने हिमालय क्षेत्र के सभी देशों को इस कार्यक्रम में शामिल किया है। कुछ देशों के साथ सही सोच अथवा सहयोगी रवैया विकसित किया गया। आईसीमोड ने विश्व विज्ञान समुदाय की व्यापक रुचि भी आकर्षित की।

अन्नपूर्णा संरक्षण क्षेत्र परियोजना


सन 1986 की अन्नपूर्णा संरक्षण क्षेत्र परियोजना एक रुचिकर विकास था सरकार ने एक दर्जन राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों में 7 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र इसके लिये अलग कर दिया। 1000 वर्ग मील क्षेत्र की इस अन्नपूर्णा संरक्षण क्षेत्र परियोजना का प्रशासन किंग महेन्द्रा ट्रस्ट फाॅर नेचर कंजर्वेशन और वित्तपोषण विश्व वन्यजीव कोष और निजी दानकर्ता द्वारा सम्पोषित है।

यह परियोजना सहयोग के नए जज्बात का एक बेहतरीन प्रयोग है। यह नवीनतम विचारों और पर्यावरणीय प्रबंधन का सम्मिश्रण है। एसीए परियोजना के वित्तपोषकों ने ग्राम्यवासियों को क्षेत्रीय सम्पदा के स्वामित्व का अधिकार सौंपा है।

पर्यटकों पर लगाए गए शुल्क से होने वाली आय का अधिकांश हिस्सा इसका प्रबंधन करने वाले ग्राम्यवासियों को दिया जाता है। वे लोग अभ्यारण्यों और आस-पास जलावन के लिये लकड़ी और केरोसिन डिपो के ईंधन के प्रयोग को वर्जित करते हैं। वनरक्षकों को पगडंडियों की सफाई और मरम्मत, वातावरण को स्वच्छ रखने, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के प्रयोग और भू-क्षरण के खतरे रोकने का प्रशिक्षण दिया जाता है।

जनता अपनी जमीन की सुरक्षा और तात्कालिक लाभ पर भविष्य के लाभों को कितना महत्व देती है, इस बात पर एसीए परियोजना का भविष्य निर्भर करता है।

हिमालयी पर्यावरणीय ट्रस्ट (एचईटी)


1988 के अंत में मैंने अनुभव किया कि दो-दशक से मैं एयर इंडिया की ओर से विश्व भ्रमण कर रहा हूँ। और अपनी पुस्तकों, अभियानों, रेडियो और टेलीविजन साक्षात्कारों के जरिए हिमालय को ख्याति दिला रहा हूँ। साथ ही अल्पाइन क्लबों को भी सम्बोधित करता रहा हूँ। इस दौरान मैंने महसूस किया कि यह हिमालय के लिये कुछ लेकर लौटने का बेहतरीन मौका है। मसलन इसकी समृद्धि को संरक्षित करने के लिये कोई परियोजना। मैंने भारत में न्यूजीलैंड के तत्कालीन उच्चायुक्त सर एडमंड हिलेरी से सम्पर्क किया। उनसे हिमालय रोमांच ट्रस्ट के गठन की योजना पर बात की। सर एडमंड ने मेरे विचार को पसंद किया। इस प्रकार हम लोगों ने संयुक्त प्रयास के जरिए पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण और नवीनीकरण का कार्य शुरू किया। विश्व के विभिन्न भागों के निकट मित्र, पर्वतारोही, नेता आदि पारिस्थितिक तंत्र को बचाने जैसे इस सुकार्य के लिये आमंत्रित किए जाने और ट्रस्ट में शामिल होने के प्रति उत्साहित दिखे।

यह ट्रस्ट मूल रूप से 17 जून 1988 को नई दिल्ली में पंजीकृत हुआ। इसका 14 अक्तूबर 1989 को हांगकांग में औपचारिक रूप से उद्घाटन किया गया। बाद में इस ट्रस्ट का नाम बदल कर हिमालय पर्यावरणीय ट्रस्ट रखा गया जो 12 जून 1991 को भारतीय ट्रस्ट अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत हुआ।

लक्ष्य एवं उद्देश्य


1. पर्वतारोहियों, अभियानकर्ताओं, अल्पाइन क्लबों, पर्यटन अभियान संगठित करने वालों और हिमालय परिक्षेत्र की सरकारों के सहयोग से हिमालयी पर्यावरण को संरक्षित करना, इसकी वनस्पति, जीवों और प्राकृतिक सम्पदा को संगठित करना तथा स्थानीय निवासियों के रीति-रिवाजों तथा हितों का संरक्षण करना।

2. हिमालय क्षेत्र के पर्यटकों द्वारा यहाँ के पर्यावरण को व्यवस्थित रखने के लिये नियम और नैतिकता के मानक बनाना।

3. हिमालय के पर्यावरण की समस्याओं पर विचार-विमर्श तथा इन विषयों पर विश्व का ध्यान आकर्षित करने के लिये अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन, गोष्ठी और हिमालयी पर्यटन बैठक आयोजित करना।

4. स्थानीय राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के बीच सूचना और सहयोग का आदान-प्रदान करना यथा-समेकित पर्वतीय विकास के अन्तरराष्ट्रीय केन्द्र, काठमांडू और पर्वतीय संरक्षण आयोग यूआईएए के बीच सहयोग।

5. हिमालय के देशों से सम्बन्धित रोमांचक पर्यटन के लिये आवश्यक दिशा-निर्देश तय करना। ख्याति प्राप्त जगहों पर भीड़-भाड़ रोकना। अभियानकर्ताओं के उचित बिखराव के लिये कार्य करना, जो पूरे हिमालय क्षेत्र में हो।

अभियानकर्ता ट्रस्टी हिमालय में रोमांचक पर्यटन के अभूतपूर्व विकास के लिये उत्तरदायी हैं। वे विपरीत प्रभावों- मसलन हिमालय के कुछ मुख्य स्थानों के प्रदूषण, अभियान एजेंसियों के प्रदूषणविरोधी कार्यों की कमी, कुछ मुख्य स्थानों की भीड़ और पर्यावरणीय शिक्षा के अभाव के प्रति चिन्तित थे।

ट्रस्ट ने हिमालय के पर्यावरणीय पहलुओं की विशेषज्ञता विकसित करने का निर्णय लिया ताकि हिमालय क्षेत्र की सरकारों तथा अन्य संस्थाओं को उनके श्रमसाध्य कार्य में सहायता मिल सके। ट्रस्ट का लक्ष्य है अभियानकर्ताओं में हिमालयी पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना और इस क्षेत्र की सुन्दरता बरकरार रखने के लिये उन्हें उत्साहित और शिक्षित करना। इस भव्य पर्वत के शताब्दियों तक संरक्षण के लिये एक उत्तेजनापूर्ण उत्तरदायित्व की भावना को विकसित करना भी इसके उद्देश्यों में एक है। ट्रस्टियों ने 1991 में टोक्यो में सम्पन्न अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में सभी यात्रियों के लिये नियम बनाए जो विश्व भर में स्वीकृत और लागू हुए।

हिमालय पर्यावरणीय ट्रस्ट में स्वीकृत हुई हिमालयी नियमावली इस प्रकार है: -

(क) प्राकृतिक पर्यावरण को संरक्षित करना।
(ख) कैम्प क्षेत्र: ज्ञातव्य हो कि एक ही कैम्प क्षेत्र दूसरे दल द्वारा भी प्रयोग किया जाएगा, जब आपने उसे खाली कर दिया हो। अतः कैम्प को उससे भी ज्यादा स्वच्छ छोड़ें जैसा आपने उसे पाया था।
(ग) वन्यहरण को नियन्त्रित करना: आग उत्पन्न न करें और दूसरों को ऐसे कार्यों से रोकें। जहाँ जलावन की लकड़ी की कमी हो, वहाँ कम से कम लकड़ी का उपयोग कर जल को गर्म करें। जब भी सम्भव हो, ऐसे निवास का चयन करें, जहाँ किरॉसिन का उपयोग हो अथवा ईंधन-रक्षक जलाव की लकड़ी का स्टोव हो। अपने साथ पौधे की कलम ले जाएँ और गुजरे हुए स्थान पर रोप कर लक्ष्य की सहायता करें।
(घ) सूखे कागज और पैकेट को सुरक्षित स्थानों पर जलाएँः रद्दी कागजों और पारिस्थितिक क्षरण वाले वस्तुओं को जमीन में गाड़ें और पर्यावरण क्षरणीय भोज्य पदार्थों सहित अन्य सामानों को वापस लाएँ उन कचरों को वापस लाएँ जो पर्यावरण द्वारा क्षरणीय न हों। अन्य लोगों द्वारा फैलाई गई गंदगी देखें तो उसे साफ कर दें।
(ङ) स्थानीय जल स्वच्छ रखें और प्रदूषकों के प्रयोग से बचें: डिटर्जेंट का बहावों और स्रोतों में प्रयोग न करें। यदि शौचालय की सुविधा उपलब्ध न हो तो जल स्रोतों से कम से कम 30 मीटर दूर जाएँ और उसे जमीन में गाड़ दें।
(च) पौधों को प्राकृतिक पर्यावरण में विकसित होने दें: कलमों, पौधों और जड़ों को हिमालय क्षेत्र के कई भागों से उखाड़ना गैर कानूनी है।
(छ) अपने पथ-प्रदर्शक और कुली को संरक्षण के कार्य में मदद करें: रसोईयों और कुलियों को प्रवाह अथवा नदी में कचड़ा फेंकने से मना करें।
(ज) हिमालय को स्वयं परिवर्तित होने दें, उसमें परिवर्तन न करें।
(झ) स्थानीय रिवाजों का आदर करें, स्थानीय संस्कृृति का संरक्षण करें और स्थानीय गर्व कायम रखें।
(ञ) चित्र खींचते समय निजित्व का आदर करें: अनुमति लें और स्वयं को अनुशासित रखें।
(ट) पवित्र स्थानों का सम्मान करें। जो आप देखने आए हैं, उसका संरक्षण करें, धार्मिक वस्तुओं को कभी भी हटाएँ या छेड़ें नहीं। मंदिरों में घूमने के दौरान जूते उतार दें।
(ठ) बच्चों को पैसे देने से बचें, क्योंकि यह भीख माँगने को प्रोत्साहित करता है: परियोजना, स्वास्थ्य केन्द्र और स्कूल को दान देना ज्यादा सकारात्मक सहयोग है।
(ड) स्थानीय तौर-तरीकों को सम्मान देने से आपको आदर मिलता है: ढीले और हल्के कपड़े पहनें-छोटी पैंट, भड़काऊ टाॅप और तंग कपड़ों को प्राथमिकता न दें। बाँह में बाँह डालकर चलना और खुलेआम चुम्बन स्थानीय लोग पसंद नहीं करते।

पिछले 13 वर्षों के दौरान हिमालय के पर्यावरण पर कई सम्मेलन आयोजित हुए। हिमालय के पर्यावरण पर हिमालयी पर्यावरणीय ट्रस्ट द्वारा प्रायोजित पहला अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन 30-31 मार्च 1990 को नई दिल्ली में हुआ। उसी वर्ष अक्तूबर में यूआईएए की सामान्य सभा की बैठक नई दिल्ली में हुई और हिमालय के पर्यावरण पर केन्द्रित दिल्ली अधिघोषणा जारी की गई। हिमालयी पर्यावरणीय ट्रस्ट और भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रूप से प्रायोजित हिमालय पर्वतारोहण और पर्यटन सम्मेलन 21-22 सितम्बर को नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ। उसी वर्ष 10-11 नवम्बर को जापान के हिमालय रोमांच ट्रस्ट ने हिमालय के पर्यावरण पर अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की। इसमें विश्व भर के 2000 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

4 अप्रैल, 1992 को सर एडमंड हिलेरी की अध्यक्षता में नई दिल्ली में गंगोत्री के संरक्षण पर सेमिनार हुआ। इसके तुरन्त बाद 8-9 मई को काठमांडू में यूआईएए के पर्वत संरक्षण आयोग की बैठक हुई। 21-22 सितम्बर, 1992 को नई दिल्ली में हिमालयी पर्वतारोहण और पर्यटन सम्मेलन हुआ, जिसमें हिमालयी पर्वतारोहण के विभिन्न पहलुओं पर विचार विमर्श हुआ। जापान के मत्सुमतो में पर्वतीय संरक्षण पर एक माह बाद संगोष्ठी का आयोजन हुआ।

सन 1994 में गंगोत्री संरक्षण परियोजना का उद्घाटन हुआ जो हिमालय पर्यावरणीय ट्रस्ट के लिये एक मील का पत्थर है। यह भारत सरकार, उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार और हिमालयी पर्यावरणीय ट्रस्ट की संयुक्त और समेकित परियोजना है। हिमालयी पर्यावरणीय ट्रस्ट कोष में अमेरिकी हिमालय फाउंडेशन का योगदान है। यह हम सभी का अनुभव है कि इसमें स्थानीय निवासियों का सहयोग जरूरी है। गंगोत्री संरक्षण परियोजना का कार्य सभी को साथ लेकर उद्देश्य प्राप्त करना है।

जनवरी 2000 में हिमालयी पर्यावरणीय ट्रस्ट ने नई दिल्ली में स्वर्ण जयंती मनाई। इन सभी सम्मेलनों का लक्ष्य हिमालयी पर्यावरण रहा है। इसके अलावा कई अल्पाइन क्लबों और पर्यटन व्यापार संस्थाओं ने भी अपने कार्यक्रमों में हिमालयी पर्यावरण के संरक्षण को शामिल किया है। हिमालयी पर्यावरण के लगभग सभी ट्रस्टियों का विश्वास है कि हिमालय के संरक्षण का सन्देश विश्व भर में फैलाया जाए।

(कैप्टेन एम.एस. कोहली 1965 के ऐतिहासिक ऐवरेस्ट अभियान दल के नेता थे; वर्तमान में हिमालयी पर्यावरणीय ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं।)