पर्यावरण विनाश बनाम अस्तित्व का संकट

Author:भारत डोगरा
Source:सर्वोदय प्रेस सर्विस, मई 2016

विश्व स्तर पर पर्यावरण सम्बन्धी आन्दोलनों का जनाधार इस कारण व्यापक नहीं हो सका है क्योंकि इसमें न्याय व समता के मुद्दों का उचित ढंग से समावेश नहीं हो पाया है। जलवायु बदलाव के संकट को नियंत्रण में करने के उपायों में जनसाधारण की भागीदारी प्राप्त करने का सबसे असरदार उपाय यह है कि विश्व स्तर पर ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन में पर्याप्त कमी वह भी उचित समयावधि में लाये जाने की ऐसी योजना बनाई जाये जो सभी लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से जुड़ी हो। वैज्ञानिक जगत में अब इस बारे में व्यापक सहमति बनती जा रही है कि धरती पर जीवन को संकट में डालने वाली अनेक गम्भीर पर्यावरणीय समस्याएँ दिनोंदिन विकट होती जा रही हैं। इनमें जलवायु का बदलाव सबसे चर्चित समस्या है। परन्तु इसी के साथ अनेक अन्य गम्भीर समस्याएँ भी हैं जैसे समुद्रों का अम्लीकरण या एसिडिफिकेशन व जलसंकट।

ऐसी अनेक समस्याओं का मिला-जुला असर यह है कि इनसे धरती पर पनप रहे विविध तरह के जीवन के अस्तित्व मात्र के लिये संकट उपस्थित हो गया है। विविध प्रजातियों के अतिरिक्त इस संकट की पहुँच मनुष्य तक भी हो गई है।

इन पर्यावरणीय समस्याओं के अतिरिक्त एक अन्य वजह से भी धरती पर जीवन के लिये गम्भीर संकट उपस्थित हुआ है और वह है महाविनाशक हथियारों के बड़े भण्डार का एकत्र होना व इन हथियारों के वास्तविक उपयोग की या दुर्घटनाग्रस्त होने की बढ़ती सम्भावनाएँ। इन दो कारणों से मानव इतिहास में पहली बार मानव निर्मित कारणों की वजह से जीवन के अस्तित्व मात्र के लिये गम्भीर संकट उत्पन्न हुआ है। हम इसे अस्तित्व का संकट भी कह सकते हैं।

मानव इतिहास के सबसे बड़े सवाल न्याय, समता और लोकतंत्र के रहे हैं। अब जब अस्तित्व की बड़ी चुनौती सामने है तो इसका सामना भी न्याय, समता और लोकतंत्र की राह पर ही होना चाहिए। अस्तित्व का संकट उपस्थित करने वाले कारणों को दूर करना निश्चय ही सबसे बड़ी प्राथमिकता होना चाहिए पर अभी तक इन समस्याओं के समाधान का विश्व नेतृत्व का रिकार्ड बहुत निराशाजनक रहा है।

इस विफलता के कारण इस सन्दर्भ में जनआन्दोलनों की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई है। यहाँ पर एक बड़ा सवाल सामने है कि अनेक समस्याओं के दौर से गुजर रहे यह जनान्दोलन इस बड़ी जिम्मेदारी को कहाँ तक निभा पाएँगे।

ऐसी अनेक समस्याओं के बावजूद समय की माँग है कि जनआन्दोलन अपनी इस बहुत महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाने का अधिकतम प्रयास अवश्य करें। इसके लिये एक ओर तो यह बहुत जरूरी है कि जनआन्दोलनों में व्यापक आपसी एकता बने तथा दूसरी ओर यह भी उतना ही जरूरी है कि आपसी गहन विमर्श से बहुत सुलझे हुए विकल्प तैयार किये जाएँ।

विश्व स्तर पर पर्यावरण सम्बन्धी आन्दोलनों का जनाधार इस कारण व्यापक नहीं हो सका है क्योंकि इसमें न्याय व समता के मुद्दों का उचित ढंग से समावेश नहीं हो पाया है। जलवायु बदलाव के संकट को नियंत्रण में करने के उपायों में जनसाधारण की भागीदारी प्राप्त करने का सबसे असरदार उपाय यह है कि विश्व स्तर पर ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन में पर्याप्त कमी वह भी उचित समयावधि में लाये जाने की ऐसी योजना बनाई जाये जो सभी लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से जुड़ी हो। तत्पश्चात इस योजना को कार्यान्वित करने की दिशा में तेजी से बढ़ा जाये।

यदि इस तरह की योजना बनाकर कार्य होगा तो ग्रीनहाऊस गैस उत्सर्जन में कमी के जरूरी लक्ष्य के साथ-साथ करोड़ों अभावग्रस्त लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का लक्ष्य अनिवार्य तौर पर इसमें जुड़ जाएगा व इस तरह ऐसी योजना के लिये करोड़ों लोगों का उत्साहवर्धक समर्थन भी प्राप्त हो सकेगा। यदि गरीब लोगों के लिये जरूरी उत्पादन को प्राथमिकता देने वाला नियोजन न किया गया तो फिर विश्व स्तर पर बाजार की माँग के अनुकूल ही उत्पादन होता रहेगा।

वर्तमान विषमताओं वाले समाज में विश्व के धनी व्यक्तियों के पास क्रय शक्ति बेहद अन्यायपूर्ण हद तक केन्द्रित है। अतः बाजार में उनकी गैर-जरूरी व विलासिता की वस्तुओं की माँग को प्राथमिकता मिलती रहेगी। जिससे अन्ततः इन्हीं वस्तुओं के उत्पादन को प्राथमिकता मिलेगी। सीमित प्राकृतिक संसाधनों व कार्बन स्पेस का उपयोग इन गैरजरूरी वस्तुओं के उत्पादन के लिये होगा। गरीब लोगों की जरूरी वस्तुएँ पीछे छूट जाएँगी, उनका अभाव बना रहेगा या और बढ़ जाएगा।

अतः यह बहुत जरूरी है कि ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की योजना से विश्व के सभी लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की योजना को जोड़ दिया जाये व उपलब्ध कार्बन स्पेस में बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देने को एक अनिवार्यता बना दिया जाये।

इस योजना के तहत जब गैर-जरूरी उत्पादों को प्राथमिकता से हटाया जाएगा तो यह जरूरी बात है कि सब तरह के हथियारों के उत्पादन में बहुत कमी लाई जाएगी। मनुष्य व अन्य जीवों की भलाई की दृष्टि से देखें तो हथियार न केवल सबसे अधिक गैरजरूरी हैं अपितु सबसे अधिक हानिकारक भी हैं। इसी तरह के अनेक हानिकारक उत्पाद हैं (शराब, सिगरेट, कुछ बेहद खतरनाक केमिकल्स आदि) जिनके उत्पादन को कम करना जरूरी है।

इस तरह की योजना पर्यावरण आन्दोलन को न्याय व समता आन्दोलन के नजदीक लाती है व साथ ही इन दोनों आन्दोलनों को शान्ति आन्दोलन के नजदीक लाती है। जब यह तीनों सरोकार एक होंगे तो दुनिया की भलाई के कई महत्त्वपूर्ण कार्य आगे बढ़ेंगे।

Latest

गुजरात के विश्वविद्यालय ने वर्षा जल को सरंक्षित करने का नायाब तरीका ढूंढा 

‘अपशिष्ट जल से ऊर्जा बनाने में अधिक सक्षम है पौधा-आधारित माइक्रोबियल फ्यूल सेल’: अध्ययन

15वें वित्त आयोग द्वारा ग्रामीण स्थानीय निकायों को जल और स्वच्छता के लिए सशर्त अनुदान

गंगा किनारे लोगों के घर जब डूबने लगे

ग्रामीण स्थानीय निकायों को 15वें वित्त आयोग का अनुदान और ग्रामीण भारत में जल एवं स्वच्छता क्षेत्र पर इसका प्रभाव

जल संसाधन के प्रमुख स्त्रोत क्या है

बाढ़ की तबाही के बीच स्त्रियों की समस्याएं

अनदेखी का शिकार: शुद्ध जल संकट का स्थायी निदान

महाराष्ट्र एक्वीफर मैपिंग द्वारा जलस्रोत स्थिरता सुनिश्चित करना 

बिहार में जलवायु संकट से बढ़े हीट वेव से निपटने का बना एक्शन प्लान