पर्यावरणीय प्रदूषण और अम्ल-वर्षा (Environmental pollution and acid - rain)

Author:दिनेश मणि
Source:योजना, जून 2002
अम्ल-वर्षा के जन्म की कहानी बीसवीं शती के दूसरे दशक से प्रारंभ होती है जब कोयला और पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों का उपयोग बढ़ने लगा। अमेरिकी वैज्ञानिक—हॉल बी.एच. कूपर (जूनियर) और जोस ए. लोपेज का मानना है कि अम्ल-वर्षा की 1911 में सर्वप्रथम सूचना देने का श्रेय लीड्स विश्वविद्यालय, इंग्लैंड के चार्ल्स क्रोथर और आर्थर जी. रुस्टीन को जाता है जिन्होंने लीड्स के औद्योगिक नगर में अम्ल-वर्षा का पी.एच. मान 3.2 निकाला।क्या आपने कभी कल्पना की है कि पानी की शीतल फुहार की जगह यदि तीखे अम्ल की वर्षा हो तो कैसा लगेगा? वन्य जीव-जंतु और पक्षी भय से भागने लगेंगे, फसलें नष्ट हो जाएगी, झीलों और नदियों का जल विषैला हो जाएगा, ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं के परखच्चे उड़ने लगेंगे, बाजारों और सड़कों पर भगदड़ मच जाएगी और सर्वत्र ‘त्राहि-त्राहि’ का स्वर गूँजने लगेगा। लोग खुली जगह छोड़कर किसी छत के नीचे शरण की तलाश में भागेंगे। अब ‘अम्ल-वर्षा’ के प्रभाव से न केवल कुछ विशेष क्षेत्रों या देशों को खतरा है वरन यह एक विश्वव्यापी संकट के रूप में उभरकर हमारे सामने उपस्थित है।

नवीन अनुसंधानों से ज्ञात होता है कि अम्ल-वर्षा का प्रभाव संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है। ज्वालमुखियों से निकले लावा और कार्बनिक पदार्थों के विघटन के फलस्वरूप प्राकृतिक रूप से ही अम्ल बनता रहता है किंतु प्रकृति स्वयं इस अम्ल को पर्यावरण के साथ संतुलित कर लेती है और वास्तविकता तो यह है कि ‘औद्योगिक क्रांति’ से पूर्व ‘अम्ल-वर्षा’ जैसी किसी समस्या का जन्म ही नहीं हुआ था। अम्ल-वर्षा के जन्म की कहानी बीसवीं शती के दूसरे दशक से प्रारंभ होती है जब कोयला और पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों का उपयोग बढ़ने लगा। अमेरिकी वैज्ञानिक—हॉल बी.एच. कूपर (जूनियर) और जोस ए. लोपेज (1976) का मानना है कि अम्ल-वर्षा की 1911 में सर्वप्रथम सूचना देने का श्रेय लीड्स विश्वविद्यालय, इंग्लैंड के चार्ल्स क्रोथर और आर्थर जी. रुस्टीन को जाता है जिन्होंने लीड्स के औद्योगिक नगर में अम्ल-वर्षा का पी.एच. मान 3.2 निकाला।

नार्वे के वैज्ञानिकों ने बाद में अपने यहाँ की झीलों में मछलियों की संख्या में कमी का कारण झीलों के जल की बढ़ती हुई अम्लीयता को ठहराया। वैसे यह दूसरी बात है कि झील के जल की बढ़ती अम्लीयता का कारण 1960 के दशक में जाकर मालूम हो सका। पिछले दशक में जिस तेजी से जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल बढ़ा है वस्तुतः उसी के कारण हिम और वर्षा-जल अम्लीय हो गए हैं। एक जीवविज्ञानी के अनुसार तो अम्ल-वर्षा प्रांतों, राज्यों या राष्ट्रों के बीच एक ऐसा रासायनिक युद्ध है जिसका पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता।

1964 के नवम्बर माह में उत्तर-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई अम्ल-वर्षा जल का पी.एच. मान 2.1 था। 10 अप्रैल, 1974 में यूरोप से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार अम्ल-वर्षा का पी.एच. मान 2.4 और इसी अप्रैल माह में नार्वे के समुद्र तटीय क्षेत्र में हुई अम्ल-वर्षा का पी.एच. क्रमशः 2.7 और 3.55 था। अमेरिका के पेनसिल्वानिया नगर से तो अम्ल-वर्षा का पी.एच. मान 1.5 तक रिपोर्ट किया गया है। 1974-75 के मानसून के दौरान मुंबई में अम्लीयता का पी.एच. मान 4.8 रिकॉर्ड किया गया।

यह बात स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि इस अम्लीयता को नापने की इकाई पी.एच. (PH) है। पी.एच. स्केल 0 से 14 तक फैला होता है। किसी उदासीन घोल का पी.एच. मान 7 होता है जैसे दूध। सात से नीचे यह अम्लीयता और 7 से ऊपर क्षारीयता को इंगित करता है। आमतौर से अम्लीयता का कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की उपस्थिति है जो कार्बोनिक अम्ल (H2CO3) बना लेती है। कार्बोनिक अम्ल एक मंद या तनु अम्ल है जो पानी में कुछ-कुछ विघटित हो जाता है। इस अम्ल से पर्यावरण को क्षति नहीं पहुँचती। इस कारण वर्षा जल को शुद्ध जल माना जाता है और इसका पी.एच. मान 5.6 होता है। वर्षा जल की बढ़ती अम्लीयता का मुख्य कारण सल्फर डाइऑक्साइड गैस है जो ताप विद्युत संयंत्रों तांबा और निकेल के प्रगालकों और जीवाश्म ईंधन जलाने वाले गाँवों तथा शहरी क्षेत्रों में निकलती है। यही गैस निरंतर वातावरण में ऊपर पहुँचती रहती है और उसे दूषित करने का मुख्य कारक है।

भारत में शाहजहाँ और मुमताज के अमर प्रेम का उज्जवल प्रतीक, विश्व पर्यटकों का आकर्षक केंद्र और संगमरमरी बदन वाला कला का अद्वितीय स्मारक ‘ताजमहल’ भी अम्ल-वर्षा की चपेट से मुक्त नहीं रह सका है। ताजमहल से 40 किलोमीटर दूर स्थित मथुरा तेलशोधक कारखाने से निकलने वाली गैस से ताज के लिए दिन प्रतिदिन खतरा बढ़ता जा रहा है।इसके अतिरिक्त नाइट्रोजन के ऑक्साइड भी अम्लीयता में वृद्धि करते हैं जो संयंत्रों (विद्युत), ऑटोमोबाइलों का धुआं, और स्पेस-हीटरों से निकलते रहते हैं। सल्फर और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों का जब ऑक्सीकरण होता है तब गंधक का अम्ल और नाइट्रिक अम्ल बनता है। वस्तुतः इन्हीं अम्लों के कारण वर्षा जल और हिम अम्लीय हो जाते हैं। यही अम्ल-वर्षाजल या हिम के पिघलने के साथ धरती पर आकर जैव मंडल का हानि पहुँचाते हैं। अम्ल-वर्षा नम और शुष्क दोनों प्रकार की होती है। वस्तुतः इसे अम्ल-वर्षा न कहकर ‘अम्ल विक्षेपण’ कहना अधिक उपयुक्त होगा। नम विक्षेपण ही पर्यावरण के लिए अधिक हानिकारक है। अम्ल-वर्षा लगभग 70 प्रतिशत सल्फर के ऑक्साइड और 30 प्रतिशत नाइट्रोजन के ऑक्साइड के कारण होती है। यह भी देखा गया है कि अपने स्रोत से सैकड़ों-हजारों मील की यात्रा करके यह वहाँ भी अपने कुप्रभाव दिखाती है। यही कारण है कि अम्ल-वर्षा आज किसी एक देश की समस्या नहीं, अंतरराष्ट्रीय समस्या है।

जलीय पारिस्थितिकी


अम्ल-वर्षा के कारण झीलों और नदियों के जल पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। मृदु जल में बाई-कार्बोनेट कम मात्रा में पाई जाती है और इसी कारण उसमें अम्ल को निष्प्रभावी बनाने की शक्ति नहीं होती। झीलों के जल का 5.6 पी.एच. मान ज्यों-ज्यों नीचे आता जाता है, उसमें रहने वाली मछलियाँ कम होती जाती हैं और अंततः एकदम विलुप्त हो जाती हैं क्योंकि अम्ल का मछली की प्रजनन-शक्ति और अंडों की जीवन क्षमता पर सीधा प्रभाव पड़ता है। 5 पी.एच. मान के नीचे बड़ी मछलियों का भी अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। संपूर्ण जलीय जैव मंडल पर इसके भोजन की भी कमी हो जाती है। सर्वेक्षणों से ज्ञात हुआ है कि भारी अम्ल-वर्षा एक दिन में हजारों मछलियों की मृत्यु इस वजह से होती है क्योंकि अम्लीय जल में वे अपने शरीर के लवण का स्तर संतुलित नहीं रख पाती। नार्वे की 954 झीलों में से 697 झीलें मत्स्यरहित हो गई हैं और जिसमें मछलियाँ बची भी हैं तो बहुत कम संख्या में। मछलियों के अतिरिक्त इनमें अन्य छोटे कीड़े-मकोड़ों और नन्हें जलीय पादपों की संख्या में भी कमी आई। यही नहीं, जल में रहने वाले जीवाणु और कवक भी बढ़ी हुई अम्लीयता के कारण पूर्णतः नष्ट हो गए हैं। हरित शैवालों की संख्या भी इस जहर से अप्रभावित नहीं रही। अम्लीय झीलों में एल्यूमिनियम, मैंगनीज, जस्ता कैडमियम, सीसा (लैड) और निकिल की सांद्रता बढ़ जाती है। इसका जल-जीवों और वनस्पतियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

स्थलीय पारिस्थितिकी


स्थलीय पारिस्थितिकी अत्यंत जटिल होती है क्योंकि इसमें सजीव और निर्जीव दोनों प्रकार के घटक होते हैं। जंगलों और फसलों पर अम्ल-वर्षा का बिल्कुल सीधा प्रभाव पड़ता है। इन अम्लों की विषाक्तता पत्तियों का पूर्ण विनाश कर डालती है। इनके प्रभाव से वनस्पतियाँ अपना भोजन भी नहीं बना पाती। इस अम्लयुक्त वर्षा का जल जब धरती में चला जाता है तो मृदा अम्लीय हो जाती है। मिट्टी के अंदर स्थित सूक्ष्म जीव-जंतुओं, जीवाणुओं, कवकों आदि को भी अम्ल की विषाक्तता नष्ट कर देती है जिनका कि पौधों की वृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। मिट्टी ऊपरी सतह के पोषक तत्व भी विनष्ट हो जाते हैं। दूसरी ओर मृदा की गुणवत्ता कम हो जाने से उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इनसे जो कीड़े-मकोड़े विषाक्त हो जाते हैं उन्हें खाने वाली चिडि़यों का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता देखा गया है। कीड़ों की मृत्यु से चिड़यों के भोजन में कमी आ जाती है। ऐसी धारणा है कि राजस्थान के विख्यात भरतपुर पक्षी अभयारण्य से साइबेरियन सारस, गुलाबी पोलिकन और लालसर जैसी चिडि़यों के वहाँ से चले जाने का कारण यही है।

अम्ल-वर्षा से कलाकृतियों, महान स्मारकों और सुंदर भवनों को भी क्षति पहुँचती है। पिछले 200 वर्षों से जो भवन प्राकृतिक कोप से अप्रभावित और सुरक्षित थे, पिछले कुछ ही दशकों में उनकी रंगत बदलने लगी है। ऐसे कला स्मारकों में भारत का ताजमहल, यूनान स्थित एक्रीपोलिस की मूर्ति, और अमेरिका का लिंकन स्मारक आदि प्रमुख हैं।

भारत में स्थिति


भारत में इस दिशा में बहुत कम अनुसंधान हुए हैं। यहाँ कोयले और पेट्रोलियम के दहन और धातुओं के विगलन के फलस्वरूप निकली हुई सल्फर डाइऑक्साइड गैस ही अम्ल-वर्षा का प्रमुख कारण है। जहाँ एक ओर मुंबई, कोलकता और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में सल्फर डाइऑक्साइड की सांद्रता के अधिक होने के कारण स्थिति काफी गंभीर हो चुकी है वहीं अहमदाबाद, कानपुर और हैदराबाद जैसे औद्योगिक नगरों में भी खतरे की घंटी बज चुकी हैं। ‘राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (निरी), नागपुर’, द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार मुंबई में सबसे ज्यादा सल्फर डाइऑक्साइड गैस वातावरण में विमुक्त होती है।

अम्लीय प्रदूषण का दूसरा बड़ा स्रोत धातुओं (तांबा, सीसा और जस्ता) का विगलन है। तांबे के विगलन से 11,000 टन और जस्ते से 21,000 टन सल्फर डाइऑक्साइड गैस निर्मुक्त होती है। साथ ही गंधक का तेजाब बनाने वाले संयंत्रों और कागज उद्योगों से ही संपूर्ण सल्फर डाइऑक्साइड का 4 प्रतिशत निकाला जाता है। इसके अतिरिक्त दूसरे उद्योगों और घरेलू कार्यों में ईंधन के दहन से निकली सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन-ऑक्साइड और दूसरी गैसें भी पर्यावरण को निरंतर प्रदूषित करती रहती हैं।

भारत में शाहजहाँ और मुमताज के अमर प्रेम का उज्जवल प्रतीक, विश्व पर्यटकों का आकर्षक केंद्र और संगमरमरी बदन वाला कला का अद्वितीय स्मारक ‘ताजमहल’ भी अम्ल-वर्षा की चपेट से मुक्त नहीं रह सका है। ताजमहल से 40 किलोमीटर दूर स्थित मथुरा तेलशोधक कारखाने से निकलने वाली गैस से ताज के लिए दिन प्रतिदिन खतरा बढ़ता जा रहा है। इस गैस के दुष्प्रभाव से श्वेत धवल संगमरमर पीला पड़ना प्रारंभ हो गया है। इस तेलशोधक कारखाने के अतिरिक्त ताज के चतुर्दिक 250 अन्य छोटे-बड़े उद्योगों और रेलवे शंटिंग यार्डों के विषैले धुएं ने समस्या की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। मात्र तेलशोधक कारखाने से ही प्रतिदिन निकलने वाली अनुमानित सल्फर डाइऑक्साइड गैस 5 टन है। इसके कुप्रभाव का इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। दिल्ली स्थित लाल किले का सुर्ख रंग भी दो रेलवे यार्डों से निकले धुएं के कारण फीका पड़ने लगा है। कितने ही अन्य ऐतिहासिक स्मारक और कलात्मक भवन इस जहरीली वर्षा के कुप्रभाव से विनाश की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। इनके सौन्दर्य के संरक्षण की ओर अभी तक कोई विशेष प्रयत्न नहीं किए गए हैं यद्यपि इसके प्रति जागरुकता बढ़ी है। संगमरमर और अन्य पत्थरों पर अम्ल-वर्षा के प्रभाव की गंभीरता को देखते हुए ही इसे ‘स्टोन लेप्रसी’ या ‘स्टोन कैंसर’ का नाम दिया गया।

सार रूप में यह कहा जा सकता है कि यदि अम्ल-वर्षा की समस्या का तत्काल समाधान न ढूंढा गया तो हम अपनी अनमोल धरोहरों को तो खो ही बैठेंगे, मानव जीवन और स्वास्थ्य को होने वाली गंभीर हानि से स्वयं को तथा आने वाली पीढि़यों को भी शक्तिहीन बना डालेंगे। वायु द्वारा प्रवाहित रोगों जैसे— दमा और ब्रांकाइटिस का भय भी बना रहता है। अमेरिका के शोधकर्ता लियोनार्ड हैमिल्टन के अनुसार तो जीवाश्म ईंधनों के दहन से निकले एसिड सल्फेट प्रति वर्ष 7,500 से लेकर 120,000 मौतों के लिए उत्तरदायी हैं। उद्योगों और जीवाश्म ईंधनों के दहन एंव धातुओं के विगलन से निकलने वाली विषैली गैसों के निपटान की समुचित व्यवस्था पर गंभीरतापूर्वक ध्यान दिए जाने की आवश्कयता है।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रसायनशास्त्र विभाग में सीनियर लेक्चरर हैं।)