पर्यावरण संरक्षण का त्यौहार है फूलदेई

Author:शिवेंद्र

मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने अपने आवास मे मनाया फूलदेई पर्व,Source:मुख्यमंत्री कार्यालय फोटो,

 

उत्तराखंड में ऋतु से संबंधित अनेक त्यौहार मनाए जाते है उन्हीं में एक त्यौहार  फूलदेई है। जो बसंत ऋतु के आगमन का त्योहार के रुप मे मनाया जाता है ।  यह  त्योहार चैत्र माह के पहले दिन से शुरू होता है और 8 दिन तक चलता है इसे गढ़वाल का घोघा के नाम से भी जाना जाता है। उत्तराखंड में 70 प्रतिशत भूभाग जंगलो से घिरा और इसी कारण यहाँ के लोगों का जीवन प्रकृति पर निर्भर है, इसीलिये यहाँ के लोग के अधिकतर त्यौहार पर्यावरण से जुड़े है। कुछ ऐसा ही त्यौहार फूलदेई है।प्रकृति से जुड़ा यह पर्व सदियों से पर्यावरण को बचाने के लिए ही मनाया जाता है, इसे अब एक मुहिम के तौर पर भी प्रसारित किया जा रहा है ताकि आज की हमारी नई जनरेशन प्रकृति के प्रति जागरूक हो सकें ।

कैसे मनाया जाता है फूलदेई पर्व

यह पूर्व उत्तराखंड के  सबसे लोकप्रिय पर्व में से एक है । चैत्र माह के आगमन पर मनाया जाने वाले त्यौहार  का सीधा सबंध पर्यावरण से है । हिंदू कैलेंडर के मुताबिक चैत्र के  महीने से नए साल की शुरुआत होती है  और इस दिन खेतो में सरसों खिलने लगती है पेड़ो में फूलो का आगमन शुरू हो जाता है । जिनमें फ्यूंली, लाई, ग्वीयाल,किंनगोड़े, बुरांस आदि प्रमुख है। इस पर्व में गांव में छोटे छोटे बच्चे एक दिन पहले जंगल में जाकर अपनी टोकरी में फूल लाते है अगले दिन यानी सक्रांति के दिन सुबह सुबह नहा धोकर एक जगह इकठ्ठा होते है और फिर घर की देहली पर रंग बिरंगे फूल को डालकर घर की सुख शांति की कामना कर “फूल देई, छम्मा देई” यह गाना गाते है इसके बाद  परिवार के लोग बच्चो को  गुड़, चावल व पैसे देते हैं | 

फूलदेई पर्व क्यों मनाया जाता है 

वैसे फुलदेई पर्व को मानने की कई कहानियां प्रसिद्ध है , जिसनमे एक भागवन शिव से जुड़ी हुई है । जिसमें बताया गया कि भगवान शिव अपनी तपस्या में लीन थे ऋतुपरिवर्तन के कई वर्ष बीतने के बाद भी भगवान शिव साधना में विलीन थे माता पार्वती और नंदी शिवगण के कई प्रयास करने के बावजूद उनकी तंद्रा नहीं टूटी। आखिर में माता पार्वती ने एक उपाए निकाला। उन्होंने शिवगणों को फ्योली फूल खिलाकर सभी शिवगणों को पितांबरी जामा पहनाकर उन्हें बच्चों का रूप दे दिया। फिर सभी से कहा कि देवलोक की क्यारियों से वह ऐसे फूलों को लाएं जिनकी खुशबू पूरे कैलाश में महके। सबने उनकी बात मानी और देव लोक से खुशबूदार  फूल लेकर आये। जिसके बाद सभी फूल उनके पास रखे गए और एक सुर में आदिदेव महादेव से उनकी तपस्या पर बाधा डालने पर क्षमा मांगी और कहा फूलदेई क्षमा देई,भर भांकर तेरे द्वार आये महाराज! शिव की तंद्रा टूटी और अपने पास बच्चों को देखकर उनका गुस्सा शांत हुआ। यह देखर शिव लोक में सभी शिव गण खुश हुए और तभी से पहाड़ो में भी इस पर्व को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । 

वहीं कुछ लोग ये भी बताते है कि जंगल में  एक वन्य कन्या रहती थी उसे एक राजकुमार से प्यार हो गया और वह जंगल छोड़ महल चली गई । उसके जाते ही जंगल के पेड़-पौधे मुरझाने लगे, नदियां सूखने लगीं और पहाड़ टूटने लगे। कुछ दिन बाद राजकुमारी की तबीयत खराब हुई उसने राजकुमार को  जंगल वापिस जाने की गुजारिश की। राजकुमार ने उसकी बात नहीं मानी  और कुछ दिन बाद उसकी मौत हो गई। अपने निधन से पहले राजकुमारी ने अपने पति को उसे उसी जंगल मे दफनाने के लिए कहा था। उन्होंने उसे वही दफनाया। और कुछ दिनों के बाद ही वहाँ  नदियों में पानी फिर लबालब भर गया,पेड़ पौधे हरे भरे हो गये और जिस स्थान पर राजकुमारी को दफनाया था , उसी स्थान पर  एक खूबसूरत पीले रंग का एक सुंदर फूल खिला है।जिसे  फूल को “फ्योंली” नाम दे दिया गया है और उसी की याद में पहाड़ में “फूलों का त्यौहार यानी कि फूल देई पर्व” मनाया जाता है और तब से “फुलदेई पर्व” उत्तराखंड में भी मनाया जाता है।

फूलदेई त्यौहार पर बनते हैं विशेष व्यंजन

फूलदेई त्यौहार में  शाम को अलग अलग प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैंजिसमें चावल से बनने वाला  सई विशेष एक तौर से बनाया जाता है।इसके अलावा चावल के आटे को दही में मिलाया जाता है।फिर उसको लोहे की कढ़ाई में घी डालकर पकने तक भूना जाता है।उसके बाद उसमें स्वादानुसार चीनी व मेवे  डाले जाते हैं यह अत्यंत स्वादिष्ट और विशेष तौर से इस दिन खाया जाने वाला व्यंजन है।