पुराने किले की झील सूखी

Author:प्रदीप सिंह

भूजल लाखों वर्षों से प्राकृतिक रूप से नदियों और बरसाती धाराओं से नवजीवन पाते रहे हैं। भारत में गंगा-यमुना का मैदान ऐसा क्षेत्र है, जिसमें सबसे उत्तम जल संसाधन मौजूद हैं। यहाँ अच्छी वर्षा होती है और हिमालय के ग्लेशियरों से निकलने वाली सदानीरा नदियाँ बहती हैं। दिल्ली जैसे कुछ क्षेत्रों में भी कुछ ऐसा ही है। इसके दक्षिणी पठारी क्षेत्र का ढलाव समतल भाग की ओर है, जिसमें पहाड़ी शृंखलाओं ने प्राकृतिक झीलें बना दी हैं। पहाड़ियों पर प्राकृतिक वनाच्छादन कई बारहमासी जलधाराओं का उद्गम स्थल हुआ करता था।

दिल्ली में यमुना की दुर्दशा और जलाशयों को पाटकर बहुमंजिला अपार्टमेंट्स बनाने का असर दिखने लगा है। शहर में कई जलाशय, तालाब और झील तो पहले ही दम तोड़ चुके हैं, अब कल तक लबालब पानी से भरे रहने वाला पुराने किले का झील भी सूख गया है। इससे साफ जाहिर होता है कि झील में आने वाला पानी बन्द होने के कारण सूख गया।

किले और झील का रख-रखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन था। कुछ दिनों पहले तक पुराना किला देखने आने वाले पर्यटक इस झील में बोटिंग का भी आनन्द लेते थे। लेकिन किले के ठीक दरवाजे पर स्थित झील का सूखना यह बताता है कि झील के पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं है। बारिश के पानी से भरने वाली इस झील में अब पर्याप्त वर्षाजल का संग्रह नहीं हो पा रहा है।

मई और जून के माह में भी ये झील पानी से भरा रहता था। गर्मी की छुट्टी में दिल्ली, नोएडा, गुड़गाँव और फरीदाबाद के स्कूलों के बच्चे पुराना किला आकर बोटिंग का आनन्द लेते थे। स्कूली बच्चे यहाँ आने पर एक साथ किला, बोटिंग और चिड़ियाघर घूम लेते थे। इसकी देखरेख की जिम्मेदारी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया (एएसआई) की है। एएसआई अधिकारियों का कहना है कि झील में बरसात का पानी भर जाता था। वही पानी कई महीने तक चलता था। इसके पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं है। बोटिंग के दौरान इसमें पानी भर दिया जाता था। 6-7 महीने से बोटिंग नहीं हो रही है, इसलिये झील में पानी नहीं भरा जा रहा। इस कारण झील का पानी सूख गया है।

दिल्ली टूरिज्म और एएसआई में हुए समझौते के तहत दिल्ली टूरिज्म बोटिंग की सुविधा देता था। संविदा खत्म होने के बाद बोटिंग बन्द हो गई और झील से एएसआई का ध्यान पूरी तरह हट गया है। सूत्रों का कहना है कि झील को रिवाइव किया जाना चाहिए, ताकि किले की खूबसूरती बनी रहे। बोटिंग के लिये दोबारा समझौते की कोशिश भी चल रही थी, लेकिन किन्हीं वजहों से फाइल अटकी हुई है। इस पर फैसला होने तक झील को रिवाइव करने की सूरत नहीं दिख रही।

झील में पानी भरने के लिये ट्यूबवेल की मदद ली जाती थी, लेकिन फिलहाल इनका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। सूत्रों का कहना है कि बोटिंग वाले दिनों में जब भी पानी कम होता था, ट्यूबवेल से पानी भर दिया जाता था। अब भी ऐसा किया जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि झील में पानी न होने से पुराने किले की खूबसूरती अब वैसी नहीं रही। साथ ही इसमें रहने वाले जीव-जन्तुओं को भी नुकसान पहुँचा है। एएसआई को जल्द-से-जल्द झील में फिर से पानी भरने की जरूरत है। यह जैव विविधता के लिहाज से भी ठीक नहीं है।

दिल्ली की जल संरचना


भूजल लाखों वर्षों से प्राकृतिक रूप से नदियों और बरसाती धाराओं से नवजीवन पाते रहे हैं। भारत में गंगा-यमुना का मैदान ऐसा क्षेत्र है, जिसमें सबसे उत्तम जल संसाधन मौजूद हैं। यहाँ अच्छी वर्षा होती है और हिमालय के ग्लेशियरों से निकलने वाली सदानीरा नदियाँ बहती हैं। दिल्ली जैसे कुछ क्षेत्रों में भी कुछ ऐसा ही है। इसके दक्षिणी पठारी क्षेत्र का ढलाव समतल भाग की ओर है, जिसमें पहाड़ी शृंखलाओं ने प्राकृतिक झीलें बना दी हैं। पहाड़ियों पर प्राकृतिक वनाच्छादन कई बारहमासी जलधाराओं का उद्गम स्थल हुआ करता था। यमुना नदी दिल्ली के लिये प्राकृतिक एवं व्यापारिक दृष्टि से वरदान था।

पुराने समय में यमुना की चौड़ी पाट जल यातायात के सर्वथा योग्य था। यमुना नदी में माल की ढुलाई होती थी। एक अनुमान के मुताबिक 500 ईसा पूर्व में भी दिल्ली ऐश्वर्यशाली नगरी थी, जिसकी सम्पत्तियों की रक्षा के लिये नगर प्राचीर बनाने की आवश्यकता पड़ी थी। सलीमगढ़ और पुराने किले की खुदाई में प्राप्त तथ्यों और पुराने किले से इसके इतने प्राचीन नगर होने के प्रमाण मिलते हैं। 1000 ई. के बाद से तो इसके इतिहास, इसके युद्धापदाओं और उनसे बदलने वाले राजवंशों का पर्याप्त विवरण मिलता है।

भौगोलिक दृष्टि से अरावली की शृंखलाओं से घिरे होने के कारण दिल्ली की शहरी बस्तियों को कुछ विशेष उपहार मिले हैं। अरावली शृंखला और उसके प्राकृतिक वनों से तीन बारहमासी नदियाँ दिल्ली के मध्य से बहती यमुना में मिलती थीं। दक्षिण एशियाई भूसंरचनात्मक परिवर्तन से अब यमुना अपने पुराने मार्ग से पूर्व की ओर बीस किलोमीटर हट गई है। 3000 ईसा पूर्व में ये नदी दिल्ली में वर्तमान 'रिज' के पश्चिम में होकर बहती थी। उसी युग में अरावली की शृंखलाओं के दूसरी ओर सरस्वती नदी बहती थी, जो पहले तो पश्चिम की ओर सरकी और बाद में भौगोलिक संरचना में भूमिगत होकर पूर्णत: लुप्त हो गई।

एक अंग्रेज द्वारा 1807 ई. में किये गए सर्वेक्षण के आधार पर बने उपर्युक्त नक्शे में वह जलधाराएँ दिखाई गई हैं, जो दिल्ली की यमुना में मिलती थीं। एक तिलपत की पहाड़ियों में दक्षिण से उत्तर की ओर बहती थी, तो दूसरी हौजखास में अनेक सहायक धाराओं को समेटते हुए पूर्वाभिमुख बहती बारापुला के स्थान पर निजामुद्दीन के ऊपरी यमुना प्रवाह में जाकर मिलती थी। एक तीसरी और इनसे बड़ी धारा जिसे साहिबी नदी (पूर्व नाम रोहिणी) कहते थे।

दक्षिण-पश्चिम से निकल कर रिज के उत्तर में यमुना में मिलती थी। ऐसा लगता है कि विवर्तनिक हलचल के कारण इसके बहाव का निचाई वाला भूभाग कुछ ऊँचा हो गया, जिससे इसका यमुना में गिरना रुक गया। पिछले मार्ग से इसका ज्यादा पानी नजफगढ़ झील में जाने लगा। कोई 70 वर्ष पहले तक इस झील का आकार 220 वर्ग किलोमीटर होता था। अंग्रेजों ने साहिबी नदी की गाद निकालकर तल सफाई करके नाला नजफगढ़ का नाम दिया और इसे यमुना में मिला दिया। यही जलधाराएँ और यमुना-दिल्ली में अरावली की शृंखलाओं के कटोरे में बसने वाली अनेक बस्तियों और राजधानियों को सदा पर्याप्त जल उपलब्ध कराती आईं थीं।

हिमालय के हिमनदों से निकलने के कारण यमुना सदानीरा रही है। परन्तु अन्य उपनदियाँ अब से 200 वर्ष पूर्व तक ही, जब तक कि अरावली की पर्वतमाला प्राकृतिक वन से ढँकी रहीं तभी तक बारहमासी रह सकीं। खेद है कि दिल्ली में वनों का कटान सल्तनत काल से ही शुरू हो गया था।

कालांतर में बढ़ती शहरी आबादी के भार से भी वन प्रान्त सिकुड़ा है। इसके चलते वनांचल में संरक्षित वर्षाजल का अवक्षय हुआ।

ब्रिटिश काल में अंग्रेजी शासन के दौरान दिल्ली में सड़कों के निर्माण और बाढ़ अवरोधी बाँध बनाने से पर्यावरण परिवर्तन के कारण ये जलधाराएँ वर्ष में ग्रीष्म के समय सूख जाने लगीं। स्वतंत्रता के बाद के समय में बरसाती नालों, फुटपाथों और गलियों को सीमेंट से पक्का किया गया, इससे इन धाराओं को जल पहुँचाने वाले स्वाभाविक मार्ग अवरुद्ध हो गए। ऐसी दशा में, जहाँ इन्हें रास्ता नहीं मिला, वहाँ वे मानसून में बरसाती नालों की तरह उफनने लगीं। बड़ी संख्या में सीमेंट कंक्रीट के निर्माणों के कारण उन्हें भूजल भृत्तों या नदी में मिलाने का उपाय नहीं रह गया है। आज इन नदियों में नगर का अधिकतर मैला ही गिरता है।