पुस्तक भूमिका : जल और प्रदूषण

Author:‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
Source:‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

पर्यावरणीय प्रदूषण आज के युग की सबसे बड़ी चुनौती है। बढ़ते औद्योगीकरण के कारण हमारी जीवन शैली में आए परिवर्तनों से पर्यावरण पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। विगत लगभग 150 वर्षों में विश्व भर में हो रहे अनियंत्रित, अनियमित एवं अंधाधुंध विकास के दुष्परिणाम जल और वायु प्रदूषण के रूप में हमारे सामने हैं।

वायु प्रदूषण एक समय था, जब उद्योगों की ऊँची चिमनियों से निकलने वाला धुँआ औद्योगिक क्रांति का प्रतीक समझा जाता था और इसकी उपस्थिति (उद्योग की स्थिति बताकर) जनमानस को राष्ट्र और अर्थव्यवस्था के विकसित होने का अहसास कराती थी। इसी प्रकार कारखानों से निकलने वाला रंगीन या गंदा-मटमैला पानी इस बात का संकेत होता था कि कारखाने में उत्पादन चालू है। वस्तुत: उस समय किसी को भी इस बात का अहसास नहीं था कि इस तरह हो रहा जल या वायु प्रदूषण समय के साथ एक गंभीर समस्या में परिवर्तित हो जाएगा।

औद्योगिक प्रदूषण की समस्या की गहराई में जाने से पूर्व आइए पहले पर्यावरण के विभिन्न घटकों की चर्चा करें। हमारे चारों ओर उपस्थित प्रत्येक सजीव या निर्जीव वस्तु वास्तव में हमारे पर्यावरण का हिस्सा है। या यूँ कहें कि इन्हीं से हमारे पर्यावरण का निर्माण हुआ है। ज्ञातव्य है कि हमारे वायुमंडल में नाइट्रोजन, आॅक्सीजन, कार्बनडाइआॅक्साइड, अक्रिय गैसों सहित अनेक गैसें एवं गैसीय अवयव एक निश्चित मात्रा में उपस्थित हैं। ये सामान्य अनुपात सृष्टि के नियमित चक्र का अहम हिस्सा है और सामान्य परिस्थितियों में इसमें कोई अंतर नहीं पड़ता। लेकिन जब इसमें अवांछित तत्वों का सम्मिलन होता है, तो प्रकृति पर इसका दुष्प्रभाव अनिवार्य रूप से पड़ता है। ये अवांछित तत्व-चाहे गैसीय रूप में हों, या कण के रूप में – वायुमंडल में प्रविष्ट होकर न केवल चारों ओर फैल जाते हैं, वरन सामान्य अवस्था तक आने के लिये उनके अनुकरण के दौरान ये जिस भी जीव या निर्जीव पर्यावरण घटक के संपर्क में आते हैं, वे उस पर अपना प्रभाव डालते हैं। उदाहरणार्थ किसी कारखाने से निकलने वाली सल्फर डाइआॅक्साइड गैस की सान्द्रता अपनी तीव्र अवस्था में जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों पर तो अपना हानिकारक प्रभाव डालती ही है, इसकी अम्लीय प्रकृति संरचनात्मक घटक को भी हानि पहुँचाती है। मथुरा स्थित रिफायनरीज से निकलने वाले धुएँ का ताजमहल पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव इसका जीवंत प्रमाण है। वास्तव में यही वायु प्रदूषण है।

इसी प्रकार पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत पानी से ही हुई। या यूँ कहें कि पानी सृष्टि के आरंभ से संबद्ध है। आज भी जब हम अन्य ग्रहों पर जीवन की खोज करते हैं, तो सबसे पहले पानी की उपस्थिति को ही जाँचते हैं। यानि पानी के बिना जीवन असंभव है, इसी बात से पानी की महत्ता समझ में आ जाती है। हमें ज्ञात है कि इस धरती पर जहाँ कहीं भी सभ्यताओं का अभ्युदय हुआ, वे स्थान वास्तव में नदियों के किनारे रहे हैं। सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि नदियों के किनारों पर ही सभ्यताओं का विकास हुआ। फिर चाहे, वो सिंधु घाटी की सभ्यता हो या कोई अन्य सभ्यता, इस बात के स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं कि लगभग 5000 वर्ष पहले पहली मानव सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई। मिस्र की सभ्यता ने नील नदी के किनारे जन्म लिया, तो मेसोपोटामिया की सभ्यता टरगिस नदी और इफ्रेट्स नदी के किनारे, हड़प्पा की सभ्यता सिंधु नदी तो चीनी सभ्यता यांगसे नदी के किनारे पुष्पित और पल्लवित हुई। अत: कहना न होगा कि जल या जलस्रोत जीवन के आरंभ हेतु मूल आधार हुआ करते थे। एक कोशकीय जीव अमीबा के प्रादुर्भाव से लेकर आधुनिकतम मानव तक के विकास में जल की भूमिका अहम रही है। यदि प्राण वायु के बिना हमारा जीवन कुछ मिनटों से ज्यादा नहीं रह सकता, तो जल के बिना हम कुछ-एक दिनों से ज्यादा जीवित नहीं रह सकते। सच तो यह है कि स्वयं हमारे शरीर में 65 प्रतिशत भाग जल ही है।

समूची पृथ्वी का दो तिहाई भू-भाग जल से घिरा हुआ है। पृथ्वी पर जल की मात्रा 1.4 मिलियन क्यूबिक मीटर आँकी गई है। जिसका 97.57 प्रतिशत भाग महासागरों में होने के कारण खारा जल है। लगभग 36 क्यूबिक मीटर स्वच्छ एवं मृदु जल, जो उपयोग के योग्य है, उसमें से लगभग 28 मिलियन क्यूबिक मीटर जल, जो कि इसका कुल 79 प्रतिशत है, बर्फ के रूप में ध्रुवों पर जमा है। अर्थात अधिकांश जल या तो समुद्रों में समुद्री जल या ध्रुवों पर बर्फ के रूप में है। इस जल का उपयोग हम दैनिक जीवन में सामान्यत: नहीं कर सकते क्योंकि समुद्री जल को उपयोग के योग्य बनाना एक जटिल एवं खर्चीली प्रक्रिया है, वहीं धुव्रीय बर्फ हमारी पहुँच से दूर है। हमारे वास्तविक उपयोग के लिये उपलब्ध लगभग 8 मिलियन क्यूबिक मीटर जल पर दुनिया की लगभग 6 अरब से ज्यादा की आबादी निर्भर है। पृथ्वी की सतह या इसके गर्भ में उपलब्ध जल जो नदियों, तालाबों, झीलों, कुँओं या फिर नलकूप के माध्यम से हमें उपलब्ध है, हम उसी का उपयोग अपने दैनिक जीवन में कर सकते हैं। वो भी तब, जब यह जल किसी भी प्रकार के प्रदूषण से मुक्त हो। तात्पर्य यह है कि संपूर्ण पृथ्वी पर उपलब्ध जल को यदि हम एक बाल्टी के बराबर मानें, तो हमारे उपयोग के योग्य जल की मात्रा एक मग से अधिक नहीं होगी। इसी से हम इसके बेशकीमती होने का अंदाजा लगा सकते हैं। शुद्ध जल वास्तव में अनमोल है और इसके स्रोत सीमित हैं।

देश में प्राकृतिक वर्षा, जल संसाधन और उनमें उपलब्ध जल की स्थिति संबंधी विवरणों को देखें तो ज्ञात होता है कि विगत दशक में हमारे देश में केरल जैसे राज्य (जहाँ से वास्तव में मानसून की शुरुआत होती है) तक को सूखे का सामना करना पड़ा। वर्षा यानी पानी की कमी का प्रमुख कारण पश्चिमी घाटों में स्थित सघन वनों का अंधाधुंध दोहन है। इसी कारण देश के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्र चेरापूँजी में भी जल की कमी महसूस की जा रही है। एवं अब यह देश का सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र नहीं रह गया है।

यह एक विडम्बना ही है कि कुल भू-भाग के दो तिहाई भाग पर पानी होने के बावजूद हर वर्ष शीत ऋतु के खत्म होते ही देश के अधिकांश शहर जल के लिये त्राहि-त्राहि करने लगते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि पृथ्वी पर उपलब्ध जल की कुल मात्रा का बहुत कम भाग ही पीने योग्य है एवं इसकी भी अधिकांश मात्रा बढ़ते औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण पीने के लिये अयोग्य है। औद्योगीकरण के दौरान विभिन्न जल प्रदूषणकारी प्रकृति के उद्योगों ने सतह पर उपलब्ध जल को तो प्रदूषित किया ही है, भूमिगत जलस्रोतों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। यानि इस 3 प्रतिशत जल की भी गुणवत्ता ठीक नहीं रह गई है। यदि हम राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में बात करें तो एक ओर तो देश की जनसंख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी ओर स्वच्छ जलस्रोत सीमित होते जा रहे हैं।

प्रदूषित नदी हमें यह जानना जरूरी है कि जो जल जीवन देने वाला है, वही जल जानलेवा भी बन सकता है, यदि उसमें विषैले एवं हानिकारक पदार्थ मिल जाएँ। पानी को सार्वत्रिक विलायक के रूप में जाना जाता है। अर्थात कोई भी अन्य विलायक, चाहे वो कार्बनिक विलायक हो या अकार्बनिक विलायक, उसमें उतने पदार्थ नहीं घुल सकते जितने पानी में। अपने इस गुण के कारण इसका उपयोग भी सर्वव्यापी होता है।

दुनिया भर में जल के माध्यम से फैलने वाले रोगों की संख्या अनगिनत है। जल के माध्यम से फैलने वाले पीलिया, पेचिश, दस्त, डायरिया आदि रोगों के कारण आज भी विश्व में सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। इसी प्रकार औद्योगिक एवं मानवीय गतिविधियों से होने वाले जल प्रदूषण के कारण भी अनेक रोग होते हैं।

औद्योगीकरण के साथ ही शहरों के विस्तारीकरण ने प्रकृतिक जलस्रोतों के लिये खतरा उत्पन्न कर दिया है। इस संबंध में हमें पूर्वजों से सबक लेना चाहिये। हमारे पूर्वज भले ही हमारी तरह आधुनिक नहीं थे, भले ही विश्व परिदृश्य में उनका दखल हमसे कम था, लेकिन अपनी छोटी सी दुनिया में रहते हुए भी वे हमसे अधिक दूरदर्शी थे। इसीलिये उस समय भी उन्होंने जल संग्रहण हेतु बड़ी संख्या में तालाब और बावड़ियाँ बनाईं। उनके द्वारा बनाये गये तालाब, बावड़ियाँ, कुएँ आदि न सिर्फ सतह पर जल की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के साधन हुआ करते थे, वरन ये भूमिगत जलस्रोतों को भी रि-चार्ज करने का कार्य करते थे। कालांतर में सभ्यता के तथाकथित विकास के साथ शहरीकरण ने गति पकड़ी औऱ कॉलोनियों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और परिसरों के निर्माण के लिये जमीन की आवश्यकता पड़ने पर तालाब पाटे गये या धीरे-धीरे उन पर अवैध कब्जे कर उनका अस्तित्व ही समाप्त कर दिया गया।

औद्योगीकरण और शहरीकरण की वजह से तथा अन्य अनेक कारणों से वनों का ह्रास हुआ। कांक्रीटों के जंगल बढ़े, लेकिन प्राकृतिक वन नष्ट होते चले गये। फलस्वरूप वर्षा की मात्रा और स्थिति में परिवर्तन आया। इसके साथ ही अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बड़ी मात्रा में हमारे द्वारा सतही एवं भूजलस्रोतों का एक तरफा दोहन किया जाने लगा। जबकि इन स्रोतों के भरण या पुनर्भरण के लिये किसी सार्थक प्रयास किये जाने की कोशिश नहीं की गई, जिसका नतीजा आज हमारे सामने है। आज हर वर्ष नलकूपों को और अधिक गहरा करवाने की जरूरत महसूस की जा रही है। फिर भी पानी मिल ही जायेगा इसकी कोई गारण्टी नहीं है। पक्की सड़क, पक्के घर, पक्की नालियाँ, पक्के आँगन एवं पक्के परिसरों में आखिर वर्षा का जल भूमि के भीतर कैसे प्रवेश करेगा? इसका दुष्परिणाम ये होता है कि वर्षा का अनमोल शुद्ध जल बिना किसी उपयोग के नालियों से नालों और नालों के माध्यम से नदियों में मिल जाता है। हम अपनी ही लापरवाही और उदासीनता के कारण इस जल का समुचित उपयोग और संचय नहीं कर पाते हैं। जबकि यदि हम चाहें तो जल संचयन इकाईयों (वॉटर-बॉडीज) जैसे तालाब आदि का निर्माण कर, इसमें वर्षों जल एकत्रित कर इसका सीधे उपयोग कर सकते हैं। साथ ही ये इकाईयाँ भूमिगत जलस्रोतों के पुनर्भरण (रिचार्ज) का प्राकृतिक जरिया भी बन सकती हैं। वर्षा का यह जल प्रदूषणमुक्त होने के कारण हमारे लिये प्रकृति का अनमोल वरदान है और हमें इसके अधिकाधिक संचयन, संग्रहण और संरक्षण के विषय में सोचना होगा ताकि प्रतिवर्ष होने वाले जल संकटों से उभर सकें।

जैसा कि हमें ज्ञात है कि जल का एक अणु हाइड्रोजन के दो परमाणुओं और आॅक्सीजन के एक परमाणु से मिलकर बनता है तथा इसे सार्वत्रिक विलायक या यूनिवर्सल साल्वेंट कहा जाता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि जल में अनेक यौगिकों को घोलने की क्षमता होती है। इसीलिये वर्षा के रूप में पृथ्वी पर गिरने वाला जल भी वातावरण में उपस्थित अनेक गैसों सहित सूक्ष्म कणों को अपने साथ घोलकर पृथ्वी पर गिरता है। वायु प्रदूषण की स्थिति में गिरने वाला-वर्षाजल भी शुद्धतम आसुत-जल नहीं कहा जा सकता। किसी भी जलस्रोत के जल की प्रकृति दूसरे स्रोत से भिन्न हो सकती है। जैसे उद्गम के पास नदी का जल अपेक्षाकृत मृदु और स्वच्छ होता है, जबकि कुछ किमी के प्रवाह के उपरांत इसमें अनेक यौगिकों, लवणों आदि का मिश्रण हो जाने से न सिर्फ इसकी प्रकृति वरन गुणवत्ता भी बदल जाती है। इसी प्रकार भूजलस्रोतों का जल अपेक्षाकृत कठोर होता है, क्योंकि इसमें भूमिगत चट्टानों में उपस्थित कैल्शियम और मैग्नीशियम के लवण घुली हुई अवस्था में होते हैं, हालाँकि ये जल सतह पर उपस्थित जलस्रोतों की अपेक्षा पेयजल के रूप में सीधे ही उपयोग किये जाने के योग्य समझा जाता है।

जल की महत्ता एवं इसकी उपलब्धता की स्थिति को समझने के साथ ही हमें ये भी समझना आवश्यक है कि जीवनदायी, अमृत तुल्य जल हानिकारक और अवांछित यौगिकों या पदार्थों के मिलने से जानलेवा भी हो सकता है। वास्तव में यही जल प्रदूषण है। अर्थात उसके भौतिक, रासायनिक अथवा जैवकीय गुणों में इस तरह का परिवर्तन अथवा औद्योगिक अपशिष्टों के बहिस्राव अथवा अन्य किसी द्रव पदार्थ या गैसीय पदार्थ या ऐसे ठोस पदार्थ के उसमें मिलने से स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो या उसका घरेलू व्यावसायिक, औद्योगिक तथा कृषि के कार्यों में उपयोग न किया जा सके या जन-जीवन, पेड़-पौधों तथा जीव-जन्तुओं पर उसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक जलस्रोतों में अवांछनीय पदार्थ के मिलने से जल प्रदूषण की स्थिति बनती है।

जल प्रदूषण के दुष्प्रभाव प्रदूषकों की प्रकृति, मात्रा एवं सान्द्रता के साथ ही जलस्रोतों की व्यापकता पर भी निर्भर करते हैं। तालाबों के प्रदूषित होने से जहाँ इन जलस्रोतों पर निर्भर कुछ स्थानीय लोग प्रभावित होते हैं, वहीं नदियों के प्रदूषित होने पर प्रभावित लोगों की संख्या बढ़ जाती है। जल प्रदूषण से न केवल मनुष्य वरन जलीय जीव-जन्तु, वनस्पति बल्कि संपूर्ण जलीय पारिस्थितिकीय तंत्र प्रभावित होता है। न केवल जल का उपयोग करने वाले वरन जलस्रोतों में पाये जाने वाले जलीय जीवों या वनस्पतियों का सेवन करने वाले भी इन प्रदूषकों की चपेट में आ जाते हैं, क्योंकि जलीय जीव या वनस्पति इन प्रदूषकों को ग्रहण या अवशोषित कर उपयोग करने वालों तक इन्हें पहुँचाने का माध्यम बन जाते हैं। जल प्रदूषण की सबसे बड़ी त्रासदी इसी रूप में दुनिया के समक्ष आई थी। जापान के मिनीमाता शहर में मरकरी से प्रभावित मछलियों का सेवन करने से अनेक लोग मारे गए। जल प्रदूषण की संभवत: ये सबसे बड़ी विभीषिका थी।

प्रकृतिक जलस्रोतों में अवांछनीय पदार्थों के मिलने से जल प्रदूषण की स्थिति बनती, जिसके निम्नलिखित मुख्य कारण हैं-

1. औद्योगिक इकाईयों के अनुपचारित या अपूर्ण उपचारित दूषित जल के जलस्रोतों में मिलने से।

2. अनुपचारित घरेलू दूषित जल के जलस्रोतों में मिलने से।

3. कृषि कार्य के उपयोग में आने वाले कीटनाशकों और उर्वरकों के वर्षाजल के बहाव के साथ जलस्रोतों में मिलने से।

4. घरेलू एवं औद्योगिक ठोस अपशिष्टों एवं इनके लीचेट के जलस्रोतों में मिलने से।

5. औद्योगिक गतिविधियों के कारण उत्पन्न अथवा इनमें प्रयुक्त रसायनों के वर्षाजल के संपर्क में आने से अथवा भूमि के भीतर प्रवेश करने से।

6. भूगर्भीय चट्टानों की विषैली प्रकृति के कारण।

7. उत्खनन गतिविधियों से।
8. अन्य गतिविधियों से।

इन सभी कारणों का हम विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

1. औद्योगिक इकाईयों के अनुपचारित या अपूर्ण उपचारित दूषित जल के जलस्रोतों में मिलने से


ऐसी सभी औद्योगिक उत्पादन प्रक्रियाओं जिनमें जल का उपयोग किसी न किसी रूप में होता है, से कम या अधिक मात्रा में दूषित जल उत्पन्न होता है। उत्पादन प्रक्रिया के अतिरिक्त औद्योगिक इकाईयों में फ्लोर वाशिंग, कन्टेनर वाशिंग, वायु प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था जैसे वेट-स्क्रबर आदि से भी दूषित जल उत्पन्न होता है। इन निस्रावों में अनेक रसायन एवं निलंबित कण उपस्थित रहते हैं। इस दूषित जल का समुचित उपचार किया जाना अनिवार्य है। इस हेतु उद्योगों में दूषित जल उपचार संयंत्र बनाए जाते हैं, लेकिन फिर भी दूषित जल का पूर्णत: उपचार किया जाना अत्यंत कठिन है। उद्योगों द्वारा ऐसे दूषित जल का नालों आदि के माध्यम से निस्सारण कर दिया जाता है, जो अंतत: नदियों में जाकर मिलता है। इस तरह ये जल प्रदूषण का करण बनते हैं।

फैक्टरी से निकलकर भूजल को प्रदूषित कर रहा है गन्दा पानी

2. अनुपचारित घरेलू दूषित जल के जलस्रोतों में मिलने से


हमारे देश में आज भी घरेलू दूषित जल के उपचार की पर्याप्त एवं सक्षम व्यवस्था नहीं है। अनियमित रूप से बनाई गई कालोनियों और यत्र-तत्र घरों के निर्माण के कारण सर्वप्रथम तो दूषित जल के समुचित निस्सारण की व्यवस्था ही एक समस्या है। शहर की खुली या बंद नालियों के साथ भूमिगत पाइप लाइनों के माध्यम से घरेलू दूषित जल एवं मल-जल निस्सारित किया जाता है, जो बिना किसी उपचार के नालों और इनके माध्यम से अंतत: नदियों में मिलता है। कुछ महानगरों को यदि छोड़ दिया जाए, तो अधिकांश बड़े शहरों में घरेलू दूषित जल के उपचार की कोई व्यवस्था नहीं है। कुछ महानगरों में ऐसी व्यवस्था की गई है पर वो भी सारे शहर से निकलने वाले दूषित जल के उपचार हेतु पर्याप्त नहीं है। अनुपचारित घरेलू दूषित जल नदियों में मिलकर उनके जल को दूषित तो करता ही है, साथ ही नदी जल को पीने के लिये पूर्णत: अनुपयुक्त बना देता है, क्योंकि ऐसे जल का उपयोग अनेक जानलेवा रोगों का कारण बन सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि घरेलू दूषित जल से प्रदूषित हुए जलस्रोतों का जल विभिन्न जल शोधन प्रक्रियाओं को उपरांत भी पूर्णत: शुद्ध नहीं हो पाता, क्योंकि घरेलू दूषित जल में ऐसे जीवाणु एवं विषाणु होते हैं, जो अनेक प्रकार से उपचार के बाद भी मारे या पृथक नहीं किये जा सकते। अर्थात इसका नदियों में मिलना किसी अभिशाप से कम नहीं है।

ये किसी विडम्बना से कम नहीं है कि हमारे देश की पवित्र नदियाँ गंगा और यमुना आज अनुपचारित औद्योगिक/घरेलू दूषित जल से प्रदूषित होने के कारण विश्व के दो बड़े नालों के रूप में जानी जाती है। यही हाल देश की लगभग सभी बड़ी नदियों का है। शहर के मल-जल के समुचित उपचार की व्यवस्था का न होना जल प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है।

3. कृषि में उपयोग में आने वाले कीटनाशकों और उर्वरकों के वर्षाजल के बहाव के साथ जलस्रोतों में मिलने से


आजादी के बाद देश में अन्न उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया। 1960-70 के दशक में देश में अधिकाधिक अन्न उत्पादन के उद्देश्य से ‘हरित क्रांति’ की अवधारणा पर अमल किया गया। प्राकृतिक कारणों से परे फसलों को अत्यधिक पोषण देकर तथा कीटों/बीमारियों के प्रकोप से हर संभावित ढंग से बचाव के द्वारा ज्यादा से ज्यादा फसल लेने के फार्मूले को अपनाया गया। रासायनिक उर्वरकों की उर्वरा शक्ति से पैदावार में तत्काल वृद्धि हुई। फसलों को हानि पहुँचाने वाले कीटों के खात्मे के लिये कीटनाशकों का अनिवार्य रूप से उपयोग किया जाने लगा। रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक दोनों का ही अधिक उपयोग प्रकृति के सामान्य चक्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। अधिकतर कीटनाशक जटिल कार्बनिक यौगिक होते हैं, जिनकी प्रकृति कैंसर कारक होती है। उपयोग के समय ये वातावरण में फैलकर वायु प्रदूषण को जन्म देती है। उपयोग के उपरांत वर्षाजल या सिंचाई के लिये डाले जाने वाले पानी के साथ बहकर ये कीटनाशक एवं उर्वरक पानी में मिलकर नालियों या नालों के माध्यम से जलस्रोतों में मिलकर उन्हें प्रदूषित करते हैं। पेयजल में इनकी उपस्थिति जनजीवन पर अत्यंत हानिकारक प्रभाव डालती है।

इसी प्रकार नदी के कछार या तट पर उगाई जानी वाली फसलों पर भी कीटनाशकों एवं उर्वरकों के प्रयोग से इनके सीधे ही नदी के जल में मिलने की संभावना बनी रहती है।

4. घरेलू एवं औद्योगिक ठोस अपशिष्ट एवं इनके लीचेट के जलस्रोतों में मिलने से


हमारे देश में घरेलू एवं औद्योगिक ठोस अपशिष्ट के प्रबंधन एवं अपवहन हेतु अभी समुचित व्यवस्था का अभाव है। घरेलू ठोस अपशिष्ट इधर-उधर फेंके जाते हैं या विभिन्न स्थानों से एकत्र कर किसी एक स्थान विशेष पर डम्प कर दिए जाते हैं। उनके निपटान का सबसे आसान तरीका उन्हें उसी अवस्था में खुले में जला दिया जाना समझा जाता है, जो हर दृष्टि से पर्यावरण के प्रतिकूल है। इसी प्रकार औद्योगिक ठोस अपशिष्ट चाहे उसकी प्रकृति किसी भी प्रकार की क्यों न हो उसके भी सही और समुचित व्यवस्थापन हेतु पर्याप्त चेतना का अभाव है।

भूमि पर फेंके जाने वाले ठोस अपशिष्ट को निपटान-स्थल के माध्यम से निष्पादित करने के दौरान भी आवश्यक सावधानी न बरते जाने की स्थिति में वर्षा के दौरान इस पर पानी गिरने तथा निष्पादित ठोस अपशिष्ट से उत्पन्न हुए लीचेट से जलस्रोतों के प्रदूषित होने की संभावना बनी रहती है। इस तरह प्रदूषण से न केवल सतह वरन भूमिगत जलस्रोत भी प्रदूषित होते हैं।

5. औद्योगिक गतिविधियों के कारण उत्पन्न अथवा इनमें प्रयुक्त रसायनों वर्षाजल के संपर्क में आने से अथवा भूमि के भीतर प्रवेश करने से


अनेक औद्योगिक प्रक्रियाओं में उत्पादन के दौरान बड़ी मात्रा में रसायनों का उपयोग किया जाता है। विभिन्न अपशिष्टों के पुनर्चक्रण, रासायनिक पदार्थों के निर्माण, उत्पादन के दौरान उत्पन्न हुए अपशिष्ट आदि से जलस्रोतों को हानि पहुँचने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

कच्चे माल के भण्डारण, उत्पादन इकाई, उत्पाद का भण्डारण, प्रक्रिया से उत्पन्न ठोस अपशिष्ट का संग्रहण, भण्डारण एवं अपवहन, उत्पादन इकाई से निकलने वाले दूषित जल के उपचार एवं इस दौरान उत्पन्न हुए स्लज का अपवहन आदि अनेक गतिविधियों से भूमि सतह एवं भूमिगत जलस्रोतों के प्रदूषित होने की संभावना बनी रहती है।

6. भूगर्भीय चट्टानों की विषैली प्रकृति के कारण


जल प्रदूषण जल प्रदूषण विशेषकर भूमिगत जलस्रोतों के प्रदूषण के लिये विभिन्न कारणों में से एक प्रमुख कारण है, भूगर्भीय चट्टानों के रासायनिक गुणवत्ता। जैसा कि हम जानते हैं कि पृथ्वी की सतह के भीतर विभिन्न भूगर्भीय संरचनाएं उपस्थित रहते हैं। इनके संपर्क में जल भी रहता है। इन भूगर्भीय चट्टानों के जल में विलेय विषैले पदार्थों तथा विषैली धातुओं की उपस्थिति भूमिगत जल को प्रदूषित कर देती है। जल में घुलनशील धातुएँ जलस्रोत में आ जाती हैं। इन जलस्रोतों से जल निकाल कर उनका उपयोग करने पर जीव पर इन धातुओं का विपरीत असर पड़ता है। जल में विषैली लौह, आर्सेनिक, लैड या मरकरी जैसी धातुओं के मिलने से जल न केवल प्रदूषित हो जाता है, वरन विषैला भी हो जाता है। इस प्रकार से प्रदूषित होने वाले जल के उपयोग से अनेक शारीरिक एवं मानसिक व्याधियाँ होने की संभावना बनी रहती है। प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली भूमिगत चट्टानों की प्रकृति के कारण इस प्रकार भूमिगत जलस्रोतों के प्रदूषित होने की संभावना बढ़ जाती है। इसका कोई विकल्प न होने के कारण इन स्रोतों को बंद कर इन स्थानों पर जल प्रदाय हेतु वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिये, ताकि वहाँ रहने वालों को इसके दुष्प्रभावों से बचाया जा सके।

7. उत्खनन गतिविधियों से


खदानों में उत्खनन के दौरान भूमिगत चट्टानों की भीतरी परतों से भूमिगत जलस्रोतों का जल बाहर निकलता है। इसी प्रकार खाली पड़ी खदानों में वर्षा का जल भी बड़ी मात्रा में एकत्र हो जाता है। खदानों के संपर्क में जल के लंबे समय तक रहने से खदानों के अयस्कों या खनिजों के गुणधर्म पानी में भी आ जाने की संभावना बनी रहती है। खदान की चट्टानों में उपस्थित घुलनशील तत्व पानी में घुल जाते हैं तथा जल प्रदूषण का कारण बनते हैं। खुदाई के दौरान इस पानी को खदानों से बाहर पम्प करके निकाला जाता है। इसमें से अधिकांश पानी नालों के माध्यम से नदियों में मिलता है एवं नदी जल को प्रदूषित करता है।

8. अन्य गतिविधियों से


विभिन्न व्यावसायिक एवं अन्य गतिविधियों से भूजल एवं सतही जलस्रोत प्रदूषित होते हैं। तथा आटोमोबाइल सर्विस स्टेशनों से निकलने वाला तेलयुक्त अपशिष्ट, अस्पतालों एवं नर्सिंग होम से निकलने वाला द्रव अपशिष्ट, होटलों आदि से निकलने वाला दूषित जल, तालाबों में तथा अन्य जलस्रोतों में मवेशियों को नहलाने आदि कपड़ा धोने के कारण नदियों तथा अन्य जलस्रोतों में मूर्तियों के विसर्जन, पूजन सामग्री आदि को डालने के कारण।

देश की अनेक नदियाँ अत्यंत पवित्र मानी गई हैं। इन नदियों पर अनेक स्थानों पर दाह संस्कार का कार्य किये जाते हैं या कई बार शवों को इनमें सीधे ही बहा दिया जाता है। इस तरह भी नदी जल प्रदूषित होता है।

एक ओर तो हम नदियों, तालाबों आदि जलस्रोतों की पूजा करते हैं तो दूसरी ओर इनमें किसी भी तरह का कचड़ा, गंदगी या अपशिष्ट डालने से नहीं चूकते। इन जलस्रोतों में विभिन्न सामग्रियों को विसर्जित करने के लिये सर्वथा उपयुक्त समझने की हमारी प्रवत्ति के कारण जहाँ हम इनके किनारे मल-मूत्र त्याग, वहीं घर की पूजन सामग्री से लेकर हर तरह का अपशिष्ट इनमें डालते हैं। हमारी इन्हीं प्रवृत्तियों के कारण हमारे अधिकांश जलस्रोत आज उपयोग्य के योग्य नहीं रह गये हैं।

उपर्युक्त तथ्यों से दृष्टिगोचर होता है कि हमारी विभिन्न औद्योगिक, घरेलू एवं व्यावसायिक गतिविधियों के कारण हम शुद्ध एवं स्वच्छ जलस्रोतों को जाने-अनजाने प्रदूषित कर रहे हैं।

जनजीवन, प्रकृति, पर्यावरण और जलस्रोतों पर जल प्रदूषण के दुष्प्रभावों को देखते हुए जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनिय़म 1974 बनाया गया। जिसके माध्यम से जल प्रदूषणकारी उद्योगों को नियम के दायरे में लाकर जल प्रदूषण नियंत्रण हेतु प्रभावकारी नियम बनाये गये। इस अधिनियम के संबंध में विस्तार से जानकारी आगामी परिशिष्ट में जोड़ दी गई है।

 

जल प्रदूषण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

पुस्तक भूमिका : जल और प्रदूषण

2

जल प्रदूषण : कारण, प्रभाव एवं निदान

3

औद्योगिक गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण

4

मानवीय गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण

5

भू-जल प्रदूषण

6

सामुद्रिक प्रदूषण

7

दूषित जल उपचार संयंत्र

8

परिशिष्ट : भारत की पर्यावरण नीतियाँ और कानून (India's Environmental Policies and Laws in Hindi)

9

परिशिष्ट : जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (Water (Pollution Prevention and Control) Act, 1974 in Hindi)