रेगिस्तानीकरण को किस प्रकार रोका जाए?

Author:सुबोध महंती
Source:विज्ञान प्रसार

‘‘रेगिस्तानीकरण एक धीमी प्रक्रिया है, जिसके परिणामस्वरूप धरती की उर्वरता शनैः शनैः समाप्त हो जाने के साथ स्थानीय लोगों के सामाजिक व आर्थिक तंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अधिकतर यह परिस्थिति मानवीय क्रियाओं द्वारा अपने लाभ हेतु भू-संरचना पर बहुत अधिक दबाव डालने के कारण उत्पन्न होती है। कभी ये परिस्थितियां किसी विशेष क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों अथवा निरंकुश होती प्राकृतिक आपदाओं, उदाहरण के रूप में अचानक जलवायु परिवर्तन अथवा दीर्घ सूखे के स्थिति आदि के कारण भी उत्पन्न हो सकती हैं।’’ - अमल कर इन कोपिंग विद नेचुरल हैजार्डः इंडियन कॉन्टेक्स, के. एस. वाल्डिया (एडीटर) 2004

आवासीय और उपजाऊ भूमि का रेगिस्तान में परिवर्तन रेगिस्तानीकरण कहलाता है। रेगिस्तान असीम शक्ति के साथ गतिशील होते हैं। रेगिस्तानीकरण का अर्थ यह कदापि नहीं है कि रेतीले टीलों की सीमा बढ़ाने के कारण रेगिस्तान का विस्तार हो रहा है। हालांकि यह कभी-कभी संभव है किन्तु इस प्रकार से रेगिस्तानों के विस्तार की यह परिघटना कम ही देखने में आती है।

सर्वप्रथम रेगिस्तानीकरण शब्द का प्रयोग सन् 1949 में फ्रेंच वैज्ञानिक ए.औब्रेविले ने अपनी पुस्तक ”कलाइमेट फारेस्ट एट डिजर्टीफिकेशन डी लाअफ्रिक्यू ट्रोपिकल“ में किया। कुछ लोगों के अनुसार वैज्ञानिक एल. लेवोडने (1927) ने रेगिस्तानीकरण शब्द का उपयोग प्रथम बार सहारा के वनों के बिगड़ते स्वरूप के सम्बन्ध में किया था। औब्रेविले ने इस विषय में बताया कि भूमि मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप यदि अफ्रीकी क्षेत्रों में स्थित नमीयुक्त और अर्धनम उपजाऊ भूमि अपनी उर्वरता खो दें अथवा उसका ह्रास हो जाए तो यह प्रक्रिया रेगिस्तानीकरण कही जाएगी।

अधिक चराई का परिणाम अपरदनअधिक चराई का परिणाम अपरदनउपग्रह से उपलब्ध चित्रों के अनुसार रेगिस्तान का विस्तृत होना अथवा अपना दायरा समटने की प्रक्रिया एक सीमित क्षेत्र तक ही संभव होती है। रेगिस्तान को इस प्रकार भी परिभाषित किया जा सकता है कि यदि शुष्क अथवा अर्धशुष्क उपजाऊ भूमि शनैः शनैः ऊसर भूमि में परिवर्तित हो जाए तथा उस भूमि की उर्वरता का भी नाश हो जाए तो ऐसी प्रक्रिया को रेगिस्तानीकरण कहते हैं। उदाहरण के लिए घास के मैदानों का ऊसर भूमि अथवा मरुभूमि में परिवर्तन होना जो अब एक असंभव सी प्रतीत होती क्रिया नहीं रही है। रेगिस्तानीकरण के द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र का लगातार होता नाश जीव-जन्तु तथा वनस्पति को तो प्रभावित करता ही है अपितु भूभौतिक संसाधनों जैसे धरती तथा जल के संचित भंडारों को तथा उनकी गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। रेगिस्तानीकरण की चर्चा प्रायः शुष्क क्षेत्र तथा सम्बन्धित पर्यावरण के संदर्भ में ही की जाती है किन्तु यह प्रक्रिया प्रेरीज, सवाना (घास के विशाल मैदान), वर्षावन तथा पर्वतीय क्षेत्र में आबादी को भी प्रभावित करती है। रेगिस्तानीकरण का प्रभाव साधारण से असाधारण के मध्य हो सकता है।

यह एक प्रकार की प्राकृतिक विपदा है यह प्रक्रिया शनैं: शनैं: चलती रहती है तथा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसमे मानव का योगदान हो सकता है। कोई क्षेत्र थोड़े समय में ही रेगिस्तान या रेगिस्तान समान परिस्थितियों वाला नहीं होता है। इस प्रक्रिया में बहुत लंबा समय लगता है। हालांकि रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया को मानवीय गतिविधियां बढ़ा सकती हैं। स्पष्ट रूप से रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया अच्छे या बुरे मौसम चक्र पर भी निभर करती है। हालांकि इससे तत्काल ही कोई संकट नहीं आता है। रेगिस्तानीकरण मानव द्वारा आवास के लिए रूखे, अनिश्चित, शुष्क भूमि के पर्यावरण में किए गए परिवर्तनों के अंतःसंबंधों का परिणाम है।

रेगिस्तानीकरण के लक्षण बहुत पहले से ही दिखाई देने लगते हैं। भूमि की बर्बादी के लिए वृक्षों की अत्यधिक कटाई, अधिक चराई, दावानल (जंगल की आग) और खेती जिम्मेदार है जिनसे पानी और हवा द्वारा मृदा का क्षरण होता है। औब्रेविले ने यह पाया कि कटिबंधीय अफ्रीका में मानवीय गतिविधियां रेगिस्तानीकरण का ही परिणाम है और यहां पिछले कुछ वर्षों में जलवायु में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है। औब्रेविले के अनुसार रेगिस्तानीकरण स्थानीय गतिविधि है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग रेगिस्तानीकरण के संकट का सामना करने के लिए अपने कार्यों और रहन-सहन में एकसमानता लिए हुए हैं। रेगिस्तान में रहने वाले लोगों को यह भी समझना चाहिए कि उनके वहां से पलायन कर जाने मात्रा से ‘रेगिस्तानीकरण’ रुक नहीं जाएगा। अक्सर यह देखा गया है कि यदि लोग ऐसे क्षेत्र से पलायन कर जाते हैं तो रेगिस्तानीकरण निश्चित ही हो जाता है।

रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया रेगिस्तान के विस्तार से कहीं अधिक जटिल परिघटना हैरेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया रेगिस्तान के विस्तार से कहीं अधिक जटिल परिघटना हैरेगिस्तान के फैलाव के संबंध में रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया समान्य नहीं है। साधारण शब्दों में रेगिस्तानीकरण का अभिप्राय शुष्क, अर्ध शुष्क या शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में भूमि के निम्नीकरण से है। भूमि का निम्नीकरण या अवक्रमण (डिग्रेडशन), जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों समेत कई अन्य कारकों का परिणाम है। वर्तमान में अनाज उत्पादन एवं पशुओं के लिए चराई भूमि की आवश्कता के समेत बढ़ती जनसंख्या को बसाने के लिए भूमि की मांग बढ़ने से भी रेगिस्तानीकरण में वृद्धि हुई है।

रेगिस्तानीकरण की विभिन्न परिभाषाओं के समान ही इसे प्रभावित करने वाले कारकों के संबंध में भी अनेक विवाद हैं। अक्सर किसी क्षेत्र को रेगिस्तान के रूप में परिभाषित करने या इसे नक्शे द्वारा प्रदर्शित करना विवाद का विषय हो सकता है। हालांकि इस बात में कोई मतभेद नहीं है कि रेगिस्तानीकरण से जैव विविधता में कमी आने के साथ ही स्थायी रूप से रेगिस्तानी क्षेत्र कृषि के लिए अनुपयुक्त हो जाता है।

नैरोबी (केन्या) में रेगिस्तानीकरण पर 1977 में संयुक्त राष्ट्र गोष्ठी के दौरान रेगिस्तान की व्याख्या इस प्रकार की गई - ”धरती की जैविक क्षमताओं में कमी होने पर वहां रेगिस्तान की भांति स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं। बढ़ती जनसंख्या की मांग के अनुसार, वनस्पति तथा पशुपालन से उपयोगी पदार्थों की प्राप्ति के साथ रेगिस्तानीकरण से विश्व स्तर पर पारिस्थितिकी तंत्र का नाश होने से धरती की उर्वरता अत्यन्त ही सीमित हो जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि विकास हेतु मानव का संघर्ष, आहार सामग्री के अधिक उत्पादन लक्ष्य को पूरा करने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग, बढ़ती जनसंख्या का दबाव तथा सामाजिक स्थिति को सुदृढ़ करने का आंतरिक दबाव आदि कारणों की अंतर्क्रिया और किसी लक्ष्य विशेष को पूरा न कर पाने का परिणाम रेगिस्तानीकरण के रूप में सामने आता है। अतः विकास हेतु निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि सभी प्रकार के जैविक उत्पादन के क्षेत्र में जनसंख्या पर नियंत्रण और प्रगति तथा तकनीक के उचित सामंजस्य स्थापित हो सके। उत्पादक पारितंत्र का नष्ट होना वास्तव में मानव समाज के विकास के लिए चिंता का विषय है। सामान्यतः मानव द्वारा प्रकृति से अत्यधिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति ने धरती की क्षमताओं में कमी की है जिसके परिणामस्वरूप धरती की उर्वरता प्रभावित हुई और धरती की ऊपरी मृदु पर्त अधिक मृदु होकर नष्ट होने के कगार पर पहुंच गई है। असीमित लाभ उठाने की प्रवृत्ति ने जल, जमीन तथा वनस्पति का विघटन किया; ध्यान रहे कि जीवन के लिए यह तीनों कारक अनिवार्य हैं। ऐसे क्षेत्रों में जैसे रेगिस्तान के निकटवर्ती भागों में जहां पारितंत्र अति भंगुर हो जाता है वहां धरती की गुणवत्ता तथा जल संसाधनों में आई गिरावट से वनस्पति, जीव-जन्तु एवं जैविक उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होता है और इनको पुनः यथा स्थिति में लाना असंभव होता है। रेगिस्तानीकरण एक प्रकार की स्वयं-पोषित व स्वतः चलित प्रक्रिया है जिसके कारण पुनर्वास अत्यंत कठिन हो जाता है। रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया को रोकने की पर विशेष ध्यान देना होगा ताकि कम से कम धन की उपलब्धता के साथ ही समय रहते पुनर्वास हो सके।“

यह ध्यान रखना चाहिए कि रेगिस्तानीकरण के विषय में लोगों को जानकारी नहीं होने अथवा जागरूकता के अभाव के कारण ही यह प्रक्रिया तीव्र गति से होती है। अक्सर लोग अपनी जानकारी के अनुप्रयोग में असमर्थ होते हैं जिसका परिणाम रेगिस्तानीकरण के रूप में प्रकट होता है। किसान, विशेषकर पिछड़े राष्ट्रों के, यह भलि-भांति जानते हैं कि रेगिस्तान को रोकने के लिए क्या करना चाहिए लेकिन फिर भी घोर गरीबी के कारण वह कुछ नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में किसान केवल असहाय बने रहते हैं और उन्हीं की आंखों के सामने उनकी धरती का रेगिस्तानीकरण हो रहा होता है। पारंपरिक गुणों से मानव समाज रेगिस्तान समान क्षेत्रों में रहने के लिए रास्ता खोज ही लेता है। फिर भी जनसंख्या की वृद्धि और भूमि से अधिक उपज की चाह में अनेक लोगों ने सदियों से विकसित अच्छी आदतों को भुला दिया है।

धरती का विघटन कोई नई प्रक्रिया नहीं है, यह पहले भी होता था लेकिन अब इसकी पहचान स्पष्ट हो जाने के कारण यह स्थिति भयावह हो चली है। इस बात के ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं कि तीन स्थानों भूमध्य सागर के तटीय क्षेत्र, मेसोपोटामियन घाटी तथा चीन के लोसियल पठार क्षेत्र पर अभिकेंद्रीय घटनाओं से भूमि का व्यापक निम्नीकरण हुआ है। बीते समय में अन्य स्थानों में भी धरती का विघटन हुआ था लेकिन उसके प्रभाव उतने स्पष्ट नहीं थे।

कुछ लोगों के मतानुसार रेगिस्तानीकरण एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इस विचार के अनुसार रेगिस्तानीकरण के लिए केवल प्रकृति ही उत्तरदायी है। कुछ अन्य लोगों का मत है कि यह केवल मानवीय कार्यों का ही परिणाम है। सच तो यह है कि कोई एक कारण इस स्थिति की पर्याप्त वजह नहीं बन सकते; मानवीय तथा प्राकृतिक दोनों ही कारण सम्मिलित रूप से इसके लिए जिम्मेदार हैं।

रेगिस्तानीकरण के प्राकृतिक कारण निम्नांकित हैः


1. वायु और पानी के द्वारा मृदा अपरदन।
2. वर्षा चक्र में दीर्घकालीन बदलाव तथा अन्य जलवायु सम्बन्धित परिवर्तन।

रेगिस्तानीकरण के कारणों का निर्धारण करना आसान नहीं है। फिर भी कुछ गतिविधियों को रेगिस्तानीकरण के कारणों के रूप में चिन्हित किया गया है। वे कारण निम्नांकित हैं:

1. वनोन्मूलन
2. अधिक चराई से वनस्पतियों का खत्म या कम होना
3. भू-जल में गिरावट
4. वर्षाजल का भू-सतह पर बहाव
5. विदेशी प्रजातियों का प्रभाव
6. जनसंख्या वृद्धि और वाहनों से मिट्टी के भौतिक गुणों में होने वाले परिवर्तन
7. खनन से होने वाली क्षति

वनोन्मूलन एवं अत्यधिक चराई रेगिस्तानीकरण का प्रमुख कारण हैवनोन्मूलन एवं अत्यधिक चराई रेगिस्तानीकरण का प्रमुख कारण हैरेगिस्तानीकरण के लिए मुख्यतया वनोन्मूलन तथा अत्यधिक चराई को जिम्मेदार माना जाता है। जीव-जंतुओं की संख्या में वृद्धि होने से भी वनस्पतियां कम होने लगती हैं। जानवरों द्वारा चराई के दौरान उनके खुर से मिट्टी धूल में बदलती रहती है। जिससे मिट्टी में सूक्ष्म पदार्थों का प्रतिशत बढ़ता जाता है। पानी और हवा द्वारा भू-क्षरण बढ़ता है। पौधे मिट्टी को बांधे रखते हैं। चराई और ईंधन के लिए लकडि़यों के संग्रह से पौधे खत्म या कम होने लगते हैं जिससे भूक्षरण की प्रक्रिया बढ़ती है। इस प्रकार रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है।

रेगिस्तानीकरण में जलवायु परिवर्तन की भूमिका का निर्धारण करना आसान नहीं है। विश्व के अनेक क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन ने अकाल की बारंबारता और व्यापकता को प्रभावित किया है। यह आवश्यक नहीं है कि सूखे की स्थिति (जलवायु) तथा उसके फलस्वरूप सूखी हुई धरती, किसी भी प्रकार से रेगिस्तानीकरण को प्रभावित करती हो। यह निश्चित रूप से क्हा जा सकता है कि स्थिति कितनी भी विस्फोटक क्यों न हो, अंततः परिणाम केवल संसाधनों के प्रबंधन पर ही निर्भर करता है।

रेगिस्तानीकरण में मानवीय गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन का योगदान भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में समय के अनुसार बदलता रहता है, यह उस क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों तथा समय चक्र पर निर्भर करता है। किसी एक परिस्थिति में रेगिस्तानीकरण से संबंधित कारकों को पहचानना आवश्यक है, उचित कारणों को जानने पर हीं उन कारको को नियंत्रित करने में सफलता मिल सकती है। रेगिस्तानीकरण स्वयं भी जलवायु में व्यापक रूप से परिवर्तन करने में पूर्णरूप से सक्षम है।

धरती के वायुमंडल में ‘ग्रीन हाउस गैसों’ के अधिक मात्रा में एकत्रित होने पर, वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण मौसम में परिवर्तन होता है। विगत कुछ दशकों से तो कुछ ऐसा ही प्रतीत हुआ है कि रेगिस्तानीकरण के फलस्वरूप उन क्षेत्रों का बहुत अधिक गर्म हो जाना भूमंडलीय तापमान पर भी कहीं कुछ प्रभाव डालता है। स्पष्ट रूप से ‘ग्रीन हाउस गैसों’ की अत्यधिक मात्रा कहीं अधिक विनाशकारी है। एक अनुमान के अनुसार रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया भूमंडलीय तापमान पर एक शताब्दी मे केवल 0.050 सेल्सियस से अधिक प्रभाव नहीं डाल सकती जो किसी भी दृष्टि से नगण्य है।

विश्व के अधिकतर रेगिस्तान अपने आसपास के परिवेश, विशेषकर पर्वतों या अन्य स्थलाकृतियों, से भिन्न होते हैं। रेगिस्तान एक प्रकार से अवरोधक का कार्य भी करते हैं। किन्हीं स्थानों पर तो मरुभूमि की अनेक पट्टियां नम-भूमि में परिवर्तित होते देखी जा सकती हैं। किन्तु इस प्रकार के परिवर्तन, ग्रीन हाउस गैसों की अधिकता से उत्पन्न परिवर्तनों की तुलना में, कम ही स्पष्ट होते हैं। फिर भी ऐसे स्थानों पर रेगिस्तान की सीमा का अनुमान लगा पाना या स्पष्ट देख पाना कठिन होता है। ऐसे सवंमिक क्षेत्र बहुत ही नाजुक (फ्रैजाइल) व संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र को प्रदर्शित करते हैं, जहां पर छोटी से छोटी अनियमिताएं पर्यावरण को प्रभावित करने में समर्थ होती हैं।

इन क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां पर्यावरण को तुरन्त प्रभावित कर सकती है। यहां पारिस्थितिकी तंत्र भी एक ऐसे कगार पर स्थित होता है जो एक निश्चित सीमा से थोड़ी अधिक छेड़-छाड़ को बिल्कुल भी सहन नहीं कर पाता है और फिर अंतिम परिणाम के रुप में धरती की गुणवत्ता ही प्रभावित होती है।

कुछ शुष्क व अर्धशुष्क भूमि में खेती भी की जा सकती है, लेकिन जनसंख्या की अधिकता अथवा वर्षा के अभाव से यहां की कुछ वनस्पतियां नष्ट हो जाती हैं। इस प्रकार कुछ पौधों की अनुपस्थिति में वायु द्वारा खुले स्थानों से धरती की मिट्टी, एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच सकती है तथा इसका परिणाम मृदा अपरदन के रूप में सामने आता है। इस प्रक्रिया में भूमि की ऊपरी सतह अपरदित हो जाती है। जहां वनस्पति नहीं होती वहां उनकी छाया भी न होने के कारण ऐसे स्थानों पर वाष्पीकरण की क्रिया तीव्र होने के परिणामस्वरूप धरती की सतह पर नमक जमा हो जाता है। इस प्रक्रिया को लवणीकरण कहते हैं। यह प्रक्रिया पेड़-पौधों के विकास को अवरुद्ध करती है। वनस्पति की कमी से वर्षा भी कम होती है। इसका मुख्य कारण पेड़-पौधों की अनुपस्थिति में नमी का कम हो जाना है जिसके फलस्वरूप उस स्थान विशेष की जलवायु भी प्रभावित होती है।

रेगिस्तान में घटित होने वाली अनेक प्राकृतिक घटनाओं में अकाल एक प्रमुख घटना है। कुछ लोगों के मतानुसार कुछ जलवायुविक क्षेत्रों में अकाल एक प्राकृतिक विपदा है। लेकिन निर्विवाद रूप से मानवीय गतिविधियां अकाल की बारंबारता के लिए जिम्मेदार हैं और कभी-कभी तो अकाल के लिए पूरी तरह से मानवीय क्रियाकलाप ही जिम्मेदार होते हैं।

यह अनुमान लगाया गया है कि केवल अकाल की घटना ही रेगिस्तानीकरण के लिए जिम्मेदार नहीं है। शुष्क और अर्ध-शुष्क भूमियों में अकाल समान्य घटना है। भूमि के सुनियोजित प्रबंधन द्वारा वर्षा होने पर अकाल से मुक्ति मिल सकती है। फिर भी यदि अकाल लंबी समय तक रहे तो यह भूमि के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी हो सकता है। रेगिस्तान के निकटवर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या तथा पुशपालन का दबाव रेगिस्तानीकरण को आमंत्रित कर सकता है। यायावरों के झुंड यदि शुष्क स्थानों से कम शुष्क स्थानों के लिए पलायन करते हैं तो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में होने वाले परिवर्तन से भूमि के निम्नीकरण की दर बड़ जाती है। यायावर लोगों के रेगिस्तानों को छोड़ने के कारण और अधिक रेगिस्तान बनते हैं। ऐसा संभवतः उनके द्वारा भूमि उपयोग की आदतों के कारण होता है। हमें रेगिस्तान में रहना सीखना होगा और वहां की पारिस्थितिकी के लिए उपयुक्त आदतों को अपनाना होगा।

रेगिस्तानीकरण के लिए मानवीय पक्ष भी महत्वपूर्ण है। रेगिस्तानीकरण, धरती की उत्पादक्ता घटने का परिणाम है। बाढ़ के कारण ऊपरी मृदा पर्त के साथ अनाज उत्पादन के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की बहुत अधिक मात्रा बह जाती है जिससे ऐसे स्थानों विशेषकर विकासशील देशों में तत्काल रेगिस्तानीकरण का प्रभाव देखा जाता है। जिससे निम्नांकित प्रभाव उत्पन्न होते हैं:

1. घोर गरीबी से कुपोषण और बीमारियां फैलती हैं।
2. राष्ट्र की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है तथा उसके फलस्वरूप सामाजिक व्यवस्थाएं भी चरमरा जाती हैं।
3. उस क्षेत्र में वनस्पति का आभाव कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि कर देता है क्योंकि पौधे-पौधे कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण कर प्रकाशसंश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते हैं।

रेगिस्तानीकरण के भौतिक परिणाम निम्नांकित हैं:


1. धूल-रेत की आंधियों की अधिकता हो जाती है।
2. सिंचाई की अदक्ष प्रणालियों तथा अपर्याप्त जल निकासी के परिणामस्वरूप बाढ़ जैसी विपदाएं अधिक प्रबल हो सकती हैं।
3. रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन को स्थानीय स्तर पर स्थानांतरित कर सकती है।

यदि रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया निरन्तर रूप से बिना किसी अवरोध के बढ़ती है तो निश्चय ही धरती के शुष्क क्षेत्रों में रहने वाली जनसंख्या (इन क्षेत्रों पर लगभग 60 से 70 करोड़ लोग निर्भर हैं) को गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है। यदि मानव रेगिस्तानीकरण से प्रभावित हुआ है तो कहीं न कहीं इस घटना के लिए वह भी आंशिक रूप से उत्तरदायी है। रेगिस्तानीकरण मानव और जटिल पर्यावरणीय परिवर्तनों का अंतःपरिणाम है। जब मानव संवेदनाओं और सीमाओं से मुक्त हो भूमि का दोहन करता है तब रेगिस्तानीकरण की समस्या उत्पन्न होती है।

रेगिस्तानीकरण एक गतिमान प्रक्रिया है, इसका आशय यह है कि एक बार आरंभ होने पर यह प्रक्रिया स्व-उत्प्रेरक की तरह चलती रहती है। रेगिस्तान को स्वतः ही अपने पांव तेजी से पसारने में महारत हासिल है। इसलिए यदि एक बार हमारे प्रयास इस दिशा में असफल हो गए तो रेगिस्तान को पुनः पुरानी स्थिति में लाना कठिन होता है। अपने प्रारम्भिक दौर में रेगिस्तानीकरण स्थानीय पारिस्थतिकी की उत्पादन क्षमता को कम कर रेगिस्तान की भांति स्थिति उत्पन्न कर देता है। इसका अर्थ है कि पोषक तत्व तथा ऊर्जा के बीच का असंतुलन पौधों की वृद्धि के लिए उपयुक्त नहीं होता है। धरती का अनुचित उपयोग इसी असंतुलन को और बढ़ा कर रेगिस्तानीकरण की घटना को बढ़ावा देता है। भविष्य में सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से भूमि का उपयोग कर और सूक्ष्म जलवायुविक एवं मृदा उर्वरकता में वृद्धि करने से रेगिस्तानी क्षेत्र के विस्तार को रोका जा सकता है।

प्रायः शुष्क भूमि पर कार्यरत किसानों को, धरती से अधिकाधिक उत्पादन पाने की इच्छा से आधुनिक तकनीकों जैसे कृषिभूमि को अधिक गहराई तक जोतने की गलती का पछतावा तब होता है जब उन्हें मिट्टी की ऊपरी पर्त के पोषक तत्वों की कमी का सामना करना पड़ता है। अक्सर नयी तकनीकें शुष्क भूमि की पारिस्थितिकी की साम्यावस्था को समझे बिना, आर्द्र क्षेत्रों को ध्यान में रखकर विकसित की जाती हैं। उदाहरण के लिए गहरे नलकूपों से पानी के दोहन में तेजी आने से जल की उपलब्धता बढ़ गई जिससे नलकूपों से पानी मिलने पर पशुओं को भी दूर तक नहीं जाना पड़ता है जिससे उनकी गतिशीलता कम हो गईं, जिसके परिणामस्वरूप जल का एक स्थान पर अत्यधिक शोषण होने लगा तथा जानवरों के चारे-पानी के लिए दूरस्थ क्षेत्रों में न जाकर नलकूप के समीपस्थ क्षेत्र तक ही सीमित होने से स्थानीय क्षेत्र के जल का अधिकाधिक उपयोग होने के फलस्वरूप वहां भूमि की गुणवत्ता में गिरावट आने लगी।

भूमि के परंपरागत उपयोग में आधुनिक कृषि व्यवस्था ने अनेक परिवर्तन करते हुए नई कृषि व्यवस्था को जन्म दिया है। इस व्यवस्था में अनेक प्रकार के पशु रखने के साथ इस बात का विशेष ध्यान रखा कि प्रत्येक प्रजाति के पशु पारिस्थिति तंत्र के विभिन्न भागों से लाभान्वित हो सकंे, जिससे स्थानीय क्षेत्र को दबाव से मुक्त किया जा सके।

भूमि का उचित उपयोग करने का अर्थ केवल कृषि तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। जब भूमि का उपयोग कोई संरचना निर्माण या आर्थिक उद्देश्य के लिए किया जाए, तब इसके लिए मार्गदर्शक सिद्धांत होने चाहिए। आज विकास के नाम पर शहरों, सड़कों एवं राजमार्गों, पाइपलाइनों और नहरों के निर्माण में वृद्धि हुई है। शुष्क क्षेत्रों में बहुत अधिक खनन गतिविधियां चल रही हैं। शायद शुष्क क्षेत्रों के उपयोग को रोक पाना संभव भी नहीं है। लेकिन यहां प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। समय की मांग है कि पारंपरिक सामाजिक मूल्यों को पहचाना जाए और शुष्क क्षेत्रों में लंबे समय के बाद विकसित हुए अनुकूलन के ज्ञान का सम्मान किया जाए। उच्च विकास के लिए तकनीक और पर्यावरण परिवर्तन को सामाजिक और आर्थिक स्तर पर परखने के साथ हमारी सोच व्यापक होनी चाहिए। इस दिशा में समन्वित प्रयत्न होने चाहिए जिसमें तकनीकी विकास प्रक्रिया के साथ आर्थिक, सामाजिक दृष्टिकोण के साथ पर्यावरण संतुलन पर भी विशेष ध्यान दिया जाए।

रेगिस्तानीकरण एक गतिशील प्रक्रिया हैरेगिस्तानीकरण एक गतिशील प्रक्रिया हैरेगिस्तानीकरण को रोकने के लिए कटिबद्ध हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के अनुसार स्थानीय लोगों तथा अनेक राष्ट्रों की सरकारों के बीच इस संबंध में साझेदारी अनिवार्य है। इस सम्मेलन का उद्देशय विशेष रूप से स्थानीय लोगों के अपनी धरती का संरक्षण तथा इसको प्रभावित करने वाले जलवायु संबंधी कारकों को समझने के लिए उत्साहित करना था। विगत में रेगिस्तानीकरण को सफलतापूर्वक रोकने के लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय प्रयास हुए हैं। लेकिन यह विषय इतना जटिल और अनिश्चित्ता लिए हुआ है कि इनके फलस्वरूप अधिकतर प्रयास विफल हो गए। यह भी लगभग निश्चित ही है कि रेगिस्तानीकरण के विषय में समस्त प्रयास व चर्चाएं, उन सारी अनिश्चितताओं के कारण फिर से और जटिल होकर एक विकट समस्या के समाधान को अधिक कठिन न बना दे।

20वीं शताब्दी में रेगिस्तानीकरण को रोकने में अधिक सफलता नहीं मिली है। किंतु समय बहुत तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। हमें आशा है कि जब संसार के सब लोग मिलकर इस समस्या के विरुद्ध एकजुट होकर इसका सामाना करने को तैयार होंगे तब रेगिस्तानी क्षेत्रों को शायद पुनः पहले वाली स्थिति में लाया जा सकेगा। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि पहले सब लोग रेगिस्तानीकरण की ज्वलंत समस्याओं से भली-भांति परिचित हों तथा उसको रोकने के विषय में भी समस्त जानकारियों को प्राप्त करें ।