रूठे मानसून की देश को चुनौती

Author:अवधेश कुमार
Source:नेशनल दुनिया, 26 जुलाई 2012

तपती और फटती धरती को तो वर्षा की फुहारें ही राहत दे सकती हैं। बारिश के अभाव में गर्मी से लोगों की छटपटहाट और इसके कारण होने वाली बीमारियों की मार की जो सूचनाएं आ रही हैं उनमें स्वास्थ्य की सारी मानवीय व्यवस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं। हम केवल मनुष्य की चिंता तक सीमित न हों, जंगली फसलों, वनस्पतियों, पालतू और जंगली जीव-जंतुओं की ओर भी देखिए और उनकी छटपटाहट की कल्पना करिए। न जाने कितने पानी व आहार की कमी से मर रहे होंगे। इससे पूरी प्रकृति का संतुलन प्रभावित होगा।

मीडिया की सुर्खियों में भले ही अण्णा समूह के अनशन की मौजूदा कड़ी हो लेकिन आम लोगों और देश के लिए मानसून के रूठने से बड़ा संकट इस समय कुछ नहीं हो सकता। अगर गर्मी से तपती धरती को बारिश की पर्याप्त बूंदें न मिलें तो प्रकृति का पूरा जीवनचक्र संकटग्रस्त हो जाता है। देश के कई इलाके अल्पवर्षा या अवर्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। सरकारी परिभाषा में सूखे की घोषणा की जाए या नहीं, इससे जमीनी हकीकत में फर्क नहीं आता। केंद्रीय जल आयोग देश के 84 जलाशयों पर निगरानी रखता है। इनमें पिछले साल की तुलना में अब तक सिर्फ 61 प्रतिशत पानी भरा है। हालांकि मौसम विभाग का दावा है कि औसत से 22 प्रतिशत कम वर्षा हुई है और इस आधार पर विचार करने से स्थिति उतनी विकट नहीं दिखेगी, किंतु पूरे देश में एक समान स्थिति नहीं है। कहीं-कहीं औसत से 75 प्रतिशत तक वर्षा हुई है। कुल मिलाकर करीब 80 प्रतिशत क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा हुई है। जरा उन क्षेंत्रों की ओर रुख करिए या वहां के लोगों से उनकी हालत पूछिए जो आकाश की ओर निहारते प्रतिदिन वर्षा की प्रतीक्षा करते हैं, आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

यही समय खरीफ एवं मोटे अनाजों की बुआई का होता है और बारिश के साथ इनका सीधा रिश्ता है। धान तो पनिया फसल है ही। इस समय तक धान की रोपाई का काम पूरा हो जाना चाहिए था, जबकि यह पिछले साल से काफी पीछे है। कुछ प्रमुख राज्यों-कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में तो काफी कम बारिश हुई है। कई राज्यों में औसत वर्षा तो कम नहीं दिखती लेकिन उन राज्यों के अंदर भी कई ऐसे क्षेत्र हैं जो अवर्षा का सामना कर रहे हैं। बिहार उन्हीं में शामिल है। कुल पैदावार में इन फसलों का योगदान 53 प्रतिशत से ज्यादा होता है। साफ है कि यदि वर्षा रानी रूठी रहीं या मानने में देर कर गई तो हमारे अनाज व मसाले की टोकरी दुर्बल हो जाएगी। कुछ उदाहरण देखिए-खरीफ की दालें जैसे अरहर, उड़द, मूंग आदि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार के कुछ भागों, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि में पैदा की जाती हैं। इनमें से ज्यादा क्षेत्रों में बारिश करीब 35 प्रतिशत तक औसत और राज्यों के अंदर कहीं-कहीं इससे भी कम हुई है। हालांकि किसानों को दलहन की उन फसलों की बुआई का सुझाव दिया जा रहा है जो कि कम सिंचाई में पैदा हो सकें। किंतु किसानों के लिए सुझावों का महत्व तभी है जब उनके पास ऐसे विकल्प अपनाने के संसाधन हों। मसालों में मिर्च, हल्दी आदि की रोपाई का यही समय है। जुलाई के अंत तक यदि बरसात नहीं हुई तो मिर्च पर असर पड़ना स्वाभाविक है।

कृषि का महत्व केवल खाद्यान्न या सब्जी, मसालों के उत्पादन तक ही नहीं है, यह हमारी जीवन प्रणाली है और अब भी देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ। उदारीकरण के बाद भारत अब कृषि प्रधान देश नहीं रहा, इसका योगदान तो कुल अर्थव्यवस्था में 15 प्रतिशत के भी नीचे है, इस तरह की शेखी बघारने वालों की पेशानी पर भी बल पड़ रहे हैं। कारण साफ है कि औद्योगिक व सेवा उत्पादन की करीब 50 प्रतिशत मांग ग्रामीण क्षेत्रों से ही आती है, जिनकी आय का मुख्य आधार कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियां ही हैं। जाहिर है, कृषि पैदावार प्रभावित होने का अर्थ जीवन प्रणाली एवं समूची अर्थव्यवस्था का प्रभावित होना है। वैश्विक मंदी से जूझती हमारी अर्थव्यवस्था के लिए यह बहुत बड़ा आघात होगा।

प्रधानमंत्री द्वारा इस संकट को स्वीकार कर अपनी देखरेख में मानसून की कमी से निपटने की तैयारी से कुछ उम्मीदें जागती हैं। सरकारी नीतियां वर्षा की भरपाई नहीं कर सकतीं, लेकिन इससे प्रभावित लोगों को सहायता देकर उनकी मुश्किलें थोड़ा कम कर सकती हैं, किसानों को सूखे की फसलों का ज्ञान और मार्गदर्शन कर भविष्य को दुरुस्त करने का आधार दे सकती हैं। सामान्य तौर पर अवर्षा या अल्पवर्षा से कृषि सबसे ज्यादा प्रभावित होती है। कृषि कार्य के लिए बिजली आपूर्ति हो, इसकी विशेष व्यवस्था की कोशिश हो रही है। पंजाब, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश को प्रतिदिन 300 मेगावाट बिजली देने की कोशिश हो रही है। उत्तर पश्चिम भारत में डीजल की आपूर्ति सुनिश्चित हो इसके निर्देश पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय को दिए गए हैं। पीने का पानी, पशुओं के लिए चारा, बीज आदि उपलब्ध हों इसके निर्देश भी दिए जा रहे हैं। जमीन पर ये योजनाएं कितनी उतरती हैं, इसके लिए हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी चाहिए, लेकिन कम से कम सरकार का इरादा लोगों को उनके हाल पर छोड़ने का नहीं है, यह कहा जा सकता है। वैसे इसमें राज्यों की भूमिका ही प्रमुख है और केंद्रीय योजनाओं का साकार होना भी उन्हीं के रवैये पर निर्भर करेगा।

किंतु प्रकृति के सामने मानवीय मशीनरी की सीमा है। कोई भी मानवीय प्रबंधन वर्षा की भरपाई नहीं कर सकता। इतिहास में सूखे और अकाल की दिल दहलाने वाली दास्तानों की कमी नहीं है। अकाल का सीधा संबंध ही वर्षा से होता है। सामान्यतः कह दिया जाता है कि भारत में अब भी करीब 60 प्रतिशत कृषि भूमि वर्षा पर ही निर्भर है। यह कतई अस्वाभाविक स्थिति नहीं है। भारत जैसे देश में समूचे कृषि क्षेत्र को कृत्रिम सिंचित क्षेत्र बना पाना असंभव है। यदि सिंचाई के ढांचे विकसित कर भी दिए तो उनमें पानी का स्रोत तो वर्षा ही होगी। धरती की कोख के पानी का भी मुख्य स्रोत बारिश ही है। वस्तुतः तपती और फटती धरती को तो वर्षा की फुहारें ही राहत दे सकती हैं। बारिश के अभाव में गर्मी से लोगों की छटपटहाट और इसके कारण होने वाली बीमारियों की मार की जो सूचनाएं आ रही हैं उनमें स्वास्थ्य की सारी मानवीय व्यवस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं। हम केवल मनुष्य की चिंता तक सीमित न हों, जंगली फसलों, वनस्पतियों, पालतू और जंगली जीव-जंतुओं की ओर भी देखिए और उनकी छटपटाहट की कल्पना करिए। न जाने कितने पानी व आहार की कमी से मर रहे होंगे। इससे पूरी प्रकृति का संतुलन प्रभावित होगा।

वास्तव में अल्पवर्षा या अवर्षा का प्रभाव व दुष्पप्रभाव-दोनों बहुगुणी होता है। केवल वर्तमान ही नहीं, अगली फसल का चक्र भी इससे प्रभावित होता है। इसीलिए जल संचय एवं सिंचाई की परंपरागत प्रणाली की ओर लौटने का सुझाव दिया जाता है जिसमें किसान ऐसी स्थिति से निपटने के लिए काफी हद तक तैयार रहते थे। आज संकट इसलिए ज्यादा बढ़ा है कि कृषि के आधुनिकीकरण के नाम पर हमारी परंपरागत प्रणालियां और ज्ञान नष्ट हो रहे हैं। इस दृष्टि से मानसून का मौजूदा रवैया हमारे लिए चेतावनी होनी चाहिए।

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