सिर्फ अक्षरज्ञान पर नहीं टिकेगा टिकाऊ विकास

Author:अरुण तिवारी

विश्व साक्षरता दिवस 08 सितम्बर 2015 पर विशेष


.वर्ष 2011 की जनगणना मुताबिक 74.04 प्रतिशत भारतीयों को अक्षरज्ञानी कहा जा सकता है। वर्गीकरण करें, तो 82.14 प्रतिशत पुरुष और 65.46 महिलाओं को आप इस श्रेणी में रख सकते हैं। आप कह सकते हैं कि आगे बढ़ने और जिन्दगी की रेस में टिकने के लिये अक्षर ज्ञान जरूरी है।

इस सन्दर्भ में उनके इस विश्वास से शायद ही किसी को इंकार हो कि इसमें साक्षरता की भूमिका, मुख्य संचालक की हो सकती है। किन्तु क्या साक्षरता का मतलब सिर्फ वर्णमाला के अक्षरों और मात्राओं को जोड़कर शब्द तथा वाक्य रूप में पढ़ लेना मात्र है? क्या मात्र अक्षर ज्ञान हो जाने से हम हर चीज के बारे में बुनियादी तौर पर ज्ञानी हो सकते हैं। नहीं!

संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘साक्षरता और टिकाऊ समाज’ को इस वर्ष के अन्तरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस का मुख्य विचार बिन्दु तय किया गया है। गौर कीजिए कि यह बिन्दु, हमारे उत्तर का समर्थन करता है। टिकाऊ विकास के स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों में सक्षमता हासिल करने के लिये संयुक्त राष्ट्र के विचारकों ने भी सिर्फ साक्षरता को नहीं, बल्कि सीखने के वातावरण को न्यूनतम आवश्यकता के रूप में महत्त्व दिया है।

‘सीखने का वातावरण’ - हम भारतीयों को इसके मन्तव्य पर खास ध्यान देने की जरूरत है। वे कहते हैं कि टिकाऊ समाज के निर्माण के लिये व्यापक ज्ञान, कौशल, व्यवहार और मूल्यों की आवश्कता है। यह सच है कि ये सभी आवश्यकताएँ हमें टिकाऊ विकास की भी बुनियादी आवश्यकताएँ हैं। इसी के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र ने खास निवेदन किया है कि टिकाऊ विकास के भावी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये हमें यह वर्ष साक्षरता और टिकाऊ विकास का जुड़ाव व सहयोग सुनिश्चित करने हेतु समर्पित करना चाहिए।

अक्षर ज्ञान से कितना आगे राष्ट्रीय साक्षरता मिशन?


आप सन्तुष्ट हो सकते हैं कि यह बात भारत के राष्ट्रीय साक्षरता मिशन द्वारा बहुत पहले समझ ली गई थी; इसीलिये साक्षरता मिशन के कार्यक्रम, आज अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं हैं; इसीलिये मिशन के सम्पूर्ण साक्षरता अभियान और उत्तर साक्षरता अभियान की संकल्पना की। इन अभियानों को नवसाक्षर को खासतौर पर आसपास के परिवेश और जरूरी कौशल के बारे में साक्षर और सक्षम बनाने के उद्देश्य से डिज़ाइन किया गया है।

प्रकृति प्रेमी इस बात से सन्तुष्ट हो सकते हैं कि भारत सरकार के साक्षरता मिशन ने अन्य विषयों के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को विशेष उद्देश्य के रूप में चिन्हित किया है। किन्तु इस बात से आप असन्तुष्ट भी हो सकते हैं कि राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के कार्यक्रम इस दिशा में रस्म अदायगी से बहुत आगे नहीं बढ़ सके हैं।

कहने को आज भारत के 424 एवं 176 जिले क्रमशः सम्पूर्ण साक्षरता और उत्तर साक्षरता अभियानों की पहुँच में है। किन्तु भारत में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में सामाजिक पहल की सुस्त दर बताती है कि जरूरत रस्म अदायगी से कहीं आगे बढ़ने की है। बगैर औपचारिक-पंजीकृत संगठन बनाए ऐसी पहल के उदाहरण तो और भी कम हैं।

कितने निरक्षर हम?


दरअसल, हमें साक्षरता की आवश्यकता हवा, पानी, नमी, जंगल, पठार, पहाड़ से लेकर अनगिनत जीवों और वनस्पतियों.. सभी की बाबत् है। क्या यह सच नहीं कि अक्षर ज्ञान रखने वाले ही नहीं, उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में भी आज प्रकृति और प्राकृतिक संरक्षण के मसलों को लेकर अज्ञान अथवा भ्रम कायम है। नदी जोड़ ठीक है या गलत? कोई कहता है कि ‘रन ऑफ रिवर डैम’ से कोई नुकसान नहीं; कोई इसे भी नदी के लिये नुकसानदेह मानता है।

कोई नदी को खोदकर गहरा कर देने को नदी पुनर्जीवन का काम मानता है; कोई इसे नदी को नाला बना देने का कार्य कहता है। किसी के लिये नदी, नाला और नहर में भिन्नता भी साक्षर होने का एक विषय है। कोई गाद और रेत के फर्क और महत्त्व को ही नहीं समझता। कोई है, जो गाद और रेत निकासी को सब जगह अनुमति देने के पक्ष में नहीं है। कोई मानता है कि जितने ज्यादा गहरे बोर से पानी लाया जाएगा, वह उतना अच्छा होगा। किसी की समझ इससे भिन्न है।

पानी-पर्यावरण साक्षरता के विषय कई


पानी-हवा समेत कई ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं, जिनके दैनिक उपयोग और संरक्षण को लेकर भारतीय समाज के हर वर्ग को साक्षर होने की जरूरत है; नेता, अफ़सर, इंजीनियर, ठेकेदार, किसान से लेकर शिक्षक, वकील और डॉक्टर तक। यदि हम इनके उपयोग और संरक्षण को लेकर साक्षर हो जाएँ, तो न मालूम अपना और अपने देश का कितने आर्थिक, प्राकृतिक और मानव संसाधनों को सेहतमन्द बनाए रखने में सहायक हो जाएँ। ज्यादातर लोग मानते हैं कि ‘आर ओ’ प्रक्रिया से प्राप्त पानी, आपूर्ति किये जा रहे पानी तथा भूजल से बेहतर है; जबकि कई विशेषज्ञ ‘आरओ’ प्रक्रिया से गुजरे पानी को सामान्य अशुद्ध जल से ज्यादा खतरनाक मानते हैं। वे कहते हैं कि ‘आरओ वाटर’ बॉयलर और बैटरी के लिये मुफीद है, जीवों के पीने के लिये नहीं। उनका तर्क है कि ‘आरओ’ प्रक्रिया में प्रयोग होने वाली झिल्ली सिर्फ खनिजों को ही वहीं नहीं रोक लेती, बल्कि ऐसे जीवाणुओं का भी वहीं खात्मा कर देती हैं, जो हमारे भोजन को पचाने के लिये सहयोगी हैं; जिन्हें प्रकृति ने हमें असल पानी के साथ मुफ्त दिया है।

लिहाजा, ‘आरओ वाटर’ इसी तरह ‘मिनरल वाटर’ के नाम पर मिल रहे बोतलबन्द पानी को लेकर भी मत भिन्नता है। ‘आरओ वाटर’ और ‘मिनरल वाटर’ नहीं, तो शुद्ध पानी प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ विकल्प क्या? पानी को ठंडा करने के लिये मिट्टी का मटका, रेफ्रिजरेटर से बेहतर विकल्प क्यों है? मिट्टी का मटका पानी को शीतल ही नहीं करता, नाइट्रेट जैसी अशुद्धि से मुक्त करने का काम भी करता है। क्या यह हमारे साक्षर होने का विषय नहीं।

क्या सच नहीं कि हमें ऐसे कितने मसलों पर साक्षर होने की जरूरत है? इन मसलों पर एक राय न होना ही जल के मामले में हमारे निरक्षर होने का पुख्ता सबूत है। तकनीकी डिग्री-डिप्लोमा प्राप्त कितने ही लोग ऐसे हैं, संचयन ढाँचे बनाने के लिये जिन्हें न विविध भूगोल के अनुकूल स्थान का चयन करना आता है और न ही ढाँचे का डिजाइन बनाना।

यदि हमारे सरकारी ढाँचें में यह निरक्षरता न होती, तो मनरेगा के ज्यादातर ढाँचें बेपानी न होते। भारत की कृषि को भूजल पर निर्भर बनाना अच्छा है या नहरी जल अथवा अन्य सतही ढाँचों के जल पर? क्या इसका उत्तर, पूरे भारत के लिये एक हो सकता है? यदि हम अनुकूल माध्यम के बारे में साक्षर होते, तो ‘स्वजल’ परियोजना के तहत् उत्तराखण्ड के ऊँचे पहाड़ी इलाकों में इण्डिया मार्का हैण्डपम्प लगाने की बजाय, चाल-खाल बनाते।

अन्य प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हमारी साक्षरता पर गौर कीजिए। कोई प्राकृतिक जंगल को सर्वश्रेष्ठ मानता है, तो किसी को इमारती जंगल बेहतर लगता है। किसी को गिद्ध, गौरैया, गाय, कौआ, बाघ, भालू, घड़ियाल, डॉलफिन से लेकर अनेकानेक प्रजातियों की संख्या घटने से कोई फर्क नहीं पड़ता; कुछ लोग हैं, जिन्हें फर्क पड़ता है। अभी दिल्ली के एक अस्थमा पीड़ित व्यक्ति ने तीन ऐसे पौधों की खोज की, जिन्हें लगाकर हम अपने आसपास की हवा को साफ कर सकते हैं। किन्तु हम में से ज्यादातर लोग यह नहीं जानते।

कहना न होगा कि पानी-हवा समेत कई ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं, जिनके दैनिक उपयोग और संरक्षण को लेकर भारतीय समाज के हर वर्ग को साक्षर होने की जरूरत है; नेता, अफ़सर, इंजीनियर, ठेकेदार, किसान से लेकर शिक्षक, वकील और डॉक्टर तक। यदि हम इनके उपयोग और संरक्षण को लेकर साक्षर हो जाएँ, तो न मालूम अपना और अपने देश का कितने आर्थिक, प्राकृतिक और मानव संसाधनों को सेहतमन्द बनाए रखने में सहायक हो जाएँ।

प्याऊ

सद्ज्ञान से स्वावलम्बन


हमारी दैनिक समस्याओं को लेकर आज हमारे समक्ष पेश ज्यादातर विकल्प, खरीद-बिक्री की रणनीति पर आधारित हैं। बाजार, कभी किसी ग्राहक को स्वावलम्बी नहीं बनाता। अतः सच यही है कि इन विषयों की साक्षरता और स्वयं करने का कौशल ही हमें इन मामलों में स्वावलम्बी बनाएँगे।

अतः हमें सिर्फ पानी-पर्यावरण ही नहीं, बल्कि विकास को टिकाऊ और बेहतरी की दिशा में गतिमान बनाए रखने के हर पहलू के प्रति साक्षर होने के प्रयास तेज कर देने चाहिए। रास्ते और रणनीति क्या हो? इस पर सभी को अपने-अपने स्तर पर विमर्श और ज़मीनी काम शुरू कर देने चाहिए। इस अन्तरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर इस बाबत् हम स्वयं चेतें और राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के लोक चेतना केन्द्रों को भी चेताएँ।

मददगार तकनीक, साझे से समग्रता


यूनेस्को के महानिदेशक ने इस बाबत् अपने सभी सहभागी देशों से निवेदन किया है कि सम्पूर्ण साक्षरता लक्ष्य हासिल करने हेतु वे मोबाइल फोन समेत उपलब्ध आधुनिक तकनीक को एक ताजा अवसर के तौर पर लें। उम्मीद है कि भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, जल संसाधन, कृषि, पर्यावरण, संचार और सूचना से सम्बद्ध मंत्रालय इस दिशा में कुछ सोचेंगे और संयुक्त रूप से कुछ करेंगे।

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