स्मार्ट शहर: भारतीय सन्दर्भ

Author:उषा पी रघुपति
Source:योजना, सितम्बर 2015

भारत अन्य देशों की तरफ प्रेरणा के लिए देख सकता है लेकिन इसे अपने शहरों को तकनीकी रूप से उच्चतर और सुचारू रूप से संचालित करने के लिए अपने देश के हिसाब से समाधान ढूँढने चाहिए। विकासशील स्मार्ट सिटीज के लिए संवहनीय विकास और संवहनीय समाधान आखिरी लक्ष्य होने चाहिए। जब तक हम प्रशासन में सुधार और लोगों के व्यवहार में परिवर्तन नहीं लाएँगे, तब तक हम दुनिया के स्मार्ट सिटीज की तरह अपने देश के शहरों को बनाने का स्वप्न पूरा नहीं कर पाएँगे। हो सकता है कि हम स्मार्ट सिटीज बनाने में कामयाब हो जाएँ लेकिन हमें प्रशासन में सुधार लाना ही होगा ताकि हमारे ये खूबसूरत शहर फिर से पुराने ढर्रे पर न लौट जाएँ। हमें हर व्यक्ति को परिवर्तन के लिए तैयार करना होगा।

भारत ने इस बात को अब स्वीकार कर लिया है कि शहरी भारत की विकास दर ग्रामीण भारत की विकास दर से वास्तविक अर्थों में ज्यादा है। सन 2001-2011 के दशक में शहरी भारत ने अपनी आबादी में 9.1 करोड़ लोगों को जोड़ा जबकि ग्रामीण भारत ने उसी अवधि में 9 करोड़ लोगों को जोड़ा। देश में शहरों के विकास के लिए चलाई गई योजना जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण विकास योजना (जेएनएनयूआरएम) से पहले शहरी क्षेत्र के विकास के लिए जो धन राशि आवंटित की जाती थी, वो ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में महत्वहीन थी। जेएनएनयूआरएम ने इस दिशा के चिन्तन में एक व्यापक परिवर्तन लाया। इसने इस तथ्य को स्वीकार किया कि शहरी भारत देश के आर्थिक विकास और तरक्की में एक महत्त्वपूर्ण और केन्द्रीय भूमिका निभाता है।

भारत के शहर देश की आर्थिक गतिविधियों को संचालित करते हैं और देश के सकल घरेलू उत्पाद में कम से कम दो तिहाई का योगदान देते हैं। जब तक शहरों में अच्छी गुणवत्ता की बुनियादी सुविधाएँ, सक्षम बुनियादी ढाँचे और सेवाएँ नहीं दी जाएँगी, भारत की अर्थव्यवस्था अपनी महत्वाकांक्षी 8 फीसदी की विकास दर नहीं हासिल कर पाएगी।

2011 के जनगणना आँकड़ों के मुताबिक भारत में 4041 विधिक शहर हैं और 3894 जनगणना शहर हैं (वे इलाके जो भारत की जनगणना की परिभाषा के मुताबिक शहरी घोषित किए गए हैं)। भारत की शहरी आबादी का लगभग 70 फीसदी ऐसे शहरों या शहरी बसावटों में रहता है जिनकी आबादी एक लाख या उससे ऊपर है। जहाँ इनमें से ज्यादातर शहर तेज रफ्तार से बढ़ रहे हैं वहाँ भारत के महानगर (जिनकी आबादी 50 लाख या ज्यादा है) विकास की रफ्तार के दबाव में चरमरा रहे हैं। जो शहर खासकर बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं उनको बढ़िया तरीके से नियोजित करने की जरूरत है, उनको बेहतर समाधान की जरूरत है। वर्तमान में भारत के शहरी इलाकों में बहुत सारी समस्याएँ हैं जैसे बुनियादी ढाँचों की कमी, आधारभूत सेवाएँ, गरीबी, झुग्गी-झोपड़ियाँ, अपर्याप्त आवासीय सुविधाएँ, परिवहन के साधन, घनी बसावट और हर तरह के प्रदूषण इत्यादि। साथ ही वहाँ पर्यावरण में बदलाव से उत्पन्न समस्याएँ और बढ़ती जा रही प्राकृतिक और मानव-जनित आपदाएँ भी शामिल हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण समाधन और सुशासन की आवश्यकता है।

भारत के ज्यादातर शहरों का मास्टर प्लान नहीं बना है और इसीलिए वहाँ अनियोजित शहरीकरण हो रहा है जो ज्यादा चिन्ता का विषय है। खासकर बुनियादी ढाँचों और सेवाओं को प्रदान करने के सन्दर्भ में तो बहुत चिन्ता का विषय है। शहरों के ज्यादातर हाशिए के इलाके तो लगभग ‘प्रशासन रहित’ इलाके हैं क्योंकि न तो वे शहरी इलाके हैं और न ही ग्रामीण। जैसे-जैसे शहरों का फैलाव होता है तो ये हाशिए के इलाके भी शहर में शामिल हो जाते हैं जो ज्यादातर अनियोजित होते हैं। इसीलिए एक गहन योजनाकृत विकास की आवश्यकता है जो शहरों के विकास को नियमित कर सकें क्योंकि बाद में शहर को नियोजित करना या पुनर्विकास करना बहुत कठिन कवायद होती है।

वर्तमान सरकार की मुख्य योजनाएँ जिसमें 100 स्मार्ट शहर, अटल मिशन फाॅर रिजुविनेशन एंड अर्बन ट्रांसफोर्मेशन (अमृत), नेशनल हैरिटेज सिटी डेवलपमेंट एंड अग्यूमेंटेशन योजना (हृदय), स्वच्छ भारत अभियान और हाउसिंग फाॅर आॅल का उद्देश्य शहरों को रहने योग्य, समावेशी गतिशील, तकनीकी रूप से उच्चतर और आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धात्मक बनाना है। भारत सरकार के शहरी विकास मन्त्रालय के मुताबिक किसी स्मार्ट सिटी के मूल बुनियादी तत्वों में निम्नलिखित सुविधाएँ शामिल होंगी:

1. पर्याप्त जलापूर्ति
2. सुनिश्चित बिजली आपूर्ति
3. स्वच्छता (ठोस कचरा प्रबंधन सहित)
4. सक्षम शहरी परिवहन और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था
5. सस्ते आवास, खासकर, गरीबों के लिए
6. शानदार आईटी संचार और डिजिटलाइजेशन
7. सुशासन, खासकर ई-प्रशासन और नागरिक भागीदारी
8. संवहनीय पर्यावरण व्यवस्था
9. नागरिकों की सुरक्षा, खासकर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा
10. स्वास्थ्य और शिक्षा

स्मार्ट सिटी मिशन में इलाकेवार तरीके से विकास के रणनीतिक तत्व हैं- शहर का सुधार (पुराने इलाकों का अनुकूल विकास), पुनर्जीवन (पुनर्विकास) और नगरीय प्रसार (हरित क्षेत्र विकास) और सम्पूर्ण नगरीय विकास जिसमें बुद्धिमत्तापूर्ण समाधान को लागू किया जाएगा और शहर के बड़े हिस्सों को इसकी जद में लिया जाएगा। (स्मार्ट सिटी रणनीति- भारत सरकार के शहरी विकास मन्त्रालय की वेबसाइट से)

स्मार्ट सिटी उन विचारों की संकल्पना करता है जिसके मुताबिक एक शहर सुचारु रूप से चलता है और उसकी हर गतिविधि अपने नियत तरीके से होती है। ये वैसे शहर होते हैं जहाँ आधारभूत सुविधाओं तक सबकी पहुँच होती है, सक्षमता-पूर्वक सेवाओं को पहुँचाया जाता है, स्वच्छता होती है, बढ़िया परिवहन प्रणाली होती है, साइकिल के लिए अलग से रास्ता होता है, पैदल चलने वालों के लिए रास्ता होता है, हरियाली होती है, जलाशय होते हैं, हरित मकान, हरित ऊर्जा, ई-प्रशासन, डिजिटल तकनीक का प्रयोग, सक्षम सूचना और संचार के तंत्र आदि-आदि होते हैं। हमें अपने शहरों का बदलने के लिए इन सारे मोर्चों पर काम करना होगा। स्मार्ट सिटीज में भविष्य का दृष्टिकोण भी होना चाहिए कि आने वाले दिनों में शहर कैसे होंगे और उनके भविष्य में फैलाव के उपाय भी होने चाहिए।

भारत के सन्दर्भ में स्मार्ट सिटी को अग्रलिखित बातों को सम्मिलित करना चाहिएः तकनीक, वित्तीय व्यवस्था, आँकड़ों तक पहुँच, ऊर्जा, पर्यावरण, पर्यावरण परिवर्तन से उत्पन्न समस्याओं का समाधान व उसकी रोकथाम, आपदा प्रबंधन सुधार, प्रशासन और नागरिक।

तकनीक: शहरों के प्रबंधन में डिजिटल तकनीक कल्पनाशील तरीके से सक्षम समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं चाहे वो परिवहन हो (यातायात और परिवहन), शहरी योजना या बुनियादी ढाँचों का निर्माण और सेवाएँ जैसे कि जलापूर्ति, नाली की व्यवस्था, ठोस कचरा प्रबंधन इत्यादि। स्मार्ट सिटी को सड़कों पर भीड़भाड़ कम करनी चाहिए और वायु प्रदूषण को भी। साथ ही उसे बेहतर स्वास्थ्य और बेहतर जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित करनी चाहिए। सेंसर का इस्तेमाल और वास्तविक समय में आँकड़ों को प्रदान करने से ये सुनिश्चित हो सकेगा कि सेवाएँ कैसे काम करती हैं और लोग उसका कैसे इस्तेमाल करते हैं। घरों में पानी और बिजली के लिए डिजिटल मीटर लगाने से लोग खुद भी अपने उपभोग की दर को देख सकेंगे और संसाधनों का अपव्यय रोक पाएँगे। सूचना और संचार तकनीक को सामाजिक क्षेत्र का भी ध्यान रखना चाहिए और समावेशी होना चाहिए। मिसाल के तौर पर उसका ऐसा उपयोग हो कि कल्पनाशील तरीके से हम सेवाओं को बुजुर्गों, विकलांगों, गरीबों और समाज के अशिक्षित वर्गों तक पहुँचा सकें।

वित्त: देश में ढेर सारे सेवा प्रदाता हैं जो विभिन्न क्षेत्रों के लिए सेवा प्रदान कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए वित्त की जरूरत पड़ेगी। बहुत सारे शहरों में नगरीय प्रशासन वित्तीय संकट से गुजर रहे हैं। यहाँ तक कि आधारभूत सेवाएँ और वेतन भी नहीं दे पा रहे। इसीलिए स्मार्ट सिटीज को सरकार में उच्चतर स्तर से, वित्तीय संस्थाओं, निजी क्षेत्र या अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों से वित्त पोषण हासिल करना होगा। सरकार और निजी क्षेत्रों को इसमें निवेश करना होगा और दीर्घावधि रखरखाव के लिए उपभोक्ताओं से पैसा लेना होगा।

किसी भी शहर के कामयाब प्रबंधन में नागरिकों की भूमिका केन्द्रीय होती है। प्रशासन को हरेक क्षेत्र में नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के उपाय करने चाहिए। स्मार्ट सिटीज में ऐसे प्रशासनिक ढाँचे होने चाहिए जो नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा दे सके। इससे ऐसा होगा कि लोग शहरों के प्रति अपना लगाव दिखाएँगे और इसके नीति निर्माण में भागीदारी कर सकेंगे। साथ ही नागरिकों को भी बुनियादी ढाँचे और सेवाओं के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार बनाने के लिए पहल की जानी चाहिए। नागरिकों के व्यवहार और उनकी प्रतिक्रिया को बदलने के लिए स्मार्ट सिटीज में उच्च तकनीक समाधान प्रस्तुत करना होगा और इसके लिए सूचना, शिक्षा और संचार की जरूरत पड़ेगी।

आँकड़ों तक पहुँच: स्मार्ट शहरों को बुनियादी ढाँचों और सेवा की सूचनाओं में खुलापन लाना होगा, खासकर उन सूचनाओं के लिए जो आम जनता से जुड़ी हुई हैं। इसके लिए हरेक शहर में स्तरीय और मानकीकृत सूचना सेवा के रख-रखाव की जरूरत होगी। तकनीक की मदद से सूचनाओं की क्राउड सोर्सिंग (तकनीक के माध्यम से अलग-अलग तरह की सूचनाओं का एक ही जगह जमावड़ा) भी की जा सकती है जो सामान्य परिस्थितियों में हासिल करना कठिन कार्य होगा। ये वास्तविक समय में हासिल होने वाले आँकड़े भी होंगे। सूचनाओं तक पहुँच से सेवा प्रदाता और उपभोक्ता सशक्त होंगे। इससे आम जनता का जीवन स्तर सुधरने में मदद मिलेगी।

ऊर्जा: हरित और स्वच्छ ऊर्जा (नवीकृत), स्मार्ट ग्रिट, आधुनिक हरित इमारतें जो ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधन के इस्तेमाल और संरक्षण को उच्चस्तर तक कर सकती हैं, ये सारी बातें किसी भी स्मार्ट सिटी में होनी ही चाहिए। इससे पर्यावरण की क्षति को भी रोका जा सकेगा, ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन का भी कम किया जा सकेगा जिस पर भारत ने वैश्विक वार्ताओं में सहमति दर्ज की है।

पर्यावरण: स्मार्ट सिटी में हरित इलाके जो जैव-विविधता को प्रोत्साहित करते हों, हरित इलाके (जैसे पार्क, जंगल आदि) जो कार्बन सिंक क रूप में काम करें, नागरिकों के लिए खुली जगहें कि वे आपस में बातचीत कर सकें, स्वच्छ हवा, जलाशयों का निर्माण और उनका संरक्षण जिसमें बारिश का पानी जमा हो सके, भूजल को रिचार्ज किया जा सके या जो तीव्र बरसात के समय उसको सोखने का काम कर सके, इत्यादि की व्यवस्था होनी चाहिए।

पर्यावरण परिवर्तन के प्रति सुरक्षा: स्मार्ट सिटीज ऐसे हों जो पर्यावरण के अनुकूल हों, उसमें हो रहे बदलावों का समाधान पेश कर सकें और बचाव के उपाय कर सकें। इसका मतलब ये है कि स्मार्ट सिटी के योजना बनाते समय ही हमें ऐसे उपायों की योजना बनानी होगी। मिसाल के तौर पर जल क्षेत्र में वर्षा जल संरक्षण, इस्तेमाल किए गए पानी का पुनर्चक्रण जलापूर्ति के विभिन्न स्रोतों की पहचान, जलवाही चट्टानों को रिचार्ज करना और जल संरक्षण के उपायों को बढ़ावा देना आदि कार्य शामिल हैं। इससे उन शहरों को जल की समस्या से जूझने में मदद मिल सकेगी जो पर्यावरण में आ रहे बदलावों की वजह से हो सकते हैं। दूसरी मिसाल है ऊर्जा के एक ही स्रोत पर निर्भरता को कम करना। जैसे छोटी-छोटी छतों पर सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना आदि-आदि।

आपदा और जोखिम प्रबंधन: अक्सर ही कई तरह की आपदाएँ शहरों को चोटिल करती रहती हैं और जैसा कि जलवायु परिवर्तन को लेकर आशंकाएँ हैं, इसमें बढ़ोत्तरी ही होगी। इसीलिए स्मार्ट सिटीज को आपदा प्रबंधन को लेकर पहले से तैयार रहने की जरूरत पड़ेगी। उन आपदाओं में बाढ़, भूकम्प, आगजनी और भूस्खलन कुछ भी हो सकते हैं। उन आपदाओं के समय ही किसी स्मार्ट सिटी की परीक्षाएँ ली जाएँगी। स्मार्ट सिटी की योजना बनाते समय इस बिन्दु का ध्यान रखना होगा।

सुधार: शहरी भारत को न केवल उन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है जिसकी वकालत जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) में की गई है बल्कि अगली पीढ़ी के सुधारों को भी करने की आवश्यकता है जो जेएनएनयूआरएम के अगले चरण के लिए रखे गए हैं। बुनियादी ढाँचों और सेवाओं के रख-रखाव और परिवर्तनों को संवहनीय रूप से लागू करने के लिए उन सुधारों को लागू करना ही होगा।

सुशासन: किसी शहर को बढ़िया तरीके से प्रबन्धित करने के किए सुशासन एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। विकसित और विकासशील दुनिया का मूल अंतर सिर्फ तकनीक नहीं है, बल्कि सुशासान है। नियम, विनियम और उनका क्रियान्वयन इस बात में अहम भूमिका निभाते हैं कि कोई शहर कैसे काम करता है। भारत में हरेक क्षेत्र में बहुत ही बढ़िया नियम-कायदे हैं लेकिन बहुत खराब क्रियान्वयन का रिकाॅर्ड है। स्मार्ट सिटीज में मजबूत प्रशासन की आवश्यकता होगी जिसमें तकनीक का इस्तेमाल अपरिहार्य होगा। स्थानीय स्तर पर हमारे शासन की इकाईयों को एक दूसरे के साथ तालमेल और सहयोग की भावना से काम करना होगा, न कि पृथक-पृथक अपने अंदाज में जैसा कि ज्यादातर मामलों में आजकल हो रहा है। प्रशासन को सुधारने के लिए एजेंसियों और सरकारी विभागों में सूचनाओं का आदान-प्रदान करना होगा। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में चुने हुए नेता ही आखिरकार प्रशासन की रूपरेखा तय करते हैं। स्मार्ट सिटीज में पारदर्शी और जिम्मेदार सरकार की आवश्यकता होगी। शहरों के बढ़िया प्रबंधन के लिए प्रशासन में क्षैतिज और लंबवत एकीकरण व तालमेल जरूरी है।

भारतीय शहरों में परिवर्तन लाने में एक जो सबसे बड़ी दिक्कत है वो ये है कि संस्थाओं और व्यक्तियों का परिवर्तन के प्रति अनुकूलित होने और उसे प्रबंधित करने की उपयुक्त सक्षमता नहीं है। नए तरीके से काम करने और नई तकनीक का इस्तेमाल करने के लिए हमें नए कौशल और ज्ञान की जरूरत पड़ेगी। प्रशासन में तभी सुधार आ पाएगा जब इस तरह के ज्ञान और कौशल को नियमित रूप से और सदा चलते रहने वाले क्रियाकलाप के तौर पर लिया जाए।

नागरिक: किसी भी शहर के कामयाब प्रबंधन में नागरिकों की भूमिका केन्द्रीय होती है। प्रशासन को हरेक क्षेत्र में नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के उपाय करने चाहिए। स्मार्ट सिटीज में ऐसे प्रशासनिक ढाँचे होने चाहिए जो नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा दे सके। इससे ऐसा होगा कि लोग शहरों के प्रति अपना लगाव दिखाएँगे और इसके नीति निर्माण में भागीदारी कर सकेंगे। साथ ही नागरिकों को भी बुनियादी ढाँचे और सेवाओं के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार बनाने के लिए पहल की जानी चाहिए। नागरिकों के व्यवहार और उनकी प्रतिक्रिया को बदलने के लिए स्मार्ट सिटीज में उच्च तकनीक समाधान प्रस्तुत करना होगा और इसके लिए सूचना, शिक्षा और संचार की जरूरत पड़ेगी। कानून और विनियमन के द्वारा भी इन व्यवहारों में परिवर्तन लाया जा सकता है।

नागरिकों को सशक्त बनाने में वैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए जो उपयोगी और उपयुक्त हों। मोबाइल फोन, कम्प्यूटर और किओस्क के माध्यम से स्मार्ट सिटीज को अपने नागरिकों तक सूचनाओं को पहुँचाने का काम करना चाहिए।

भारत, भौगोलिक, सांस्कृतिक और विकास के स्तर के सन्दर्भ में एक विशाल देश है। किसी भी स्मार्ट सिटी की योजना बनाते समय देश की विविधता का ख्याल रखा जाना चाहिए। सबके लिए एक ही जैसी योजना से इच्छित नतीजे हासिल नहीं हो पाएँगे। हमें अपनी योजनाओं को बनाते समय देसी ज्ञान और समाधानों को भी महत्व देने की आवश्यकता है।

स्मार्ट सिटीज के विकास में भारत की ललक को देखते हुए सिंगापुर, वियेना (आॅस्ट्रिया), सोंग्डो (कोरिया), बार्सीलोना (स्पेन) आदि शहरों के उदाहरण दिए जाते हैं। हालाँकि भारत अन्य देशों की तरफ प्रेरणा के लिए देख सकता है लेकिन इसे अपने शहरों को तकनीकी रूप से उच्चतर और सुचारू रूप से संचालित करने के लिए अपने देश के हिसाब से समाधान ढूँढने चाहिए। विकासशील स्मार्ट सिटीज के लिए संवहनीय विकास और संवहनीय समाधान आखिरी लक्ष्य होने चाहिए। जब तक हम प्रशासन में सुधार और लोगों के व्यवहार में परिवर्तन नहीं लाएँगे, तब तक हम दुनिया के स्मार्ट सिटीज की तरह अपने देश के शहरों को बनाने का स्वप्न पूरा नहीं कर पाएँगे। हो सकता है कि हम स्मार्ट सिटीज बनाने में कामयाब हो जाएँ लेकिन हमें प्रशासन में सुधार लाना ही होगा ताकि हमारे ये खूबसूरत शहर फिर से पुराने ढर्रे पर न लौट जाएँ। हमें हर व्यक्ति को परिवर्तन के लिए तैयार करना होगा।

लेखिका राष्ट्रीय शहरी मामले संस्थान (एनआईयूए) में प्रोफेसर हैं। नगर नियोजन में उन्हें 34 वर्ष का अनुभव प्राप्त है। वह शहरी अवसंरचना, शहरी सेवाएँ, शहरी पर्यावरण, शहरी गरीबी और शहरी हरित विकास आदि विषयों पर काम कर चुकी हैं। फिलहाल वह पूरे भारत में शहरी जलवायु परिवर्तन संतुलन तथा स्थानीय नगर शासन इकाईयों के अधिकारियों के क्षमता विकास के विषय पर काम कर रही हैं। ईमेल: uraghupathi@niua.org

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