शुष्क क्षेत्र - जल संग्रहण

Author:एस.सी. महनोत और पी.के. सिंह
Source:इंटर कोऑपरेशन
जल विस्तार एक पद्धति है जिसमें प्राकृतिक नालियों अथवा नालिकाओं से खाइयों, अवरोधों (डाइक्स), बांधों और तालाबों के द्वारा अपवाह की राह बदलकर अथवा विलम्बित कर इसे कम ढालू अथवा लगभग समतल क्षेत्रों में फसल उगाने हेतु विस्तार करते हैं। जल विस्तार पद्धति को चारागाहों में भी अपनाया जा सकता है। जल विस्तार पद्धति का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में पेड़ पौधों को नमी उपलब्ध कराना है ताकि अतिरिक्त नमी के प्रभावी उपयोग से प्राकृतिक वर्षण की शेष पूर्ति हो सके। भविष्य में उपयोग हेतु भूजल के पुनः पूरण में भी इस विधि को अपनाया जाता है। शुष्क क्षेत्र में सीमित वर्षा प्रायः कम अवधि वाले तीव्र तूफानों के साथ होती है। यह जल शीघ्रता से नालिकाओं में निकल जाता है और फिर बहता जाता है, जो कभी कभी कई मिलों तक समुद्र अथवा क्षेत्र में अवस्थित झील की ओर। वह क्षेत्र जल से वंचित रह जाता है और इससे उत्पन्न आकस्मिक अपवाह से आई बाढ़े विनाशकारी हो सकती है बहुधा उन क्षेत्रों में जहां तूफानी वर्षा हुई ही नहीं थी। शुष्क क्षेत्रों में जल संग्रहण विधियां इस बहुमूल्य और जीवनदायी संसाधन को सावधानीपूर्वक कल्पनाशीलता एवं प्रभावी तकनीक क्षमता का उपयोग करते हुए संचय की ओर अग्रसर हैं।

जल विस्तार


जल विस्तार एक पद्धति है जिसमें प्राकृतिक नालियों अथवा नालिकाओं से खाइयों, अवरोधों (डाइक्स), बांधों और तालाबों के द्वारा अपवाह की राह बदलकर अथवा विलम्बित कर इसे कम ढालू अथवा लगभग समतल क्षेत्रों में फसल उगाने हेतु विस्तार करते हैं। जल विस्तार पद्धति को चारागाहों में भी अपनाया जा सकता है। जल विस्तार पद्धति का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में पेड़ पौधों को नमी उपलब्ध कराना है ताकि अतिरिक्त नमी के प्रभावी उपयोग से प्राकृतिक वर्षण की शेष पूर्ति हो सके। भविष्य में उपयोग हेतु भूजल के पुनः पूरण में भी इस विधि को अपनाया जाता है।

अनेक प्रकार की जल विस्तार विधियां उपलब्ध हैं जो विभिन्न परिस्थितियों के लिए उपयुक्त हैं। विभिन्न मृदाएं अनेक प्रकार से इस विधि को प्रभावित करती है। चिकनी-भारी (क्ले) मृदाओं की अंतःस्यंदन दर कम होती है तथा जल संचय क्षमता अधिक - अतः वे उत्तरगामी फसलीकरण के साथ गहरे जल फैलाव हेतु उपयुक्त है जैसे पेटा काश्त। बलुई मृदाओं की अंतःस्यंदन दर अधिक होती है और जल संचय क्षमता कम, इनमें अपवाह मार्ग को बदलने वाली विधियों को अपनाया जाता है। गहरी मृदा अधिक मात्रा में जल शोषित कर सकती है, जबकि उथली मृदा में ऐसी विधियों की आवश्यकता होती है, जिनमें अधिक जल विकास की व्यवस्था हो ताकि फसलों को डूबने से बचाया जा सके। मृदा क्षारीयता एवं लवणीयता से जुड़ी समस्याओं से अपेक्षाकृत आजाद हों। साथ ही, जिन भूमियों में विस्तार करना हो उनकी स्थलाकृति लगभग समतल स्निग्ध और नालियां अथवा नालिकाएं रहित हों।

जल विस्तार विधियां जलवायु से भी प्रभावित होती है। संभवतया 250 मि.मी. से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में ही जल विस्तार विधियां उपयोगी होती हैं। तीव्र गति वाली वर्षा की संभावना जल विस्तार विधियों को प्रभावित करती हैं। वर्षा एवं बर्फ की संभावना जल विस्तार विधियों को प्रभावित करती हैं। वर्षा एवं बर्फ के पिघलने से प्राप्त अपवाह का यथाक्रम मौसमी वितरण एवं मात्रा इस प्रकार की होनी चाहिए ताकि जल विस्तार विधि में उसका उपयोग प्रभावी रूप से फसल वृद्धि के दौरान हो सके। वर्षा जल का परिवर्तित बहाव इतना नहीं होना चाहिए कि जो रख-रखाव की समस्या पैदा करे और न ही उसमें इस प्रकार के लवण अथवा मलबे की इतनी मात्रा हो कि जो जल विस्तार वाले क्षेत्र के लिए हानिकारक हों।

जो फसलें अथवा पेड़ पौधे लगाए गए हैं उनकी अपेक्षित समयावधि और मौसम तक जल प्लावन को सहन करने की क्षमता होनी चाहिए। मृदाओं, ढाल एवं पौधों का संयोजन इस प्रकार से होना चाहिए कि वे क्षेत्र में प्रभावित बाढ़ के जल की मात्रा को अपरदन अनुमोदित सीमाओं के परे होने वाले मृदा ह्रास को सह सकें। सहज रूप से जल विस्तार प्रमाणिक सिंचाई की अपेक्षा अधिक जोखिम भरी होती है, क्योंकि यह पद्धति अधिकांशतः नियमित वर्षा एवं मृदा जो अपवाह में सहायक है, पर निर्भर है। एक विचलित प्रणाली तीव्र रूप में प्रभावित बाढ़ जल की धीमा करती हैं और मृदा में प्रवेश की अनुमति देती हैं। फसलों की रोपाई अवरोधों के पीछे की ओर वाले तर क्षेत्रों में की जाती है।

जल विस्तार विधियों द्वारा बाढ़ के जल को सुरक्षित रूप में झेल सकने हेतु सतर्कतापूर्वक उपयोगी एवं तकनीकी रूप से सुदृढ़ विन्यास करना आवश्यक है। अनेक शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों में संभाव्य स्थल पाए जाते हैं, फिर भी उस क्षेत्र की स्थलाकृति, मृदा का प्रकार एवं वनस्पति को ध्यान में रखकर ही सावधानीपूर्वक चयन किया जाए। संभाव्य स्थलों में अपेक्षाओं का होना आवश्यक हैः (i) जल फैलाव हेतु उपलब्ध अपवाह जल, ऊपरी जल ग्रहण क्षेत्रों से उत्पन्न होता है, वह इतना अवश्य होना चाहिए कि जो कम से कम कुछ मात्रा में प्रवाह प्रतिवर्ष हो सके; और (ii) बाढ़ वाले मैदान अथवा बहुत कम ढाल वाले क्षेत्र, जहां की मृदा फसलोत्पादन हेतु उपयुक्त हों।

अनुप्रयोग हेतु जल की गहराई


यदि बाढ़ के जल को क्षेत्र के ऊपर छितराए रूप में विस्तार देना हो तो अनुप्रयोग हेतु जल की गहराई लगभग उतनी ही हो जितना कि जल मृदा में जितने समय तक अनुमानित जल प्रवाह हो, शोषित हो जाए। अधिक अथवा बहुत अधिक पारगम्यता वाली मृदाओं में जल क्षेत्र को भरने में आवश्यक मात्रा से अधिक हो सकता है। यदि विस्तार में जल को भरा अथवा खड़ा रखना है तो अनुप्रयोग हेतु जल की गहराई उगाए जाने वाले पौधों के प्रभावी जड़ क्षेत्र वाली मृदा परिच्छेदिका की उपलब्ध जल क्षमता के बराबर होनी चाहिए।

जल ग्रहण क्षेत्र का क्षेत्रफल


विश्वसनीय जल आपूर्ति हेतु जल ग्रहण क्षेत्र का इतना क्षेत्रफल होना चाहिए ताकि उससे अनुप्रयोग हेतु आवश्यक मोड़ा गया प्रवाह औसतन 10 वर्ष में से 8 वर्ष संभावित मात्रा प्राप्त हो सके। इससे कम प्रवाह की मात्रा वाली पद्धतियां निश्चित रूप से सरल एवं सस्ती हैं और उन्हें अनुप्रयोग हेतु कम से कम इतनी मात्रा प्रदान करनी चाहिए जो औसतन कम से कम 2 वर्ष में एक बार संभावित हो सके। फैलाव वाला क्षेत्रफल (लाभान्वित क्षेत्र) और जलग्रहण क्षेत्र के क्षेत्रफल का अनुपात विभिन्न जलवायवीय क्षेत्रों में बहुत भिन्न होता है। कम से कम यह अनुपात निम्नांकित हो सकता है :

1 हेक्टेयर (लाभान्वित क्षेत्र) : 20 हेक्टेयर (जल ग्रहण क्षेत्र) इस पद्धति में आवश्यकता से अधिक जल को बिना अधिक अपरदन अथवा अन्य लाभों की क्षति के वापस बाहर की धारा में सुरक्षित रूप में निकाला जा सके।

बहाव मोड़ने के कार्य


बहाव को मोड़ने के कार्य स्वचालित होने चाहिए और विस्तार/फैलाव वाले क्षेत्र के ऊपर बहाव अथवा धारा के अलावा उन जल मार्गों/ धाराओं के जिनमें 24 घंटे से अधिक संभाव्य प्रवाह हो, की दिशा मोड़ने हेतु किसी भी प्रकार का मानव चालित नियंत्रण न हो। ये कार्य इतने सक्षम हों कि अधिकतम बाढ़ प्रवाह को सुरक्षा-पूर्वक निकाल सकें। उपयुक्त नियंत्रण प्रयुक्त किए जाने चाहिए ताकि जल वहन प्रणाली में केवल इच्छित दर के प्रवाह का प्रवेश हो। साथ ही नियंत्रण उपाय ऐसे हों जो क्षेत्र से बहाव को ठीक प्रकार से अलग रख सकें।

वहन प्रणाली


वहन प्रणाली में आवश्यक क्षमता होनी चाहिए ताकि वह अभिकल्पना के अनुरूप बहाव को मोड़ने हेतु किए गए कार्यों से विस्तार क्षेत्र तक सुरक्षित ले जाएं। खाइयां, अवरोध, मोड़ देने वाली एवं संबंधित संरचनाएं व्यवस्थित एवं अवस्थापित चयनित पद्धति के अनुरूप छितराए बहाव को भूमि की सतह के ऊपर अथवा भूमि पर बहाव को भरा अथवा एकत्रित करें। अवरोधों अथवा बहाव मोड़ने वाली संरचनाओं में 15 से.मी. से कम मुख्यांतर नहीं होना चाहिए। इन संरचनाओं के पार्श्व ढाल स्थिर होने चाहिए ताकि वे फसल प्रबंध अथवा कटाई की प्रक्रियाओं में अनुचित विघ्न न डालें। इनके निर्माण में योजनानुसार संरेखण, क्रमिक ढाल एवं अनुप्रस्थ काट का ध्यान रखना आवश्यक है। निर्मित संरचनाओं की आकृति स्निग्ध होनी चाहिए।

सूक्ष्म जलग्रहण क्षेत्र रोपण


बहुत ही कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी पौधे उगाए जा सकते हैं तथा जीवित रखे जा सकते हैं, यदि इसके चारों ओर वर्षा को एकत्रित करने वाले एक थाला गड्ढा बना दिया जाए, जो सामान्य की अपेक्षा बड़े क्षेत्र की वर्षा के जल को पौध को सींचने के लिए मजबूर करता है। इस विधि को सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र रोपण कहते हैं। सामान्य रूप से, विभिन्न क्षेत्रों में 16 वर्ग मी. से 1000 वर्ग मी. क्षेत्र का सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र उपयोग में आता है, जो जलवायु (वर्षा) और फसल के प्रकार पर निर्भर करता है। उपलब्ध जल की मात्रा में वृद्धि कर पेड़ों के उत्पादन हेतु वर्षा के जल को कई गुणा करने वाली प्रक्रिया अपनाते हुए इस विधि को विकसित किया गया है। वर्षा के जल को कई गुणा करने वाला शब्द इंगित करता है वर्षा को जो गिरती है, उदाहरणार्थ एक वर्ग मी. क्षेत्र पर होने वाली वर्षा को किसी सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र द्वारा घेरे गए क्षेत्रफल से गुणा किया जाता है।

कृषि योग्य भू-खंड (ग-घ) सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र की प्राकृतिक भूमि के सबसे निचले वाले बिंदु पर अवस्थित है, इसकी स्थिति बदल सकती है। प्रत्येक सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र एक 15-20 से.मी. ऊंची मृदा की मेड़ से घिरा है। सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र के सबसे निचले बिंदु पर एक गड्ढा लगभग 40 से.मी. गहरा खोदा जाता है। उसमें एक पेड़ रोप दिया जाता है। यह गड्ढा सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र के अपवाह का संचय करता है। गड्ढे का आकार संभावित जल संग्रहण के अनुरूप होता है।

इन गड्ढों में जैविक खाद दिया जाता है और जल ग्रहण क्षेत्र के विपरीत इनकी मृदा सतह को जल शोषण वृद्धि हेतु ढीला रखा जाता है। मृदा सतह से जल का वाष्पन कम करने हेतु पलवार का उपयोग भी किया जाता है। वनस्पतिविहीन मरुस्थलीय मैदानी सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र पर्याप्त अतिरिक्त जल प्रदान करते हैं, जिससे फलदार पेड़ एवं चारे के पौधों की वृद्धि सुनिश्चित होती है।

इस प्रकार के मरुस्थलीय एवं बहुत कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र रोपण वृहद जल संग्रहण संरचनाओं की अपेक्षा अधिक प्रभावी होते हैं, क्योंकि बहाव में होने वाली जल क्षति बहुत कम होती है। बहुत हल्की वर्षा में भी ये अपवाह जल देते हैं, जबकि अन्य विधियां नहीं दे सकती। एक अपवाह खेत (फार्म) बनाने की अपेक्षा किसी क्षेत्र को सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्रों में परिवर्तित करना बहुत सस्ता है, क्योंकि सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की नालियां, मोरियां, वेदिकाएं और वेदिका दीवारों की जरूरत नहीं होती। साथ ही, सूक्ष्म जल ग्रहण क्षेत्र किसी भी ढाल पर बनाए जा सकते हैं, जिसमें लगभग समतल मैदान भी सम्मिलित हैं। यह विधि किसान को समर्थ बनाता है, वृहद समतल क्षेत्र के उपयोग के लिए जो अपवाह फार्मों हेतु अनुपयुक्त हैं।

मरुस्थ्लीय पट्टीदार खेती


इस प्रकार की खेती में भूमि ढाल के विपरीत दिशा (आरपार) में संकरी पट्टियां बनाकर मरु क्षेत्रों में फसलोत्पादन किया जाता है। इनके बीच में चौड़ी पट्टियां छोड़ी जाती हैं जो फसली पट्टी में एक जलग्रहण क्षेत्र के रूप में अतिरिक्त जल प्रदान करती है। अतिरिक्त जल प्रदान करने वाली पट्टी और फसल पट्टी की चौड़ाई का अनुपात, जल-प्रदान करने वाली अथवा आंतरिक जल ग्रहण क्षेत्र की अवस्था एवं उसके ढाल पर निर्भर करती है। जल ग्रहण क्षेत्र को इसकी अपनी प्राकृतिक अवस्था में ही रखा जाता है और उसका चारागाह भूमि के रूप में उपयोग किया जा सकता है। यह प्रणाली कम वर्षा वाली परिस्थितियां, जो कि इन क्षेत्रों में बहुत सामान्य है, फसलों का अर्थपूर्ण उत्पादन सुनिश्चित करती है। औसत वर्षा वाली परिस्थितियों में चारा व फसल दोनों का उत्पादन हो जाता है, जबकि बहुत कम वर्षा की स्थिति में चारा मिल जाता है।

अंतः कुंड जल संग्रहण पद्धित


इस पद्धति में चौड़े कुंड, अपवाह देने वाली ढलवां मेड़ों के बीच अवस्थित रहते हैं। कुंडों का उपयोग फसलों की बोआई हेतु करते हैं, जिनमें एक या दो कतार में चयनित फसल बोई जाती है। कुछ अच्छी वर्षा वाली दशा में एक दूसरी फसल जिसकी जल मांग कम होती है, उसे कुंडों के बीच छोड़ी गई रिज पर बो देते हैं।

इस प्रणाली में कम से कम एक फसल सुनिश्चित हो जाती है चाहे अपेक्षाकृत अधिक वर्षा हो अथवा अपेक्षाकृत कम वर्षा। अपवाह देने वाला ढाल और फसली क्षेत्र के बीच 3:1 का अनुपात उचित रहता है। रिज से रिज तक कुंडों के आरपार आकस्मिक वर्षा के जल को रोकने एवं स्थानीय जल संरक्षण हेतु छोटी मिट्टी की मेड़ें अथवा अवरोध बांध बनाए जाते हैं।

पारंपरिक जल संग्रहण संरचना

नाड़ी


नाड़ियां खोदकर बनाए गए अथवा मृदा बांध वाले गांव के छोटे-छोटे तालाब होते हैं जिनमें बहुत ही कम मात्रा में होने वाले वर्षण को एकत्रित किया जाता है, जो भारत के मरुस्थलीय प्रदेश में पेयजल की भारी कमी को दूर करती है। पश्चिमी राजस्थान में नाड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरागत जल संग्रहण पद्धति है और प्राथमिक रूप में गाँवों के मनुष्यों एवं पशुओं के उपभोग हेतु जल आपूर्ति का मुख्य स्रोत है। क्योंकि नाड़ी पद्धति भारतीय मरुस्थलीय क्षेत्र में प्राणभूत जल संसाधन है, हर गांव में एक या अधिक गांव की जल आवश्यकता एवं उपयुक्त स्थल की उपलब्धता पर आधारित है।

जल संग्रहण की नाड़ी पद्धति उन सभी क्षेत्रों हेतु उपयुक्त है जिनमें संभावित अपवाह उत्पन्न करने वाले जल ग्रहण क्षेत्र उपलब्ध हों। नाड़ी का आकार स्थानीय प्राकृतिक एवं भौगोलिक अवस्थाओं एवं वर्षा की प्रणाली पर निर्भर करता है। सामान्यतया वर्तमान में जो नाड़ियां अस्तित्व में हैं, वे 1.2 मी. से 9.8 मी. गहरी और 280 से 4800 घन मी. क्षमता वाली है। नाड़ियों के दो घटक हैं :

i. जल ग्रहण क्षेत्र का क्षेत्रफल, एवं
ii. जल भराव क्षेत्र।

ये विशिष्टताएं वर्षा की मात्रा एवं वातावरण के अनुरूप बदलती हैं, उदाहरणार्थ, नाड़ी का आयतन टीबों वाले क्षेत्र में 53.0 घन मी. रेतीले मैदानी क्षेत्र में 131.1 घन मी., और चट्टानी/पथरीले क्षेत्र में 785.5 घन मी. होता है। इसी प्रकार 2% से 3% ढाल वाले जल ग्रहण क्षेत्र में न्यूनतम नाड़ी आयतन 45.7 घन मी. प्रति हेक्टेयर मिलता है, टीबों वाले क्षेत्र में, जब कि अधिकतम नाड़ी आयतन 731.8 घन भी प्रति हेक्टेयर नए जलोढ़ मैदान में प्रमाणित किया गया है।

एक परंपरागत नाड़ी में अधिक वाष्पन एंव रिसाव; भारी मात्रा में अवसाद जमाव और जल प्रदूषण आदि परिमितताएं होती हैं। अवसाद जमाव नाड़ी की भराव क्षमता को कम करता है। जल ग्रहण क्षेत्रों में जैविक सड़न-गलन के कारण भारी मात्रा में अवसाद का जमाव होता है, जबकि संग्रहित जल के अनुचित उपयोग के कारण जल प्रदूषण होता है। संचित जल की अपेक्षा, प्रायः नाड़ियों का सतही क्षेत्र अधिक होने के परिणाम स्वरूप वाष्पन में जल ह्रास अधिक होता है, अधिकतम ह्रास मार्च से जून तक होता है। जल उपलब्धता में सुधार हेतु केंद्रीय रुक्ष क्षेत्र अनुसंधान केंद्र, जोधपुर ने इस संरचना को पूर्णता दी है। उन्नत अभिकल्पना में रिसाव पर नियंत्रण पाने हेतु नाड़ी के चारों तरफ और तल में लो डैनसिटी पॉली इथलीन (एल.डी.पी.ई) पाल (शीट) का अस्तर लगा दिया जाता है तथा वाष्पन ह्रास को कम करने हेतु सतह से आयतन का अनुपात जितना संभव हो कम (0.3 से कम) रखा जाता है। प्रवेश मार्ग पर उपयुक्त सिल्ट ट्रैप का प्रावधान करने से नाड़ी अवसाद अथवा सिल्ट मुक्त जल का प्रवेश होगा।

अंतःस्रवण जलाशय


अंतःस्रवण जलाशयों (टैंक) का निर्माण सतही अपवाह के भंडारण एवं अंतःस्रवण द्वारा भूजल पुनःपूरण को प्रोत्साहित करने हेतु किया जाता है। इस संरचना के निर्माण से पूर्व उसके जल ग्रहण क्षेत्र का विस्तृत प्रारूप, संभावित अपवाह, चयनित स्थल पर अभिकल्पित संचय एवं लाभान्वित क्षेत्र आदि पहलुओं की पूर्ण जानकारी कर लेनी चाहिए। अंतःस्रवण जलाशय, जल संरक्षण हेतु बहुत उपयोगी हैं और पेयजल/सिंचाई संसाधनों को पुष्ट करते हैं (प्रायः कुएं)।

टांका


भारतीय मरुस्थलीय क्षेत्रों में यह अतिप्रचलित वर्षा जल संग्रहण संरचना है और यह भूतल जलाशय अथवा जलकुंड का स्थानीय नाम है। चूने के मसाले अथवा सीमेंट लेप से बना टांका एक छोटा वृत्ताकार अथवा आयताकार भूतल जलाशय होता है, जिसका निर्माण साधारणतया छिछली भूमि पर किया जाता है। सतही अपवाह को टांके के चारों ओर बने साफ सुथरे, हल्के ढालू जल ग्रहण क्षेत्र (जिसे स्थानीय भाषा में आगोर कहते हैं) द्वारा टांके की ओर पहुंचाया जाता है। इस प्रकार के टांकों का निर्माण बहुत पुराने समय से एक परिवार के लिए, धार्मिक केंद्रों, पाठशालाओं और अन्य सामुदायिक स्थलों के पास होता आया है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार राजस्थान में जोधपुर के पास सन् 1607 में टांके का सबसे पहले निर्माण हुआ। कुछ वर्षों पूर्व, इस प्रकार की जल संग्रहण संरचनाओं के विकास के विवरण अन्य विकासशील देशों, जैसे बोत्सवाना, घाना, केन्या, यमन, श्रीलंका, थाइलैंड और इंडोनेशिया से भी प्रकाशित हुए हैं।

टांके का निर्माण अकेले पारिवार के आधार पर अथवा समुदाय के लिए किया जाता है। अच्छे प्रबंध एवं जल के उचित उपयोग के कारण परिवारिक टांका अधिक पसंद किया जाता है। परंपरागत टांका 3-4.25 मी. व्यास का जमीन में एक गड्ढा खोदकर बनाया जाता है और पूरे टांके में 6 मि.मी. मोटा चूने के समाले का लेप करने के बाद 3 मि.मी. मोटा सीमेंट लेप किया जाता है। इसको बेर की झाड़ियों अथवा अन्य कंटीली झाड़ियों से ढक दिया जाता है। इस प्रकार के टांके लगभग 3 वर्ष तक कामयाब रहते हैं। तालाब की चिकनी मिट्टी, मुरम, कोयले की राख, कंकड़ और मरड़ा आदि का उपयोग करते हुए रिसावरोधी आगोर बनाया जाता है।

परंपरागत विधियों से बनाए जाने वाले टांके अस्थाई होते हैं तथा दीवारों एवं तल से जल रिसाव होने के साथ साथ जल प्रदूषित हो सकता है। यही नहीं, जल ग्रहण क्षेत्र अथवा आगोर का क्षेत्रफल भी होने वाली वर्षा एवं उससे उत्पन्न अपवाह के अनुरूप नहीं होते। वाष्पन में जल ह्रास भी अधिक होता है। इसके अतिरिक्त परंपरागत टांकों का आकार भी छोटा होता है। परिणामस्वरूप संग्रहित जल से पूरे वर्ष तक पेयजल की आपूर्ति नहीं हो पाती।

परंपरागत टांकों में व्याप्त समस्याओं के निवारण हेतु कजरी, जोधपुर ने एक उन्नत 21 घन मी. (21000 लीटर) क्षमता वाले टांके की अभिकल्पना की है जो मात्र 125 मि.मी. वार्षिक वर्षा से भर जाते हैं। यह जल 6 सदस्यों वाले परिवार की पूरे वर्ष तक घरेलू मांग की आपूर्ति हेतु पर्याप्त होता है। इस प्रकार की संरचना की आयु 25 वर्ष से अधिक होती है, क्योंकि यह सीमेंट मसाले में चिनाई एवं लेप करके बनाई जाती है। इस टांके के लिए 778 वर्ग मी. जल ग्रहण क्षेत्र (आगोर) की आवश्यकता होती है। कजरी के वैज्ञानिकों के अनुभव बताते हैं कि संहत कंकरीले अथवा भारी मृदा वाला 2-3 प्रतिशत ढालू 2 हेक्टेयर का जल ग्रहण क्षेत्र 200 घन मी. क्षमता वाले टांके अथवा सामुदायिक टांके के लिए पर्याप्त होता है।

उन्नत टांके की ऊर्ध्वाधर सतह पत्थर की चिनाई व सीमेंट के लेप से बनी होती है तथा पेंदे में 10-15 से. मी. मोटी सीमेंट कंक्रीट की तह होती है। टांके में जल आवक स्थानों और एक जल निकालने वाले स्थान पर खड़ी लोहे की छड़े और जाली लगाई जाती है ताकि यह सुनिश्चित हो कि टांके में प्रवेश करने वाला जल प्रवाह प्रदूषक पदार्थों से मुक्त है। टांके में सिल्ट अथवा अवसाद के प्रवेश को सीमित रखने हेतु सिल्ट ट्रैप लगाया जाता है। टांका ऊपर से पत्थर की पट्टियों व सीमेंट लेप से ढक दिया जाता है जिसमें जल निकालने हेतु एक छोटी जगह खुली रखते हैं, उस पर भी जी.आई.शीट का ढक्कनमय ताला लगाने की व्यवस्था कर देते हैं। संचित जल का उपयोग मुख्य रूप से पीने के लिए करते हैं। यद्यपि, वर्तमान में इस तकनीक को अधिक कीमती फल-वृक्षों में अनुपूरक सिंचाई करने के लिए भी अपनाया जाता है।

वर्षा जल संरक्षण की प्लावन विधियां


विभिन्न पद्धतियां हैं जिनमें वर्षा के जल (सतही अपवाह) को एकत्रित कर, मृदा को तर करने हेतु काफी लंबी अवधि तक भरा रखते हैं ताकि मृदा में शोषित नमी का उपयोग कर फसल पैदा की जा सके। इनका निर्माण प्रायः कम ढालू कृषि भूमियों पर किया जाता है। मृदा मेड़ें (बांध) सतही अपवाह को एकत्रित करती हैं एवं जलभराव बनाए रखती हैं और मृदा में जल शोषित हो जाने के बाद रबी मौसम की विभिन्न फसलें बोईं जाती हैं। भारत के शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों में सैकड़ों सालों से व्यापक रूप में प्लावन विधियां अपनाई जा रही हैं जिनमें से कुछ में जल नियंत्रण एवं प्रबंध के परिष्कृत तरीके अपनाए जाते हैं। इस अध्याय के आगामी पृष्ठों में शुष्क क्षेत्रों में जल-संरक्षण हेतु अपनाई जाने वाली सामान्य प्लावन विधियां उल्लेखित हैं।

समोच्च मेड़ें


पश्चिमी राजस्थान के कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अपेक्षाकृत छोटे आकार की समोच्च मेड़ें (धोरा-पाली) बनाई जाती हैं। 250 मि.मी. या अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मात्र 0.30 ऊंची समोच्च मेड़ें भूमि को पट्टियों में विभाजित करती हैं जिनमें मानसून की अवधि में 0.2 मी. गहराई तक जल भरा जाता है और वे क्रमिक रूप से ढाल के नीचे की ओर प्लावन करती हैं। जब वर्षा रुक जाती है, संग्रहित जल अंतःस्यंदन प्रक्रिया में शोषित होता है और रबी की फसल बो दी जाती है। कुछ हद तक अन्य क्षेत्रों में भी समोच्च मेड़बंदी पद्धति वर्षा जल संरक्षण की प्लावन विधि के अभिप्राय को पूरा करती है।

पारंपरिक जल संग्रहण संरचना

खड़ीन


पश्चिमी राजस्थान में खड़ीन एक बहुत ही प्रचलित वर्षा जल संरक्षण अथवा प्लावन विधि से खेती करने की रीति है। जलमग्न जलाश्य के लिए खड़ीन स्थानीय नाम है। खड़ीन एक तरह का अस्थाई तालाब है। औसत लेकिन अति स्थिर, लगभग 100-200 मि.मी. वार्षिक वर्षा वाले दूर दराज के मरुस्थलीय प्रदेश में बहुत पहले पंद्रहवीं शताब्दी में खड़ीन पद्धति विकसित हुई थी। इस पद्धति को विकसित करने का श्रेय पालीवाल ब्राह्मणों को जाता है। खड़ीन पद्धति एक स्थित-विशेष पद्धति है, जिसके लिए आवश्यकता है बहुत बड़े प्राकृतिक अधिक अपवाह संभाव्य जल ग्रहण क्षेत्र की, जो गहरी मृदावली समतल घाटी भूमि क्षेत्र के आसपास हो।

इस पद्धति में मिट्टी की मेड़ें (धोरा) घाटी की समतल भूमि के आरपार संभवतया समोच्च रेखा पर सतही अपवाह एवं सिल्ट, जो आसपास की बेकार पहाड़ियों, बंजर भूमि अथवा अन्य जल ग्रहण क्षेत्र से बहकर आती है, उसे एकत्रित करने एवं भरने हेतु बनाई जाती है। खड़ीन अथवा जलमग्न क्षेत्र से जल ग्रहण क्षेत्र के क्षेत्र का अनुपात 1:12 से 1:15 होता है जो जल ग्रहण क्षेत्र के प्रकार पर निर्भर करता है तथा एक क्षेत्र में जहां अत्यधिक अस्थिर औसत वर्षा 165-200 मि.मी. होती है, 75से 100 मि.मी. वर्षा के जल को भरने हेतु इस प्रकार के जलाशयों की अभिकल्पना की जाती है। मेड़ों की ऊंचाई एवं उनके अनुप्रस्थ काट की अभिकल्पना वर्षा के प्रतिरूप, जल ग्रहण क्षेत्र की विशिष्टताओं, लहर की लम्बाई एवं मृदा के प्रकार पर निर्भर करती है। लगभग 75 प्रतिशत खड़ीन क्षेत्र को जलमग्न करने हेतु मेड़ की ऊंचाई 1 से 3 मीटर के बीच रखी जाती है। संग्रहित जल की गहराई 0.5-1.25 मी. के बीच होती है और यह जल प्रायः नवंबर के प्रारम्भ तक रिसाव, वाष्पन और अंतःस्यंदन के कारण अंतर्धान हो जाता है, उस समय रबी की फसल बो दी जाती है। शेष नमी में प्रायः गेहूं, चना और सरसों उपजाया जाता है।

संग्रहित जल द्वारा लवणीयता का निक्षालन, भूजल के पुनःपूरण में वृद्धि और निचले क्षेत्रों में अवस्थित कुओं के जल स्तर में सुधार आदि खड़ीन पद्धति के अन्य लाभ हैं। खड़ीन तल में जमा होने वाली अतिरिक्त सिल्ट एवं अवसाद के कारण हर वर्षण फसल के उत्पादन में क्रमिक वृद्धि होती है। खड़ीन तल में गहराई तक अंतःस्रवण भूजल पुनः पूरण प्रारम्भ करता है। बड़ी खड़ीनों में मेड़ों के बाहर की ओर छोटे उत्खनित कुएं पेयजल की आपूर्ति करते हैं।

स्थान का चयन


खड़ीन के स्थानों के उपयुक्त चयन हेतु निम्नांकित कसौटियां हैं:
i. खड़ीन तल अपेक्षाकृत समतल होना चाहिए, ताकि मेड़ की न्यूनतम ऊंचाई से बहुत बड़ा क्षेत्र प्रभावी रूप से जलमग्न हो सके।
ii. पर्याप्त अपवाह प्राप्ति हेतु खड़ीन तल के ऊपर अपेक्षाकृत दुर्भेद्य एवं अधिक ढालू जल ग्रहण क्षेत्र की उपलब्धता का होना आवश्यक है।
iii. दुर्भेद्य परत खड़ीन तल के नीचे बहुत गहराई में नहीं होना चाहिए ताकि वह नमी को लंबी अवधि के लिए धारण कर सकें।

अपेक्षित जानकारियां


खड़ीन पद्धति को क्रियान्वित करने के पूर्व निम्नांकित जानकारियाँ आवश्यक है :
i. जलमग्न होने वाले संभावित क्षेत्र की विस्तृत स्थालाकृतिक नक्शा एवं प्रस्तावित मेड़ के संरेखण का अनुदैर्ध्य काट (एल-सेक्शन):
ii. जल मग्न होने वाले क्षेत्र का मृदा सर्वेक्षण नक्शा:
iii. औसत वर्षा एवं 25 वर्ष की आवृत्तिक अवधि के लिए वर्षा के लिए वर्षा की तीव्रता; और
iv. जल ग्रहण क्षेत्र की अवस्था एवं क्षेत्रफल

कुंई


जल की कमी वाले मरुभूमि में कुछ विशेष परिस्थिति में कुइयों का निर्माण किया जाता है। वर्षा जल के संरक्षण और भंडारण की बहुत पुरानी पद्धति है। ये मीठे जल को पेयजल हेतु केवल वर्षा जल अथवा रेती की गहरी तहों में संरक्षित नमी को एकत्रित करती हैं।

अध्याय दो में रेजाणी जल की व्याख्या की है। राजस्थान में प्राचीन समुदायों ने इस जल की खोज की थी और इसके अधिकतम उपयोग के रास्ता बनाए। कुंई ऐसी संरचना है जो रेत में “छिपी” नमी की बेशकीमती बूंदों को पीने के जल के रूप में परिवर्तित करती है।

कुंई बहुत छोटे और संकरे कुंए होते हैं। कुंई भूजल से ठीक वैसे नहीं जुड़ती जैसे कुआं जुड़ता है। कुंई बहुत संकरी, उथली, ऊर्ध्वाधर और वर्तुलाकार संरचना होती है। ये धीमे-धीमे रेती की संग्रहित नमी को जल में बदलने का सेवा कार्य करती हैं। इस पद्धति को समझना थोड़ा कठिन है, किंतु हम भूले नहीं है कि शताब्दियों से मनुष्य इस तकनीक का बहुत सरलता से उपयोग करते रहे हैं।

बहुत धीमी प्रक्रिया में, कुंई रेत द्वारा संग्रहित नमी को जल में बदलती है और इनका उपयोग विशेषकर उन क्षेत्रों में किया जाता है जहां भूजल लवणीय (खारा) होता है और अन्य साधन पेयजल आपूर्ति उपलब्ध नहीं है। लवणीय भूजल साधारणतया उन सभी क्षेत्रों में पाया जाता है जहां भू सतह के कुछ नीचे खड़िया पत्थर (जिप्सम) अथवा चौक की कड़ी पट्टी होती है। कुंइयों का निर्माण मुख्य रूप से इसी प्रकार की पट्टी पर किया जाता है। यह कठोर पट्टी वर्षा के जल का लवणीय भूजल वाले क्षेत्र में अंतःस्रवण रोकती है।

अध्याय दो में हमने देखा है कि राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में रेत की सतह के नीचे पत्थर की एक पट्टी चलती है। क्योंकि यहां भूजल लवणीय है, कुंई सदा इसी खड़िया पट्टी के ऊपर ही खोदी जाती है। यह पट्टी वर्षा के जल को खड़िया तह के नीचे उतरने एवं लवणीय भूजल में मिलने से रोकती है। इस खड़िया पट्टी के ऊपर हजारों लीटर जल नमी के रूप में रेती में शोषित अथवा अटका रहता है। इस प्रकार के क्षेत्रों में लगभग 3 फीट चौड़ा एक गड्ढा अत्यंत सावधानी से तब तक खोदा जाता है, जब तक वह खड़िया पत्थर की पट्टी तक न पहुंचे। खाली जगह रेत में समाई नमी को अपनी ओर खींचती है (डिप्रेशन के कारण) और ये धीरे-धीरे फिर से जल में बदल जाती है और खाली कुंइयां बूंद-बूंद रिसने वाले जल से भरना शुरू हो जाती है। एक कुंई नमी को लगभग 50-100 लीटर प्रतिदिन जल में बदल देती है। एक बार बाहर निकाल लेने के बाद कुंई को पुनःपूरण हेतु छोड़ दिया जाता है।

रेत के नीचे सब जगह खड़िया की पट्टी नहीं है, इसलिए कुंई भी पूरे राजस्थान में नहीं मिलेगी। चुरू, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर के कई क्षेत्रों में यह पट्टी चलती है और इसी कारण वहां गांव-गाव में कुंइयां मिलती हैं। यह ग्रामीण तकनीकी का एक अद्भुत उदाहरण है। कुंई का मुंह छोटा रखने के पीछे संपूर्ण वैज्ञानिक तर्क है। कुंई हमेशा जल से भरी नहीं रहती। यह चौबीसों घंटे निरंतर बूंद-बूंद से पुनःपूरण और पुनः भरण की प्रक्रिया है। इसकी सीमित होती है, जो लगभग 50-100 लीटर है। यदि कुंई का व्यास अधिक हो तो कम मात्रा का जल ज्यादा फैल जाएगा और तब उसे ऊपर निकालन संभव नहीं होगा। छोटे व्यास की कुंई में धीरे-धीरे रिसकर आने वाला जल कुछ ऊंचाई तक उठ जाएगा, जिसे बाल्टी द्वारा बाहर निकाला जा सकता है। इसी कारण से कुंई का व्यास कम रखा जाता है।

इसके अतिरिक्त, इस प्रकार की संकरी संरचना को आसानी से ढककर रखा जा सकता है। धूलभरी आंधियों वाले क्षेत्रों में जल को रेती और अन्य गंदगी से बचाना संभव है। हर एक कुंई को लकड़ी के बने ढक्कन से ढंक दिया जाता है, जो वाष्पन में जल ह्रास नहीं होने देते। कहीं कहीं खस की टट्टी के तरह घास फूस या छोटी-छोटी टहनियों से बने ढक्कनों का भी उपयोग किया जाता है। आने-जाने वाले लोगों से भी इस अमृत जैसे मीठे जल की सुरक्षा करनी होती है और यहां तक कि ढक्कनों पर ताले भी लगाए जाते हैं। रेती में लगभग 3 फीट व्यास की और लगभग 20-30 फीट गहरी, करीब-करीब सुरंगनुमा इन छोटी कुंइयों को खोदने की योग्यता लोगों की तकनीकी कौशल का यथेष्ट प्रमाण देती है। इनमें लेप भी एक विशेष तरीके से किया जाता है ताकि चारों ओर जल की बूंदे बन सकें। खोदने के साथ-साथ इनकी दीवारों पर अस्तर लगाने की प्रक्रिया एक बहुत ही तकनीकी कार्य है और यह केवल उन क्षेत्रों के अनुभवी लोगों के द्वारा ही किए जा सकते हैं।

जहां कहीं भी हमें इस प्रकार की संरचनाएं मिलें, हमें उनका पर्याप्त अध्ययन करना चाहिए। जबकि कुंइयों का निर्माण विशेष रूप से कम हो गया है, कुछ क्षेत्रों में आज भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि यह तकनीक पुरानी हो गई है। जैसेलमेर के कई गाँवों में इंदिरा गांधी नहर के आगमन के साथ कुंइयों को नष्ट कर दिया गया था। बाद में इसका आभास हुआ कि इस नहर से जल प्राप्त करना इतना आसान नहीं है। कई गाँवों में मौजूद कुंइयों को दुरस्त करने का कार्य प्रारम्भ हो गया है और बल्कि नई भी बनने लगी हैं। समुदायों द्वारा इन सभी जल संग्रहण की परंपरागत तकनीकी की अभिकल्पना वर्षों के अनुभव के बाद की गई है। आधुनिक पद्धतियों में भी ये प्रभावी परिपूरक भूमिका निभा सकती हैं। परंपरागत पद्धति हर स्तर पर जन भागीदारी का बहुत प्रगतिशील व्यवहार है। स्वयं लोगों द्वारा अभिकल्पित, अपने स्वयं के संसाधनों से बनाई गई, उन्हीं के द्वारा उनकी देखभाल, वह भी कई पीढ़ियों से क्षेत्र में काम करने वाली सभी संस्थाओं और व्यक्तियों को इस अद्वितीय जन भागीदारी की परंपरा को प्रोत्साहित करने हेतु आवश्यक कदम उठाने चाहिए।

पारंपरिक जल संग्रहण संरचना

पक्के बांध-एनिकट


यह एक पक्की संरचना होती है जो स्थानीय जल ग्रहण क्षेत्र के जल को रोकती है और समुचित उपयोग हेतु उसका भंडारण करती है। यह अपवाह जल के संग्रहण एवं पुनःपूरण के अन्य प्रकार में नाले अथवा प्राकृतिक जल निकास मार्ग के आर पार बनाए जाते है, जिसे राजस्थान में साधारणतया “एनिकट” कहते हैं। अन्य कुछ प्रदेशों में इसे ‘चेक डैम’ भी कहा जाता है। संरचना के पीछे रोके गए जल को उत्तोलक सिंचाई के रूप में तथा मनुष्यों, पालतू पशुओं और जंगली जानवरों के पेयजल हेतु उपयोग में लिया जा सकता है। ये एनिकट निचले क्षेत्रों में अवस्थित कुओं के पुनःपूरण में भी योगदान करते हैं। एनिकट काफी लंबे समय से प्रचलन में हैं तथा बहुत ही लोकप्रिय हैं।

एनिकट अर्धशुष्क क्षेत्रों में अधिक बनाए जाते हैं, क्योंकि इनको आर्थिक दृष्टि से प्रभावी बनाने हेतु एक निश्चित मात्रा में वर्षा की जरूरत होती है। मुख्य रूप से उसके दो घटक हैं : मिट्टी का बांध, आवश्यकता होने पर और एक पक्का निकास मार्ग। स्थल के चयन, अन्य आवश्यक जानकारियों एवं अभिकल्पना का विस्तृत विवरण आगामी अध्याय में दिया गया है।