सूखा : वर्षा संग्रहण का प्रयास (Rainwater Harvesting)

Author:अनिल अग्रवाल
Source:सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट, 2000

यदि सरकार इस ओर ध्यान दे तो सूखे को पूरी तरह दूर करना संभव है - और अधिकतम दस वर्षों में।
.देश के कई इलाके भीषण सूखे का सामना कर रहे हैं। आज गुजरात, राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, उड़ीसा व आंध्र प्रदेश में भीषण जल संकट बना हुआ है। समाचार पत्रों में छपी खबरों के मुताबिक सौराष्ट्र के कई कस्बों में जलापूर्ति अत्यंत अनियमित हो गई है। इलाके में अधिकांश बाँध व जलाशय सूख गए हैं। सरकार टैंकरों से पानी मुहैया कराकर और नलकूपों को गहरा कर इस समस्या से निपटने की कोशिश कर रही है। केन्द्र सरकार ने ‘वाटर स्पेशल’ रेलगाड़ियाँ चलाने का वादा किया है। लेकिन क्या जब भी सामान्य से कम बारिश होगी तब हर बार यह पूरी कवायद जरूरी है?

नहीं, हम ऐसा नहीं सोचते और इस समस्या के स्थायी हल के लिये उठाए जा सकने वाले कदमों के बारे में आपको संक्षेप में बताना चाहेंगे। हाँ, अगर लगातार कई साल तक सूखा पड़ता रहे तो बात दीगर है। जिस बदलाव की पैरवी हम कर रहे हैं, वह तभी संभव है जब हमारे नेता देश में जल प्रबंधन को एक नये नजरिये से देखें।

हेग में विश्व जल आयोग ने हाल ही में कई देशों के जल संसाधन मंत्रियों को अपनी रिपोर्ट सौंपी। आयोग की एक बैठक में एक सदस्य ने जल के महत्व के बारे में राजनीतिज्ञों को शिक्षित किए जाने की जरूरत पर जोर दिया। लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूँ, क्योंकि शायद ही मैं किसी ऐसे नेता, से मिला जो जल के महत्व पर जोर न देता हो खासकर भारत में। इसके बावजूद मैंने पाया कि इनमें से शायद ही किसी को जल संकट से निपटने के तरीकों की जानकारी है। इसके अलावा नेताओं को इस बारे में शिक्षित करना कहीं ज्यादा मुश्किल है।

लेकिन कुछ सरकारी कोशिशों के बावजूद कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया और मौजूदा अप्रत्याशित सूखे ने भयंकर तबाही फैलाई। इस सूखे का अंदेशा तो सितम्बर में ही हो चुका था, जब आम चुनाव के दौरान सौराष्ट्र में ‘पहले पानी फिर आडवाणी’ जैसे नारे गूँजने लगे थे और सितम्बर माह में तो उत्तरी गुजरात के कई गाँवों से लोग पलायन करने लगे थे।

शुरुआती दौर में ही पता लगने के बावजूद सरकार टैंकरों के जरिए जलापूर्ति और नलकूपों को और गहरा करने जैसे रस्मी उपायों के अलावा जल संकट से निपटने के लिये कुछ नहीं कर सकी। जल संकट के प्रति भारतीय नेताओं की उदासीनता अत्यन्त आश्चर्यजनक है।

गुजरात और राजस्थान में छाए मौजूदा संकट को बहुत से लोग ‘प्राकृतिक आपदा’ कह सकते हैं लेकिन ये सच्चाई से कोसों दूर है।

तालिका- 1: अप्रैल 2000 तक गुजरात के शहरों में उपलब्ध पेयजल

 

स्थान

उपलब्ध पेयजल

राजकोट (1)

हर दूसरे दिन 30 मिनट

जामनगर, जसदान और अमरेली (1)

तीन दिन पर केवल एक बार 20 मिनट के लिये

जोडिया शहर, जिला-जामनगर (2)

12 दिन पर 20 मिनट

ध्रोल शहर, जिला-जामनगर (2)

आधी आबादी को 8 दिन में एक बार पानी उपलब्ध

 

स्रोत: (1) जनयाला श्रीनिवास 2000, फॉरगेट द सेंसेक्स फॉर ए सेकेंड, लूक ह्वाट एल्स इज गोइंग डाउन, द इंडियन एक्सप्रेस, नई दिल्ली, अप्रैल 19, पे-1
(2) जनयाला श्रीनिवास 2000, वन्स ए फोर्टनाइट, दे गेट ए फ्यू ड्राप्स एंड दैट टू फॉर ट्वेन्टी मिनट्स, द इंडियन एक्सप्रेस, नई दिल्ली, अप्रैल 21, पेज-1


दरअसल ये मानवजनित या सरकार-जनित आपदा है। पिछले सौ साल के इतिहास पर गौर करें तो दुनिया और भारत ने जल प्रबंधन के क्षेत्र में दो बड़े बदलाव देखे। पहला तो यह कि लोगों ने धीरे-धीरे अपनी जवाबदेही सरकार पर डाल दी, हालाँकि डेढ़ सौ साल पहले दुनिया में किसी भी सरकार की जिम्मेदारी पानी मुहैया कराने की नहीं थी। दूसरा बदलाव यह आया कि बारिश के पानी का उपयोग करने की साधारण तकनीक लुप्त होने लगी और इसकी जगह बाँध और ट्यूबवेल के जरिए नदियों व भूजल का जमकर दोहन होने लगा। नदियों व जलाशयों में बारिश के कुल जल का मात्र एक छोटा हिस्सा ही जमा हो पाता है। इससे जल स्रोतों पर अधिक दबाव पड़ना स्वाभाविक है।

सरकार पर निर्भरता का सीधा मतलब है जलापूर्ति की लागत में बढ़ोतरी होना। लागत वसूली की स्थिति बदहाल होने से जल योजनाओं की वित्तीय स्थिति प्रभावित हुई है और मरम्मत व रख-रखाव न के बराबर हुए हैं। पानी के इस्तेमाल में सावधानी बरतने में लोगों की दिलचस्पी न होने से जलस्रोतों के बने रहने पर ही प्रश्न चिन्ह लग गया है, जिसका सामना आज हम कर रहे हैं। नतीजतन, सरकारी पेयजल आपूर्ति योजनाएं गंभीर संकट में हैं (गुजरात के शहरों में उपलब्ध पेयजल के लिये देखें तालिका-1)। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद पेयजल संकट से ग्रस्त गाँवों की संख्या में कोई कमी नहीं आयी है। पूर्व ग्रामीण विकास सचिव एन सी सक्सेना के इस बयान पर जरा गौर करें, “सरकारी गणित के मुताबिक दो लाख संकटग्रस्त गाँवों में से दो लाख संकटग्रस्त गाँव घटाने के बाद भी दो लाख संकटग्रस्त गाँव बचे रहते हैं।”

यह एक वास्तविकता है कि औसत सालाना वर्षा के संदर्भ में भारत दुनिया के सर्वाधिक समृद्ध देशों में से एक है। इसे देखते हुए कोई वजह नहीं कि हमें सूखे का सामना करना पड़े।

आज जरूरी है कि हमारे नीति निर्माता मौजूदा संकट से सबक लें कि आने वाले वर्षों में देश को कैसे सूखे से मुक्त बनाया जाए। यह काम ऐसा है कि देश अगर इस पर ध्यान दे, तो इसे एक दशक से भी कम समय में आसानी से पूरा किया जा सकता है।

इसमें कोई शक नहीं कि सरकार ने जल संसाधन विकास पर काफी खर्च किए हैं, लेकिन इन कार्यक्रमों का मुख्य लक्ष्य:

(क) हरित क्रांति के लिये सिंचाई के साधनों का विकास और
(ख) पेयजल आपूर्ति कार्यक्रमों पर रहा।

देश के एक बड़े हिस्से में अब भी सूखे की संभावना बनी हुई है। और निश्चित तौर पर ये स्थिति इन इलाकों की लगातार उपेक्षा की वजह से पैदा हुई है। इसके अलावा सरकार ने जल संतुलन के क्षेत्र में व्यापक हस्तक्षेप को बढ़ावा दिया है। भूजल दोहन के रूप में आज हम जो कुछ कर रहे हैं वो जल संतुलन क्षेत्र में छेड़छाड़ का जीता जागता उदाहरण है। देश में भूजल के दोहन को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है लेकिन भूजल स्तर बढ़ाने के लिये कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं। नतीजतन पूरे देश में भूजल स्तर गिर रहा है। पेयजल जरूरतों के लिये नब्बे फीसदी ग्रामीणों की निर्भरता भूजल पर होने के मद्देनजर, भूजल स्तर में गिरावट से गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाएगा। खासतौर से उन वर्षों में, जब वर्षा कम होगी जैसा कि इस साल हुआ। इस स्थिति में ट्यूबवेल या बोरवेल के मुकाबले खोदे गए कुँओं पर निर्भर रहने वाले गरीब ही सूखे के पहले शिकार होंगे।

1. समाज और वर्षा


सामाजिक तौर पर बारिश का पानी जमा करने की परंपरा आज भी प्रासंगिक है। सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरमेंट ने पिछले साल दिसम्बर में गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश के कई सूखा प्रभावित गाँवों में एक सर्वेक्षण किया था। इन गाँवों में झाबुआ जिले का धलेर छोटी गाँव, दाहोद जिले का थुंथी-कनकासिया गाँव, राजकोट जिले के राज-समाधियाला व मांडलिकपुर गाँव और कच्छ जिले का गाँधी ग्राम गाँव शामिल है। सर्वेक्षण से पता चला कि जिन गाँवों में बारिश के पानी को संचित करने के तरीके अपनाए गए थे, उन गाँवों में पीने का पानी तो उपलब्ध था ही, सिंचाई के लिये भी थोड़ा-बहुत पानी था। दूसरी तरफ पड़ोस के गाँवों में पानी की कमी थी और गर्मी आने पर वहाँ के लोग पलायन की तैयारी कर रहे थे। इस सर्वेक्षण से यह भी पता चलता है कि बारिश के पानी का संचयन गंभीर सूखे की स्थिति में भी आपकी जरूरतें पूरी कर सकता है।

ग्राफ-1: अंतहीन प्रक्रियाः सरकार की ग्रामीण पेयजल आपूर्ति योजनाओं का रिकॉर्ड
तालिका के मुताबिक सर्वेक्षण के बाद पता चला कि काफी संख्या में गाँवों में पेयजल उपलब्ध कराया गया, लेकिन समस्याग्रस्त गाँवों की संख्या बढ़ती रही। उदाहरण के लिये 1980 में केवल 56 हजार गाँवों में ही पेयजल की समस्या होनी चाहिए थी, लेकिन ये बढ़कर 2 लाख 31 हजार तक जा पहुँची। निश्चित तौर से इस पर काफी पैसे खर्च हुए और समस्या को दूर करने के लिये जिस पद्धति का इस्तेमाल किया गया, वह अस्थायी था। पूर्व ग्रामीण विकास सचिव एन सी सक्सेना की ये बात यहाँ सही साबित होती है कि दो लाख समस्याग्रस्त गाँवों में से दो लाख समस्याग्रस्त गाँवों को घटाने के बाद भी दो लाख समस्याग्रस्त गाँव बचे रह जाते हैं।

ग्राफमार्च के आखिर में हमारे निष्कर्ष की एकबार और पुष्टि हुई। भांवता-कोल्याला गाँव को डाउन टू अर्थ जोसफ सी जॉन पुरस्कार देने के लिये मार्च के आखिर में राष्ट्रपति के आर नारायणन के साथ हेलिकॉप्टर से अरवारी वॉटर शेड जाने के दौरान दिल्ली से अलवर के बीच पूरे रास्ते सिर्फ सूखे खेत ही नजर आ रहे थे। यह इलाका लगातार दूसरे साल सूखे का सामना कर रहा था। लेकिन अचानक हमें हरे-भरे खेत नजर आए, और हमने पाया कि हम रेगिस्तानी इलाके के बीच अरवारी वॉटर शेड की हरित पट्टी में पहुँच चुके हैं, जहाँ पिछले 5-10 साल में ग्रामीणों ने बारिश का पानी जमा करने के सैकड़ों केंद्र बनाए हैं। यहाँ अब किसी को बारिश का पानी जमा करने का महत्व समझाने की जरूरत नहीं है। राष्ट्रपति ने तकरीबन मृत अरवारी नदी को देखा, जो लगातार दो साल तक सूखे का सामना करने में असहाय थी, लेकिन यहाँ के कुओं में पानी लबालब भरा था, खेतों में हरियाली थी और किसान अपेक्षाकृत खुश थे।

2. प्राथमिकता ठीक से तय करनी होगी, तभी बारिश के पानी के संचय का महत्व समझ पाएंगे


बारिश के पानी के संचयन का महत्व क्यों है? इसका सीधा सा जवाब है कि इसके जरिए बेकार बह जाने वाले पानी को भी रोककर अपने लिये उपयोगी बनाया जा सकता है। मान लीजिए कि भारत के सबसे कम वर्षा वाले इलाके बाड़मेर में आपके पास एक हेक्टेयर जमीन है और यहाँ सालाना 100 मिमी. बारिश होती है यानी यहाँ आपको सालाना 10 लाख लीटर बारिश का पानी मिलता है जो 15 लीटर रोजाना के हिसाब से 182 लोगों की पीने और खाना बनाने की जरूरतें पूरी करने के लिये पर्याप्त है। अगर आप इस पूरे पानी को जमा नहीं भी कर पाते हैं तब भी आप सामान्य तरीके से सालाना कम से कम 5 लाख लीटर पानी जमा कर सकते हैं। आज ये एक सच्चाई है कि इस सामान्य तरीके को अपना कर ही लोग थार के रेगिस्तान में भी जीवन-यापन कर रहे हैं और यह इलाका आबादी की दृष्टि से दुनिया का सर्वाधिक घनत्व का रेगिस्तान बना हुआ है। अगर मान लें कि सालाना 2 हजार मिमी. बारिश का पानी उपलब्ध होता है जोकि पूर्वी भारत में आम बात है तो सालाना 10 लाख लीटर बारिश का पानी जमा करने के लिये 5 सौ वर्गमीटर जमीन की जरूरत पड़ेगी। एक दिलचस्प तथ्य ये है कि ग्रामीण आबादी का घनत्व सालाना बारिश पर निर्भर होता है। उदाहरण के लिये बाड़मेर में लोग कम है और प्रति व्यक्ति जमीन ज्यादा है जबकि पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना जिले में, जहाँ बारिश अधिक होती है, लोग ज्यादा हैं और प्रति व्यक्ति जमीन कम है।

ऐसा नहीं है कि जो गाँव इस साल भीषण सूखे की चपेट में हैं वहाँ बारिश नहीं हुई। आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और पश्चिमी मध्यप्रदेश के कई इलाकों में बारिश का स्तर अभी भी 500 मिमी. से ज्यादा है, हालाँकि यह सामान्य से कम है लेकिन यह बारिश भी काफी है। सूखे से सर्वाधिक प्रभावित सौराष्ट्र व कच्छ में सालाना औसत बारिश 578 मिमी. है। अखबारों में छपी रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल इन इलाकों में बहुत कम बारिश होने के बावजूद दो सौ मिमी. बारिश हुई। लेकिन इन इलाकों की जनता ने बारिश के इस पानी को बेकार बह जाने दिया।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितनी बारिश हुई, अगर आप इसे जमा नहीं करते तो बारिश होने के बावजूद जल संकट का सामना करना पड़ेगा। अविश्वसनीय होने पर भी यह सच है कि सालाना 11 हजार मिमी. बारिश वाला इलाका चेरापूँजी अब भी पेयजल के भीषण अभाव का सामना कर रहा है। हमने लगातार यह बात कही है कि भारत का कोई भी ऐसा गाँव नहीं है जो बारिश का पानी जमा करके पेयजल व खाना बनाने के लिये पानी की अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा न कर सके। आँकड़े गवाह हैं। भारत में औसतन सालाना 1,170 मिमी. बारिश होती है। यह औसत पश्चिम भारत के रेगिस्तानों में 100 मिमी. बारिश से लेकर पूर्वोत्तर की ऊँची पहाड़ियों पर होने वाली 15 हजार मिमी. बारिश के दायरे में है। देश के करीब 12 फीसदी इलाके में सालाना 610 मिमी. से कम की औसत बारिश होती है जबकि आठ फीसदी से अधिक बारिश करीब 15 दिन में और साल के कुल 8,760 घंटों में से 100 घंटे से कम अवधि में होती है। सालभर में बरसाती दिनों की कुल संख्या गुजरात और राजस्थान के रेगिस्तान इलाकों में 5 से कम दिनों से लेकर पूर्वोत्तर में 150 दिनों तक हो सकती है। इसलिए दिन के कुछ ही घंटों में अचानक होने वाली इस बारिश के पानी को जमा कर लेना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

अधिकांश बारिश कुछ ही घंटों में होने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे पूर्वजों ने पानी जमा करने के विभिन्न तरीके सीखे।

(अ) वे बारिश के पानी को सीधे जमा करते थे। घर के आंगन में होने वाली बारिश का पानी वे वहाँ बने टांके में जमा करते थे और सार्वजनिक जमीन पर होने वाली बारिश का पानी कुंडी नामक कृत्रिम कुँओं में जमा करते थे।

(ब) मॉनसून के वक्त हुई बारिश के बहते पानी को हमारे पूर्वज लद्दाख में जिंगों में, बिहार में अहारों में, राजस्थान में जोहड़ों में और तमिलनाडु में एरी में जमा करते थे।

(स) उत्तर बिहार और पश्चिम बंगाल में बाढ़ के वक्त नदियों से पानी जमा किया जाता था।

जल संचय आज भी प्रासंगिक है। वर्ष 1991 में भारत के कुल 5 लाख 87 हजार 226 रिहायशी गाँवों में कुल 62.9 करोड़ की आबादी रहती थी, यानी हर गाँव में 1,071 लोग रहते थे, जबकि 1981 में प्रति गाँव आबादी 942 थी। अब हम मान लेते हैं कि आज हर गाँव में 1,200 लोग रहते हैं। भारत में होने वाली बारिश का सालाना औसत करीब 1,170 मिमी. है। अगर इस पानी का मात्र आधा हिस्सा ही जमा किया जा सके तो भारत के गाँवों को पीने और खाना बनाने की अपनी सालाना जरूरत पूरी करने के लिये आवश्यक 65.7 लाख लीटर पानी जमा करने की खातिर हर गाँव में 1.12 हेक्टेयर जमीन की जरूरत होगी। अगर सूखा पड़ा हो और बारिश का स्तर सामान्य से आधा हो गया हो तो भी इतना पानी जमा करने के लिये महज 2.24 हेक्टेयर जमीन चाहिए।

एक औसत गाँव की पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिये 236 व्यक्तियों की औसत आबादी के गाँव वाले अरुणाचल प्रदेश में 0.10 हेक्टेयर जमीन की जरुरत होगी, जहाँ गाँव छोटे हैं और बारिश का स्तर बहुत ज्यादा है। दूसरी ओर इस उद्देश्य के लिये प्रति गाँव 4,679 व्यक्तियों की आबादी वाली दिल्ली में 8.46 हेक्टेयर जमीन की जरूरत होगी, जहाँ गाँव बड़े हैं, और बारिश कम होती है। राजस्थान के विभिन्न इलाकों में पेयजल संचय के लिये 1.08 से लेकर 3.64 हेक्टेयर जमीन की जरूरत पड़ेगी, जबकि गुजरात में 1.72 से लेकर 3.30 हेक्टेयर जमीन की जरूरत पड़ेगी (देखें-तालिका 2)। और अगर गाँव वाले इससे ज्यादा पानी जमा कर लेते हैं तो इसका इस्तेमाल सिंचाई में किया जा सकता है। क्या ये असम्भव कार्य लगता है और क्या किसी गाँव में इतनी जमीन उपलब्ध नहीं है? भारत में कुल 30 करोड़ हेक्टेयर भूक्षेत्र है। अब मान लेते हैं कि भारत के 5 लाख 87 हजार गाँव दुर्गम जंगली क्षेत्रों, ऊँची पहाड़ियों और अन्य निर्जन तराई क्षेत्रों को छोड़ कर 20 करोड़ हेक्टेयर जमीन का उपयोग कर सकते हैं, तो भी हर गाँव के हिस्से 340 हेक्टेयर जमीन आती है। यानी कुल 3.75 अरब लीटर पानी जमा किया जा सकता है। यह गणना बारिश का पानी जमा करने की क्षमता को संभव बताती है। साफ है कि भारत में किसी के प्यासे रहने का कोई कारण नहीं है।

इसके अलावा भारत के अधिकांश खेतों को हर साल कम पानी की जरुरत वाली फसलें उगाने के लिये बारिश के जरिए सिंचाई का पानी चाहिए। अगर हर गाँव यह सुनिश्चित करे कि गाँव की समस्त जमीन और उससे जुड़ी सरकारी जमीन पर होने वाली बारिश का पूरा पानी जमा कर लिया जाएगा, तो ज्वार और मक्का जैसी कम पानी की फसलें उगाने के लिये गाँव के कुओं में पर्याप्त पानी होगा।

लेकिन हालात ये हैं कि राष्ट्रीय जलग्रिड या नर्मदा पर बन रहे बाँध जैसे सभी प्रस्तावित बाँध मिलकर भी भारत के हर गाँव को सिंचाई के लिये नदी का पर्याप्त पानी मुहैया नहीं करा पाएंगे। भारत की कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा तब भी पानी के अभाव का सामना करेगा। आधिकारिक आँकड़ों से भी इसकी पुष्टि होती है। राष्ट्रीय एकीकृत जल संसाधन विकास योजना आयोग का अनुमान है कि 14.5 करोड़ हेक्टेयर की मौजूदा कृषि भूमि के मुकाबले कुल सिंचाई क्षमता ज्यादा से ज्यादा 14 करोड़ हेक्टेयर जमीन के लिये है। करीब 7.59 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई भूतल जल योजनाओं के जरिए होगी, जिसमें से 5.85 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई वृहत मझौली परियोजनाओं के जरिए 1.74 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई टैंकों जैसी लघु सिंचाई परियोजनाओं के जरिए और 6.41 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई भूजल परियोजनाओं के जरिए की जाएगी। (अध्याय-3, पेज 36) लेकिन अभी ये सपना है। वर्ष 1992-93 में करीब 14.5 करोड़ हेक्टेयर के कुल फसली क्षेत्र में से 11.934 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में पानी की कमी थी, जिसमें से 7.84 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में खाद्यान्न की खेती होती है।

लेकिन पानी के अभाव वाले इन क्षेत्रों के अधिकांश हिस्से की उत्पादकता बढ़ाने के लिये यहाँ की बारिश पर्याप्त है अगर बारिश के पानी का संचय और भूजल दोहन का संयोजन ठीक है। ये क्षेत्र आज देश के सर्वाधिक गरीब लोगों के लिये मददगार साबित हो रहे हैं। अगर हम बारिश का पानी जमा नहीं करें तो पानी के अभाव वाले क्षेत्रों के निवासियों की परेशानियाँ दूर नहीं होंगी।

तालिका-2: भारत का प्रत्येक गाँव अपने पेयजल का प्रबंध खुद कर सकता है: पेयजल और खाना बनाने में खपत होने वाले पानी की पूर्ति हेतु वर्षा के पानी को इकट्ठा करने के लिये देश के अलग-अलग राज्यों में प्रतिगाँव जमीन की जरूरत (हेक्टेयर में)

 

राज्य

मौसमवार क्षेत्र

औसत वार्षिक वर्षा (मिली मीटर)

2001 तक प्रति गाँव में ग्रामीणों की अनुमानित संख्या

पेयजल और खाना बनाने में पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिये प्रति गाँव, जमीन की आवश्यकता, जहाँ सामान्य वर्षा का आधा संचित हो सके (हेक्टेयर)

भयंकर सूखे की स्थिति में, जब सामान्य वर्षा % से कम हो, तब पेयजल और खाना बनाने की जरूरतों को पूरा करने के लिये वर्षा के पानी को संचित करने के मकसद से प्रति गाँव जमीन की आवश्यकता (हेक्टेयर)

भारत

-

1,170

1220

1.14

2.28

अंडमान और निकोबार द्वीप

अंडमान और निकोबार द्वीप

2,967

408

0.16

0.32

अरुणाचल प्रदेश

अरुणाचल प्रदेश

2782

236

0.10

0.20

असम

असम और मेघालय

2818

807

0.32

0.64

मेघालय

असम और मेघालय

2818

311

0.12

0.24

नागालैंड

नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा

1881

1153

0.68

1.36

मणिपुर

नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा

1881

726

0.42

0.84

मिजोरम

नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा

1881

549

0.32

0.64

त्रिपुरा

नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा

1881

3496

2.04

4.08

पश्चिम बंगाल

1. हिमालय की तराई में बसे पश्चिम बंगाल और सिक्किम के इलाके

2. पश्चिम बंगाल में गंगा के कछार का इलाका

2739

1439

1602

1.1.0-1.22

2.20-2.44

सिक्किम

हिमालय की तराई में बसा पश्चिम बंगाल और सिक्किम का इलाका

2739

1132

0.46

0.92

उड़ीसा

उड़ीसा

1489

683

1.10

2.20

बिहार

1. बिहार का पठारी इलाका

2. बिहार का मैदानी इलाका

1326

1186

1367

1.12-1.26

2.24-2.52

उत्तर प्रदेश

1. उत्तर प्रदेश

2. उत्तर प्रदेश के पश्चिम का मैदानी इलाका

3. उत्तर प्रदेश के पश्चिम का पहाड़ी इलाका

1025

896


1667

1026

0.68-1.26

1.36-2.52

हरियाणा

हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली

617

2,258

4.00

8.00

दिल्ली

हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली

617

4769

8.46

16.92

चंडीगढ़

हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली

617

2647

4.70

9.40

पंजाब

पंजाब

649

1345

2.26

4.52

हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश

1251

328

0.28

0.56

जम्मू और कश्मीर

जम्मू और कश्मीर

1011

1140

1.24

2.48

राजस्थान

1. पश्चिमी राजस्थान

2. पूर्वी राजस्थान

313

675

1039

1.68-3.64

3.36-7.28

मध्य प्रदेश

1. मध्य प्रदेश

2. पूर्वी मध्य प्रदेश

1017

1338

867

0.70-0.94

1.40-1.88

गुजरात

1. गुजरात क्षेत्र

2. सौराष्ट्र और कच्छ

1107

578

1741

1.72-3.30

3.44-6.60

गोवा

कोंकण और गोवा

3005

1816

0.66

1.32

महाराष्ट्र

1. कोंकण और गोवा

2. मध्य महाराष्ट्र

3. मराठवाड़ा

4. विदर्भ

3005

901

882

1034

1389

0.50-1.72

1.00-3.44

आंध्र प्रदेश

1. आंध्र प्रदेश का तटीय इलाका

2. तेलंगाना

3. रायल सीमा

1094


961

680

2231

2.34-3.60

4.68-7.20

तमिलनाडु

तमिलनाडु और पुडुचेरी

998

2627

2.88

5.76

पुडुचेरी

तमिलनाडु और पुडुचेरी

998

1106

1.32

2.64

कर्नाटक

1. कर्नाटक का तटीय इलाका

2. उत्तरी कर्नाटक का अंदरूनी इलाका

3. दक्षिणी कर्नाटक का अंदरूनी इलाका

3456


731


1126

1343

0.42-2.02

0.84-4.04

केरल

केरल

3055

14,083

5.04

10.08

लक्षद्वीप

लक्षद्वीप

1515

3,228

2.34

4.68

 

टिप्पणी: गणनाएं इस मान्यता पर आधारित हैं कि अलग-अलग मौसमवार क्षेत्रों में स्थित गाँवों की आबादी उस राज्य की सामान्य आबादी के अनुपात में होगी।
स्रोत: भारतीय मौसम विभाग के सामान्य वर्षा के आँकड़े 1981 और 1991 की जनगणना के आधार पर 2000 में औसत आबादी का अनुमान


3. सूखा निवारण बनाम बड़ी सिंचाई परियोजना


लेकिन ऐसा करने के लिये हमारे योजना बनाने वाले और राजनीतिज्ञों को हरित क्रांति शैली के कृषि विकास के लिये सिंचाई के साथ सूखा निवारण सिंचाई का घालमेल बंद करना होगा। अन्यथा, देश की प्राथमिकताएं पूरी नहीं हो पाएंगी और करोड़ों गरीब सूखे की भयावहता का सामना करने के लिये विवश बने रहेंगे। धन की उपलब्धता और पुनर्वास जैसी समस्या-समाधानों के जरिए इस आपदा से निपटने के प्रयास किए जा सकते हैं, लेकिन हमारी प्राथमिकता सूखे जैसी स्थिति को खत्म करने के उपाय की होनी चाहिए। इसके लिये अपेक्षाकृत कम धन की जरूरत पड़ेगी और 5-10 साल में आशा के मुताबिक परिणाम हासिल होने लगेंगे।

इसके अलावा इस वास्तविकता को भी समझना जरूरी है कि भविष्य में देश की खाद्य सुरक्षा पूरी तरह से राष्ट्रव्यापी भूजल पुनरोपयोग कार्यक्रमों पर निर्भर करेगी और यह कार्यक्रम छोटे-छोटे समुदायों के जरिए बारिश का पानी जमा करके ही चलाया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो भूजल के अतिदोहन और देश में भूजल का स्तर गिरने से मौजूदा सिंचित क्षेत्रों की खेती भी मारी जाएगी। फिलहाल देश के कुल सिंचित क्षेत्र के आधे से अधिक हिस्से की सिंचाई के लिये डीजल व बिजली से चलने वाले 1.7 करोड़ से अधिक ट्यूबवेलों और बोरवेलों के जरिए भूजल का इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा भूजल से सिंचित क्षेत्र नहरों से सिंचित क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा उत्पादकता दर्शाते हैं।

इस तरह सिंचित क्षेत्रों से भारत की कुल कृषि उत्पादन में भूजल का योगदान नहरों के मुकाबले काफी ज्यादा है। जिन वर्षों में नदियाँ सूखी होती हैं और सूखा पड़ा होता है उस दौरान पेयजल और सिंचाई के लिये भूजल मुख्य स्रोत बन जाता है। भारत की कृषि व ग्रामीण जीवन आज पूरी तरह भूजल पर आश्रित है। भूजल स्तर में और गिरावट भारत की काफी मेहनत से हासिल की गई अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता के लिये गम्भीर खतरा बन सकता है। वह भी ऐसे समय में जब भारत को अपनी बढ़ती आबादी की माँग पूरी करने के लिये और खाद्यान्न उत्पादित करने की जरूरत होगी।

4. छोटे माध्यमों से ज्यादा पानी मिल सकता है


अब हम जरा एक दूसरे नजरिये से गाँव आधारित बारिश के पानी के संचय की प्रासंगिकता पर विचार करते हैं। भारत जैसे देश में वर्षाजल प्रबंधन का मुख्य तत्व ‘भंडारण’ है, जहाँ मानसून हमें औसतन करीब 100 घंटे की बारिश उपलब्ध कराता है और साल के शेष 8,660 घंटों में मामूली बारिश भी नहीं होती।

पानी जमा किया जा सकता है
(अ) बड़े बाँधों और जलाशयों में
(ब) छोटे तालाबों में और
(स) जमीन के अन्दर भूजल के रूप में

वस्तुतः पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि ग्राम-स्तरीय वर्षाजल संचयन बड़े या मझोले बाँधों के मुकाबले ज्यादा पानी मुहैया कराने में सक्षम होगा। इससे यह भी पता चलता है कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पानी सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने की दृष्टि से बाँध बनाना अत्यन्त खर्चीला और अवैज्ञानिक तरीका है। इस्राइली वैज्ञानिक माइकेल इवेनरी के अनुसंधानों से काफी उपयोगी सबक सीखा जा सकता है। श्री इवेनरी ने इस मुद्दे पर भीषण सूखा प्रभावित क्षेत्र नेगेव मरुस्थल के जरिए सबसे बेहतर सूचनाएं व निष्कर्ष मुहैया कराया है। इस मरुस्थल में सालाना महज 105 मिमी. औसत बारिश होती है।

श्री इवेनरी इस तथ्य से प्रभावित हुए थे कि प्राचीन इस्राइली सभ्यता ने नेगेव मरुस्थल के बीचो-बीच अपने कस्बे बसाए थे। इन कस्बों की खुद की कृषि व जलापूर्ति व्यवस्था थी। यह कुछ-कुछ जोधपुर, जैसलमेर शहरों की तरह था जहाँ थार मरुस्थल के बीच मेहनती मारवाड़ियों ने विकास किया। इस्राइली व मारवाड़ी दोनों ने खाना बनाने व पीने के पानी की अपनी जरूरतें पूरी करने के लिये बारिश के पानी का पानी बखूबी इस्तेमाल किया। नेगेव के प्राचीन फार्मों के पुनर्निर्माण के अपने प्रयासों के दौरान श्री इवेनरी कुछ आश्चर्यजनक निष्कर्षों तक पहुँचे। एक निष्कर्ष तो यह था कि छोटे जलाशयों के जरिए जमा पानी के मामले में प्रति इकाई जमा पानी की मात्रा बड़े जलाशयों से एकत्र पानी की मात्रा के मुकाबले ज्यादा होती है।

यहाँ एक बात समझ में आती है कि बड़े जलग्रहण क्षेत्र में जमा पानी बड़े क्षेत्र में प्रवाहित होगा और पानी का बड़ा हिस्सा मिट्टी के गीलेपन और वाष्पन के जरिए नष्ट हो जाएगा। पानी की यह क्षति बहुत ज्यादा हो सकती है।

नेगेव मरुस्थल में एक हेक्टेयर जलग्रहण क्षेत्र में हर साल प्रति हेक्टेयर 95 घन मीटर पानी जमा होता है जबकि 345 हेक्टेयर जलग्रहण क्षेत्र में सालाना प्रति हेक्टेयर 24 घन मीटर पानी जमा होता है। दूसरे शब्दों में जमा किए जा सकने वाले पानी का 75 फीसदी हिस्सा नष्ट हो जाता है। सूखा प्रभावित वर्षों के दौरान यह क्षति और ज्यादा हो सकती है। वर्षों के अनुसंधान के बाद इवेनरी ने अपने निष्कर्ष में कहा कि 50 मिमी. से कम बारिश के सूखा प्रभावित वर्षों के दौरान (नेगेव मरुस्थल में औसत बारिश 105 मिमी. है) 50 हेक्टेयर से बड़े जलसंग्रह क्षेत्र पर्याप्त पानी संचित नहीं कर पाएंगे जबकि छोटे प्राकृतिक जल संग्रह क्षेत्रों में प्रति हेक्टेयर 20 से 40 घन मीटर पानी जमा होगा और 0.1 हेक्टेयर से छोटे जल संग्रह क्षेत्रों में प्रति हेक्टेयर 80 से 100 घन मीटर पानी जमा होगा। (देखें तालिका 3)

देहरादून स्थित सेंट्रल सॉयल एंड वाटर कंजर्वेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट द्वारा भारत में किए गए अलग-अलग अध्ययनों से भी जलसंग्रह क्षेत्रों के आकार और उसमें संचित हो सकने वाले पानी की मात्रा के बीच सम्बन्धों का पता चलता है। एक अध्ययन से पता चलता है कि जल संग्रह क्षेत्र का आकार एक हेक्टेयर से बढ़ाकर मात्र दो हेक्टेयर करने पर ही प्रति हेक्टेयर संचित पानी की मात्रा में 20 फीसदी की कमी आ जाती है। (देखें ग्राफ 2) सेंट्रल सॉयल एंड वाटर कंजर्वेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा आगरा, बेल्लारी व कोटा में किए गए विभिन्न अध्ययनों और शिलांग के अत्यधिक वर्षा वाले इलाकों में किए गए एक अन्य अध्ययन से भी पता चलता है कि छोटे जल संग्रह क्षेत्रों से प्रति हेक्टेयर ज्यादा पानी जमा होता है। सामान्य शब्दों में, लब्बोलुआब यह कि पानी के अभाव वाले सूखा प्रभावित क्षेत्र में एक-एक हेक्टेयर जल संग्रह क्षेत्र वाले 10 छोटे बाँध 10 हेक्टेयर के जल संग्रह क्षेत्र वाले एक बड़े बाँध के मुकाबले ज्यादा पानी जमा करेंगे।

यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सौराष्ट्र में बड़ी संख्या में निर्मित मझोले आकार के बाँधों ने सूखे के वक्त बहुत कम पानी संचित किया और दिसम्बर से ही सूखने शुरू हो गए। साफ है कि क्षेत्र को सूखा मुक्त बनाने के उपाय मझोले व बड़े बाँधों वाली बड़ी जलसंग्रह परियोजनाओं पर नहीं टिके हैं बल्कि इसके लिये छोटे जल संचय केन्द्रों की जरूरत होगी जिसे खेत व गाँव के स्तर पर बनाया जाए। अपने इन निष्कर्षों का उपयोग करते हुए इवेनरी ने नेगेव मरुस्थल के बीचो बीच एक उद्यान विकसित किया जिसमें हर पेड़ को अधिकतम जल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये अलग-अलग छोटे जल संग्रह क्षेत्र बनाए। इन जल संग्रह क्षेत्रों का आकार 15.6 वर्ग मीटर से लेकर 1,000 वर्ग मीटर तक था। यानी सूखे की भीषण से भीषण स्थिति में भी लघु जल संग्रह क्षेत्र विधि न केवल पेयजल व अन्य उपयोग के लिये पानी उपलब्ध कराने में समर्थ है बल्कि यह पानी जमा करने का सर्वाधिक सक्षम तरीका भी है।

तालिका-3: आकार का आश्चर्यजनक प्रभावः नेगेव मरुस्थल में जल संग्रह क्षेत्रों के आकार का संचित जल की मात्रा पर असर देखने को मिला है (10 फीसदी ढाल वाले जल संग्रह क्षेत्र और सालाना 105 मिली मीटर वर्षा के मामले में)
ग्रामीण अपनी पेयजल और सिंचाई की जरूरतों की पूर्ति के लिये एक जल संग्रह क्षेत्र में वर्षा का कितना पानी जमा कर सकते हैं, ये विभिन्न परिस्थितियों पर निर्भर करता है। उपरोक्त तालिका से पता चलता है कि अगर ढलाऊ जमीन जैसे अन्य कारण सामान्य रहे तब भी बड़े जल संग्रह क्षेत्रों में वर्षा का पानी कम ही जमा किया जा सकता है। इसकी वजह है कि बड़े जल संग्रह क्षेत्रों में पानी जमा किए जाने पर ये व्यापक क्षेत्रों में प्रवाहित होता है और इस क्रम में पानी का एक बड़ा हिस्सा या तो भाप बन जाता है या जमीन सोख लेती है। छोटे जल संग्रह क्षेत्र में ज्यादा पानी इकट्ठा होता है और दोनों के बीच का अंतर काफी अधिक है। तालिका के मुताबिक 0.1 हेक्टेयर का 3000 अति लघु जल संग्रह क्षेत्र मिलकर 300 हेक्टेयर जैसे एक बड़े आकार वाले जल संग्रह क्षेत्र के मुकाबले 5 गुणा अधिक पानी जमा कर सकते हैं। या इसे साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि सूखा संभावित इलाके में एक हेक्टेयर के जल संग्रह बाँध में 10 हेक्टेयर के एक बड़े बाँध के मुकाबले अधिक पानी जमा हो सकता है।

 

क्रमांक

जल संग्रहण क्षेत्र का आकार (हेक्टेयर)

संचित पानी घन मीटर/हेक्टेयर

वर्षा के पानी के जमा होने का सालाना प्रतिशत

1

अति लघु जल संग्रह क्षेत्र (अ)

160 घन मीटर/हेक्टेयर

15.21%

2

20 हेक्टेयर

100 घन मीटर/हेक्टेयर

9.52%

3

300 हेक्टेयर

50 घन मीटर/हेक्टेयर

3.33%

 

टिप्पणीः (अ) अति लघु जल संग्रह क्षेत्र बहुत छोटे आकार का जल संग्रह क्षेत्र है, जो 100 वर्ग मीटर से लेकर 0.1 हेक्टेयर क्षेत्रफल का होता है।
स्रोतः माइकल इवेनरी, वर्ष 1971, द नेगेवः द चैलेंज ऑफ डेजर्ट, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, यू के।


तालिका-4: लघु संग्रह क्षेत्र सूखे के समय में ज्यादा प्रभावी: सूखा प्रभावित साल में, जब वर्षा 50 मिली मीटर से भी कम हुई, नेगेव मरुस्थल क्षेत्र में जल संचय पर जल संग्रह क्षेत्र के आकार का प्रभाव
नीचे तालिका से साफ जाहिर है कि सूखे के साल में रेगिस्तानी इलाके में, बड़े जलाशयों में कम पानी ही इकट्ठा होता है।

 

क्रमांक

जल संग्रहण का आकार (हेक्टेयर)

संचित पानी घन मीटर/हेक्टेयर

वर्षा के संचित पानी का वार्षिक प्रतिशत

1

अति लघु जल संग्रह क्षेत्र (अ)

80-100 घन मीटर/हेक्टेयर

16-20%

2

छोटे प्राकृतिक जलाशय (अ)

20-40 घन मीटर/हेक्टेयर

4-8%

3

50 हेक्टेयर से बड़े जल संग्रह क्षेत्र

आकार की अपेक्षा काफी कम

0%

 

टिप्पणीः (अ) अति लघु जल संग्रह क्षेत्र बहुत छोटे आकार एक हजार वर्गमीटर या 0.1 हेक्टेयर तक होता है।
स्रोतः माइकल इवेनरी, वर्ष 1971, द नेगेवः द चैलेंज ऑफ डेजर्ट, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, यू के।


5. मंत्री भी अब बारिश का पानी जमा करने की बात कर रहे हैं


मीडिया में हो-हल्ला मचने पर पिछले कुछ हफ्तों से हमारे नेताओं की नजर भी सूखे पर गई है। प्रधानमंत्री और ग्रामीण विकास, शहरी विकास व जल संसाधन मंत्रियों सहित कई नेताओं ने देश को सूखा मुक्त बनाने के लिये समुदाय आधारित वर्षाजल संचय के महत्व के सम्बन्ध में बयान जारी किए हैं।

पहला बयान ग्रामीण विकास मंत्री सुंदरलाल पटवा ने दिया कि सरकार उम्मीद करती है कि सरकार आश्रित कार्यक्रमों का स्थान धीरे-धीरे जन आश्रित, विकेंद्रित और मांग आधारित ग्रामीण जलापूर्ति कार्यक्रम ले लेंगे। इस कार्यक्रम के लिये बजट पिछले साल के 1,800 करोड़ रुपये के मुकाबले 8 फीसदी बढ़ाकर 1,960 करोड़ रुपये किया जा रहा है। इस बजट का पाँचवाँ हिस्सा राज्य सरकारों को दिया जाएगा जो ग्रामीणों की भूमिका निर्णयात्मक बनाने के लिये समुदाय आधारित कार्यक्रम चलाएंगी। इन कार्यक्रमों की कुल पूँजी लागत और परिचालन व रख-रखाव लागत के एक हिस्से का बोझ उपभोक्ता उठाएंगे। इस योजना के परीक्षण के लिये 58 जिलों की पहचान की गई है। इसी बीच, पेयजल स्रोतों के सही इस्तेमाल के अध्ययन के लिए एक प्रवर समिति भी गठित की गई है।

दूसरा बयान प्रधानमंत्री का आया जिन्होंने संसद में कहा कि देश में बारिश का महज छह फीसदी हिस्सा संरक्षित किया जा रहा है और अब जल संचय पर व्यापक तौर पर ध्यान दिया जाएगा।

तीसरा बयान शहरी विकास मंत्री जगमोहन का आया जिन्होंने देश के शहरी भवन निर्माण नियमों के तहत जलसंचय को अनिवार्य बनाए जाने का सुझाव दिया।

चौथा बयान पूर्व जल संसाधन मंत्री सी पी ठाकुर का आया जिन्होंने अप्रैल के आखिर में दिए गए एक साक्षात्कार में इस दिशा में अपनी प्रमुख पहल के तौर पर श्रमशक्ति भवन, इग्नू जैसे दिल्ली के कुछ भवनों और जयपुर के 9 भवनों में जल संचय के बारे में ही बात की। अप्रैल के शुरू में उन्होंने पानी की कमी वाले क्षेत्रों में करीब 10 हजार जल संग्रह क्षेत्र बनाने के लिये 550 करोड़ रुपये की योजना की घोषणा की थी। यह राशि सीधे गाँवों के लाभार्थी समूहों और जल उपभोक्ता समितियों को दी जानी थी।

इस संदर्भ में राज्यों में भी हलचल रही है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने राज्य के मौजूदा जल संग्रह विकास कार्यक्रम के पुनरोद्धार की घोषणा की और इसके लिये वो जल संरक्षण आयोग की पहली बैठक भी कर चुके हैं। श्री नायडू ने इंडियन एक्सप्रेस से एक साक्षात्कार में कहा कि अब तक हमने जलसंग्रह कार्यक्रम पर करोड़ों रुपये बर्बाद किए हैं। लेकिन नतीजे अत्यंत निराशाजनक रहे। बिना किसानों को शामिल किए यह स्थिति बदली नहीं जा सकती। आंध्र प्रदेश सरकार ने नए आयोग के जरिए 4 हजार करोड़ रुपये खर्च करने और एक करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को बढ़िया जल संग्रह प्रबंधन के दायरे में लाने की योजना बनाई है। चुने गए क्षेत्रों में ग्रामीणों को 5 हजार हेक्टेयर का जल संग्रह केंद्र विकसित करने के लिये 20 लाख रुपये दिए जाएंगे।

शहरी संदर्भों में, दिल्ली सरकार ने जल संग्रह में दिलचस्पी दिखाई है। पिछले दशक में राजधानी के विभिन्न हिस्सों में भूजल स्तर 4 से 10 मीटर तक गिरने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार सभी नई सामूहिक आवासीय समितियों के लिये उनके कांपलेक्सों में बारिश का पानी जमा करने को अनिवार्य बनाने के उद्देश्य से कानून बनाने की सोच रही है। इसी बीच, नई दिल्ली नगर निगम ने एक विशेष जल संग्रह परियोजना को मंजूरी दी है जिसके तहत तालकटोरा गार्डन, नेहरू पार्क, लोदी गार्डन व कुशक नाला पार्क में जलाशय निर्मित किए जा रहे हैं।

गुजरात में सिंचाई मंत्री नितिन पटेल ने कहा कि सरकार सरदार पटेल सहभागी जल संचय योजना के तहत पूरे राज्य में 10 हजार नियंत्रक बाँध निर्मित करने की योजना बना रही है। ग्रामीणों को नियंत्रक बाँधों की लागत का 40 फीसदी हिस्सा मुहैया कराया जाएगा। इसके लिये सरकार को 16 हजार आवेदन मिले हैं जिसमें 8 हजार 563 आवेदनों को मंजूरी दी गई है। यह योजना शुरू करने के लिये सरकार ने दो हजार नियंत्रक बाँधों के निर्माण के लिये 100 करोड़ रूपये मंजूर किये हैं। यह एक महत्त्वपूर्ण बदलाव है। वर्ष 1991 से 1999-2000 के बीच गुजरात सरकार के विभिन्न विभागों ने कुल 1 हजार 341 नियंत्रक बाँधों का निर्माण किया।

महाराष्ट्र में अप्रैल के आखिर में नीमच जिले में एक कार्यशाला आयोजित की गई जिसमें जल संचय के जरिए जल संग्रह के महत्व पर जोर दिया गया और जिलाधीश ने शहर में छत आधारित जल संचय को बढ़ावा देने और हर ग्राम पंचायत में जलाशय विकसित करने के लिये योजना तैयार करने का वादा किया।

वर्षाजल संचय को बढ़ावा देने वाले लोगों की रिपोर्ट भी काफी उत्साहजनक है। जामनगर कस्बे में एक पूर्व राजपरिवार द्वारा निर्मित विशाल लखोटा झील की सफाई के उद्देश्य से स्थानीय निवासियों से धन एकत्र करने के लिये स्थानीय आनंद बाबा आश्रम की प्रेरणा से लखोटा जल संचय अभियान समिति गठित की गई है। स्थानीय निवासियों ने इस मुहिम को अपना पूर्ण समर्थन दिया है। अप्रैल माह के मध्य में राजकोट में स्वामी नारायण गुरुकुल की अगुवाई में महज पाँच दिन के भीतर 15 गाँवों में नियंत्रक बाँधों की आधारशिला रखी गई। अहमदाबाद शहर में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री की अगुवाई वाली खाडिया इतिहास समिति ने भूमिगत जल टैंकों का सर्वेक्षण किया है। ये टैंक घरों में बारिश का पानी जमा करने के लिये परंपरा के रूप में हर घर में बने होते थे। समिति ने इन टैंकों के पुनरोद्धार के लिये मुहिम शुरू करने की योजना बनाई है। इंडिया टुडे पत्रिका द्वारा स्थापित संस्था केयर टुडे ने ग्रामीणों के परंपरागत जल संचय टैंकों की सफाई में मदद के लिये गुजरात व राजस्थान में एक-एक परियोजना की पहचान करने की घोषणा की है। दिल्ली में जल संकट पर एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली जलबोर्ड की वसंत कुंज की जलाभाव ग्रस्त डीडीए कॉलोनियों में वर्षा का जल संचित करने का काम शुरू करने का आदेश दिया है।

.ग्राफ-2इन घटनाक्रमों से संकेत मिलता है कि निकट भविष्य में शहरी व ग्रामीण, दोनों इलाकों में सामूहिक रूप से जल संचय के तरीके को व्यापक तौर पर अपनाया जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके नतीजे प्रभावी होंगे, खासकर गाँव के संदर्भ में?

6. सामाजिक सहभागित से बनें जल संचय क्षेत्र


जल संचय क्षेत्र बनाना बहुत आसान है- किसी भी ठेकेदार को कुछ धन दे दीजिए; वह बना सकता है। लेकिन गाँवों में सामाजिक स्तर पर स्वप्रबंधन की भावना पैदा करके एक प्रभावी जल संग्रह क्षेत्र बनाना अत्यधिक कठिन कार्य है। यह केवल तभी संभव है जब हर जल संग्रह क्षेत्र सहभागी सामाजिक प्रक्रिया का नतीजा हो। पानी एक प्राकृतिक संसाधन है। यह जितनी आसानी से किसी समुदाय को बाँट सकता है, उतनी ही आसानी से एकजुट भी कर सकता है। इसलिए यह अनिवार्य है कि हर जल संग्रह क्षेत्र के निर्माण के पीछे एक मजबूत सामाजिक प्रक्रिया काम कर रही हो जिसे अर्थशास्त्री ‘सामाजिक पूँजी’ कहते हैं। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ सरकारी एजेंसियों का रिकार्ड न के बराबर है और जटिल सरकारी नियम सामाजिक सक्रियता के मूल सिद्धांत के खिलाफ जाते हैं।

केंद्र व राज्य सरकारों के चिंतायुक्त बयान प्रसंशनीय हैं। लेकिन सालाना लक्ष्य तय करना पूरी तरह नुकसानदेह होगा, धन नाले में बह जाएगा। किसी भी जल संग्रह कार्यक्रम के लिये कम से कम पहले दो साल सामाजिक सक्रियता पैदा करने पर खर्च करने होंगे, समाज को जल संचय का महत्व समझाना होगा और यह बताना होगा कि इससे किस तरह के आर्थिक व पर्यावरण सम्बन्धी लाभ मिल सकते हैं, किस तरह का और कहाँ जल संग्रह क्षेत्र बनाया जाना चाहिए और जरूरी जल संग्रह क्षेत्र के निर्माण में समाज का क्या योगदान होगा। भूमिहीन से लेकर भूस्वामी और महिलाओं तक, समाज के हर तबके को इसमें सहभागी बनाना होगा और इस प्रक्रिया से मिलने वाला लाभ उन्हें बताना होगा। यह सुनिश्चित करने के प्रयास भी करने होंगे कि इससे होने वाला लाभ समाज के हर तबके तक पहुँचे।

इसका कारण है कि जलाशयों का विकास होने पर ही जल संग्रह का काम बढ़िया होता है। स्वाभाविक तौर पर जल संचय कार्य से भूस्वामी ही लाभान्वित होते हैं और भूमिहीनों को इसका कोई लाभ नहीं मिलता और वे इस मुहिम से अलग-थलग हो जाते हैं। लेकिन पानी व मिट्टी के संरक्षण के लिये जलाशयों का विकास न केवल जल व जमीन का संरक्षण करता है बल्कि सामान्य तौर पर जमीन पर घास-पात का उत्पादन बढ़ाता है जिससे भूमिहीन लाभान्वित होते हैं। इससे जमीन का नाश यह भूक्षरण भी कम होता है। इस प्रक्रिया से ठेकेदारों को पूरी तरह अलग रखा जाना चाहिए और श्रम सम्बंधी सभी लाभ भूमिहीनों को मिलने चाहिए।

अगर गाँवों के लोग उपरोक्त बातें व्यवहार में लाएं तो उनसे बेहतर काम और कोई नहीं कर सकता। इस उद्देश्य के लिये उन गाँवों के निवासियों को धन मुहैया कराना महत्त्वपूर्ण होगा जहाँ उपरोक्त सिद्धांत लागू हो रहे हों। फिर देखिए, जल संचय उनके जीवन को किस तरह बदल देता है। मध्य प्रदेश राजीव गाँधी जलाशय विकास अभियान (आरजीडब्लूडीएम) के तहत रालेगन सिद्दी गाँव दिखाने के लिये झाबुआ से आदिवासियों को बसों द्वारा लाया गया। तरुण भारत संघ भी लगातार पड़ोसी क्षेत्रों में ‘पानी यात्रा’ का आयोजन करता है ताकि इस अभियान में सक्रिय ग्रामीण अभियान से अलग ग्रामीणों से आमने-सामने बातचीत करे सकें।

लब्बोलुआब यह कि पहले कुछ वर्षों में प्रगति धीमी रहेगी। राजीव गाँधी जलाशय विकास अभियान और तरुण भारत संघ, दोनों मामलों में ऐसा ही हुआ। लेकिन दोनों के अनुभवों से यह भी पता चला कि एक बार यह परिकल्पना समझ में आ जाने के बाद नतीजे बहुत तेजी से आते हैं। मध्यप्रदेश में राजीव गाँधी जलाशय विकास अभियान पर निगाह रखने वाले आर गोपालकृष्णन के मुताबिक कार्यक्रम के पहले दो वर्षों में नतीजे इतने धीमे होते हैं कि हमें शक होता है कि हम सही दिशा में जा रहे हैं या नहीं। दूसरे शब्दों में, पहले साल कोई नतीजा हासिल नहीं होगा, दूसरे व तीसरे साल थोड़े-बहुत नतीजे मिल सकते हैं और चौथे व पाँचवे साल में भारी उत्साहवर्द्धक नतीजे मिलेंगे।

अन्य कारणों से भी जल संचय की सफलता के लिये सामाजिक सक्रियता अनिवार्य है। सबसे पहले तो जल संग्रह क्षेत्रों के निर्माण में समाज को शिद्दत से शामिल होना होगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ये संग्रह क्षेत्र तकनीकी तौर पर दुरुस्त हों यानी उचित स्थान का चयन हो और तकनीकी मानक ठीक-ठाक ढंग से लागू हों। घटिया ढंग से निर्मित जल संग्रह क्षेत्रों में पानी संचित नहीं होगा और वे सहजता से नष्ट हो सकते हैं। दूसरे, पानी संचित करने वाले उचित तरीके से निर्मित जल संग्रह क्षेत्र से जब भूजल स्तर में वृद्धि या टैंक में भूतल जल के रूप में पानी उपलब्ध होना शुरू हो जाए तो समुदाय को उपलब्ध पानी का प्रबंध करना शुरू करना होगा। यह उपलब्ध पानी शुरुआती वर्षों में सभी किसानों की जमीन की सिंचाई के लिये पर्याप्त नहीं हो सकता। इन वर्षों में किसानों को पानी में हिस्सेदारी करनी होगी और इसका इस्तेमाल उन फसलों के लिये करना होगा जिनमें ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है। ऐसा तभी होगा जब जल संग्रह क्षेत्र के साथ पहले से ही सामाजिक सक्रियता जुड़ी होगी, अन्यथा कुछ लोग पानी हड़प जाएंगे और शेष हाथ मलते रहेंगे।

सरकार को भारतीय संपत्ति अधिकार नियम जैसे पुराने ब्रिटिश कानूनों को भी बदलना होगा जो जल प्रबंधन में जन भागीदारी पर रोक लगाते हैं। प्रबंधन विशेषज्ञ कहते हैं कि ‘ईश्वर विस्तार में है।’ पटवा, ठाकुर व चन्द्रबाबू नायडू और इनके जैसे अन्य लोगों को जटिल सरकारी नियमों में सामाजिक सक्रियता के अनुरूप बदलाव सुनिश्चित करना होगा। चूँकि सरकारी अफसर सामाजिक कार्यकर्ता नहीं होते, इसलिए ये काम तभी हो पाएगा जब इसे अच्छे रिकॉर्ड वाले गैर सरकारी संगठनों को सौंपा जाय और नतीजों के लिये धैर्यपूर्वक इंतजार किया जाय। लेकिन अगर वे सरकारी कार्यक्रम चाहते हैं तो भी यह हो सकता है। इस स्थिति में उन्हें अपने जुझारू और उत्साही अफसरों को काम में लगाकर खुद कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर नजर रखनी होगी। जल संचय व जलाशय विकास कार्यक्रमों की सफलता के लिये राजस्व, भूमि संरक्षण, सिंचाई, वन व कृषि विभागों के बीच अंतरविभागीय तालमेल जरूरी है।

राजीव गाँधी जलाशय विकास अभियान पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा सीधी निगरानी इस कार्यक्रम की सफलता का कारण है। अन्यथा नतीजों के रूप में भारी मात्र में कीचड़, ईंटे, व अलग-थलग पड़ी जनता मिलेगी, पानी दुर्लभ बना रहेगा और जल संचय की परिकल्पना बदनाम हो जाएगी। समाचार पत्रों में छपी खबरों के मुताबिक गुजरात सरकार द्वारा प्रायोजित नियंत्रण बाँधों के मामले में पहले ही बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। इसलिए हमें सुनिश्चित करना होगा कि जल संचय धन संचय का जरिया न बन जाए।

7. परम्परागत व्यवस्था का पुनरोद्धार करना होगा


नए जल संग्रह क्षेत्रों का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है। अनुपयुक्त हो चुके टैंकों के विशाल भंडार के भी पुनरोद्धार के प्रयास किये जाने चाहिए। सरकारी अनुमानों के मुताबिक 1986-87 में भारत में 15.13 लाख टैंक थे जिनमें से 95 फीसदी टैंक आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल के आठ राज्यों में थे। लेकिन इनमें गाद जमा होने और खराब रख-रखाव के कारण इनसे सिंचित होने वाली भूमि 1962-63 में 47.8 लाख हेक्टेयर से घट कर 1985-86 में 30.7 लाख हेक्टेयर रह गई जबकि इस अवधि में कई नए टैंकों का निर्माण किया गया। इससे 5 हजार करोड़ रुपये की पूँजीगत हानि हुई। इसलिए यह आवश्यक है कि इस मशीनरी को इनकी पूर्ण क्षमता के साथ बहाल किया जाए।

8. वर्षा का पानी जमा करने से गाँवों की गरीबी दूर हो सकती है


अगर जल संचय व जलाशय विकास कार्यक्रमों का ठीक ढंग से संचालन हो तो सुखोमाजरी, रालेगन सिद्दी और अलवर जिले के कई गाँवों के अनुभव से स्पष्ट होता है कि वर्षाजल संचयन महज पेयजल जरूरतों को पूरा करने की पहली सीढ़ी ही नहीं बल्कि ग्रामीण गरीबी दूर करने, भारी मात्रा में ग्रामीण रोजगार सृजित करने और ग्रामीण इलाकों से शहरी इलाकों में पलायन को कम करने की पहली सीढ़ी भी है। पानी की ज्यादा और सुनिश्चित उपलब्धता का अर्थ है- अधिक और स्थिर कृषि उत्पादन और बेहतर पशुपालन। ये दोनों ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ तैयार करते हैं। 1970 तक रालेगन सिद्दी देश का एक पिछड़ा हुआ गाँव था लेकिन वर्षाजल संचय के तरीकों पर अमल कर ये गाँव खुद को सबसे समृद्ध गाँव के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हुआ है। प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करने वाले सभी गाँवों में या तो शहरों की ओर पलायन में भारी कमी आई है या ये पूरी तरह रुक गई है।

Graf-3समुदाय आधारित वर्षाजल संचय का एक अन्य दिलचस्प पहलू यह है कि यह गाँव में एक सामुदायिक भावना उत्पन्न करने में मददगार है जो भावना आज पूरे देश में खत्म होती जा रही है। अर्थशास्त्रियों के शब्दों में इससे ‘सामाजिक पूँजी’ निर्मित हुई है। दरअसल हम कह सकते हैं कि अगर पंचायत राज लागू करना है तो सबसे पहले पंचायों को जल संचय केंद्रों का संचालन करने को कहना होगा, यानी, ‘हर गाँव का अपना तालाब।’

अगर यह कसरत इतनी सार्थक है तो सरकार यह उदाहरण क्यों नहीं अपनाती और पूरे देश में लागू क्यों नहीं करती है? यहाँ तक कि राष्ट्रपति के आर नारायणन ने भी पिछले गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जल संचय के लिये अभियान चलाने की अपील की थी। समस्या दरअसल माहौल बनाने की है।

वर्षाजल संचय के लिये खुद सरकार को एक नया दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। यह दृष्टिकोण नौकरशाही की सर्वोच्चता की बजाय प्रशासन में भागीदारी का होना चाहिए। दुर्भाग्यवश हमारे राजनीतिज्ञों ने सरकार पर निर्भरता की संस्कृति को जन्म दिया है और वादे करना पसंद करते हैं, भले ही वे खोखले क्यों न हों। नेता यह आभास कराते हैं कि वे सरकारी मशीनरी के जरिए सब कुछ उपलब्ध करा देंगे। इस राजनीतिक मानसिकता से जल से सम्बन्धित नौकरशाही ने जनता को अपनी जलापूर्ति व्यवस्था विकसित करने में सक्षम बनाने की बजाय सेवाएं उपलब्ध कराने की संस्कृति विकसित की है भले ही वे घटिया हों। और यह नौकरशाही अब भी बड़े बाँधों, पम्पों, पाइपों व बोरवेलों के जाल में उलझी हुई है।

पूर्व जल संसाधन मंत्री सी पी ठाकुर भले ही आज जल संचय के महत्व को स्वीकार करने में न हिचकें लेकिन हाल ही में हेग में सम्पन्न वर्ल्ड वाटर फोरम की बैठक में इस मुद्दे पर कुछ ठोस करने की बारी आई तो श्री ठाकुर और समूचा भारतीय प्रतिनिधिमंडल बड़े बाँधों की बात करने के अलावा और कुछ नहीं कर सका। हम यहाँ बड़े बाँध बनाम छोटे बाँध विषय पर बहस करने नहीं जा रहे हैं, कुछ स्थितियों में बड़े बाँध जरूरी हो सकते हैं लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि छोटे बाँधों की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है और इस तथ्य को नजरअंदाज किया गया है। बड़े और छोटे बाँधों के बीच तालमेल जरूरी है।

पिछले कुछ साल में देश में वर्षाजल संचय परम्परा की प्रासंगिकता के सम्बंध में जनता की सोच में महत्त्वपूर्ण बदलाव आया है, खासकर तब से जब 1997 में सीएसई ने ‘डाईंग विजडमः द राइज, फॉल एंड पोटेंशियल ऑफ इंडियाज ट्रेडिशनल वॉटर हारवेस्टिंग सिस्टम’ प्रकाशित किया। इस किताब में इस बात का लेखा-जोखा है कि कठिन परिस्थितियों में भी यह परम्परा देश के कई इलाकों में कैसे अस्तित्व में है। केंद्रीय व राज्यों के मंत्रियों के हालिया बयान उत्साहवर्द्धक हैं लेकिन सरकार को बयानों से आगे बढ़कर कुछ करने की जरूरत है। राष्ट्रपति की सलाह पर ध्यान दिया जाना चाहिए और जल संचय के लिये जन अभियान चलाने के उद्देश्य से एक ठोस कार्य योजना तैयार की जानी चाहिए।

(लेखक वर्ल्ड वाटर कमीशन के सदस्य थे और नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट के निदेशक हैं।)

संंदर्भः-
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