स्वर्णजलः कहीं पास कहीं फेल

Author:श्रीपद्रे

आमतौर पर कहा जाता है, पब्लिक स्कूलों में जहां कहीं भी सरकारी पैसे से रूफवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाए गए हैं, पैसे की बर्बादी ही हुई है। इसके बावजूद भी चिकमगलूर जिले में तो कहानी ही दूसरी है। इस जिले की अच्छाईयां और कुछ शिक्षाओं को गिना रहे हैं श्री पद्रे...

2007 में स्वर्णजल योजना के तहत कर्नाटक सरकार ने ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में रूफवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने के लिए 73.66 करोड़ रु. का प्रावधान किया। 45,337 स्कूलों में से 23,683 स्कूलों को इस योजना के क्रियान्वयन के लिये चुना गया। अब तक इसमें से 20,760 स्कूलों में रूफ़वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाए जा चुके हैं।

पिछले साल बंगलोर स्थित संस्था 'अर्घ्यम्' ने प्रदेश के सात जिलों कामराजनगर, दावणगेरे, चित्रदुर्ग, धारवाड़, गदग और तुमकुर में एक सर्वे करके यह जानने की कोशिश की, कि इन जगहों पर लगाये गये रूफ़वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम्स की क्या हालत है? उनमें से कितने चालू हैं, कितने सही ढंग से काम कर रहे हैं, कहां उपकरणों की कमी या खराबी है, आदि। सर्वे में पाया गया कि लगभग 1269 हार्वेस्टिंग ढांचों में से सिर्फ़ 140 यानी 11 प्रतिशत ही सही काम कर रहे थे। 49% इंस्टालेशन में फ़्लश सेपरेटर प्रणाली काम कर रही थी, फ़िल्टर माध्यम सहित लगाये गये फ़िल्टर 43 प्रतिशत काम कर रहे थे, 26 प्रतिशत सिस्टम के टैंक लीक कर रहे थे, 52 प्रतिशत में नल ही नहीं लगाया गया था, जबकि सिर्फ़ 45% प्रतिशत प्रणालियों में गटर ठीक से काम कर रही थी और उसे सही तरीके से लगाया गया था।

इस सर्वे के नतीजों के आधार पर 'अर्घ्यम' ने कर्नाटक सरकार को रूफ़वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने सम्बन्धी कई सुझाव दिये, ताकि इस उपकरण और तकनीक का सही फ़ायदा लोगों तक पहुँचे। लेकिन दुर्भाग्य से सरकारी लेटलतीफ़ी और आलस की वजह से इस मामले में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो सकी। मीडिया में कई बार यह खबरें प्रकाशित हुईं, कि 'सरकारी पैसे से लागू हुई रेनवाटर हार्वेस्टिंग परियोजना स्कूलों में असफ़ल हो गई है, तथा यह राज्य के पैसे की बरबादी है…' आदि। यह तो हुई सरकारी मशीनरी और व्यवस्था की दुर्दशा… अब देखते हैं कि इसी योजना को कर्नाटक के एक अन्य जिले चिकमगलूर में कैसे सफ़लतापूर्वक लागू किया गया है।

असल में जिन सरकारी स्कूलों में यह योजना और रूफ़वाटर हार्वेस्टिंग की संरचना असफ़ल सिद्ध हुई है, उसमें 'क्या नहीं किया जाना चाहिये…' यह बात प्रमुखता से उभरकर सामने आती है। जिस तरह से इस सिस्टम की संरचना और निर्माण किये गये, उससे ग्रामवासियों के बीच सकारात्मक संदेश जाने की बजाय एक नकारात्मक संदेश ही जाता है कि इस प्रकार बारिश का जल बचाने की कवायद बेकार की बात है। जबकि चिकमंगलूर जिले में इसका ठीक विपरीत घटित हुआ है, जहाँ रेनवाटर हार्वेस्टिंग से सभी लोग खुश हैं, स्कूलों में बच्चे रेनवाटर हार्वेस्टिंग का पानी की उपयोग करना पसन्द करते हैं। साल के उन महीनों में जब इसका उपयोग नहीं होता, तब इसके सभी महत्वपूर्ण उपकरण एक कमरे में ताला लगाकर बन्द कर दिये जाते हैं, ताकि चोरी न हों।

चिकमंगलूर जिला पंचायत की सीईओ सुन्दरा नाईक बताती हैं कि जब सरकार ने यह योजना लागू करने का फ़ैसला किया उसी वक्त हमने तय कर लिया था कि सारा सामान तथा उपकरण अच्छी क्वालिटी का लगायेंगे। हमने सरकारी 'निर्मिती केन्द्रों' पर भरोसा करने की बजाय निजी लोगों को सामान आपूर्ति का ठेका देना शुरु किया। इस बात का शुरु-शुरु में काफ़ी विरोध भी हुआ, लेकिन धीरे-धीरे सब शान्त हो गया। टैंक के आकार के अनुसार इस सिस्टम को लगाने का खर्च 32,000 रुपये से लेकर 62,000 रुपये है। चिकमंगलूर में छत का पानी नीचे उतारने वाले गटर पाईप से लेकर हैण्ड पम्प तक सभी सामान उच्च गुणवत्ता का लगाया गया है। कीलों और बोल्ट की जगह पाइपों को फ़िक्स करने के लिये पक्के क्लेम्प लगाये गये हैं। इसी प्रकार 'L' तथा 'U' आकार के मोड़ देने के लिये भी स्थानीय लेकिन 'गेल्वेनाइज़्ड क्लेम्प' लगाये गये हैं।

चिकमंगलूर में रेनवाटर सिस्टम लगाने वाली कम्पनी, बंगलोर स्थित फ़ार्मलैण्ड रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के मालिक विजय राज ने बताया कि, हमने स्कूलों में प्रत्येक दो फ़ीट के पाइप पर एक क्लेम्प के अनुसार माल दिया है ताकि पाईप मजबूत बने रहें, और आसानी से उखड़े नहीं। जिन स्कूलों में लोहे के एंगलों पर पाईप टिकाये गये हैं, वहाँ हमने वेल्डिंग मशीन भिजवाकर मजबूत काम किया है। इसी कम्पनी ने 'फ़िल्टर' और 'हैण्डपम्प' का भी निर्माण किया है, इनके फ़िल्टर का डिजाइन कुछ इस तरह तैयार किया गया है ताकि 200 माइक्रोन से भी बारीक कण ज़मीन में उतरने से पहले ही रोक दिया जाता है, जबकि हैण्डपम्प ज़ंगरोधी धातु से बने हैं।

सरकारी मदद और संस्थाओं द्वारा संचालित रूफ़वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के खराब संचालन के लिये सिर्फ़ परिस्थितियाँ ही जिम्मेदार नहीं हैं, असल में स्थानीय संस्थाओं और पालकों-बच्चों को इसका महत्व समझाने और इससे जोड़ने का भी गंभीर प्रयास नहीं किया गया। हालांकि प्रत्येक स्कूल में फ़ार्मलैण्ड RWH सिस्टम ने उपकरणों के साथ बाकायदा एक सचित्र रंगीन पुस्तक भी दी है, जिसमें सभी कुछ समझाया गया है, लेकिन जब तक बच्चों और पालकों की इसमें सक्रिय भागीदारी नहीं होगी तब तक यह योजना सही नहीं चलेगी।

एक और समस्या उपकरणों, पाइपों के बुरे रखरखाव, खराबियों और माल के चोरी होने की भी है, खासकर स्कूलों में छुट्टियों के दौरान। इससे बचाव के लिये अधिकतर स्कूलों में चोरी से बचने के लिये फ़िल्टर और पम्पों को ताला लगा कर रखा गया है। इनमें से अधिकतर कीमती उपकरणों को नेशनल इंश्योरेंस कम्पनी से बीमा भी करवाया गया है जिसकी 100 रुपये वार्षिक किश्त भी स्कूल प्रशासन भरता है।

इसके बावजूद असली खुशी तो 'पानी की उपलब्धता' ही है… चिकमंगलूर के कुवेम्पु सेंटेनरी सरकारी स्कूल के हेडमास्टर एचके ओंकारप्पा कहते हैं कि नल के पानी के मुकाबले रेनवाटर अधिक मीठा और स्वादिष्ट है, दोनों के बीच अन्तर साफ पता चलता है। हम स्कूल में पीने और मध्यान्ह भोजन पकाने के लिये रेनवाटर का ही इस्तेमाल करते हैं। यहाँ तक कि बच्चे भी इसी पानी का उपयोग करना पसन्द करते हैं। इस स्कूल में पिछले एक साल से यह सिस्टम लगा हुआ है और बराबर काम कर रहा है।

वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने वाली एजेंसी ने एक वर्ष पूरा होने पर सभी स्कूलों का दौरा किया और सभी उपकरणों की जाँच करके उन्हें 'उपयोगी' और 'कार्यक्षम' होने का प्रमाणपत्र भी जारी किया। एजेंसी के विजयराज ने कहा कि हालांकि हमारे अनुबन्ध में ऐसी कोई शर्त नहीं थी, लेकिन हम नहीं चाहते थे कि स्कूल प्रशासन और बच्चे परेशानी उठायें और इसीलिये हमने छोटी-छोटी मरम्मत का काम भी मुफ़्त में कर दिया। शिमोगा जिला पंचायत के प्रतिनिधियों ने हाल ही में चिकमंगलूर के स्कूलों का दौरा किया और जानना चाहा कि यह सिस्टम कैसे काम करता है। वे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने अपने जिले के 200 स्कूलों के लिये यह रूफ़वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने का प्रस्ताव दिया, जिसमें से 44 का काम पूरा भी हो चुका।

तात्पर्य यह कि ऐसी योजनाओं में सरकारी अकर्मण्यता और आलस्य अच्छे-खासे सिस्टम और उपकरणों को भी खराब अथवा अनुपयोगी बना सकता है, वहीं दूसरी ओर यदि अच्छी गुणवत्ता का सामान लगाया जाये और पालकों-बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित की जाये तो यह बेहद सफ़ल सिद्ध हो सकता है और स्कूलों को वर्ष भर पानी की समस्या ही न रहे।