तालाब बचेगा तभी समाज बचेगा

Author:संतोष कुमार सिंह
Source:पंचायतनामा, 19 - 25 नवंबर 2012
अनुपम जीअनुपम जीगांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अनुपम मिश्र तालाबों के संरक्षण के काम के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। सहज-सरल व्यक्तित्व वाले अनुपम जी पानी के संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक की बजाय देशज तकनीक व परंपरागत तरीकों के प्रवक्ता रहे हैं। उनकी पुस्तकें ‘आज भी खरे हैं तालाब’ व ‘राजस्थान की रजत बूंदे’ काफी चर्चित रही हैं। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ ने पुस्तकों के छपने और बंटने के कई रिकार्ड तोड़ डाले। अनुपम जी से पंचायतनामा संवाददाता संतोष कुमार सिंह ने विस्तृत बातचीत की।

उत्तर भारत में प्रसिद्ध पर्व छठ हो रहा है। इस दिन नदियों या तालाबों पर जाकर मनाये जाने वाले इस त्योहार की परंपरा को कैसे देखते हैं आप?

यह पुरानी परंपरा रही होगी। या फिर उन इलाकों में है, जहां आज भी नदी या तालाब बने हुए हैं। आजकल तो लोग अपने घर की छतों पर ही इस परंपरा का निर्वाह करते हैं। ऐसा करना उनकी मजबूरी है। क्योंकि एक तो तालाब धीरे-धीरे सूख रहे हैं, नदियां सूख रही हैं। और जो हैं भी, वे इतनी बुरी हालत में हैं कि वहां अपनी धार्मिक परंपराओं के निर्वहण में लोग हिचकिचाते हैं। हमें यह समझना होगा कि इसके लिए दोषी कौन है। पहले अगर कोई तीर्थ पर नहीं जा पाता था, तो वह अपने यहां तालाब बनवाकर या फिर उसके रख-रखाव में योगदान देकर अपनी महती जिम्मेवारी को निभाता था। तालाब बनाने वाले के साथ तालाब बचाने वालों को भी समाज में पूजनीय माना जाता था।

तालाबों की स्थिति ऐसी क्यों हो गयी है?

आज का समाज आधुनिकता का दंभ भरते हुए तालाबों से कट गया लगता है। प्रशासन जिस पर तालाब की सफाई की जिम्मेवारी है, वह इसे एक तरह से समस्या के रूप में देखता है। अगर इस दिशा में कोई कदम उठाने की जरूरत भी होती है, तो इसे टालने के लिए बहाना खोजा जाता है। खर्चीला बताया जाता है। यह भी तर्क दिया जाता है कि पुराने की बजाय नये तालाब के निर्माण में खर्च कम आयेगा। इसका परिणाम हुआ की न नये तालाब बने, और न ही पुराने तालाबों को साफ किया गया। पहले के लोग ऐसा नहीं सोचते थे। तालाब की गाद को प्रसाद के तौर पर ग्रहण किया जाता था। किसान, कुम्हार और गृहस्थ तीनों परस्पर सामंजस्य से तालाब को साफ करने में जुटते थे। बिहार में इस कार्य को उड़ाही कहा जाता है। उड़ाही समाज की सेवा है, श्रमदान है। गांव के हर घर से काम कर सकने वाले तालाब पर एकत्र होते थे। हर घर दो से पांच मन मिट्टी निकालता था। काम के समय वहीं गुड़ का पानी बंटता था। पंचायत में एकत्र हर्जाने की रकम का एक भाग उड़ाही के संयोजन में खर्च होता था। इसके अलावा गांव में कुछ भूमि, कुछ खेत या खेत का कुछ भाग तालाब की व्यवस्था के लिए अलग रख दिया जाता था।

आज तो खुद सरकार तालाबों की स्थिति को सुधारने के लिए प्रयासरत है? पुराने तालाबों की उड़ाही और नये तालाब के निर्माण के लिए मनरेगा के तहत विशेष प्रबंध किये गये हैं? स्थिति सुधरी है?

देखिए, तालाब हमारी परंपरा से जुड़े रहे हैं। केवल सरकारी योजनाएं बना देने मात्र से स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं होगा। स्थिति तभी सुधरेगी, जब समाज की भागीदारी बढ़ेगी। श्रमदान को बढ़ावा दिया जायेगा। लोगों को यह समझाया जायेगा कि तालाब बचेंगे तभी समाज बचेगा। ग्रामसभा को मजबूत करना होगा, पंचायतों को और अधिकार दिये जाने के साथ ही उन्हें जवाबदेह बनाना होगा। पुराने जमाने में गांव में पंचायत के भीतर ही एक और संस्था होती थी- एरी वार्यम। एरी वार्यम में गांव के छह सदस्यों की समिति की एक वर्ष के लिए नियुक्ति होती थी। जो तालाब के रख-रखाव और व्यवस्था की जिम्मेवारी लेता था। इसी तरह बिहार में मुसहर, उत्तर प्रदेश के हिस्सों में लुनिया, मध्य प्रदेश में नौनिया, दुसाध, और कोल जातियां तालाब का काम किया करती थीं। वर्तमान के झारखंड और पश्चिाम बंगाल के इलाकों में बसे संताल भी सुंदर तालाब बनाते थे। संताल परगना क्षेत्र में आज भी कई तालाब ऐसे हैं, जो संतालों की कुशलता की याद दिलाते हैं। बिहार के मधुबनी इलाके में छठवीं सदी में आये एक बड़े अकाल के समय पूरे क्षेत्र के गांवों ने मिलकर 63 तालाब बनाये थे। इतनी बड़ी योजना बनाने से लेकर उसे पूरी करने तक के लिए कितने बड़े स्तर पर तैयारी करनी पड़ी होगी। कितने साधन जुटाये गये होंगे। यह सोचने वाली बात है। मधुबनी में ये तालाब आज भी हैं और लोग इन्हें आज भी इन्हें कृतज्ञता से याद रखते हैं।

आज न सिर्फ सिंचाई के साधनों का अभाव है, बल्कि कई इलाकों में पेयजल का संकट भी है?

यह तो सभी स्वीकार करते हैं कि आगे आने वाले समय में देश के समक्ष जल संकट एक बड़ी चुनौती बन कर उभरेगा। आज भी जगह-जगह पर पानी की कमी की वजह से संघर्ष की स्थिति है। लेकिन यह सवाल हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या हम इस समस्या के प्रति सजग हुए हैं। जवाब यही है कि - नहीं। तो फिर जब हम ही सजग नहीं है, तो देश के नीति-नियंता से यह कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वे इस मसले पर गंभीर होंगे। ऐसे में जो भी योजनाएं बनायी जाती हैं, वे महज खाना पूर्ति नजर आती हैं। जबकि जरूरत इस बात की है कि इसके लिए व्यापक स्तर पर मुहिम चलायी जाये। गांव-गांव में बने कुएं और तालाब पेयजल व सिंचाई जल का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं। जब तक हम इन कुओं और तालाबों के रखरखाव पर ध्यान नहीं देंगे, और भूमि की जलसंग्रहण की परंपरागत तकनीक को बढ़ावा नहीं देंगे, तब तक इस आसन्न समस्या से कैसे निबट सकते हैं। हमें हर स्तर पर परंपरागत वर्षा जल के संरक्षण की व्यवस्था करनी होगी। तभी हम आसन्न चुनौती से निबट सकते हैं।

नीति निर्माता जल संकट से निबटने के लिए नदियों को जोड़ने की योजना पर बल देते हैं? आपकी क्या राय है?

समय-समय पर इसको लेकर बहस चलती रहती है। नदी जोड़ने का काम प्रकृति का है, सरकार का नहीं। जहां दो नदियां जुड़ती हैं, वह तीर्थस्थल बन जाता है। नदी जोड़ने से अनेक गांव डूबेंगे, वनों को नुकसान पहुंचेगा और दलदल उत्पन्न होगा। नदियां प्राकृतिक रूप से अपनी धाराएं बदलती रहती हैं और ऐसे में किसी एक बिंदु से किसी दूसरी नदी को जोड़ना बिल्कुल ही व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता। उदाहरण के लिए अगर बिहार की नदी कोसी को देखें तो पिछले 100 सालों में कई किलोमीटर मार्ग बदल चुकी है। कोसी पर बैराज और तटबंध बनाकर उसे बांधने की कोशिश अगर लगातार जारी रहती है तो इससे और तबाही आयेगी। बैराज और तटबंध उन नदियों में कारगर सिद्ध हो सकते हैं, जिनमें गाद कम होता है और जिनके बहाव की गति धीमी हो।

एक तरफ आप ‘आज भी खरे हैं तालाब’ नामक पुस्तक लिखकर तालाब को बचाने के उपाय सुझाते हैं, वहीं देश की अधिकतर नदियां संकट में हैं। गंगा-यमुना को बचाने अभियान चल रहे हैं, करोड़ों खर्च हो रहे हैं। क्या कहेंगे आप?

सवाल सिर्फ गंगा-यमुना का ही नहीं है, बल्कि देश की 14 बड़ी नदियां बड़े संकट की शिकार हैं। छोटी नदियां मर रही हैं। नदियां मरती रहीं तो हमारा अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा। नदियों के बहाव क्षेत्र में वास स्थान बनाये जा रहे हैं और नदियां उफान को तैयार हैं। आज स्थिति यह बनती है कि कहीं बाढ़ से परेशानी है, तो कहीं सुखाड़ से। लेकिन साथ ही साथ यह भी सही है कि नदियां लाखों सालों का कैलेंडर बनाकर चलती हैं। वे लाखों साल में बनती हैं। न मालूम कौन सी नदी कितने बरस बाद फिर कब जिंदा हो जाये? कुछ पता नहीं। लेकिन हमें सजगता तो बरतनी ही होगी। 20 वर्ष में गंगा की साफ-सफाई के मद में सरकार 39,226 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है, लेकिन सामाजिक व बुनियादी मसलों को ध्यान न देने की वजह से अब तक नाकामी हाथ लगी है। इसलिए हमें कानूनी पक्ष को मजबूत करने के साथ ही सामाजिक पक्ष पर भी लोगों की सोच बदलनी होगी। केवल कभी-कभार आंदोलन करने मात्र से स्थिति में सुधार नहीं होगा। इसके लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी। यह तो सभी स्वीकार करते हैं कि आगे आने वाले समय में देश के समक्ष जल संकट एक बड़ी चुनौती बन कर उभरेगा। आज भी जगह-जगह पर पानी की कमी की वजह से संघर्ष की स्थिति है। लेकिन यह सवाल हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या हम इस समस्या के प्रति सजग हुए हैं। जवाब यही है कि - नहीं। तो फिर जब हम ही सजग नहीं हैं, तो देश के नीति नियंताओं से यह कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वे इस मसले पर गंभीर होंगे।

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