तीन दशक निमाड़

Author:मेधा पाटकर
Source:शुक्रवार, 16-31 अगस्त, 2016

पहाड़ी आदिवासियों ने हमें तो बहुत सिखाया ही, खुद की और अगली पीढ़ी की शिक्षा की नींव डाल दी।

.नर्मदा की घाटी में पहाड़ से निमाड़ तक संघर्ष को अब 31 साल पूरे हो रहे हैं। पहाड़ी आदिवासियों ने हमें तो बहुत सिखाया ही, पर साथ-साथ खुद की और अगली पीढ़ी की शिक्षा की नींव डाल दी। इस पूरी प्रक्रिया में प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार, संसाधन के निरंतर उपयोग से लेकर सादगी की जीवन-प्रणाली तक क्या नहीं सीखा हमने? हम उनके संसाधनों पर निर्भरता को न जाँचते, न उसकी अमूल्यता परखते हैं जब शासनकर्ता नदी और घाटी पर आक्रमण या अतिक्रमण करते हैं, तब गाँव की इकाई और एका ही आधार बनता है। आदिवासी क्षेत्र में यह अधिक आसान होता है, बस चट्टान और पहाड़ चलकर और चढ़कर जाने की हिम्मत होनी चाहिए।

मध्य प्रदेश के निमाड़ के क्षेत्र में दलीय राजनीति से ऊपर उठकर गाँवों का संघर्ष जाति-पाति तोड़कर आगे बढ़ाना पड़ा। उसके लिये हर मोड़ पर अंदर झांककर देखने वाले कुछ किसान, नदी के साथ अनोखा रिश्ता रखने वाले मछुआरे, भरसक मेहनत करने वाले कुम्हारों के साथ गरीब से गरीब परिवारों से भी ऐसे शख्स मिले जिन्होंने पैसे के लालच को धिक्कारा और यह स्वीकार किया कि हमें मानेसरी (नर्मदा) बचानी होगी सुख-समृद्धि देखे किसानों ने पहाड़ का रास्ता पकड़ा और एक नहीं, कई बरसातें निकालीं। वर्षा काल में पानी से टकराते सत्याग्रही खड़े रहे। तब किसी को फर्क समझाना नामुमकिन था।

आदिवासी बोली में बूढ़े राण्या भाई, बाबा भाई ने अपना वक्तव्य दिखाया तो उनकी राजनीतिक सोच-समझ, विकास पर टिप्पणी आदि से कई प्रकार से प्रभावित हुए बुद्धिजीवी भी। पिंजारी बाई को दिल्ली की सभा में प्रभाष जोशी जी ने उत्कृष्ट वक्ता घोषित किया था। एक पीढ़ी निकल गई तो अब दूसरी पीढ़ी खड़ी हो रही है, अपनी सोच विकसित करने में उन्हें अभ्यास क्रम काम नहीं आ रहा लेकिन आंवार होता है आंदोलन। उन्हें बाजारवाद से दूर रखना पहले से अधिक दुष्कर चुनौती है जरूर।

अहिंसक संघर्ष में सबसे अहम शक्ति होती है जीवटता। उसी के लिये महिलाएं अधिक मजबूत और तैयार होती हैं। चाहे दीर्घ यात्राएं हो या उपवास, मंजिल तक पहुँचने की उनकी जिद ही कामयाबी लाती है। उन्हें ‘अवकाश’ देने के लिये पुरुषों की दादागिरी तोड़ने में कभी असफलता हाथ लगी, लेकिन 31 सालों में, आज तक उन्होंने ही संघर्ष और निर्माण को भी बल दिया।

ग्रामीण और शहरी स्थानीय वैश्विक विश्व बैंक को चुनौती, अमेरिका की संसद में संसदीय समिति के सामने प्रस्तुति और सन 2007 से हर न्यायालय में अपने अधिकारों पर बहस की चुनौती महत्त्वपूर्ण रही और परीक्षा में बाँध, नहरें, भ्रष्टाचार, अत्याचार, अन्याय, आदिवासियों के अधिकार तक कई मुद्दों पर मोर्चों और हमने शासन को, पूँजीनिवेशकों को ललकारा और हर मोड़ पर समाज की संवेदना को पुकारा। देश और दुनिया में मिले कई सहयोगी। कुछ भूतपूर्व न्यायाधीश, कुछ प्रशासक और बुद्धिजीवी और संघर्षकर्ता। वैसे ही लेखक-पत्रकार भी। इन्हें जोड़कर रखने में कई बार हम कम पड़े, तो कई बार आखिर तक साथ देने की उनकी तैयारी सामने आयी।

आज सोशल मीडिया की ताकत उभरी है। लेकिन हम ठहरे जन आंदोलनों के मार्ग पर जाननेवाले। मीडिया में हमारी पहचान नहीं है, तो क्या हम गैर-सामाजिक हैं? सत्ता और सत्ताधीशों ने अब जब जनता को भुक्खड़ जनता मानना शुरू किया, संवाद तोड़ा और हर जन संगठन की शक्ति को तोड़ा है तो ‘हम भी कम नहीं’ दिखाना जरूरी है।

बाँध ऊपर उठा है, उठते जल के साथ हमारा दिल, हमारा विश्वास गिर नहीं सकता है। यही हमारी अपेक्षा है। हम वहीं हैं, जहाँ थे गिर नहीं सकता है, यही हमारी अपेक्षा है। हम वहीं हैं, जहाँ थे, नर्मदा नदी किनारे। राजघाट पर। यहाँ अंत्य संस्कार का घाट है, लेकिन महात्मा गाँधी की समाधि भी है, जिस पर संदेश लिखा हैः हमारी संस्कृति और सभ्य बढ़ते उपभोग पर नहीं, जरूरतों को मर्यादित रखने पर ही निर्भर है। वही होगा सच्चा स्वराज।

(लेखिका नर्मदा बचाओ आंदोलन की सूत्रधार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।)