ठंडे रेगिस्तान

Author:सुबोध महंती
Source:विज्ञान प्रसार

”अधिकतर रेगिस्तानों को गर्म क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, लेकिन संभवतः सभी रेगिस्तानी जीवोम क्षेत्र में ठंडे रेगिस्तान सबसे अनोखे क्षेत्र होते हैं।“ www.worldbiomes.com/biomes desert_htm

ठंडे या शीत रेगिस्तान की परिभाषा जनमानस की तर्कहीन धारणा के विपरीत है; जनसमान्य द्वारा गर्म रेगिस्तान को तो विश्व रेगिस्तानों से संबंधित माना जाता है लेकिन ठंडे रेगिस्तानों को अद्भुत सुंदरता के बावजूद भी रूखा माना जाता है।

ठंडे रेगिस्तान शीतकाल में हिमपात के कारण निर्जन स्थल के रूप में जाने जाते हैं। पर्वतों के शिखरों तथा ध्रुवीय प्रदेश के निकटवर्ती क्षेत्रों में भी ऐसा ही वातावरण रहता है। ठंडे रेगिस्तान अंटार्कटिका, ग्रीनलैण्ड और आर्कटिक प्रदेशों में फैले हुए हैं। सर्दियों में भारी वर्षा होने के साथ इन क्षेत्रों में अक्सर गर्मियों में भी वर्षा होती है। ठंडे रेगिस्तान में सर्दियों का औसत तापमान -2 डिग्री सेल्सियस से -4 डिग्री सेल्सियस के बीच तथा ग्रीष्म ऋतु में 21 डिग्री सेल्सियस से 26 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है।

अधिकतर ठंडे रेगिस्तान चट्टानी अथवा हिम से ढ़के क्षेत्र होते हैं। बारह महीनें बर्फ से ढके इन क्षेत्रों में अनाज भी नहीं उगता जिससे यहां खाने के लिए कुछ नहीं है। यहां सारा पानी बर्फ रूप में होता है। ठंडे और गर्म दोनों रेगिस्तानों में पानी का अभाव रहता है। वास्तव में गर्म रेगिस्तानों की तुलना में ठंडे रेगिस्तानों में पानी की अधिक कमी होती है। धरती का सर्वाधिक शुष्क रेगिस्तान अंटार्कटिका का ठंडा रेगिस्तान है।

ठंडे रेगिस्तानठंडे रेगिस्तान

जीवन के चिन्ह (निशान)


प्रायः कम तापमान वनस्पति और जीवों के विकास को बाधित करता है। पौधों, सूक्ष्म जीवों और जानवरों में विशेषकर समतापी जीवों में ठंडे तापमान में रासायनिक क्रियाएं धीमी हो जाती हैं। ठंडे रेगिस्तानों में पौधों के विकास के लिए समुचित मात्रा में सूर्य की किरणें (शक्ति) उपलब्ध नहीं हो पातीं हालांकि अधिकतर क्षेत्रों के ऊंचे स्थानों पर स्थित होने के कारण वहां पर पराबैंगनी विकिरण की अधिकता के कारण पेड़-पौधे पनप नहीं पाते हैं।

पर्याप्त विरोधाभास के अनुरूप ठंडे रेगिस्तानों में सर्वाधिक जीव-जन्तु बड़े एवं गर्म रक्त वाले होते हैं। हालांकि इनकी संख्या भी बहुत कम होती हैं अधिकतर असमतापी जीव ठंडे रेगिस्तान को कम ही पसंद करते हैं। यह क्षेत्र सीमित जैवविविधता को रखता है।

ठंडे रेगिस्तानों में रहने वाले जीवों को यहां की ठंडी विषम शीत ऋतु के प्रति अपने को ढालना होता है। ऐसा करने के लिए कुछ जीव सतह के नीचे बिल बनाते हैं। धरती पर बर्फ की चादर, अच्छे कुचालक की भांति व्यवहार कर भूमि के अंदर की ऊष्मा को बाहर आने से रोके रखती है। ठंडे रेगिस्तान के अधिकतर जीव बिल बनाकर भूमि की सतह से नीचे ही रहते हैं।

हिम तेंदुआहिम तेंदुआबहुत ठंडी परिस्थितियों में जीवनयापन के लिए कुचालकता बहुत महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए कस्तूरी मृग महीन रोवों की दो पर्त (लोमचर्म यानी फर) रखता है। जानवरों के बाहरी फर लंबे बालों से बने होते हैं जो इनको हवा और पानी से सुरक्षित रखते हैं। दूसरी अंदरुनी ऊनी फर शरीर की गर्मी को बाहर निकलने नहीं देते। कस्तूरी बेल -40 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भी अपने शरीर की गर्मी से गर्म रहता है। इसी प्रकार ठंडे रेगिस्तानों में रहने वालो पक्षी भी पंखों पर पतली पर्त विकसित कर यहां जीवित रहते हैं। ठंडे रेगिस्तान में केवल वही जीव जीवन यहां पर केवल वह पशु ही रह पाते हैं जो धरती खोदकर उसके नीचे अपना स्थान सुरक्षित बना सकें।

भारत का ठंडा रेगिस्तान – लद्दाख


भारत का सबसे ठंडा रेगिस्तान लद्दाख क्षेत्र है। इसे चट्टानी धरती अथवा अनेक दर्रों वाली भूमि भी कहते हैं। लद्दाख का क्षेत्रफल 1,17,000 वर्ग किलोमीटर है। यह संसार का सबसे ऊंचा निर्जन पठार है। लद्दाख की ऊंचाई 2750 मीटर से लेकर 7,672 मीटर है। लद्दाख क्षेत्र में चार पर्वत श्रृंखलाएं हैं; 1. विशाल हिमालय 2. लेह-लद्दाखलेह-लद्दाखजंस्कार 3. लद्दाख 4. काराकोरम। इतनी ऊंचाई पर स्थित चोटियां भारतीय मानसून के समय जलयुक्त बादलों को रेगिस्तान क्षेत्र (लद्दाख) में बरसने से रोकती हैं। अतः वहां वर्षा कम होती है। लद्दाख हमेशा से ठंडा रेगिस्तान नहीं था। हमें आज जो स्थान दिखता है, वहां किसी समय झीलों का विशाल तंत्रा था। उन झीलों में से कुछ आज भी अस्तित्व में हैं। यहां का वातावरण शुष्क, ऊंची नीची चट्टानों से युक्त है तथा यहां तापमान बहुत कम ही रहता है। यहां वर्षा विरला ही होती है।

लद्दाख क्षेत्र में शीत ऋतु में कभी-कभी तापमान -45 डिग्री सेल्सियस नीचे तक गिर जाता है। कठोर परिस्थितियों के बावजूद यह स्थान जीवन निर्जन नहीं है। यहां जानवर और वनस्पतियों ने इतनी रूखी परिस्थितियों में भी जीने के लिए अपने में अनुकूलन विकसित किया है।

सबसे छोटी भेड़-यूरियलसबसे छोटी भेड़-यूरियललद्दाख में जहां पर पानी उपलब्ध है वहां वनस्पतियां मिलती हैं। अनेक जंगली औषधियां और झाडि़यां छोटे-छोटे सोतों या झरनों के किनारों पर उगती हैं। कुछ वनस्पतियां ऊंची ढलानों के सिंचित क्षेत्रों में भी मिलती हैं। गर्मियों में भारत के गर्म हिस्सों से अनेक पक्षी लद्दाख पहुंचते हैं। एक शुष्क क्षेत्र के बावजूद लद्दाख की पक्षियों की विविधता अद्भुत है। यहां कुल 225 प्रजातियों के याकयाकपक्षी, जिनमें से अधिकतर प्रवासी पक्षी हैं, देखे गए हैं। इनमें से कुलिंग, दहियल, थिरथिरा और हुदहुद गर्मियों के मौसम में अधिक दिखाई देते हैं। इनके अलावा इस क्षेत्र में भूरे सिर वाली गॅर, ब्राह्ममिण बत्तख, हंस, काली गर्दन वाली सारस, कोआ, तिब्बती रामचकोर, लैमरगियर और सुनहरी बाज भी देखे जा सकते हैं।

लद्दाख के स्तनधारी पशुओं में मुख्य रूप से दुर्लभ साकिन, याक (एक प्रकार का जंगली गाय), संसार की सबसे बड़ी आकार की तिब्बतीय भेड़ नयान, भराल (नीली भेड़) तथा संसार की सबसे छोटी भेड़ यूरियल, भूरी भेड़, मारमोट्स, खरगोश, हिम तेंदुआ, बनबिलाव, तिब्बती हिरण एवं तिब्बती भेडि़या है। हाल ही में इस क्षेत्र में तिब्बती रेतीली लोमड़ी खोजी गई है।

लद्दाख के निवासियों की जीवन-शैली परंपरागत है। यहां के स्थानीय निवासी भेड़ तथा याक पालने के साथ ग्रीष्म ऋतु में नदियों की तली में जौ की खेती करते हुए जीवनयापन करते हैं।

Latest

वायु प्रदूषण कम करने के लिए बिहार बना रहा है नई कार्ययोजना

3.6 अरब लोगों पर पानी का संकट,भारत भी प्रभावित: विश्व मौसम विज्ञान संगठन

अब गंगा में प्रदूषण फैलाना पड़ेगा महंगा!

बीएमसी ने पानी कटौती की घोषणा की; प्रभावित क्षेत्रों की पूरी सूची देखें

देहरादून और हरिद्वार में पानी की सर्वाधिक आवश्यकता:नितेश कुमार झा

भारतीय को मिला संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान

जल दायिनी के कंठ सूखे कैसे मिले बांधों को पानी

मुंबई की दूसरी सबसे बड़ी झील पर बीएमसी ने बनाया मास्टर प्लान

जल संरक्षण को लेकर वर्कशॉप का आयोजन

देश की जलवायु की गुणवत्ता को सुधारने में हिमालय का विशेष महत्व