दिग्गजों की कर्मस्थली में पड़ गया सूखा

Author:रिपोर्ट अंकित तिवारी

इलाहाबाद को आधिकारिक तौर पर प्रयागराज के नाम से जाना जाता है।  उत्तरप्रदेश के इस जिले से कई राजनीति के  दिग्गजों ने देश का  प्रतिनिधित्व किया है ।  1952 में  भारत के आजादी के बाद सबसे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस क्षेत्र को चुना था और लगातार तीन बार जीत हासिल की थी। इसके बाद 1971 में  भारत के 7वे प्रधानमंत्री  विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की थी । वही 1984 में बॉलीवुड के महा नायक अमिताभ बच्चन  ने पहली बार यहाँ से चुनाव लड़ा  और  पूर्व मुख्यमंत्री  हेमवंतीनंदन बहुगुणा को करारी शिकस्त दी थी। कई वीआईपी  लोगों  की कर्मस्थली होने के बावजूद  आज भी यहाँ के लोग पानी की बूंद बून्द के  लिये  मोहताज है ।  पानी की किल्लत से जूझ  रहे  इस जिले के  ग्रामीणों की समस्या कोई नई और वर्तमान की नहीं, बल्कि बीते कई वर्षों की है। प्रयागराज दो क्षेत्रों में बटा हुआ है  एक  जमुना पारऔर दूसरा  गंगा पार ।

पानी के मामले में जमुना पार  क्षेत्र की स्थिति गंगा पार वाले क्षेत्र के मुकाबले बेहद  खराब है  जमुना पार के अंतर्गत आने वाले   पहाड़ी पथरीली वाला क्षेत्र शंकरगढ़ ब्लॉक में गर्मियों के समय ग्राउंड वाटर का लेवल काफी नीचे चले जाता है । जिसके कारण कई गांव में पेयजल की किल्लत शुरू हो जाती है  ऐसे में गींज और लोहघरा के ग्रामीणों   को पानी की पूर्ति के लिए पानी के टैंकरों और तालाबों पर निर्भर रहना पड़ता है।  वही पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के  गांव मांडा में भी ग्राउंड वाटर का लेवल नीचे गिरने से अप्रैल-मई  के महीने में पानी की किल्लत शुरू हो जाती है ।

इसके अलावा कोराव तहसील के  आदिवासी इलाके भइया बड़ोखर और  मेजा के खुर्द, किसोट, तलाइया, सोपोहा, बसहेरा आदि दर्जनों गांव में ग्रामीण कुएं  के पानी निकाल कर  जीवन यापन करते हैं। लेकिन गर्मी शुरू होते ही कुएं सूख जाते हैं। इससे ग्रामीणों को दूर-दराज से पैदल चलकर पानी लाना पड़ता है।   तो कुछ ऐसा ही हाल पाठा क्षेत्र का भी है जहां कई गांवों में मार्च से ही जलस्तर काफी नीचे चला जाता है, जिससे कुंए सूखने के कगार पर पहुंच जाते है और जिन पर पानी रहता है उनकी क्वालिटी इतनी खराब रहती है कि उंन्हे पिया भी नही जा सकता है ।

ऐसे में यहां के लोगों को टोंस नदी पर ही निर्भर रहना पड़ता है जो पावर प्लांट के कचरे के कारण दूषित नदियों के लिस्ट में  शामिल हो  हो गई है ऐसा नही है कि जहाँ सरकारी योजना नहीं पहुँची है वही पानी की किल्लत है। जिन क्षेत्रों में सरकारी  योजनाएं पहुँची वहाँ भी लोग पानी समस्या से जूझ रहे है भटौति सपाहा ऐसा ही एक गाँव है जहाँ  ग्रामीणों का कहना है कि उनके घरों तक जरूर पानी की पाईपलाइने पहुँची है लेकिन उसके बावजूद हर दिन उन्हें पानी की समस्या का सामना करना पड़ता है।

इसके लिये वह जल निगम को जिम्मेदार ठहराते है क्योंकि गांव में जिस  पाईपलाइनो  से पानी पहुँचता है  वह   जगह जगह टूटी और खराब  हो चुकी है और उन्हें ठीक करने काम जल निगम का है। जिन्हें अभी तक ठीक नही किया गया है।  किपराव गांव में भी पानी को लेकर  यही स्थिति है, गाँव मे जरूर ओवर हेड टंकी का निर्माण किया गया है लेकिन आज तक उससे पानी सप्लाई नहीं हो पाई है। पानी की समस्या से गांव के किसान भी  परेशान है क्योंकि  खेत मे सिंचाई के लिए पानी नही मिल पा रहा जिसके कारण उनकी फसले सूख रही है। 

गांवों में पानी की समस्या हर वर्ष कि नही हर दिन के लिये  बनती जा रही है कई बार राज्य प्रशासन द्वारा यहाँ पानी की किल्लत दूर करने के लिये कई कदम उठाए गए लेकिन उसके बावजूद   पानी की समस्या दूर नही हो पाई है।  तमाम नाकामियों के बाद राज्य के अधिकारियों को अब बस उम्मीदें हर घर नल से है। जलजीवन मिशन जौनपुर  के प्रभारी अमित कटियार का कहना है कि केंद्र सरकार  हर घर नल की जो योजना है उससे गांव के प्रत्येक घर में नल लगाया जाएगा। इस योजना के तहत एक surface source scheme भी बनाई गई है।  जिससे यमुना और गंगा से पानी पाईप के जरिए गांव तक लाया जाएगा । इसके साथ ही उन्होंने कहा पानी की समस्या दूर करने के लिये इस योजना के तहत   ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने का भी प्रयास किया जाएगा। 

अधिकारियों के दावों से ऐसा लग रहा है कि यह योजना ग्रामीणों की बरसों पूरी समस्या को दूर कर देगा लेकिन ग्रामीणों को इन दावों पर यकीन नहीं  आ रहा है  क्योंकि  वह मानते हैं कि ये दावे सिर्फ कागजों तक सीमित रहते है।अधिकारियों के दावों से ऐसा लग रहा है कि यह योजना ग्रामीणों की बरसों पूरानी समस्या को दूर कर देगा लेकिन ग्रामीणों को इन दावों पर यकीन नहीं  आ रहा है  क्योंकि  वह मानते हैं कि ऐसे दावे अब तक सिर्फ कागजों तक ही  सीमित रहते है।